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'असली' बनाम 'राजनीतिक': रांची छात्र प्रदर्शन को सीजेपी के बरक्स रखती सोशल मीडिया मुहिम की पड़ताल
झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) में कथित अनियमितताओं के खिलाफ रांची में चल रहा छात्र आंदोलन ने जैसे-जैसे ज़ोर पकड़ा, सोशल मीडिया के एक हिस्से ने इसे दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन के मुकाबले 'असली' आंदोलन के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया.
साथ ही बताया कि ये 'बिना विदेशी फंडिंग के' और 'छात्रों के नेतृत्व में’ चलने वाला भी बताया. लेकिन ज़मीन पर मौजूद प्रदर्शनकारी और सबूत खुद एक अलग ही कहानी बयां करते हैं. ये कहानी उस प्रतिद्वंद्विता की नहीं बल्कि साझा एकजुटता और आपसी प्रेरणा की, जिसका जिक्र नहीं के बराबर है.
इसके लिए न्यूज़लॉन्ड्री ने दोनों प्रदर्शनों को लेकर फेसबुक और एक्स यानि ऑनलाइन दुनिया में हो रही चर्चाओं पर गौर किया.
हमारी पड़ताल में एक बार-बार दोहराया जाने वाला एक नैरेटिव सामने आया. जिसमें झारखंड के आंदोलन की तारीफ करते हुए उसकी तुलना सीजेपी के उस महीने भर लंबे प्रदर्शन से की जा रही थी, जो नीट-यूजी पेपर लीक के खिलाफ दिल्ली में चला था और जिसका अंत केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के 25 जुलाई को इस्तीफे के साथ हुआ. सीजेपी के प्रदर्शन पर विदेशी फंडिंग, राजनीतिक समर्थन, 'आज़ादी' के नारे और हिंसा के आरोप लगे थे.
वही अकाउंट, अलग एंगल
हमें कम से कम दो पोस्ट एक जैसा खाका अपनाए मिले. इनसे जुड़े अकाउंट पहले भी सीजेपी की आलोचना कर चुके थे.
एक फेसबुक पोस्ट में लिखा था, "रांची-झारखंड, छात्र-शक्ति का ऐतिहासिक जनसैलाब! ज़रा गौर से देखिए इस अनुशासित और जागरूक भीड़ को, न कोई गुंडागर्दी, न कोई भड़काऊ नारेबाजी, न कोई पत्थरबाजी, और न ही कोई राष्ट्र-विरोधी एजेंडा!. बस छात्रहित, अपने भविष्य और अधिकारों की मांगों पर केंद्रित होकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते झारखंड के युवा. झारखंड के इन अनुशासित छात्रों की आवाज़ को दबने मत दीजिए! इसे रिपोस्ट कर अपना समर्थन दीजिए."
यह पोस्ट 10 से 12 अगस्त के बीच फेसबुक पर कम से कम 20 बार शेयर हुआ. अलग-अलग यूज़र्स ने रांची में मार्च करते छात्रों की तस्वीरों के साथ यही टेम्पलेट शेयर किया.
पोस्ट में कहीं भी सीजेपी का नाम नहीं लिया गया लेकिन इसकी 'चेकलिस्ट' शांतिपूर्ण, ‘छात्रों के नेतृत्व में, 'देश-विरोधी' नारों से मुक्त- सीधे तौर पर सीजेपी के खिलाफ एक जवाब जैसी इशारा करती है.
न्यूज़लॉन्ड्री ने इसके बाद उन अकाउंट्स को ट्रैक किया. जिन्होंने यह पोस्ट शेयर की थी, यह जांचने के लिए कि क्या उन्होंने सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर भी ऑनलाइन चर्चाओं में हिस्सा लिया था. पाया गया कि यही फेसबुक यूज़र्स दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन की वैधता पर सवाल उठाने या उसकी आलोचना करने वाला कंटेंट भी पोस्ट कर चुके थे.
कुछ यूज़र्स ने झारखंड के छात्रों को सीजेपी नेताओं या आईसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) के कार्यकर्ताओं से "बहकाए जाने" को लेकर आगाह किया और आरोप लगाया कि उनकी भागीदारी राजनीतिक हितों की पूर्ति करेगी. कुछ अन्य ने जंतर-मंतर के प्रदर्शन में शामिल महिलाओं की आलोचना की. कई पोस्ट में सीजेपी के प्रदर्शन को वामपंथी नेताओं, विपक्षी राजनेताओं और राजनीतिक टिप्पणीकारों वाले एक "पुराने इकोसिस्टम" का हिस्सा बताया गया.
सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास के पुराने बयान, जिनमें 2020 में नागरिकता संशोधन कानून की उनकी आलोचना भी शामिल है, को यूज़र्स ने उनकी राजनीतिक "निष्ठा" पर सवाल उठाते हुए शेयर किया.
ये पोस्ट हमेशा दोनों प्रदर्शनों की सीधी तुलना नहीं करते लेकिन तुलना का इशारा लगातार बना रहता है: झारखंड को 'असली' और छात्रों के नेतृत्व वाला तो सीजेपी को राजनीतिक, विघ्न पैदा करने वाला और विदेशी फंडिंग से चलने वाला’ के तौर पर संज्ञा दी जाती है.
'कोई विदेशी फंडिंग नहीं', 'कोई आज़ादी के नारे नहीं'
जैसा कि जब बात झारखंड के प्रदर्शन की होती तो एक और लगातार दोहराया जाने वाला नैरेटिव होता. जिसमें "कोई विदेशी फंडिंग नहीं" और "कोई आज़ादी के नारे नहीं" जैसे वाक्यांशों का प्रयोग होता. न्यूज़लॉन्ड्री ने 3 से 10 अगस्त के बीच कम से कम 20 ऐसी पोस्ट ट्रैक कीं, जिनमें एक जैसी भाषा और दोहराए जाने वाले वाक्यांश इस्तेमाल हुए थे.
इनमें से ज़्यादातर पोस्ट एक जैसे खाके पर आधारित थीं. जैसे कि "शाबाश झारखंड. पूरा भारत तुम्हें देख और सुन रहा है. न कोई विदेशी फंडिंग, न कोई राजनीतिक नारा, न भारत, हिंदुओं या हिंदू देवी-देवताओं का अपमान, न प्रधानमंत्री के खिलाफ नफरत या असंसदीय भाषा का इस्तेमाल."
इसके अलावा, फेसबुक पेज "भारत डिफेंस हिंदी" की ओर से 4 अगस्त को शेयर की गई एक पोस्ट में बारिश में तंबू थामे खड़े छात्रों की तस्वीर के साथ लिखा था: "न विदेशी फंडिंग, न आज़ादी के नारे, न हिंदुओं का अनादर, ठीक-ठाक तंबू तक नहीं. हम झारखंड के छात्रों के साथ खड़े हैं." इस पोस्ट को 5,800 लाइक और 671 शेयर मिले, और इसमें इस्तेमाल की गई तस्वीरों को बेहतर दिखाने के लिए एआई का भी सहारा लिया गया था. एआई-डिटेक्शन टूल हाइव मॉडरेशन तो कम से कम यही बताता है.
इन पोस्ट में सीजेपी का सीधा ज़िक्र नहीं था. लेकिन इनमें इस्तेमाल हुए वाक्यांश, खासकर "विदेशी फंडिंग" और "आज़ादी के नारे", दिल्ली में सीजेपी के नेतृत्व वाले प्रदर्शन को लेकर चल रही ऑनलाइन बहस में भी शामिल थे यानी शब्दावली वही है, जो सीजेपी पर हमला करने के लिए इस्तेमाल होती रही है.
विदेशी फंडिंग का आरोप मुख्यधारा के टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर लगातार चलता रहा है, लेकिन इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक ऐसा कोई सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध सरकारी आदेश, जांच रिपोर्ट या अन्य आधिकारिक निष्कर्ष मौजूद नहीं था, जो यह साबित करता हो कि सीजेपी को विदेशी फंडिंग मिली. 24 जुलाई को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस बारे में पूछे जाने पर कहा था, "इस मामले पर मेरे पास फिलहाल आपके साथ साझा करने के लिए कोई जानकारी नहीं है."
झारखंड के प्रदर्शनकारियों की तारीफ करने वाली कई पोस्ट में "आज़ादी" के नारों की गैरमौजूदगी को इस बात के सबूत के तौर पर पेश किया गया कि उनका प्रदर्शन सीजेपी से अलग है. उल्लेखनीय है कि सीजेपी के नेतृत्व ने खुद ऐसे नारों से दूरी बनाई थी और प्रदर्शनकारियों से इनसे बचने की अपील की थी. नेतृत्व ने प्रदर्शन के लिए चार नारों को मंज़ूरी दी थी: "इंकलाब ज़िंदाबाद", "जय भीम", "भारत माता की जय" और "धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो". 22 जुलाई को प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए सीजेपी प्रवक्ता आशुतोष रांका ने कहा था कि नकारात्मक नारों से बचना चाहिए, क्योंकि "वो नैरेटिव बनाने का मौका ढूंढ रहे हैं."
दोनों प्रदर्शनों के बीच खींची जा रही यह ऑनलाइन विभाजन रेखा तब और उलझ जाती है, जब इसे प्रदर्शन स्थल से मिले बयानों के साथ मिलाकर देखा जाए.
सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीप्के ने झारखंड के छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की निंदा करते हुए निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की मांग की. दीप्के ने यह भी दोहराया कि वे खुद झारखंड में मौजूद नहीं थे और प्रदर्शन को "हाईजैक" नहीं करना चाहते. उन्होंने स्वीकार किया कि सीजेपी के स्वयंसेवक रांची में मौजूद थे और प्रदर्शन में शामिल हुए थे. सोशल मीडिया पर चल रहे कुछ दावों के उलट, सीजेपी नेतृत्व ने झारखंड पुलिस की कार्रवाई की सार्वजनिक तौर पर निंदा की थी.
ज़मीन पर मौजूद प्रदर्शनकारियों ने भी सीजेपी की भागीदारी स्वीकार की, लेकिन ज़रूरी नहीं कि उन्होंने इसे प्रदर्शन पर कब्ज़ा करने की कोशिश के तौर पर देखा हो.
रांची यूनिवर्सिटी के छात्र और जेपीएससी-जेएसएससी अभ्यर्थी न्याय मंच से जुड़े विमल कुमार ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि सीजेपी के स्वयंसेवकों ने प्रदर्शनकारियों का साथ दिया. उनके साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया और जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में प्रदर्शन में शामिल हुए.
उन्होंने कहा, "सीजेपी के स्वयंसेवकों ने समर्थन दिखाया और हमारे साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की. मैं भी उनके साथ बैठा." वह आगे कहते हैं कि जो कोई भी छात्रों का समर्थन करना चाहता है, उसका प्रदर्शन स्थल पर स्वागत है.
उन्होंने कहा, “छात्रों की सभी मांगों और प्रदर्शनों को सुना जाना चाहिए, उन्हें एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा नहीं किया जाना चाहिए. हम कोई राजनीतिक पार्टी नहीं हैं. मुख्य मकसद राज्य में बड़ा बदलाव लाना है, न कि इतनी छोटी बातों को लेकर सशंकित रहना."
वहीं, जेपीएससी-जेएसएससी रिफॉर्म्स मंच से जुड़े बिनय कुमार ने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा, "हमारा मकसद सीधा है. हम सुधार चाहते हैं. हमारे आंदोलन का समर्थन करने के लिए कोई भी आ सकता है, किसी को भी जाने के लिए नहीं कहा जा रहा. हालांकि, हम अपने मंच से कोई राजनीतिक या जातिवादी बयान नहीं देने देंगे. बाहरी ताकतों की वजह से हमारा छात्र आंदोलन भटकना नहीं चाहिए. सीजेपी के स्वयंसेवक प्रदर्शन स्थल पर आते रहे हैं."
सबसे अहम बात यह कि विमल ने बताया कि दिल्ली के प्रदर्शन ने उन्हें प्रेरित किया. "जेपीएससी को लेकर इन दिक्कतों की वजह से हम लंबे समय से गुस्से में थे. दिल्ली के प्रदर्शन ने एक केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा दिलवा दिया. उसके चरम ने हमें कुछ सकारात्मक ऊर्जा दी और हम डटे रहे." उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारी तब तक डटे रहेंगे, जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं.
बिनय ने भी यही बात दोहराई और सीजेपी की धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा दिलवाने में मिली कामयाबी को अपनी प्रेरणा का जारी स्रोत बताया.
जेपीएससी-जेएससीएससी अभ्यर्थी न्याय मंच से जुड़े एक अन्य प्रदर्शनकारी चंदन राजक ने कहा, "जंतर-मंतर पर जिस तरह लोग जुटे, वह हमारे लिए एक बुलावा था. मैं पहले भी कई प्रदर्शनों का हिस्सा रह चुका हूं, लेकिन जिस तरह रांची में हमारे मुद्दे के समर्थन में भीड़ जुटी है, वह ऐतिहासिक है. हमने प्रदर्शन आयोजित करने, भीड़ जुटाने और अपनी मांगें रखने के तरीके में सीजेपी के दिल्ली प्रदर्शन से प्रेरणा ली."
विमल ने इस विचार को भी खारिज किया कि झारखंड के प्रदर्शन की शांतिपूर्ण प्रकृति का इस्तेमाल इसे दिल्ली के प्रदर्शन से अलग दिखाने के लिए किया जाए.
उन्होंने कहा, "झारखंड में हर कोई शांतिपूर्ण है और यही हमारा लक्ष्य है. हमारा प्रदर्शन महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर आधारित है." सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई का ज़िक्र करते हुए राजक ने कहा कि भले ही बड़ी भीड़ में कुछ लोग हिंसक हो गए हों, पुलिस की प्रतिक्रिया अनुपातहीन थी.”
विमल ने आरोप लगाया कि झारखंड के छात्रों को भी रात में पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा और प्रदर्शन के दौरान बिजली काट दी गई थी. राजक ने कहा कि दो छात्र आंदोलनों की तुलना करने की कोई ज़रूरत नहीं है. यह असली मुद्दे से ध्यान भटकाने का एक तरीका है.
ये बयान बताते हैं कि सीजेपी के प्रदर्शन ने झारखंड के कुछ प्रदर्शनकारियों को प्रभावित ज़रूर किया लेकिन प्रभाव का मतलब नियंत्रण नहीं होता. दोनों आंदोलनों की शिकायतें और नेतृत्व अलग-अलग थे, जबकि सीजेपी के स्वयंसेवकों ने जो समर्थन दिया, प्रदर्शनकारियों ने उसका स्वागत करने की बात कही.
आरोप-प्रत्यारोप का खेल
प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई दिल्ली में सीजेपी के नेतृत्व वाले प्रदर्शन और झारखंड में चल रहे छात्र आंदोलन के बीच तुलना का एक और आधार बन गई है. दोनों ही प्रदर्शनों में पुलिस कार्रवाई हुई, और दोनों ही मामलों में प्रदर्शनकारियों और उनके समर्थकों ने पुलिस पर ज़रूरत से ज़्यादा बल इस्तेमाल करने का आरोप लगाया, जबकि प्रशासन ने हिंसा या बैरिकेड तोड़ने की कोशिश को अपनी कार्रवाई का आधार बताया.
20 जुलाई को सीजेपी की ओर से आयोजित "चलो संसद" मार्च के दौरान, जब प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे थे, तो पुलिस ने आंसू गैस और लाठियों का इस्तेमाल किया. कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 100 प्रदर्शनकारी और 120 सुरक्षाकर्मी घायल हुए थे; दिल्ली के दो अस्पतालों से मिली एक आरटीआई जानकारी में यह भी आरोप लगाया गया कि रैपिड एक्शन फोर्स ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया, जिससे कम से कम 10 प्रदर्शनकारी घायल हुए.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल समेत कई विपक्षी नेताओं ने भी पुलिस कार्रवाई की निंदा की थी. वहीं दिल्ली पुलिस का कहना था कि प्रदर्शनकारियों के एक छोटे समूह ने हिंसक रुख अपनाते हुए संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की, जिसके चलते बल प्रयोग करना पड़ा.
10 अगस्त को झारखंड के छात्रों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई के बाद एक जैसी बहस फिर सामने आई. जब प्रदर्शनकारी राज्य विधानसभा की ओर मार्च कर रहे थे, तो पुलिस ने लाठी, आंसू गैस और वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया. द हिंदू में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, कई प्रदर्शनकारी घायल हुए, जबकि एक प्रदर्शनकारी ने एएनआई को बताया कि कम से कम 100 युवाओं पर लाठीचार्ज हुआ.
सोशल मीडिया पर यूज़र्स ने प्रदर्शनकारियों को शांतिपूर्ण छात्र बताया और सवाल उठाया कि उन पर पुलिस हिंसा क्यों की गई. कुछ ने सीजेपी और कांग्रेस जैसी पार्टियों, जो कि राज्य में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के साथ गठबंधन में है और आम आदमी पार्टी (आप) की रांची में हुई कार्रवाई पर चुप्पी को लेकर भी सवाल उठाए.
लेकिन यह तुलना तब और उलझ गई, जब झारखंड के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा को लेकर परस्पर विरोधी दावे ऑनलाइन सामने आने लगे.
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 10 अगस्त को एक्स पर लिखा: "झारखंड में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर बल प्रयोग गलत है. छात्रों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है, और केवल बातचीत से ही समाधान निकल सकता है. झारखंड सरकार को इन छात्रों की बात सुनते रहना चाहिए और उनकी समस्याओं का तुरंत समाधान करना चाहिए."
वहीं, कुछ सोशल मीडिया यूज़र्स ने दावा किया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े लोगों ने प्रदर्शन को "हाईजैक" कर हिंसा की. इसे साबित करने के लिए एक वीडियो शेयर किया गया, जिसमें दो लोग बस के ऊपर खड़े होकर कुछ हवा में उछालते नज़र आ रहे हैं और रांची में भाजपा के झंडे लहराए जा रहे हैं. इसे 10 अगस्त की घटना बताकर पेश किया गया.
न्यूज़लॉन्ड्री ने पाया कि यह वीडियो असल में एक अलग और असंबंधित विधानसभा मार्च का था. हमने इस फुटेज को समाचार एजेंसी आईएएनएस तक ट्रेस किया, जिसने इसे 23 जुलाई को प्रकाशित किया था.
आईएएनएस के मुताबिक, “कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने नीट पेपर लीक को लेकर रांची में भाजपा दफ्तर के बाहर प्रदर्शन किया था और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की थी. यह प्रदर्शन कांग्रेस और भाजपा समर्थकों के बीच झड़प में बदल गया, जिसमें अंडे और टमाटर फेंके गए और पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा.” यानी यह फुटेज भाजपा से जुड़े लोगों द्वारा प्रदर्शन हाईजैक किए जाने को नहीं दिखाता.
उस दिन की अन्य रिपोर्ट्स में भी दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच धक्का-मुक्की और उसके बाद अंडे, पत्थर और डंडों के इस्तेमाल वाली झड़प का ज़िक्र है. यह घटना रांची में उस वक्त चल रहे व्यापक राजनीतिक टकराव के बीच हुई थी.
एक दिन पहले, भाजपा कार्यकर्ताओं ने जेपीएससी और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएससीएससी) में गंभीर अनियमितताओं के आरोपों को लेकर झारखंड प्रदेश कांग्रेस दफ्तर को घेर लिया था. इसके बाद कांग्रेस ने भाजपा दफ्तर के बाहर प्रदर्शन की घोषणा की, जिसके चलते 23 जुलाई को यह टकराव हुआ.
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि 10 अगस्त के छात्र प्रदर्शन के दौरान कोई हिंसा नहीं हुई. चश्मदीदों के बयान और रांची पुलिस के वर्जन से पता चलता है कि कुछ पथराव ज़रूर हुआ था. रांची के एसपी परस रान ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर और चप्पलें फेंकी, जिससे कुछ जवानों को मामूली चोटें आईं. उन्होंने बताया कि दो पुलिसकर्मियों के सिर में चोट लगी, जिनमें पांच से आठ टांके लगाने पड़े, जबकि कई अन्य को मामूली चोटें आईं. रान ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने पत्रकारों के माइक्रोफोन कवर के अंदर पत्थर छिपाकर उन्हें पुलिस की ओर फेंका.
पुराना फुटेज, नया दावा
ऑनलाइन नैरेटिव की एक और परत यह दिखाने की कोशिश करती रही कि झारखंड के छात्रों को विपक्षी नेताओं से मिलने नहीं दिया गया. कई पोस्ट में दावा किया गया कि झारखंड के छात्र राहुल गांधी से मिलने दिल्ली स्थित उनके आवास पहुंचे थे लेकिन पुलिस ने उन्हें वहां से हटा दिया. एक पोस्ट में लिखा था: "आज जब झारखंड के छात्र राहुल गांधी से मिलने उनके आवास पर पहुंचे तो पुलिस बुला ली गई."
261,000 फॉलोअर्स वाले एक्स पेज "ओशियन जैन" ने यह क्लिप 7 अगस्त को पोस्ट की. मालूम हो कि इस पेज को अक्सर भाजपा सरकार के समर्थन वाला कंटेंट शेयर करता पाया जाता है.
न्यूज़लॉन्ड्री ने इस फुटेज को दो अलग-अलग और असंबंधित घटनाओं से जोड़कर पाया. पहली घटना 7 अगस्त की एक ईटीवी भारत की रिपोर्ट से जुड़ी थी, जिसमें साधुओं ने संसद में हुए एक पहले के प्रदर्शन के खिलाफ विरोध जताया था, जिसमें विपक्षी नेताओं पर धार्मिक प्रतीकों के दुरुपयोग का आरोप लगा था.
दूसरी घटना महिलाओं के एक अलग प्रदर्शन से जुड़ी थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कांग्रेस के चुनावी टिकट के बदले पैसे लिए गए थे. दोनों ही समूहों को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था, और इनमें से किसी में भी झारखंड के छात्र शामिल नहीं थे. लेकिन बाद में इस फुटेज को यह दिखाने के लिए फिर से शेयर किया गया कि झारखंड के छात्रों को गांधी से मिलने से रोक दिया गया.
इस तरह सोशल मीडिया पर दोनों प्रदर्शनों को लेकर खींची जा रही यह लकीर करीब से जांचने पर टूट जाती है. विदेशी फंडिंग के आरोप के पीछे कोई आधिकारिक निष्कर्ष नहीं है. सीजेपी के अपने नेतृत्व ने ही "आज़ादी" के नारों को हतोत्साहित किया था. और भाजपा द्वारा हाईजैक किए जाने या पुलिस द्वारा विपक्षी नेताओं को रोके जाने का जो "सबूत" पेश किया गया, वह असंबंधित और पुराना फुटेज निकला. ज़मीन पर, रांची के प्रदर्शनकारियों ने दोनों प्रदर्शनों को प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि एक-दूसरे से ऊर्जा लेने वाला बताया.
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