Report
इंडिया टुडे ग्रुप में 120 से अधिक कर्मचारियों की छंटनी, सुबह नौकरी पर आए, दोपहर में इस्तीफा
बीते बुधवार को अनमोल कुमार महतो (बदला हुआ नाम) नोएडा सेक्टर-16 स्थित टीवी टुडे नेटवर्क के दफ्तर में काम कर रहे थे. वह पिछले दो वर्षों से आज तक हिंदी वेबसाइट का हिस्सा थे. उनकी शिफ्ट खत्म होने में करीब एक घंटा बाकी था, तभी एचआर विभाग ने अपने केबिन में बुलाया. वहां उनके मैनेजर और एचआर प्रतिनिधि बबिता मौजूद थीं. अनमोल के मुताबिक उनसे कहा गया कि आज आपका आखिरी दिन है. आप अपना इस्तीफा दे दीजिए.
अनमोल इस अकस्मात स्थिति के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे. उन्होंने पूछा, ‘‘क्या मेरे काम में कोई कमी है? अगर कोई समस्या थी तो मुझे कभी इसके बारे में बताया क्यों नहीं गया?” इस पर एचआर मैनेजर ने जवाब दिया, ‘‘नहीं, आपके काम में कोई कमी नहीं है. हम रीस्ट्रक्चरिंग कर रहे हैं.’’
अनमोल बताते हैं कि उस समय एचआर के हाथ में उनके फुल एंड फाइनल से जुड़े दस्तावेज पहले से मौजूद थे. उसी वक्त उनसे इस्तीफा लिखवाया गया और लैपटॉप तथा आई-कार्ड जमा कराने के बाद दफ्तर छोड़ने के लिए कहा गया.
यह सिर्फ अनमोल के साथ नहीं हुआ. 20 जुलाई से 24 जुलाई के बीच इंडिया टुडे समूह के करीब 120 से ज्यादा कर्मचारियों के ऊपर इसी तरह की कार्रवाई हुई.
इनमें बड़ी संख्या आज तक हिंदी वेबसाइट से जुड़े कर्मचारियों की थी. इसके अलावा कैमरामैन, वीडियो एडिटर्स, ग्राफिक्स, फैक्ट-चेक, डाटा इंटेलिजेंस यूनिट, आज तक रेडियो और अन्य विभागों के कर्मचारी भी प्रभावित हुए.
एचआर के कहने पर अधिकांश कर्मचारियों ने इस्तीफा दे दिया. वहीं कुछ कर्मचारियों ने कारण जानने की कोशिश की. उनका कहना है कि उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं मिला. जिन लोगों ने इस्तीफा देने से इनकार किया, उन्हें बाद में बर्खास्त कर दिया गया.
हमें यह भी पता चला कि जिन्होंने इस्तीफा दिया उन्हें दो महीने की पूरी सैलरी एडवांस में दी गई. वहीं, जिन्हें टर्मिनेट किया गया है, उन्हें दो महीने का बेसिक वेतन दिया जाना है.
यह इस्तीफा एचआर प्लेटफॉर्म ‘केका’ के माध्यम से लिया गया. मालूम हो कि यह एक थर्ड-पार्टी सर्विस है, जिसका इस्तेमाल कंपनियां अपने ह्यूमन रिसोर्स से संबंधित सेवाएं मैनेज करने के लिए करती हैं. इस प्लेटफॉर्म पर इस्तीफे के लिए अलग-अलग विकल्प उपलब्ध होते हैं. कर्मचारियों ने अपनी स्थिति के अनुसार अलग-अलग विकल्प चुने. किसी ने ‘रीस्ट्रक्चरिंग’ का विकल्प चुना तो किसी ने ‘अदर्स’ का हवाला दिया.
इसके बाद कर्मचारियों को इस्तीफे का कारण भी लिखना था. कुछ लोगों ने औपचारिक रूप से सामान्य इस्तीफा दर्ज किया जबकि कई कर्मचारियों ने स्पष्ट रूप से लिखा कि उनसे प्रबंधन की ओर से इस्तीफा देने के लिए कहा गया.
न्यूज़लॉन्ड्री को मिली जानकारी के मुताबिक, जिन कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया है उनमें से कुछ एक-दो साल से काम कर रहे थे तो कुछ बीते 14-15 सालों से यहां जुड़े थे. इसके अलावा हाल ही में ज्वाइन करने वाले भी इस छंटनी का हिस्सा बने.
एक कर्मचारी राजू देव (बदला नाम) जो बीते 13 साल से आज तक हिंदी से जुड़े हैं. उन्होंने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि यहां सब अप्रेजल (बढ़ोतरी) का इंतज़ार कर रहे थे. हालांकि, अभी तक अप्रेजल का फार्म ही नहीं भरवाया गया. वह बताते हैं, “मैं गुरुवार को दफ्तर पहुंचा. मुझे इस तरह के किसी ‘हादसे’ का अनुमान तक नहीं था. अपना काम कर रहा था तभी बाकियों की तरह मुझे भी नीचे बुलाया गया. उसी वक़्त रिजाइन देने के लिए बोला गया. मुझे कोई ठोस कारण नहीं बताया गया. रिजाइन लेकर, लैपटॉप और आई-कार्ड ले लिया गया और नीचे जाने के लिए बोल दिया गया.”
राजू कहते हैं, “मैंने अपने जीवन के 13 साल से ज़्यादा इस संस्थान को दिए. लेकिन अपने ही साथियों से मिलने तक नहीं दिया गया. एचआर और मैनेजर ने जो रवैया अपनाया उसके बाद मेरा खुद किसी से मिलने का मन नहीं हुआ. मैं चुपचाप घर लौट आया. जिस संस्थान को जवानी दे दी वहां से इतनी उपेक्षा की उम्मीद नहीं थी.”
इसी तरह एक महिला कर्मचारी जो बीते चार साल से वहां काम कर रही थीं, उन्हें भी नौकरी से हटा दिया गया. इनके साथ भी वहीं हुआ जो राजू और अनमोल के साथ हुआ. महिला कमर्चारी नैना राजपूत कहती हैं, ‘‘21 जुलाई को मेरी शिफ्ट दो बजे खत्म होने वाली थी. 12 बजे के करीब मुझसे इस्तीफा लिखवाया गया. मैं अपना सामान लेने के बहाने डेस्क पर गई और अपने साथियों को अलविदा कहा.’’
इंडिया टुडे के एक वरिष्ठ कर्मचारी से जब हमने कर्मचारियों को हटाए जाने के लिए बताए जा रहे ‘रीस्ट्रक्चरिंग’ के कारण पर सवाल किया तो उन्होंने कहा कि कंपनी आर्थिक दबाव का सामना कर रही है. उनके मुताबिक, “वास्तविकता यह है कि कंपनी घाटे में चल रही है, लेकिन कर्मचारियों को यह बात सीधे तौर पर नहीं बताई जा रही.”
गौरतलब है कि आज तक और इंडिया टुडे जैसे ब्रांड चलाने वाली कंपनी के मुनाफ़े में पिछले वित्त वर्ष में भारी गिरावट देखी गई. जब उसका सालाना नेट प्रॉफ़िट 81 प्रतिशत गिरकर लगभग 14 करोड़ रुपये रह गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी के परफ़ॉर्मेंस पर असर डालने वाले कारणों में विज्ञापन से होने वाली कम कमाई, रीस्ट्रक्चरिंग की लागत और रेडियो बिज़नेस से हुआ नुकसान शामिल था. कंपनी का रेवेन्यू 19 प्रतिशत गिरकर लगभग 807 करोड़ रुपये हो गया.
ऐसा नहीं है कि यह इंडिया टुडे में यह सब जुलाई महीने में ही शुरू हुआ है. इससे पहले भी धीरे-धीरे लोगों को हटाया जा रहा है. मई के आखिरी महीने में इंडिया टुडे पत्रिका से जुड़े छह लोगों को हटाया गया था. उस समय भी ऐसा ही हुआ.
कर्मचारियों का यह भी कहना है कि अपेक्षाकृत कम वेतन पाने वाले कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जा रहा है. उनके मुताबिक, कई कर्मचारी जिनका वेतन करीब 25-30 हजार रुपये महीना है, उन्हें हटा दिया गया है.
न्यूज़लॉन्ड्री ने इस छंटनी को लेकर इंडिया टुडे के एचआर प्रमुख नावेंदु शेखर, समूह के न्यूज़ डायेक्टर सुप्रियो प्रसाद और समूह के सलाहकार संपादक बी.वी. राव को कुछ सवाल भेजे हैं. हालांकि, ख़बर प्रकाशित किए जाने तक उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया है.
Also Read
-
No entry, no answers, just ‘get lost’: The Opposition’s battle to be heard by Gyanesh Kumar
-
Beyond ‘cleaning’ voter rolls: The digital machinery behind SIR
-
‘A civilisational crisis’: The IISc professor whose AI talk went viral
-
Goa case of 97 voters: One day after Express report, deleted voters asked to submit Form 6
-
How a protest for FIR against ACP ended with an FIR against 17 protesters