Maharashtra Coronavirus
चप्पल और क्रीमरोल: लॉकडाउन में 15 साल की रोहिणी के अरमान
"कोरोना के बाद जब एक बार फिर से काम मिलना शुरू हो जाएगा और पैसे मिलेंगे तो मैं सबसे पहले अपने लिए चप्पल खरीदूंगी और क्रीमरोल खाऊंगी" यह बात सुनने में शायद बहुतों को अजीब लगे कि चप्पल और क्रीमरोल जैसी मामूली चीज़ों को कोई कोरोना महामारी के चलते खरीद नहीं पा रहा है लेकिन महाराष्ट्र के बीड जिले के काठोड़ा गांव की दलित बस्ती में रहने वाली 15 साल की रोहिणी वाघमारे के लिए यह एक ज़मीनी हकीकत है. अपने माता पिता के साथ गन्ने की कटाई करने वाली रोहिणी के पहले से गरीब परिवार पर कोविड-19 की ऐसी मार पड़ी है कि वो घोर गरीबी में धकेले जा चुके हैं.
रोहिणी, उसके माता-पिता, बड़ा भाई और बड़ी बहन हर साल अक्टूबर से लेकर अप्रैल तक पश्चिम महाराष्ट्र और उत्तर कर्नाटक के शक्कर कारखानों में गन्ना काटने जाते हैं और लौटकर साल के बाकी महीनों में दिहाड़ी मजदूरी कर अपना घर चलाते हैं. लेकिन कोविड-19 में लॉकडाउन के चलते उन्हें कोई काम नहीं मिल रहा है और गुजर बसर करने का उनके पास कोई साधन भी नहीं बचा है.
गौरतलब है कि गन्ने की कटाई के लिए जाने वाले मजदूरों को मुकादम (शक्कर कारखानों के लिए गन्ना काटने वाले मजदूरों का प्रबंध करने वाला ठेकेदार) पेशगी देते हैं और मजदूरों को शोषण और उधारी के ऐसे चक्रव्यूह में फंसाते हैं जिससे वह कभी नहीं निकल पाते. ये पेशगी मिलने के बाद मजदूर 7-8 महीने तक गन्ने की कटाई करते हैं. इस पेशगी को स्थानीय भाषा में उचल कहा जाता है. रोहिणी के पांच लोगों के पूरे परिवार ने पिछले साल जुलाई में मुकादम से डेढ़ लाख की उचल ली थी. यह पैसे उन्हें इक्कठे मिलने के बजाय किश्तों में मिले थे.
रोहिणी कहती हैं, "पिछले साल भी बंद के वक़्त कोई काम नहीं था. घर में खाने पीने की दिक्कत थी. पिताजी मुकादम के पास गए थे. हमारे पूरे परिवार से गन्ना काटने के लिए मुकादम ने डेढ़ लाख की उचल तय की थी. लेकिन यह उचल उसने इक्कठी नहीं दी थी. कभी पांच हज़ार देता था कभी दस हज़ार, हालांकि अक्टूबर तक उसने सारे पैसे लौटा दिए थे लेकिन किश्तों में मिले पैसे बच नहीं पाते हैं. इस साल फिर काम नहीं है घर में चीज़ों की बहुत किल्लत है, कुछ दिन पहले मेरे पिता मुकादम से 5000 रूपये उधार मांगने गए थे लेकिन उसने पैसे देने से मना कर दिया. वह कह रहा था कि अगर हमारा परिवार कोरोना से मर गया तो वो किससे पैसे वसूल करेगा. अलबत्ता वो यह कहने लगा कि हमने पिछले साल डेढ़ लाख में से सिर्फ एक लाख की उचल का ही काम किया है और हमें उसे 50 हज़ार लौटाने पड़ेंगे."
रोहिणी पिछले अक्टूबर 2020 से लेकर अप्रैल की शुरुआत तक कोल्हापुर के एक शक्कर कारखाने में अपने परिवार के साथ गन्ना काट रहीं थी. उचल में लिए डेढ़ लाख तो वहां जाने के पहले ही ख़त्म हो गए थे तो लगभग सात महीने तक उनका परिवार कटे हुए गन्ने की पत्तियों को चारे की तरह बेच कर दिन में 100-150 रुपये कमा लेता था और उसी से सब्ज़ी खरीदता था.
वह कहती हैं, "अप्रैल में कोल्हापुर से लौटते वक़्त हमारे पास बिलकुल भी पैसे नहीं थे तो मेरे बड़े भाई आकाश ने 1500 रुपये में अपना मोबाइल बेच दिया था. लौटने के बाद उस पैसे की मदद से हमने अनाज और बाकी राशन खरीदा था. यहां आने के बाद लगभग दो महीने हो गए हैं, कोरोना के चलते कोई मजदूरी नहीं मिल रही है, खेतों में भी कोई मजदूरी नहीं देता है. अब इधर उधर से मांग कर खाना पीना चल रहा है."
जब हमने रोहिणी से पूछा कि उनके घर में कितना राशन है, तो वो तपाक से कहती हैं, "दो दिन का पीठ (आटा) और प्याज बची है." रोहिणी से जब पूछा गया कि क्या उनके घर में दाल, शक्कर, नमक, दूध, तेल, साबुन, सब्ज़ी है, तो वह जवाब देते हुए कहती हैं, "बस थोड़ी शक्कर और नमक है. बाकी साबुन, दाल, तेल, दूध वगैरह कुछ नहीं है."
वह आगे कहती है, "सिर्फ भाकरी चटनी है घर पर. हम सुबह शाम वही खाते हैं. सब्ज़ी हफ्ते में एक आध बार बनती है घर पर जब कोई दे देता है या कही से कुछ पैसे उधार मिल जाते हैं. आज भी सब्ज़ी नहीं है घर में इसलिए आज खाना खाने का मन नहीं कर रहा है."
वह थोड़ा मुस्करा कर कहती हैं, "मुझे अच्छा खाना खाने का मन करता है. मुझे चावल, चपाती, दाल, सब्ज़ी खाना है. मुझे क्रीमरोल, बेकरी के बिस्किट, नानखटाई, और केक खाना है. एक साल हो गया यह सब नहीं खा पायी, पिछले साल बिस्किट खाये थे पांच रूपये के. मुझे बिंदी, काजल, चूड़ी पहनना अच्छा लगता है. लेकिन अभी घर पर पैसे नही हैं. इसलिए यह सब कुछ नहीं कर सकते."
अपने हाथ में एल्यूमीनियम की दो पतली चूड़ियां दिखाकर वह कहती हैं, "यह पिछले साल साल संक्रांति पर 20 रूपये की खरीदी थीं. ज़्यादा पैसे नहीं थे तो सिर्फ एक-एक ही चूड़ी खरीदी. अभी कुछ दिन पहले हमारी बस्ती में एक पायल बेचने वाला आया था. मैं ऐसे ही पायल देखने गयी थी, लेकिन जैसे ही उसने पायल का दाम 300 बताया मैं बिना कुछ बोले घर लौट आयी."
अपने पैर की तरफ इशारा करते हुए वह कहती हैं, "मैं जंगल में लकड़ी काटने गयी तो पैर में चोट लग गयी थी. नंगे पांव गयी थी इसलिए खून निकल आया था चप्पल नहीं है मेरे पास. जब कोरोना ख़त्म होने के बाद काम मिलने लगेगा तो उस पैसे से चप्पल खरीदूंगी और क्रीमरोल खाऊंगी. लेकिन अभी बिलकुल पैसे नहीं है यह सब इच्छाएं दबानी पड़ती हैं. मां का चार दिन से पेट दुख रहा था उसकी दवाई लाने के लिए पैसे नहीं थे हमारे घर पर, बहुत बुरा लग रहा था. लेकिन नीम्बू पानी पीकर अब मां ठीक हो गयी है."
पांचवी तक पढाई कर चुकी रोहिणी पिछले कई सालों से अपने मां-बाप के साथ शक्कर कारखानों में जा रहीं हैं. वह पिछले तीन सालों से गन्ना काट रही हैं. वह कहती हैं, "पढाई करने का बहुत मन है लेकिन गन्ना काटने मां-बाप जाते हैं तो उनके साथ जाना पड़ता है. छोटी लड़कियों को यहां अकेले नहीं छोड़ते, इसलिए मां-बाप के साथ जाती हूं. मैं भी 12 घण्टे गन्ना काटती हूं.
रोहिणी की मां लता कहती हैं, "हमारे घर पर 10-20 रूपये तक नहीं हैं. अगर कुछ चोट लग जाए और तबीयत ख़राब हो जाए तो घर में ही इलाज करते हैं. क्या करें कुछ ज़रिया नहीं है हमारे पास. भाकरी और चटनी भी बड़ी मुश्किल से नसीब हो रही है. चटनी बनाने के लिए मिर्ची पाउडर भी हमारी पड़ौसन ने दिया है.
रोहिणी के पिता रमेश कहते हैं," हमारा जीना बहुत मुश्किल हो गया है. पैसे भी नहीं हैं काम भी नहीं है. कुछ तो काम मिलना चाहिए, ऐसे कब तक जिएंगे. प्रदेश सरकार को कुछ तो करना चाहिए.
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