Ground Report
ट्रैफिक, रेड लाइट, तमाशबीन भीड़: दमकल अधिकारियों की ज़ुबानी मालवीय नगर अग्निकांड में देरी की कहानी
मालवीय नगर स्थित फ्लोरिश स्टे होटल की जिस आग ने 22 लोगों की जिंदगी छीन ली. उसमें एक अहम बात बार-बार उठी कि दमकल विभाग की टीम अगर समय रहते पहुंच जाती तो शायद कई लोगों की जान बच जाती. आम आदमी पार्टी ने इस मामले में दमकल विभाग समेत सरकार पर गंभीर आरोप लगाए. पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने दमकल को ‘निकम्मे विभाग’ की संज्ञा तक दे डाली.
वहीं, दमकल विभाग का कहना था कि उन्हें आग लगने की पहली सूचना सुबह 8:50 बजे मिली और 9:16 बजे उन्हें मौके पर मौजूद अधिकारियों से अतिरिक्त मदद की मांग हुई.
गौरतलब है कि आग लगने जैसे गंभीर दुर्घटना की स्थिति में रिस्पॉन्स टाइम (निपटान में लगने वाला वक्त) काफी अहम होता है. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन दिशानिर्देशों के अनुसार, शहरी इलाकों के लिए रिस्पॉन्स टाइम 3 से 5 मिनट तक का रखा गया है. जबकि इस घटना में दमकल विभाग की भी मान लें तो 20 मिनट से ज्यादा की देर हुई है यानि रिस्पॉन्स टाइम में भी चार गुणा वक्त लगा.
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि इस देरी का कारण क्या है?
इसका जवाब तलाशने के लिए हमने घटनास्थल के आस-पास मौजूद स्थानीय लोगों, दुकानदारों, प्रत्यक्षदर्शियों और राहत-बचाव अभियान से जुड़े लोगों से बात की. साथ ही समझने की कोशिश भी रही कि आग और दमकल विभाग के बीच कौन आ रहा था?
आइए पहले मामला समझते हैं.
आग की शुरुआत और कारण अज्ञात
दिल्ली के हौज़ रानी स्थित फ्लॉरिश स्टे में 3 जून 2026 की सुबह जब होटल में ठहरे लोगों की ठीक से नींद भी नहीं खुली थी तो यह आग भड़क उठी. आग के कारणों का फिलहाल खुलासा नहीं हो पाया है. वहीं, आग कितने बजे लगी, इसे लेकर तमाम तरह के दावे सामने आए हैं.
हमसे बातचीत में लोगों ने बताया कि आग सुबह आठ बजे के बाद लगी है. शुरुआत में इमारत से उठे हल्के धुएं को लोगों ने कैफेटेरिया से उठा धुआं समझ नजरअंदाज कर दिया. फिर जैसे-जैसे धुआं घना होने लगा तो हादसे का अंदेशा हुआ लेकिन तब तक आग फैल चुकी थी.
स्थानीय व्यापारी संतोष न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, “मेरा मंडी का काम है. हम गाड़ी से माल लेकर आते हैं. करीब 8:45 बजे मैंने यहां माल उतारा था. उस समय इमारत से थोड़ा धुआं निकल रहा था. ऐसा लग रहा था कि कोई खाना बना रहा है. जब तक आग बाहर नहीं आई, तब तक किसी को अंदाजा नहीं था कि अंदर आग लगी हुई है.”
हमारी पड़ताल में भी यही पता चला कि आग सुबह करीब साढ़े आठ बजे के बाद तेजी से फैली. दमकल विभाग के पास इसकी सूचना करीब 15 मिनट बाद पहुंची. सूचना के फिर करीब 20 से 25 मिनट बाद दमकल विभाग की टीम पहुंची. इस तरह से देखें तो 40 मिनट से ज्यादा की देरी हुई.
इस हादसे ने 22 लोगों की जिंदगी छीन ली है. वहीं, दो दर्जन से ज्यादा लोग अभी भी अस्पताल में उपाचाराधीन है.
दमकल विभाग का दावा कितना सही?
दमकल विभाग का दावा है कि सवा नौ बजे उनकी टीम पहुंच कर बचाव में जुट गई थी. इस बात की तस्दीक हमें घटनास्थल पर मिले अहमद इमरान भी करते हैं. वह बताते हैं, “रोज की तरह मैं ऑफिस जा रहा था. तभी मैंने देखा कि रास्ते में आग लगी है और फायर ब्रिगेड अभी-अभी पहुंची थी. मैंने उसी वक्त वीडियो रिकॉर्ड की, जब दमकलकर्मियों ने आग बुझाने के लिए पहला पानी का फव्वारा छोड़ा था. इसके बाद मैं वहां से निकल गया.”
हमने इमरान द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो और तस्वीरों की समय-सीमा की जांच की. वीडियो के मेटाडाटा के अनुसार, उनकी रिकॉर्डिंग सुबह 9:17 बजे की है. वहीं, उनके फोन में मौजूद एक अन्य तस्वीर में सुबह 9:21 बजे फायर ब्रिगेड की गाड़ी घटना स्थल पर दिखाई दे रही है.
हादसे के प्रत्यक्षदर्शी मोहम्मद फैज़ल हमसे बातचीत में कहते हैं, “मैं ठीक 8:58 बजे वहां पहुंचा. मैंने देखा कि लोग दुकानों से गद्दे निकालकर नीचे लगा रहे थे. इन्हीं गद्दों पर एक महिला ने चौथी मंजिल से छलांग लगाई…. फायर ब्रिगेड 9:00 से 9:05 बजे के बीच पहुंच गई थी, लेकिन भारी ट्रैफिक और भीड़ की वजह से उन्हें अंदर पहुंचने में दिक्कत हुई. फायर ब्रिगेड ने करीब 9:15 बजे तक अपना काम शुरू कर दिया था…. सिर्फ तीन से पांच मिनट में पूरी इमारत का सामने वाला हिस्सा जल गया. आग बहुत तेजी से फैल रही थी.”
इसरार भी हमसे बातचीत में लगभग यही समय का जिक्र करते हैं. वह कहते हैं, "हम यहां करीब 8:45 बजे पहुंच गए थे…. हम सबने हिम्मत की, गद्दे निकाले, उन्हें नीचे बिछाया… 6-7 लोगों को हमने सामने की तरफ से उन्हीं गद्दों पर छलांग लगवाकर बाहर निकाला. फायर ब्रिगेड करीब 40 मिनट बाद पहुंची होगी.”
मोहम्मद अफजल भी इसी वक्त के आस-पास यहां पहुंचे. वह न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, "आग 8:30 बजे लगी थी और हम लोग 10-15 मिनट के भीतर मौके पर पहुंच गए थे. इसके बाद फायर ब्रिगेड पहुंची, लेकिन यहां भारी ट्रैफिक था और सड़क ब्लॉक थी, जिसकी वजह से वो गाड़ियां अंदर नहीं आ पा रही थीं. फिर फायर ब्रिगेड की एक गाड़ी मालवीय नगर गोल चक्कर की तरफ से घूमकर पीछे वाले रास्ते से लाई गई…. इसके बाद करीब 9:19 बजे फायर ब्रिगेड ने पहुंचकर अपना सिस्टम एक्टिव किया और काम शुरू कर दिया था.”
कुछ इसी तरह की बात संतोष कहते हैं. वह न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, “मेरे सामने की बात है, यहां तक पहुंचने में एम्बुलेंस को ही करीब 20 मिनट लग गए. ऑटो वालों और लोगों की भीड़ की वजह से सड़क जाम हो गई थी. आग लगती है तो लोग मदद करने के बजाय उसे देखने लग जाते हैं, अपने काम से ज्यादा तमाशा देखने में लग जाते हैं. सोशल मीडिया पर इस घटना के कई वीडियो मौजूद हैं. अगर आप उन्हें देखेंगे तो उनमें एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड के सायरन साफ सुनाई देंगे. लगातार सायरन बजाया जा रहा था ताकि लोग रास्ता छोड़ दें, लेकिन लोग हट ही नहीं रहे थे. पुलिसकर्मी भीड़ को हटाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन लोग उनकी बात भी नहीं सुन रहे थे. वहां कई लोग रील बनाने में लगे हुए थे. जब आपको पता है कि आग लगी है, तो सबसे पहली प्राथमिकता आग बुझाने और राहत कार्य में सहयोग करने की होनी चाहिए, न कि रील बनाने की."
होटल के मालिक और फायर ब्रिगेड को फोन करते रहे वसीम
32 वर्षीय मोहम्मद वसीम खान भी हादसे के दिन लोगों को बचाने में जुटे थे. खान ने तो होटल मालिक लवकेश बजाज को फोन कर आग लगने की सूचना भी दी. उनका दावा है कि इसके बाद लवकेश मौके पर आए और कुछ देर बाद चले गए. बताते चलें कि लवकेश फिलहाल पुलिस गिरफ्त में हैं.
खान उस दिन जिक्र करते हुए कहते हैं, "मैं यहीं पास में अपनी गाड़ी पार्क करता हूं. मैं करीब 8:30 बजे यहां पहुंचा तो देखा कि बिल्डिंग में आग लगी हुई है. सबसे पहला फोन मैंने अपने पिता को 8:38 बजे किया था. इसके बाद मैंने 8:52 बजे लवकेश बजाज, जो इस बिल्डिंग के मालिक हैं, उन्हें फोन किया. उन्होंने बताया कि उन्हें जानकारी है कि होटल में आग लगी है. तब मैंने उनसे कहा कि आपको यह तो जानकारी है कि होटल में आग लगी है, लेकिन शायद यह जानकारी नहीं है कि आग कितनी भयंकर है और लोगों का बच पाना कितना मुश्किल हो सकता है. इसके करीब 10 मिनट बाद वह (लवकेश) मौके पर पहुंचे. वह यहां 10-20 मिनट तक रहे.”
वसीम खान आगे बताते हैं, “मैंने फायर ब्रिगेड को 14 बार फोन किया. पहला कॉल मैंने 9:02 बजे किया और आखिरी कॉल 9:12 बजे किया. तब तक कोई फायर ब्रिगेड की गाड़ी मौके पर नहीं पहुंची थी.”
वसीम खान कहते हैं, “यहां मौजूद भीड़ में अधिकतर लोग मदद कर रहे थे. एसएचओ का काम है ट्रैफिक पुलिस को सूचना देना कि इलाके में आग लग गई है लेकिन यह काम हमने किया. यह रास्ता ऑफिस टाइम में हमेशा व्यस्त रहता है. अगर एसएचओ ने पहले ही ट्रैफिक डायवर्ट करवा दिया होता तो और समय बच सकता था.”
वहीं, एक अन्य निवासी वसीम गौरी कहते हैं कि फायर ब्रिगेड अगर समय पर नहीं पहुंचती तो शायद हादसा और बड़ा हो जाता है.
वसीम के मुताबिक, “फायर ब्रिगेड समय पर पहुंच गई थी. अगर वे समय पर नहीं पहुंचते तो पूरी लाइन में आग फैल सकती थी और यहां 100-200 लाशें पड़ी होतीं. ट्रैफिक की वजह से उन्हें आने में कुछ समय लगा, लेकिन हालात को देखते हुए वे समय पर ही पहुंचे. यह सड़क हमेशा व्यस्त रहती है क्योंकि यहां कोर्ट भी है, मॉल भी है और आसपास अस्पताल भी हैं. इसलिए इस रोड पर हर समय भारी ट्रैफिक रहता है. मालवीय नगर, साकेत कोर्ट और मैक्स अस्पताल की तरफ से दमकल की गाड़ियां पहुंच रही थीं. एक-एक करके लगातार गाड़ियां मौके पर आ रही थीं. एम्बुलेंस की संख्या भी काफी थी. लोग रास्ते में रुक-रुक कर घटना को देख रहे थे."
क्या कहती है पुलिस?
दिल्ली पुलिस ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि उन्हें इस घटना की जानकारी सबसे पहले 8:48 मिनट पर मिली थी और कंट्रोल रूम में इसकी जानकारी 8:51 पर मिली. 8:57 पर उनके कुछ अधिकारी उस घटना स्थल पर मौजूद थे. मालूम हो कि इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन में दिल्ली पुलिस के 11 अधिकारी घायल हुए.
हेड कॉन्स्टेबल दिनेश इस रेस्क्यू ऑपरेशन का अहम हिस्सा थे. वह न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं कि उन्हें सुबह 8:50 बजे एक फोन कॉल के माध्यम से घटना की जानकारी मिली और 8:53 बजे तक मौके पर पहुंच गए थे. दिनेश कहते हैं, "मैं बाइक से मेट्रो स्टेशन तक गया और वहां से दौड़कर बिल्डिंग तक पहुंचा. रास्ते में काफी जाम लगा था."
दिनेश की तरह ही हेड कॉन्स्टेबल देशराज को सुबह 9:15 बजे ड्यूटी ऑफिसर का फोन आया. उन्हें तुरंत घटनास्थल पर पहुंचने के निर्देश दिए गए. दिनेश कहते हैं, "मैं तुरंत रवाना हो गया. यहां तक कि मैंने वर्दी भी नहीं पहनी."
देशराज के अनुसार, “रास्ते में भारी ट्रैफिक जाम था. फायर ब्रिगेड की एक गाड़ी भी जाम में फंसी थी. जिसे निकलवाने में मैंने मदद की.”
देशराज के मुताबिक, उन्होंने ट्रैफिक पुलिसकर्मियों से यातायात को डायवर्ट करने के लिए भी कहा ताकि आपातकालीन वाहन आसानी से घटनास्थल तक पहुंच सकें. उन्होंने बताया कि जब वह मौके पर पहुंचे तो फायर ब्रिगेड की एक गाड़ी आग बुझाने में जुटी हुई थी.
उन्होंने कहा कि घटनास्थल के आसपास ट्रैफिक की स्थिति बेहद खराब थी. बड़ी संख्या में लोग सड़क पर रुककर घटना देखने की कोशिश कर रहे थे, जिससे यातायात और बाधित हो रहा था. "हमें लोगों को जबरन हटाना पड़ रहा था और कई जगह ट्रैफिक डायवर्ट करना पड़ रहा था."
देशराज ने स्पष्ट किया कि दमकल विभाग की ओर से कोई देरी नहीं हुई थी. उनके अनुसार, आग इतनी भीषण थी कि कुछ ही मिनटों में पूरे क्षेत्र में फैल गई. उन्होंने बताया कि इमारत के भीतर लगे एयर कंडीशनर फट गए थे, इंटीरियर का बड़ा हिस्सा जल चुका था और धुएं के कारण बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए थे.
राजस्थान निवासी हेड कॉन्स्टेबल करतार पिछले 10 सालों से दिल्ली पुलिस में हैं. वह कहते हैं, “जैसे ही मैं मालवीय नगर मेट्रो स्टेशन के पास पहुंचा तो वहां भारी ट्रैफिक जाम था. एक फायर ब्रिगेड की गाड़ी मेट्रो के पास ट्रैफिक में फंसी हुई थी. लोगों ने मदद भी की, लेकिन कई लोग वीडियो बनाने के चक्कर में सड़क पर भीड़ लगाकर खड़े हो गए, जिससे रास्ता अवरुद्ध हो गया और फायर ब्रिगेड की गाड़ी फंस गई. हमें खुद पैदल दौड़कर मौके पर पहुंचना पड़ा. लोगों ने मदद भी की, लेकिन वीडियोग्राफी के कारण बाधा भी उत्पन्न हुई."
नजदीकी फायर स्टेशन बिजी तो पहला रिस्पॉन्डर कौन?
फ्लोरिश स्टे होटल के सबसे नजदीक गीतांजली स्थित फायर स्टेशन है. इसकी दूरी मात्र 3-4 किलोमीटर है. हालांकि, घटना स्थल पर सबसे पहले भीकाजी कामा प्लेस के फायर स्टेशन की गाड़ी पहुंची. जो इससे करीब 8 किलोमीटर दूर है.
विभाग का कहना है कि गीतांजलि फायर स्टेशन उस समय किसी दूसरी आपात स्थिति में व्यस्त था. इसीलिए कॉल दूसरे स्टेशनों को डायवर्ट की गई.
भीकाजी फायर स्टेशन पर सुबह जब कॉल आई तो कमल डागर की ड्यूटी खत्म होने वाली थी. कमल न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, “हमारी टीम ने जल्द से जल्द घटनास्थल तक पहुंचने की पूरी कोशिश की और लगभग 15 से 17 मिनट में वहां पहुंच गए.”
कमल कहते हैं कि रास्ते में रेड लाइट और ट्रैफिक जाम दोनों थे. ऐसे में उनके अधिकारी लगातार खिड़की खोलकर सायरन बजाते रहे और लोगों से रास्ता खाली करने की अपील करते रहे. उन्होंने कहा, “इंचार्ज लगातार आवाज लगा रहे थे- ‘साइड हट जाओ, फटाफट, इमरजेंसी व्हीकल है, जाने दो इसको.’
डागर कहते हैं, “फायर टेंडर चलाते समय अचानक ब्रेक लगाने से बचना पड़ता है क्योंकि गाड़ी में 12 हजार लीटर पानी भरा होता है. अगर बार-बार ब्रेक लगाए जाएं तो गाड़ी की गति दोबारा पकड़ने में समय लगता है. इसलिए टीम कोशिश करती है कि कम से कम ब्रेक लगाए जाएं. सायरन लगातार चालू रहता है और जैसे ही गाड़ी की रफ्तार ट्रैफिक या रेड लाइट के कारण धीमी होती है, इंचार्ज लोगों को रास्ता देने के लिए आवाज लगाते रहते हैं.”
डागर कहते हैं कि वह जितना संभव हो सकता है उतना तेज चलाने की कोशिश करते हैं.
डागर ने बताया कि भीकाजी कामा स्टेशन से दो गाड़ियां रवाना हुई. वॉटर बाउजर-31 और SWT-43. वह वॉटर बाउजर-31 पर तैनात थे, जिसमें 12,000 लीटर पानी रहता है, जबकि दूसरी गाड़ी की टंकी में 3,000 लीटर पानी था.
उन्होंने बताया कि आग लगी हुई इमारत गली के भीतर लगभग 20 से 25 मीटर की दूरी पर थी. छोटी गाड़ी सीधे घटनास्थल तक पहुंच गई थी जबकि उनकी गाड़ी करीब 20 मीटर पीछे खड़ी रही. वहां से पाइप लगाकर पानी पहुंचाया गया.
करीब दो वर्षों से दमकल सेवा में कार्यरत कमल डागर ने कहा कि यह उनके अब तक के करियर का सबसे खतरनाक अनुभव था.
भीका जी के अलावा सफदरजंग फायर स्टेशन से मनोज कुमार मेहरावत की टीम मौके के लिए रवाना हुई थी. इस स्टेशन की दूरी भी घटनास्थल से करीब 8 किलोमीटर है. मनोज कहते हैं कि रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती उनके लिए ट्रैफिक और भीड़ थी.
मनोज ने बताया कि मालवीय नगर की मेन सड़क पर इतनी अधिक भीड़ थी कि उन्हें अपने 2-3 कर्मियों को वाहन से नीचे उतारना पड़ा. इन्हें ट्रैफिक खुलवाने और लोगों से रास्ता खाली कराने के लिए लगाया गया. इस पूरी कवायद में 5-6 मिनट का वक्त लग गया.
वह कहते हैं, “लोग रुककर देखने लगते हैं. जिससे ट्रैफिक आगे नहीं बढ़ पाता… लगातार एम्बुलेंस, फायर ब्रिगेड और स्थानीय पुलिस के सायरन बज रहे थे लेकिन लोग हिल ही नहीं रहे थे. सायरन का मतलब यही होता है कि पीछे कोई आपात स्थिति है और रास्ता देना चाहिए, लेकिन लोग मानते नहीं हैं.”
‘सटीक लोकेशन न होना भी बना चुनौती’
भीका जी कामा प्लेस स्टेशन पर तैनात फायर ऑफिसर नरेंद्र कुमार कहते हैं कि 8:50 से 8:51 बजे के बीच जैसे ही सायरन बजा, उन्होंने तुरंत अपनी ड्रेस तैयार की, वॉचरूम से एड्रेस स्लिप ली और घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.
नरेंद्र कुमार कहते हैं कि एड्रेस स्लिप में केवल लेमन ट्री, मालवीय नगर का पता लिखा था लेकिन किसी ब्लॉक का स्पष्ट उल्लेख नहीं था. रास्ते में ही उन्होंने घटनास्थल पर संपर्क करने की कोशिश की और मौके पर मौजूद लोगों से संपर्क कर सटीक लोकेशन हासिल की.
वह दावा करते हैं कि लगभग 9:05 बजे घटनास्थल पर पहुंच गए थे. वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि इमारत के बाहर गद्दे बिछे हुए थे और कुछ लोग खिड़कियों से बचाव की गुहार लगा रहे थे. इसके बाद उनकी टीम ने तुरंत पाइपलाइन बिछाकर आग बुझाने का काम शुरू किया और अंदर फंसे लोगों को राहत पहुंचाने की कोशिश की.
नरेंद्र कुमार का कहना है कि आग की लपटें इमारत से लगभग 10 फीट बाहर तक निकल रही थीं. उन्होंने तुरंत अपने कार्यालय को सूचना दी कि आग काफी बड़ी है, इसलिए वरिष्ठ अधिकारियों और अतिरिक्त मैनपावर को भेजा जाए.
नरेंद्र का मानना है कि घटनास्थल पर मौजूद लोगों ने शुरुआत में खुद आग बुझाने की कोशिश की. वह कहते हैं, “ऐसा प्रतीत होता है कि सूचना देने में देरी हुई. क्योंकि आग में इतनी अधिक गर्मी और तीव्रता विकसित होने में समय लगता है.”
नरेंद्र मालवीय नगर के गोल चक्कर की ओर से घटनास्थल तक पहुंचे. उनके अनुसार पता और लोकेशन पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी, लेकिन टीम ने अपने अनुभव और कौशल का इस्तेमाल करते हुए रास्ता खोज लिया और पीछे की ओर से घटनास्थल तक पहुंची.
उन्होंने बताया कि घटनास्थल के अंतिम हिस्से में भी कुछ कारें खड़ी थीं. उनके अनुसार यदि आग काफी समय से लगी हुई थी तो स्थानीय लोगों को उन वाहनों को पहले ही हटा देना चाहिए था ताकि दमकल कर्मियों को पाइपलाइन बिछाने और राहत कार्य शुरू करने में कम समय लगता. अंततः टीम ने वहीं से पाइपलाइन बिछाकर आग बुझाने और बचाव अभियान जारी रखा।
नरेंद्र कुमार कहते हैं कि वैसे तो बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे, लेकिन इनमें कई लोग वीडियो और रील बनाने में व्यस्त थे. इससे सिर्फ तमाशबीन भीड़ बढ़ रही थी और बचाव मुश्किल होता जा रहा था.
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