Obituary
16 साल पहले इरफान द्वारा लिखा गया एक लेख
सिनेमा की एक्टिंग में अभी बहुत विकास होना हैं
समाज की जरूरत के रूप में रंगमंच का विकास हुआ. उसी रंगमंच का विकसित रूप है सिनेमा. सिनेमा तकनीकी दृष्टि से आगे है. रंगमंच के उद्देश्यों को लेकर सिनेमा आगे बढ़ा. लेकिन एक फर्क है दोनों में. थिएटर के लिए अकेला अभिनेता भी कुछ कर सकता है, पर सिनेमा के लिए अभिनेता को कैमरामैन, एडिटर आदि पर निर्भर रहना पड़ता है. यहां निवेश आरंभ होता है. निवेश के बाद उसकी रिकवरी भी चाहिए. इस तरह सिनेमा का कमर्शियल पहलू मजबूत होता है.
रंगमंच समाज का दर्पण है. समाज की समस्याओं और चिंताओं से जुड़ा रहता है रंगमंच. सिनेमा के कमर्शियल होने से इसमें मनोरंजन का दबाव बढ़ा. सिनेमा देखने गया दर्शक मनोरंजन के अलावा किसी और विषय में नहीं सोचता.
निश्चित ही रंगमंच से सिनेमा में आने पर बहुत सारी चीजें भूलनी पड़ीं. इस प्रक्रिया के बावजूद भूली या भुलाई गई चीजें भी दिमाग के किसी कोने में बैठी रहती हैं. वह सिस्टम में मौजूद रहती है. रंगमंच का अनुभव सिनेमा के काम आता है. अपने देश में मेथड एक्टिंग को अच्छी चीज नहीं माना जाता है. ऐसी कोशिश भी नहीं रहती कि एक्टर किसी किरदार पर मेहनत करें. सब कुछ तत्काल होता है, जबकि रंगमंच और लोकनाट्य शैलियों में किरदार की तैयारी पर बहुत जोर दिया जाता है. सिनेमा में नाटकीयता कम होती है. रियलिस्टिक एक्टिंग की भ्रांति में अभिनेताओं ने सिनेमा में आवश्यक मेहनत भी बंद कर दी है.
रंगमंच और सिनेमा दोनों माध्यमों की पृथकता स्पष्ट है. आप रंगमंच में उस तरह से बातें नहीं कर सकते, जिस तरह से सिनेमा में करते हैं. रंगमंच में आपको हर चीज मंच पर दिखानी होती है. सिनेमा की परेशानी अलग है. वहां एक्टर को कम समय मिलता है. लाइटिंग और सेट की व्यवस्था में समय लगने पर निर्देशक परेशान नहीं होता, लेकिन अभिनेता दो-चार टेक ले ले या रिहर्सल की मांग करें तो निर्देशक खीझने लगता है. सिनेमा की एक्टिंग में आमतौर पर मेलोड्रामा की मांग रहती है. कुछ कर दिखाने की मंशा काम करती है. सूक्ष्मता से अधिक स्थूलता पर फोकस रहता है, जबकि होना उल्टा चाहिए.
सिनेमा में रंगमंच से आए अभिनेताओं पर थिएट्रिकल होने का अभियोग लगता रहा है. मुझे लगता है कि इस टर्म का उपयोग लापरवाही के साथ हो रहा है. हमारे समीक्षक प्रशिक्षित नहीं हैं. वे किसी भी पारिभाषिक शब्द को उसके अर्थ और संदर्भ से अलग ले जाकर इस्तेमाल करते हैं. आप रिव्यू पढ़ें तो यही मिलेगा कि उसने खुद को दोहराया, रोल के साथ न्याय किया, रोल निभा नहीं पाया. क्या एक्टिंग को ऐसे ही समझा और समझाया जाता है?
मुझे नहीं लगता कि रंगमंच से सिनेमा में आए अभिनेता को कोई खास महत्व दिया जाता है. कई बार अभिनेताओं का संघर्ष लंबा हो जाता है. हां, किसी प्रकार आपने जगह बना ली तो अवश्य रंगमंच से आने का उल्लेख किया जाता है. आपकी प्रतिभा का श्रेय रंगमंच को दे दिया जाता है. इसमें कोई बुराई नहीं है, पर कलाकार के वैयक्तिक प्रतिभा को भी तो रेखांकित करना चाहिए.
मैं अपनी बात कहूं तो आरंभ में कैमरे के आगे बहुत बंधा महसूस करता था. मुझे ज्यादा जूझना पड़ा. लगातार अभ्यास के बाद में कैमरे के आगे सहज हो सका. रंगमंच की आरंभिक ट्रेनिंग में जितना सीखा, उससे आगे कोई एडवांस ट्रेनिंग नहीं हुई. रंगमंच का प्रशिक्षण कई बार आड़े भी आता है. फिल्म देखते समय पता चलता है कि परफॉर्मेंस में झटका लग रहा है. समीक्षक भी उस पर गौर नहीं कर पाते. आम दर्शक की तो बात छोड़ें. खुद को एहसास होता है अपनी गलतियों का.
रंगमंच से आए कलाकारों में केवल राज बब्बर ने स्टारडम का सुख भोगा. वास्तव में स्टारडम खास व्यक्तित्व से मिलता है. रंगमंच से आए अभिनेता वैसा व्यक्तित्व नहीं गढ़ पाते. अमिताभ बच्चन की एक्टिंग में दोनों खूबियां झलकती है. अपने देश में अभिनय की तकनीक और बारीकी की जरूरत ही नहीं पड़ती. यहां तो मेलोड्रामा चलता है. रियल और स्वाभाविक एक्टिंग के दर्शन हॉलीवुड की फिल्मों में होते हैं. शायद हमारे दर्शक भी अभी वैसी एक्टिंग के लिए तैयार नहीं हैं. मुझे लगता है कि सिनेमा की एक्टिंग में अभी बहुत विकास होना है. सिर्फ व्यक्तित्व का खेल या स्टारडम का प्रभाव लंबे समय तक नहीं चलेगा.
संतुष्टि तो नहीं मिलती. सिनेमा की सीमित एक्टिंग में संतुष्टि नहीं है. इसके संतोष दूसरे प्रकार के हैं. भौतिक सुख और संतोष मिल जाता है. आपको लोग पहचानने लगते हैं. आपके पास सुविधाएं रहती हैं, लेकिन सृजनात्मक सुख गायब हो जाता है. फिल्मों की एक्टिंग करते समय खटकता रहता है कि जो लोगों को अच्छा लग रहा है या जिसकी तारीफ हो रही है वह उपयुक्त नहीं है. शायद इसी कारण में कई बार अधिक आनंद नहीं उठा पाता. वह विराग चेहरे पर भी आता होगा और सुधि दर्शकों को लगता है कि मैं ठहर गया हूं... जड़ हो रहा हूं. मैं इस जड़ता को तोड़ना चाहता हूं. कोशिश है कि काम करते समय मुझे अपने आप में लगे कि मैं सच्चा हूं.
अप्रैल-जून 2005
(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज के विशेष सहयोग से प्रकाशित)
Also Read
-
The bigger story in Kashmir is the media’s silence on action against its own
-
‘How can you remove names without checking?’: Inside Prayagraj’s battle over voter lists
-
6 journalists summoned this month, ‘25’ in a year: The police trail following Kashmir’s press
-
Mark Carney calls out the rules-based global order lie, but only after it hurts middle powers
-
‘This is why he wanted to leave India’: Noida techie death raises civic safety questions