Opinion
वो अंदरूनी फूट जिसने माओवादी आंदोलन को खत्म कर दिया
हिंदुस्तान में माओवादी आंदोलन ताश के महल की तरह कैसे ढह गया?
इस प्रश्न के उत्तर के लिए हमें थोड़ा मध्य भारत में माओवादी आंदोलन के इतिहास पर भी नज़र डालनी होगी. बाकी राज्यों की तरह मध्य भारत में माओवादी आंदोलन स्वतः स्फूर्त नहीं रहा है. यह बाहरी लोगों द्वारा थोपा हुआ आंदोलन था.
बंगाल हो बिहार या आंध्र प्रदेश हर जगह माओवादी आंदोलन मूलतः जमींदार विरोधी आंदोलन रहे हैं. इनका नेतृत्व अधिकतर शिक्षित मध्य वर्ग के शहरी कम्युनिस्टों ने ही किया. पर वहां चारु मजूमदार और कानू सान्याल के साथ-साथ जंगल संथाल जैसे आदिवासी नेता भी इसके शीर्ष नेतृत्व में रहे.
मध्य भारत के आदिवासी इलाकों का माओवादी आंदोलन इन राज्यों के माओवादी आंदोलनों की असफलता से जुड़ा है. बंगाल के नक्सलबाड़ी में, जहां से इस आंदोलन को नक्सलवाद का नाम भी मिला, 1967 में शुरू होने के 5 साल के अंदर वह पुलिस के दमन से खत्म भी हो गया था.
इसके भी 5 साल बाद, 1977 में बचे हुए माओवादी एक समीक्षा बैठक के लिए मिले. उनके लिए प्रश्न यही था कि हम तो यह समझते थे कि 1967 में हमारे आंदोलन को सही लाइन (दिशा) मिली थी पर यह सब इतनी जल्दी कैसे खत्म हो गया?
उस समीक्षा बैठक का समापन रियर एरिया डॉक्युमेंट नामक एक दस्तावेज से हुई जिसमें यह कहा गया कि माओ ने कहा था कि पार्टी को एक रियर एरिया यानि छुपने की जगह भी बनाकर रखना चाहिए जहां युद्ध की विपरीत परिस्थतियों में अधिकतर योद्धाओं को शिफ्ट किया जा सके जो हालात सुधरने पर वापस लौटें.
मध्य भारत में हाल में जिस दण्डकारण्य में माओवादी आंदोलन के समाप्त होने का दावा किया गया है, यह वही रियर एरिया या छुपने की जगह थी, जहां माओवादियों ने 1980 में काम करना शुरू किया था. उनका उद्देश्य इस इलाके को एक सुरक्षित छुपने की जगह की तरह विकसित करने की थी.
पर 1990 तक जब माओवादी आंदोलन की स्थिति और राज्यों में नहीं सुधरी तो छुपने की जगह में भेजे गए माओवादियों ने विद्रोह कर दिया और कहा कि हम दंडकारण्य से ही क्रांति के लिए काम करेंगे. पार्टी की यह समझ गलत है कि यहां आदिवासियों में राजनैतिक चेतना नहीं है और क्रांति यहां पर नहीं होगी.
दंडकारण्य में और जगहों की तरह जमींदार नहीं थे और कोई भूमिहीन भी नहीं था पर राज्य ने माओवादियों की मदद की. बीजेपी की सरकार ने एक पुलिसिया आंदोलन शुरू किया जिसका नाम था जन जागरण आंदोलन. इसका मुख्य उद्देश्य उन लोगों को परेशान करना था जिन्होंने पिछले 10 सालों में माओवादियों की मदद की थी
1980 से 1990 तक माओवादी दंडकारण्य में एक एनजीओ की तरह काम कर रहे थे जहां उन्होंने आदिवासियों को जंगल विभाग के अत्याचार से मुक्ति दिलाने, तेंदूपत्ता और अन्य वन उपजों का सही दाम दिलाने और उनकी महिलाओं के सरकारी अधिकारियों द्वारा हो रहे दैहिक शोषण को रुकवाने जैसे काम करते रहे.
आदिवासी समाज में अधिकतर कार्य सामूहिक निर्णय से होते हैं. उनके सामाजिक नेताओं ने उनसे उस समय कहा कि माओवादी चाहते हैं कि स्थनीय आदिवासी अब उनकी पार्टी से जुड़ें. इन लोगों ने हमारी पिछले 10 सालों में बहुत मदद की है. इसलिए आपमें से जो लोग जन जागरण अभियान के कारण घर नहीं जा पा रहे हैं वो पार्टी (माओवादी) से जुड़ सकते हैं.
दंडकारण्य में माओवादी आंदोलन की शुरुआत ऐसे हुई और उसका अंत भी. 2015 के आसपास उन्हीं आदिवासी सामाजिक नेताओं ने आदिवासी समाज से यह कहा कि दादा (माओवादी) लोग अच्छे लोग हैं. कम से कम पुलिस से तो अच्छे हैं, पर उनके हिंसक आंदोलन से लंबे समय में हमारे समाज का भला नहीं होगा.
1990 और 2015 के बीच 2005 में एक और बड़ी घटना हुई थी जब सरकार ने जन जागरण अभियान के बड़े रूप को सलवा जुडुम (गोण्डी में शांति यात्रा) नाम से शुरू किया था. इस आंदोलन के बाद मजबूरी में बहुत बड़ी संख्या में आदिवासी माओवादी पार्टी में शामिल हुए क्योंकि दूसरा विकल्प था अपने घर-गांव छोड़कर सरकारी कैंपों में जाना.
इस तरह सलवा जुडुम से नाराज आदिवासी बड़ी संख्या में माओवादी आंदोलन से जुड़ गए. 2005 से 2015 तक दंडकारण्य में माओवादी पार्टी बहुत ताकतवर हो गई. उन्होंने कई बड़े हमलों को अंजाम दिया. पर 2015 के सामाजिक निर्देश के बाद जब आदिवासियों ने आंदोलन को छोड़ने की इच्छा जाहिर की तो बाहरी और गैर आदिवासी माओवादी नेता बहुत उग्र हो गए. उन्हें लग रहा था क्रांति अब बस होने ही वाली है!
मैं दंडकारण्य में 2004 से मीडिया के लोकतंत्रीकरण के एक प्रयोग पर काम करने की कोशिश कर रहा हूं और जन पत्रकारिता की हमारी बैठकों में लोगों ने कहना शुरू किया “यह काम बहुत अच्छा है, बहुत जरूरी है, इससे हमें मदद होती है पर हमें आपसे इससे बड़ी मदद चाहिए हम माओवादी आंदोलन को छोड़ना चाहते हैं.”
3 सालों तक उनके आग्रह पर टालमटोल करने के बाद भी जब आदिवासी अपनी बात पर अड़े रहे हम लोगों ने उन शहरी लोगों से बात करने की कोशिश की जो माओवादी आंदोलन के करीब थे, या इस आंदोलन को समझते थे. एकाध को छोड़ लगभग सभी ने कहा कि एक शांति प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए पर किसी ने कुछ नहीं किया.
2018 से मीडिया के लोकतंत्रीकरण के काम को पीछे करते हुए हम लोगों ने नई शांति प्रक्रिया का काम शुरू किया. कई बैठकें हुई, कई पदयात्राएं हुई, कुछ साइकिल रैली हुई फिर धीरे धीरे माओवादी नेताओं ने हमसे संपर्क करना शुरू किया. प्रेस नोट के साथ बातचीत में भी वे हमारा विरोध करते थे पर बार-बार फोन करते थे.
फोन हर बार नए नंबर से आता था और वे कहते थे “आप तो हमें सरेंडर करने को कह रहे हैं. आप तो हमें भारतीय संविधान को मानने की बात कर रहे हैं. ये सब हम कभी नहीं कर सकते”. हम कहते थे “यदि आप चाहें तो हम सरेंडर और संविधान की जगह कुछ दूसरे शब्दों का उपयोग कर सकते हैं.”
केंद्र सरकार को बातचीत में कोई रुचि नहीं थी. पर सलवा जुडुम के असफल प्रयोग के बाद (जिसे मिलिट्री की भाषा में स्ट्रेटेजिक हेमलेटिंग यानि पानी को मछली से अलग करने की रणनीति कहते हैं) फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस यानि माओवादी इलाकों में नए कैंप लगाने की सरकार की नई रणनीति सफल होती नज़र आ रही थी.
31 मार्च, 2026 की डेडलाइन के करीब मैंने अबूझमाड़ के कुतुल में जाने की कोशिश की जो माओवादियों की अघोषित राजधानी कही जाती थी जहां उनके प्रमुख बसवराजू बहुत सालों तक रहते थे. पिछले साल उनकी हत्या हो गई और उसके बाद से ही माओवादी आंदोलन और कमज़ोर होता गया.
कुतुल जाने के रास्ते में मैंने नारायणपुर जिले (अबूझमाड इसी जिले में है) के पुलिस प्रमुख रॉबिन्सन गुड़िया से मुलाकात की. रॉबिन्सन पिछले दो सालों में बसवराजू की हत्या समेत माओवादियों की “राजधानी” में हुए तमाम हमलों का नेतृत्व करते रहे हैं जो कुछ महीनों पहले तक भी माओवादियों का अभेद्य किला समझा जाता था.
मैंने रॉबिन्सन गुड़िया से पूछा ये कमाल हुआ कैसे? ये ताश के महल की तरह कैसे ढह गए? उन्होंने जवाब दिया “ह्यूमन इन्ट. 80% ह्यूमन इन्ट और 20% बाकी सब कुछ”. मैंने पूछा 20% में क्या क्या था, उन्होंने कहा “अमित शाह, डबल इंजन सरकार, ड्रोन, सैटेलाइट, पैसा, डीआरजी (स्थानीय लोगों की बटालियन) आदि.”
फाइनल असॉल्ट
इस “ह्यूमन इन्ट” (इंटेलीजेंस) ने पुलिस कैंपों के सफल होने में भी मदद की. लोग मूलतः ऊब गए थे दोनों तरफ की हिंसा से. असली कहानी शुरू होती है 16 जनवरी, 2024 से. इस बीच छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार आ गई थी और अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद तेज हुई कैंप लगाने की रणनीति और तेज़ हो गई.
कैंप लगाने की सरकारी रणनीति को असफल करने के लिए माओवादियों ने एक बड़े हमले की तैयारी की. उन्होंने छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के धर्मावरम के केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कोबरा बटालियन पर हमला करने के लिए अपने पश्चिम और दक्षिण बस्तर के सभी लड़ाकों को इकट्ठा होने का आदेश दिया.
उन्होंने तालपेरु नदी के किनारे स्थित कोबरा कैंप की एक नकल बनाई. लड़ाकों के पहनने के लिए घास के कपड़े बनाए, खूब रेकी की, पर इन तमाम तैयारियों के बावजूद धर्मावरम हमला असफल हो गया. यद्यपि माओवादियों ने प्रेस नोट निकाला कि उन्होंने 35 पुलिसकर्मियों को मार दिया है, पर असल में कोई भी सुरक्षाकर्मी नहीं मरा था.
इस असफलता का एक बड़ा कारण था कि स्थानीय लोग हमले में बड़ी संख्या में नहीं जुड़े या जुड़ सके, जैसा पहले के सभी बड़े हमलों में होता आया था. पर इस असफल हमले ने एक काम किया जो बहुत समय से नहीं हो पाया था. इसने प्रमुख आदिवासी माओवादी कमांडरों को एक जगह इकट्ठा होने का मौका दिया.
उन्होंने असफल हमले की समीक्षा की और उसके बाद वह किया जो दंडकारण्य के 45 साल के माओवादी इतिहास में पहली बार हुआ. उस बैठक में सभी आदिवासी माओवादी नेताओं ने एक दूसरे को बताया कि समाज यह चाहता है कि हम रणनीति बदलें, हम आंदोलन से अलग हो जाएं. फिर उन सबने एक पत्र लिखने का निर्णय लिया.
माओवादी पार्टी में केंद्रीय समिति सबसे ऊपर की निर्णायक समिति होती है. केंद्रीय समिति को लिखे इस पत्र में कहा गया “लगातार लग रहे कैंपों के कारण लोगों से मिलना और मदद लेना मुश्किल होता जा रहा है. हमें लगता है अब पार्टी को रणनीति बदलनी चाहिए, हमें थोड़े समय के लिए अपने हथियार डंप कर देना चाहिए.”
कुछ माह के भीतर हुई केंद्रीय समिति की बैठक में इस सामूहिक पत्र पर चर्चा हुई और प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया. पर धर्मावरम की बैठक में अन्य आदिवासी लड़ाकों ने उनके प्रमुख कमांडर हिडमा से यह अनुरोध किया था कि वे इस सामूहिक पत्र के बारे में पार्टी के अन्य धड़ों की राय जानने का भी प्रयास करें.
यद्यपि दंडकारण्य के माओवादी आंदोलन मे 99% लड़ाके आदिवासी थे और उनमें से आधी लड़कियां. पर इस समय तक केंद्रीय समिति में एक भी आदिवासी या महिला को स्थान नहीं मिला था. हिडमा ने उस पत्र को पार्टी के सभी समूहों को भेजा. एक आदिवासी और एक तेलुगु माओवादी नेता ने मुझे उस पत्र के बारे में बताया था.
पत्र खारिज तो हो गया था पर उसने अपना काम कर दिया था. केंद्रीय समिति के प्रवक्ता वेणुगोपाल सबसे पहले पत्र से सहमत हुए. इसके बाद पार्टी के महासचिव बसवराजू भी धीरे धीरे पत्र से सहमत होने लगे. हिडमा को तब तक पार्टी के सभी समूहों से पत्र के लिए समर्थन मिल गया था. इसके बाद हिडमा को केंद्रीय समिति में ले लिया गया.
महासचिव बसवराजू ने शांति के लिए लोगों से बात करनी शुरू की. मैंने सुझाव दिया कि कुछ पत्रकारों को इसमें शामिल करना सुरक्षा की दृष्टि से बेहतर होगा. मेरी पत्नी की अस्वस्थता के कारण मेरा इसमें सक्रिय रूप से शामिल होना संभव नहीं था. इन बैठकों में हिडमा सहित केंद्रीय समिति के सदस्य रूपेश भी शामिल हुए.
इस बीच एक बड़ी घटना हो गई. स्थानीय लड़के-लड़कियों और सरेंडर किए पूर्व माओवादियों की एक डीआरजी टीम ने बसवराजू की हत्या कर दी. शांति विरोधी माओवादी नेताओं ने शांति समर्थक माओवादियों को बसवराजू की हत्या के लिए दोषी बताया. पर बसवराजू की हत्या के बावजूद शांति प्रक्रिया का काम रुका नहीं.
छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा से एक पत्रकार मित्र की मदद से संपर्क किया गया. फिर गृहमंत्री से क्या-क्या बात करनी है इस पर काम शुरू हुआ. रूपेश को उसी पत्रकार मित्र के साथ गृह मंत्री से रायपुर में मिलने की जिम्मेदारी दी गई. पर रूपेश सिर्फ तीन मांगों पर सहमति बनाकर वापस आ गए.
ये तीन मांगें थी: 1 बाहर आने पर किसी माओवादी पर कोई मुकदमा नहीं चलाया जाएगा 2. बाहर आने पर किसी माओवादी को पुलिस में भर्ती होने के लिए दबाव नहीं डाला जाएगा 3. माओवादियों की लीगल फ्रंट संस्था मूलवासी बचाओ मंच पर प्रतिबंध हटा लिया जाएगा. इससे हिडमा बहुत नाराज हो गए.
हिडमा ने कहा “मैं अपने लिए नहीं लड़ रहा, मैं अपने समाज के लिए लड़ रहा हूं. इसमें समाज के लिए तो कुछ भी नहीं है. और लगभग 70-80% लड़ाकों के साथ हिडमा शांति विरोधी खेमे में शामिल हो गया. पर वेणुगोपाल के नेतृत्व में शांति समर्थक धड़े ने इन्हीं तीन शर्तों पर लगभग 20% लड़ाकों के साथ आत्मसमर्पण करने का निर्णय लिया.
जंगल में रहने वाले आदिवासियों को भी पार्टी के इस विभाजन की खबर थी और उन्होंने बड़े नेताओं के बारे मे बिल्कुल सटीक जानकारी पुलिस को देना और तेज कर दिया (जिस ह्यूमन इन्ट के बारे मे रॉबिन्सन गुड़िया बता रहे थे). जब बड़े तेलुगु नेताओं की हत्या होने लगी तो कुछ शहरी लोगों ने शांति के प्रयास शुरू किए.
ऐसा लग रहा था कि जब 80% लड़ाके अब शांति के खिलाफ हैं तो बहुत अधिक खून खराबा होगा. पर लोगों द्वारा दी गई जानकारियां इतनी सटीक थी कि छोटे छोटे पुलिस के समूह भी बड़े-बड़े नेताओं की हत्या कर सकुशल वापस आने लगे और अंततः एक दिन हिडमा भी मारे गए या मार दिए गए.
जिस दिन हिडमा मारे गए, टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार उस दिन भी समाज के पास उनका आखिरी पत्र आया था कि वे आदिवासी मुद्दों पर सरकार से बातचीत करना चाहते हैं. और उसके बाद शांति विरोधी माओवादी गुट के बचे बड़े नेताओं ने भी वैसे ही आत्मसमर्पण कर दिया जैसा शांति गुट ने पहले किया था. इस तरह दंडकारण्य का माओवादी अभ्यारण्य पलक झपकते ही ढह गया.
लेखक बीबीसी के पूर्व पत्रकार और सीजीनेट स्वर के संस्थापक हैं. यह मध्य गोंडवाना क्षेत्र पर केंद्रित एक वॉइस-बेस्ड ऑनलाइन समाचार पोर्टल है. वह नई शांति प्रक्रिया के संयोजक भी थे.
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