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उत्तर प्रदेश: सरकार के सामने संपादकों का आत्मसमर्पण
25 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के एक बड़े हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स की टॉप हेडलाइन देखकर लोगों का माथा घूम गया. योगी के हवाले से लिखा गया कि ऑक्सीजन, बेड, दवा की उत्तर प्रदेश में कोई कमी नहीं. यह खबर उस समय में प्रकाशित हुई जब राज्य के एक बड़े शहर गाजियाबाद के इंदिरानगर में बड़ी संख्या में लोग एक गुरद्वारे के बाहर सड़क पर ऑक्सीजन के लिए लाइन लगाकर खड़े थे. राज्य के अलग-अलग हिस्सों से इसी तरह की खबरें आ रही थी. किसी को बेड नहीं मिल रहा है तो कोई ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए अस्पतालों के चक्कर लगा रहा है. कई लोग इन असुविधाओं के चलते सड़कों पर ही दम तोड़ रहे हैं.
राज्य के श्मशान घाट एक अलग ही दिल तोड़ने वाली तस्वीर पेश कर रहे हैं. यहां लंबी-लंबी लाइने लगी हैं और लाश जलाने के लिए टोकन लेने पड़ रहे हैं. शायद ही कोई हो जो इस समस्या से अछूता बचा हो. लेकिन इस बीच देश के सभी बड़े अखबारों ने कमाल कर दिखाया. रविवार को सभी बड़े अखबारों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि प्रदेश में ऑक्सीजन, बेड और दवा की कोई कमी नहीं है. समस्या सिर्फ कालाबाजारी की है. इसके बाद से लोग सोशल मीडिया पर सीएम योगी की तस्वीर वाली इन खबरों को शेयर कर रहे हैं. लोग कह रहे हैं राज्य के मौजूदा हालात किसी से छुपे नहीं हैं लेकिन सीएम योगी के साथ-साथ इन अखबारों ने भी अपना ईमान बेच दिया है.
योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को समाचार पत्रों के संपादकों के साथ एक वर्चुअल बैठक की थी. जिसे रविवार को लगभग सभी अखबारों ने प्रमुखता से छापा. अमर उजाला अखबार पहले पेज पर सीएम योगी की तस्वीर के साथ लिखता है- "ऑक्सीजन का ऑडिट कराएंगे, 32 प्लांट भी लग रहे, तैयारी पहले से बेहतर." इस हेडिंग के ऊपर लिखा है कि योगी ने कहा- “ऑक्सीजन की कमी नहीं, समस्या कालाबाजारी है.”
वहीं अखबार अंदर खबर में लिखता है, "मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि किसी भी निजी या सरकारी कोविड अस्पताल में ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है. समस्या कालाबाजारी और जमाखोरी है. अस्पतालों में लगातार बेड बढ़ रहे हैं और रेमडेसिविर की भी कोई कमी नहीं है."
अखबार प्रदेश सरकार और योगी आदित्यनाथ के दावे का पूरी तरह से आंख मूंदकर गुणगान कर रहे हैं जबकि प्रदेश की स्थिति यह है कि उनकी अपनी बिरादरी के कई लोग यानी पत्रकार ही सुविधाओं की कमी के चलते जान से हाथ धो बैठे हैं.
वहीं हिंदुस्तान अखबार लिखता है, "लखनऊ को ऑक्सीजन की संजीवनी" नीचे एक और हेडिंग में दावा किया गया है, "उत्तर प्रदेश में ऑक्सीजन, जीवन रक्षक दवाओं और बेड की कमी नहीं."
अखबार खबर में सीएम योगी आदित्यनाथ के हवाले से लिखता है, "राज्य में दवा, बेड व वेंटीलेटर की कोई कमी नहीं है. यह आपदाकाल है लेकिन हमारी तैयारी पहले से बेहतर है. 36 जिलों में एक भी वेंटीलेटर नहीं था लेकिन आज हर जिले में वेंटीलेटर है. यूपी पहला राज्य है जिसने चार करोड़ टेस्ट किए हैं. अभी हम सवा दो लाख टेस्ट रोज कर रहे हैं. सभी को निशुल्क वैक्सीन की सुविधा देने वाला यूपी पहला राज्य है."
यही हाल दैनिक जागरण का है. जागरण लिखता है, "अब निजी अस्पतालों का होगा ऑक्सीजन ऑडिट: मुख्यमंत्री"
जबकि खबर में अंदर लिखा है, "सीएम योगी कहते हैं कि इस आपदा के काल में नकारात्मक खबरें और भयावह तस्वीरें फैलाने वाले सक्रिय हैं, जिनका काम लोगों में भय पैदा करना है. सरकार की तरफ से जांच भर्ती ऑक्सीजन और दवाओं की आपूर्ति जैसी तैयारियां पूरी हैं. यह संक्रमण चूकि पहली लहर के मुकाबले 30 गुना ज्यादा है, इसलिए ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है. रेमडेसिविर का अभाव नहीं है.”
वहीं एनबीटी अखबार लिखता है, "ऑक्सीजन, बेड, दवा की कमी नहीं: योगी"
एनबीटी पहला अखबार दिखाई दे रहा है जिसने संपाकों द्वारा पूछे गए कुछ सवाल छापे हैं. हालांकि मुख्यमंत्री ने इन सवालों के जवाब क्या दिए यह कहीं नहीं छपा है. संपादकों द्वारा पूछे गए इन सवालों को आप एनबीटी की इस खबर में देख सकते हैं.
यह घटना मौजूदा समय में पत्रकारिता की बदहाल स्थित को बहुत बदसूरत तरीके से हमारे सामने रखती है. कोरोना के हालात पूरे देश में बेकाबू हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश इस लिहाज से अलहदा है कि यहां बिना जांच के ही बड़ी संख्या में मौतें हो रही हैं और उनको कोविड के आंकड़े में दर्ज तक नहीं किया जा रहा है. ऐसे दौर में जब लखनऊ के तमाम संपादकों से मुख्यमंत्री ने बातचीत की तब उनसे कड़े सवाल पूछने की बजाय संपादकों ने मुख्यमंत्री के वकतव्य को जस का तस छाप दिया. उनसे पलट कर सवाल तक नहीं किया.
किसने कल्पना की थी कि एक दिन मुख्यमंत्री का प्रेस रिलीज वकतव्य देश के सभी बड़े अखबारों की पहले पन्ने की सुर्खी बन जाएगा. पत्रकारिता का यह बदसूरत सच आज हमारे सामने है. बता दें कि संपादकों के साथ यह वर्चुअल संवाद शनिवार को हुआ था. उस दिन उत्तर प्रदेश में कोरोना के 38,055 नए केस सामने आए. जो अब तक का सबसे ज्यादा है. वहीं उस दिन 223 सक्रमितों की मौत हो गई. यह वो आकड़ा है जो सरकार दर्ज कर रही है. अपुष्ट आंकड़े इससे कई गुना ज्यादा हैं.
न्यूजलॉन्ड्री ने उस वर्चुअल बैठक में शामिल कुछ संपादकों से भी बात की.
इस संवाद में अमर उजाला के लखनऊ संपादक राजीव सिंह भी शामिल हुए. जब हमने उन्हें फोन किया तो उन्होंने वर्चुअल मीटिंग से जुड़ा सवाल सुनते ही हमारा फोन काट दिया.
इसके बाद हमने हिंदुस्तान अखबार के लखनऊ संपादक सुनील द्विवेदी को फोन किया. हमने उनसे सवाल किया कि क्या सीएम योगी से बातचीत में आपने कोई सवाल पूछा था क्या? इसका उन्होंने कोई जवाब देने की बजाय हमारा फोन कट कर दिया.
दैनिक जागरण के लखनऊ संस्करण के संपादक आशुतोष शुक्ला ने भी यह कहते हुए बात करने से मना कर दिया कि वह अभी बहुत व्यस्त हैं.
इसके बाद न्यूजलॉन्ड्री ने एनबीटी लखनऊ के संपादक सुधीर मिश्रा से बात की. उन्होंने बताया, "जो सवाल संपादकों द्वारा पूछे गए हैं उन्हें हमने अखबार में छापा है. दूसरी बात हम प्रेस कांफ्रेंस भी छापते हैं और जनता की तकलीफ भी छापते हैं. आप सिर्फ हेडिंग पर मत जाइए हमने जो मुद्दे उठाएं हैं, जो सवाल किए हैं वह भी देखिए. अगर आप कोई खबर कर रहे हैं तो उसमें ईमानदार जर्नलिज्म होना चाहिए. धारणा बनाकर काम नहीं करना चाहिए. लोगों ने अगर खबर को सोशल मीडिया पर डाल दिया है तो उस पर सोच नहीं बनानी चाहिए. उसके लिए दस खबरें पढ़नी चाहिए. आपने सभी अखबार पढ़े होंगे लेकिन सिर्फ हमने अपने अखबार में सवाल छापे हैं. और उन सवालों में वह सभी बातें हैं जो आप हमसे कहना चाहते हो."
वह आगे कहते हैं, “जब आप सरकार के खिलाफ खबरें छाप रहे हैं तो आपको उनकी बात भी करनी पड़ेगी. हम सब एकतरफा बात नहीं कर सकते हैं. मुख्यमंत्री ने जो दावा किया है हमने उसे छापा है और नवभारत टाइम्स ने कोई अपना विश्लेषण नहीं किया है.” इसके बाद उन्होंने हमारे व्हाट्सएप पर कोविड के चलते लोगों कोे हो रही परेशानियों से जुड़ी कुछ खबरें भी हमें भेजीं.
हमने लखनऊ के पत्रकार और मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी से इस मसले पर बात की. वो कहते हैं, "मैं 36 साल से पत्रकारिता कर रहा हूं लेकिन उस बैठक मैं मुझे नहीं बुलाया गया. जबकि मैं अध्यक्ष हूं उन सभी पत्रकारों का जो मुख्यमंत्री और शासन के बीच काम करते हैं. लेकिन इस बैठक की कोई जानकारी मेरे पास तक नहीं पहुंची. इस मीटिंग का हमें भी ऐसे ही पता चलता जैसे आपको चला है."
वह कहते हैं, "मुझे इस बात पर आश्चर्य होता है कि इस वक्त जो तकलीफ है जो परेशानियां हैं उन्हें दिखाना चाहिए. और अखबारों में लिखकर चीजों को संतुलित नहीं करना चाहिए. हम खुद किसी को सिलेंडर नहीं दिलवा पा रहे हैं. हमारे पास पचासों लोगों का फोन आता है. हम खुद परेशान हैं कि हम किसी को एडमिट नहीं करवा पा रहे हैं."
वह आगे कहते हैं, "एक वरिष्ठ पत्रकार दो-दो, तीन-तीन अखबारों में एडिटर रहे हैं, उन्हें लखनऊ में इलाज के लिए जगह नहीं मिली तो वह अब कानपुर जाकर अपना इलाज करवा रहे हैं. उनको लखनऊ के किसी अस्पताल में जगह नहीं मिली. देखिए जब जनता का विश्वास टूटता है तो मीडिया में क्या छाप रहा है उससे उसे फर्क नहीं पड़ता है. आज करोड़ों रुपए के प्रायोजित विज्ञापन देकर खबरें छप रही हैं. आदमी इस पर कैसे विश्वास करेगा. अब जो दिख रहा है आदमी तो उस पर ही विश्वास करेगा ना."
"हमारे हेल्थ सिस्टम का जो इंफ्रास्ट्रक्चर होना चाहिए वह हमारे यहां नहीं है. यह दो चार टैंकर ऑक्सीजन मंगाकर ही खुश हैं. जबकि आदमी मर रहा है. मीडिया को यह देखना चाहिए. मुझे थोड़ी सी संतुष्टि जरूर थी कि इतना बड़ा संकट आया तो इस बार मीडिया ने थोड़ा सा सही लिखना व दिखाना शुरू किया. वास्तविक स्थिति को दिखाया चाहे वो इटावा से लेकर गोरखपुर या बनारस से लेकर लखनऊ कहीं की भी हो. इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया दोनों ने ही यह दिखाना शुरू कर दिया था. हमको लग रहा है कि शायद मुख्यमंत्री को इसलिए ही यह सब करने की जरूरत पड़ी." उन्होंने कहा.
वह आगे कहते हैं, "जब मुझे मुख्यमंत्री के साथ पत्रकारों के इस संवाद के बारे में पता चला तो मैंने टिप्पणी की कि इसकी कोई तस्वीर तक सामने क्यों नहीं आई. जबकि वर्चुअल मीटिंग के भी स्क्रीनशॉट बाहर आते हैं लेकिन इसमें ऐसा कुछ नहीं हुआ. इसलिए कौन संपादक क्या छापेगा, यह सिर्फ उतना ही छापेंगे जितना मुख्यमंत्री ने बोला है. यह सब करोड़ों के विज्ञापन के चलते ऐसा हो रहा है."
इस बारे में न्यूजलॉन्ड्री ने वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान से भी बात की. पत्रकारों और सीएम योगी की मीटिंग के सवाल पर वह कहते हैं, "वह मीटिंग नहीं भाषण था. पहले मुझे भी लगा था कि वह मीटिंग थी लेकिन बाद में पता चला कि वह एक भाषण था. लोगों को ऑनलाइन जोड़ा गया था लेकिन कोई संवाद नहीं था."
वह कहते हैं, "जो आज अखबारों ने छापा है उससे पता चलता है कि अखबारों पर सरकार का कितना शिकंजा है. जब एक भाषण को संपादक लोग खबर बना कर छापने लगें तो इससे ज्यादा दुर्भाग्य क्या हो सकता है. उसमें किसी ने कोई सवाल नहीं किया. प्रेस नोट में भी बस जो मुख्यमंत्री ने बोला है वही छपा है."
वह आगे कहते हैं, "एक कोरोना बीमारी है जो देशभर में लगी है दूसरा कोरोना मीडिया को लगा है. मीडिया में स्टेनोग्राफर की तरह काम हो रहा है. जो वह बोल रहे हैं बस वही टाइप कर दिया जा रहा है. अगर पत्रकार होने के नाते आपके अंदर सवाल पूछने की जिज्ञसा नहीं है तो फिर आपको यह काम छोड़ देना चाहिए."
वह कहते हैं, "यह बहुत बुरी स्थिति है और अब तो धमकी भी दी जा रही हैं, कि जो ऐसी स्थिति को बढ़ा चढ़ाकर दिखा रहे हैं उनके खिलाफ कार्रवाई होगी. आप सुन सकते हैं कुछ दिन बाद कि कुछ पत्रकारों के खिलाफ देशद्रोह के मुकदमे हो गए. अगर आपने सरकार पर सवाल उठा दिया तो फिर आप देशद्रोही हो गए. यानी सवाल पूछना जुर्म है."
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