मोदी सरकार द्वारा विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने के कुछ महीनों बाद समिति बनाई गई थी.
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एमएसपी कमेटी: चार साल और 54 लाख का खर्च लेकिन रिपोर्ट का इंतजार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने के लिए समिति बनाने की घोषणा किए लगभग चार साल हो चुके हैं. लेकिन इस समिति ने अब तक एक भी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की है.

इस बीच, समिति पर लगभग 54 लाख रुपये खर्च किए जा चुके हैं और उसने दर्जनों बैठकें की हैं, जिनकी कार्यवाही आरटीआई के जवाबों में सार्वजनिक नहीं की गई है.

18 जुलाई 2022 को गठन के बाद से समिति की छह पूर्ण बैठकें और उसकी उप-समितियों की 42 बैठकें हो चुकी हैं. समिति की सबसे हालिया बैठक इस साल 14 मई को आयोजित हुई थी.

मई में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय से प्राप्त आरटीआई जवाब के अनुसार, केंद्रीय जन सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) ने किसी भी बैठक की कार्यवाही (मिनट्स) साझा करने से इनकार कर दिया.

सीपीआईओ का कहना था कि इन बैठकों की कार्यवाही गोपनीय है और इनमें केवल समिति के अध्यक्ष तथा सदस्य ही शामिल होते हैं.

सीपीआईओ के अनुसार, 17 मई तक समिति पर कुल 53,97,280 रुपये खर्च किए जा चुके थे. वहीं, केवल 2 अप्रैल को आयोजित एक बैठक पर ही 62,380 रुपये का खर्च आया था.

मालूम हो कि जून, 2020 में लोकसभा में पेश किए गए तीन कृषि कानूनों को किसानों की आय बढ़ाने के उपाय के तौर पर प्रस्तुत किया गया था. हालांकि, इन कानूनों के खिलाफ देशभर में व्यापक किसान आंदोलन शुरू हो गया, जिसमें किसानों की प्रमुख मांग एमएसपी को कानूनी गारंटी देने की थी.

आंदोलन तेज होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर, 2021 में इन तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की थी. इसके बाद, वर्ष 2022 में एमएसपी समेत अन्य कृषि सुधारों पर सुझाव देने के लिए इस समिति का गठन किया गया.

समिति को प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने, फसल चक्र में बदलाव के सुझाव देने और एमएसपी व्यवस्था को अधिक प्रभावी तथा पारदर्शी बनाने के उपाय सुझाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

समिति में अध्यक्ष संजय अग्रवाल के अलावा 27 सदस्य शामिल हैं. हालांकि, इस संबंध में भेजे गए प्रश्नों का संजय अग्रवाल ने कोई जवाब नहीं दिया.

न्यूज़लॉन्ड्री इससे पहले भी इस समिति और इससे जुड़े आरटीआई खुलासों पर रिपोर्ट प्रकाशित कर चुका है.

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