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वैधानिक गल्प: स्मृति और विस्मृति के बीच युद्ध का उपन्यास
शांत से दिखते कस्बे में एक महिला का पति गायब हो गया है. गर्भ में पल रहे बच्चे को छोड़ दें तो उस महिला के साथ कोई नहीं है. प्रेम-विवाह करने के कारण परिवार ने उससे दूरी बना लिया है और पुलिस तंत्र बार बार उससे मनुष्य होने का अधिकार छीन रहा है. उसे नागरिक की हैसियत से नीचे गिराने पर व्यवस्था तुली है. किसी के लिये लाचार शब्द प्रयोग करने की नौबत न आये लेकिन वह लाचार स्त्री हर तरफ से निराश होकर अपने एक मित्र को फोन करती है, जो एक कथाकार है, दिल्ली में रहता है. और इतना सारा कुछ जिस उपन्यास के पहले पन्ने पर घटित होता है, उसका नाम है, वैधानिक गल्प. आगे की कहानी बताने का कोई औचित्य नहीं लेकिन यह कहना जरुरी है कि यह उपन्यास आपके दिल-दिमाग पर किसी गुम चोट की तरह असर करता है.
चन्दन पाण्डेय के उपन्यास ‘वैधानिक गल्प’ को पढ़ते हुये मिलन कुंदेरा का कथन याद आता रहा: सत्ता के विरुद्ध मनुष्य का संघर्ष भूलने के विरुद्ध स्मृति के संघर्ष के समान है. राष्ट्रराज्य जब राजशाही से भी अधिक शक्तिशाली और निरंकुश हो चले हैं तब अपनी ज्यादतियों को भुला दिया जाना राष्ट्रों की कामना है और उन्हें भुलाने में लगे हर प्रयास को राष्ट्र अपनी सफलता मानता है. सत्ताधारियों का हर प्रचार, हर होर्डिंग उनके अपने कारनामों को छुपाने का प्रयास होता है. ऐसे में, साहित्य और कला पर अतिरिक्त जिम्मेदारी होती है कि वे सत्ता-प्रायोजित हर असत्य को कला के जरिये उद्घाटित करें. ‘वैधानिक गल्प’ ऐसी ही एक कृति है.
देखने में लगता है उपन्यास एक रहस्य कथा के शिल्प में लिखा गया है लेकिन यह दरअसल दिल्ली से नोमा की दूरी है, जिसे लांघने में लगा समय इसे रहस्यकथा का शिल्प देता है. कथावाचक अर्जुन ‘सिस्टम’ में यकीन रखने वाला व्यक्ति है. दूसरी तरफ एक निजी विश्वविद्यालय के मालिक हैं जो ‘सिस्टम’ को दाहिनी जेब में रखते हैं.
एक पात्र को छोड़कर इस उपन्यास का प्रत्येक पात्र रोज ब रोज दिखने जैसे लोग हैं. एक पात्र है जो इस पूरे ‘सिस्टम’ में रहते हुये भी खुद का जीवन जीता है. उसकी शिक्षा, उसकी तैयारी, मनुष्यता में उसका रुझान उसे नोमा नामक कस्बे में इतनी रौशनी से भर देता है कि शक्ति संस्थान की आंखें चुंधियाने लगती हैं. वह एक कॉलेज में अस्थायी शिक्षक है, छात्रों के साथ नाटक मंडली चलाता है और नाटक के आदिम रूप यानी नुक्कड़ नाटक में यकीन रखता है. एक दिन वह शहर में घटी एक घटना का उपयोग लोगों को जागरुक करने के लिये करने का निर्णय लेता है और उसका नाट्य-रुपान्तरण करता है और उसकी टीम उस नाटक का कई मौकों पर मंचन शुरु करती है. लेकिन नाटक में ऐसा न जाने क्या है कि प्रत्येक पात्र गायब होने लगता है.
कहानी आप उपन्यास में पढ़ सकते हैं लेकिन वह नाटक दरअसल जनस्मृति का एक रूप बनता जा रहा है. भूलने के विरुद्ध स्मृति का हथियार बनाया जाना नागवार गुजरता है. यह उपन्यास जिन समांनातर कथा-पटरियों पर सरपट भागता है वह इन पात्रों के गायब होने के साथ अर्जुन का खुद को पाने की कथा भी है. यह उपन्यास उस बर्बरता का दस्तावेज भी है जो सबल भीड़ किसी योजना के तहत हत्याओं को अंजाम देती है. यह उपन्यास अनसूया के भावी जीवन की कथा भी है जिसकी कल्पना मात्र से सिहरन पैदा हो जाये.
नागरिकता की समूची बहस के बीच चन्दन की यह संभावित त्रयी, तीन उपन्यासों की श्रृंखला जिसका नाम लेखक ने नागरिक त्रयी दिया है, एक बड़ा हस्तक्षेप बन सकेगी यह उम्मीद है. और यह उम्मीद इसलिए है क्योंकि लेखक ने आदिकालीन कथा-सूत्रों का नए सिरे से प्रयोग करना शुरु किया है. इस उपन्यास की बात करें तो 144 पन्नों का यह उपन्यास पहले पन्ने से अपनी गिरफ्त में ले लेता है. इस उपन्यास का कलेवर रहस्य कथा का है लेकिन जीवन में प्रेम के जिन पहलुओं को छूता है वह अनुपम है.
रहस्यकथाएं अमूमन सत्ता कवचों के प्रति सहृदय होती हैं लेकिन ‘वैधानिक गल्प’ इनसे अलग है. यही अलगाव इस उपन्यास को अम्बर्तो इको के उपन्यास ‘दी ने आव दी रोज’ और ओरहान पामुक के उपन्यास ‘माई नेम इज रेड’ के चाहने वालों का प्रिय बना सकता है. कम से कम मुझे यही महसूस हुआ. उपरोक्त दोनों उपन्यास जहां सभ्यता समीक्षा को पन्नों के भीतर लिये चलते हैं, उसका वर्णन करते चलते हैं, ‘वैधानिक गल्प’ उसके इशारे देते चलता है. इस उपक्रम में कथा में गति इतनी तेज़ है कि कई बार आप उस सभ्यता समीक्षा को नजरअंदाज करते चलते हैं जो वास्तव इस उपन्यास का उद्देश्य है.
पुस्तक: वैधानिक गल्प
लेखक: चन्दन पाण्डेय
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
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