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चुनाव आयोग के एसआईआर ने बंगाल के नतीजों को कितना बदला
4 मई को आए विधानसभा चुनाव के नतीजों में भाजपा ने पश्चिम बंगाल की 294 में से 207 सीटों पर जीत हासिल की. यह एक ऐतिहासिक जीत थी. हालांकि, चुनाव से पहले जो हुआ, वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है.
दरअसल, मतदान से कुछ महीने पहले, मतदाता सूचियों के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) ने राज्य के चुनावी परिदृश्य को चुपचाप बदल दिया. फरवरी में जब अंतिम लिस्ट आई, तब तक 27.16 लाख मतदाता हटा दिए गए थे. ये वे लोग थे जिनके नाम चुनाव आयोग ने 'न्यायिक निर्णय के अधीन' यानी जांच के घेरे में रखे थे. चुनाव तब हुए जब इन हटाए गए लाखों लोगों की अपीलें सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनी 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल के सामने लंबित थीं.
भाजपा की इस बड़ी जीत के कई कारण बताए गए. जैसे सत्ता विरोधी लहर, विपक्ष के वोटों का बंटवारा और हिंदू वोटों का एकजुट होना. इनमें से अधिकांश कारण सामान्य थे, लेकिन एसआईआर का मामला विवादित था. इसलिए हमने वोटर लिस्ट में सुधार और चुनाव परिणामों के बीच संबंध की पड़ताल की.
हमने चार टेस्ट किए, जिनमें से हरेक पिछले वाले से ज्यादा कड़ा था. हमारा मकसद यह देखना था कि नामों को हटाए जाने और चुनाव नतीजों के बीच का संबंध कहां टिकता है और कहां टूट जाता है.
यह विश्लेषण क्या है और क्या नहीं?
इस विश्लेषण के जवाब ऐसे नहीं हैं, जिन्हें किसी भी पक्ष के समर्थक सुनना पसंद करेंगे. क्योंकि यह इस बात की कोशिश नहीं है कि भाजपा क्यों जीती या टीएमसी क्यों हारी. उसके लिए तो ऐसे डाटा की जरूरत होगी जो सार्वजनिक रूप से मौजूद हो: जैसे कि बूथ-लेवल के नतीजे, नए जुड़े नामों का पूरा हिसाब, और यह स्पष्टता कि किसे हटाया गया, क्यों हटाया गया और वह किसे वोट देते.
आम तौर पर यह मान लिया जाता है कि हटाए गए मतदाता टीएमसी के थे लेकिन इस पर संदेह करने की जरूरत है. जांच के घेरे में आए 27.16 लाख लोग एक ही गुट के नहीं थे. वे कांग्रेस, वामपंथी या भाजपा के वोटर भी हो सकते थे. भाजपा का तर्क भी खारिज नहीं किया जा सकता कि एसआईआर केवल उन सूचियों को ठीक कर रहा था, जो सालों से फर्जी नामों से भरी थीं.
ये दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं. एसआईआर जैसा संशोधन प्रशासनिक रूप से सही हो सकता है और चुनावी रूप से प्रभावशाली भी, क्योंकि यह विधानसभा से ‘फर्जी’ मतदाताओं को हटाता है लेकिन साथ ही वह ‘असली मतदाताओं’ को भी निशाना बनाता है.
गणित अंततः जो भी साबित करे, लेकिन सच तो यह है कि एसआईआर ने इस चुनाव को असामान्य बना दिया. यह एक ऐसा चुनाव था जिसमें लाखों मतदाताओं को उनके सबसे बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार यानी वोट देने के हक को लेकर अनिश्चितता के भंवर में धकेल दिया गया.
अब, आइए विस्तार से देखते हैं कि आंकड़े क्या कहते हैं.
पहला टेस्ट: शुद्ध कटौती बनाम जीत का अंतर
पश्चिम बंगाल के मतदाताओं में से चुनाव आयोग ने सबसे पहले 58,19,653 उन मतदाताओं को हटाया जो अनुपस्थित थे, शिफ्ट हो गए थे, मर चुके थे या जिनके नाम दो जगह थे.
इसके बाद, ड्राफ्ट रोल से 5,46,053 मतदाता और हटाए गए. वहीं, सप्लीमेंट्री डिलीशन 27,16,393 रहे. इस तरह कुल हटाए गए नामों की संख्या 90,82,099 हो गई.
अब, अगर कुल संख्या में से मृत मतदाताओं (24,20,089) को हटा दें, तो हमें पहली बड़ी संख्या मिलती है- 66,62,010 यानि यह 'शुद्ध कटौती' है.
यहां 'शुद्ध कटौती' का मतलब उन सभी से है, जिन्हें मृत्यु के अलावा अन्य कारणों से हटाया गया. जैसे तकनीकी गड़बड़ी, स्थायी रूप से शिफ्ट होना, वोटर का पता न चलना या दूसरी जगह नाम होना.
यदि हम 2026 की जीत के अंतर की तुलना हरेक विधानसभा में हुई 'शुद्ध कटौती' से करते हैं तो हमें भाजपा की जीत वाली 82 ऐसी सीटें मिलती हैं, जहां हटाए गए नामों की संख्या पार्टी की जीत के अंतर से ज्यादा रही. इन 82 में से 70 सीटें ऐसी थीं जो टीएमसी से भाजपा के पाले में चली गईं.
उदाहरण के लिए, जोरासांको विधानसभा में भाजपा 5,797 वोटों से जीती. 2021 में इसी सीट पर टीएमसी 12,743 वोटों से जीती थी. एसआईआर के दौरान यहां हटाए गए नामों की संख्या 62,538 थी. जो कि जीत के अंतर से 10 गुना ज्यादा है.
इसी तरह, सातगाछिया में भाजपा 401 वोटों से जीती. 2021 में टीएमसी यहां 35,390 वोटों से जीती थी. यहां शुद्ध कटौती 17,783 थी, जो जीत के अंतर से 44 गुना ज्यादा है.
दूसरा टेस्ट: शुद्ध कटौती बनाम मिजाज में बदलाव
टीएमसी की जो सीटें बरकरार रहीं, वहां भी मतदाता का मिजाज थोड़ा बदलता नजर आया. जिसे हमने 2021 और 2026 की जीत के अंतर से भांपा. इसके लिए हमने जहां पार्टी के पास सीट बरकरार रही वहां मिजाज में आए बदलाव को पिछले आंकड़े से घटाया गया. जहां सीट पार्टी के हाथ से निकल गई वहां इस बदलाव को पूरी तरह समझने के लिए आंकड़ों को जोड़ा गया.
उदाहरण के लिए शमशेरगंज में टीएमसी 2021 में 26,379 वोटों से जीती थी. 2026 तक यह अंतर गिरकर 7,587 पर आ गया यानी 18,792 मतदाताओं का मिजाज इस बार बदल गया था.
अब इसकी तुलना मतदाता सूची से हटाए गए नामों से करें. इस विधानसभा से 83,000 से अधिक मतदाताओं के नाम हटा दिए गए थे. यह संख्या टीएमसी की जीत के अंतर में आई गिरावट से कहीं ज्यादा है, जो इस जीत को काफी अस्थिर या नाजुक दिखाती है.
जो सीटें भाजपा के पाले में गईं, वहां भी 'मिजाज में बदलाव' का संकेत दिखा. यहां टीएमसी की 2021 की जीत और भाजपा की 2026 की जीत का आंकड़ा इसका गवाह है.
जैसे कि हावड़ा उत्तर का उदाहरण देखें. 2021 में टीएमसी यहां 5,522 वोटों से जीती थी. 2026 में बीजेपी ने न केवल उस अंतर को पाटा, बल्कि 11,250 वोटों की अपनी बढ़त भी बना ली. तो इस तरह यहां बदलाव 11,250 वोट का नहीं था, यह 16,772 वोट था. यानी टीएमसी की पुरानी बढ़त और बीजेपी की नई बढ़त का कुल जोड़.
और यहां भी, हटाए गए नामों की संख्या इस बदलाव से कहीं अधिक थी. करीब 59,000 मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए थे.
चौरंगी सीट पर, 2021 में टीएमसी ने 45,344 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी. 2026 में पार्टी ने इस सीट को बचा तो लिया, लेकिन जीत का अंतर घटकर सिर्फ 22,002 रह गया यानी 23,342 वोटों का चुनावी बदलाव हुआ.
इस निर्वाचन क्षेत्र में कुल 74,118 नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए थे. अगर इस संख्या की तुलना चुनावी बदलाव से करें, तो यह 3.17 का अनुपात है. इसका सीधा मतलब यह है कि टीएमसी ने जमीन पर जितने वोट गंवाए, उससे तीन गुना से भी ज्यादा नाम लिस्ट से काट दिए गए थे.
इसी तरह पांडवेश्वर में, 2021 में टीएमसी ने 3,803 वोटों से जीत हासिल की थी. 2026 में बीजेपी ने यहां 1,398 वोटों से जीत दर्ज की यानी कुल चुनावी बदलाव 5,201 वोटों का रहा. इस सीट पर 26,416 मतदाताओं के नाम हटाए गए, जो कुल चुनावी बदलाव से पांच गुना ज़्यादा है.
इसी हिसाब से चलते रहें तो 12 ऐसी सीटें दिखती हैं जहां शुद्ध कटौती मतदाताओं के चुनावी मिजाज में आए बदलाव से ज्यादा थी. हालांकि, सीटों का यह आंकड़ा काफी छोटा है और इससे यह नहीं समझा आता कि भाजपा टीएमसी से कुल 130 सीटें छीनने में कैसे सफल रही.
तीसरा टेस्ट 'जांच के घेरे' वाली कटौती बनाम जीत का अंतर
जांच के घेरे में रखे गए या सुविधा के लिए ‘विचाराधीन’ शब्द का इस्तेमाल करें तो ऐसे 27.16 लाख मतदाता एसआईआर में हटाए गए कुल 66.62 लाख मतदाताओं की तुलना में ज्यादा सटीक पैमाना हो सकते हैं. चूंकि सामान्य कटौती के विपरीत, ये वे लोग थे जिनकी पात्रता की विशेष रूप से समीक्षा की गई थी. और यह, एसआईआर के प्रभाव को मापने का एक अधिक सटीक तरीका है.
293 सीटों के विश्लेषण से पता चलता है कि 49 सीटों पर 'विचाराधीन मतदाताओं' की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी. इनमें से भाजपा ने 26, टीएमसी ने 21 और कांग्रेस ने 2 सीटें जीतीं.
जिन 49 सीटों पर विचाराधीन कटौती 2026 की जीत के अंतर से ज्यादा थी, भाजपा ने उनमें से निम्नलिखित सीटें जीतीं:
जंगीपुर, मानिकचक, करंडीघी, हेमताबाद, कुशमंडी, रैना, मोंतेश्वर, मंगलकोट, पांडवेश्वर, आसनसोल उत्तर, भातार, नाकाशिपारा, अशोकनगर, राजारहाट न्यू टाउन, हिंगलगंज, काकद्वीप, सातगाछिया, काशीपुर बेलगाछिया, उलुबेरिया उत्तर, जगतबल्लभपुर, श्रीरामपुर, चंपदानी, पांडुआ और जंगीपाड़ा.
इनमें से भाजपा की तीन सीटों पर जीत ममता बनर्जी के कैबिनेट मंत्रियों को हराकर मिलीं. आसनसोल उत्तर में मलय घटक, जंगीपाड़ा में स्नेहाशीष चक्रवर्ती और मोंतेश्वर में सिद्दीकुल्लाह चौधरी.
यहां तक कि मुर्शिदाबाद का मुस्लिम बहुल विधानसभा जंगीपुर भी इनमें शामिल है. यह 2014 से टीएमसी का गढ़ था, जिसे पार्टी ने 2021 में 92,480 के अंतर से जीता था. यहां 36,581 नाम हटाए जाने के बाद, भाजपा ने यह सीट 10,542 वोटों से जीत ली.
लेकिन जीत के अंतर से ‘विचाराधीन’ कटौती की तुलना करना अभी भी 2021 के मुकाबले मिजाज में अए बदलाव को पूरी तरह स्पष्ट नहीं करता. इसके लिए चौथा और अंतिम टेस्ट है.
चौथा टेस्ट: ‘विचाराधीन’ कटौती बनाम मिजाज में बदलाव
यह सबसे कड़ा टेस्ट है. इसमें जब हम ‘विचाराधीन कटौती’ की तुलना 2021 के मुकाबले चुनावी मिजाज में आए बदलाव से करते हैं, तो पता चलता है कि केवल 14 सीटों पर यह कटौती मिजाज में आए बदलाव के आंकड़ों को पार कर रही थी. इन 14 में से, भाजपा को केवल एक सीट, पांडवेश्वर पर जीत मिली है. बाकी सीटों पर 2026 में भी टीएमसी ही जीती. हालांकि, 2021 में टीएमसी ने इन सभी 14 सीटों पर जीत दर्ज की थी.
तो इस टेस्ट के तहत, एसआईआर का प्रभाव सिमटकर केवल एक सीट तक रह जाता है. हालांकि, हमारा यह चौथा टेस्ट एक बात नहीं समझा पाता कि भाजपा की अपनी सीटों पर क्या हुआ. दरअसल, भाजपा ने 2021 में जीती हुई एक भी सीट नहीं हारी. जिन सीटों पर वह बहुत कम अंतर से जीती थी, वहां जीत का अंतर काफी बढ़ गया है. जबकि दूसरी तरफ टीएमसी जिन सीटों को बचाने में कामयाब रही, वहां भी उसकी जीत का अंतर घट गया.
उदाहरण के लिए, भाजपा ने 2021 में दिनहाटा सीट सिर्फ 57 वोटों से जीती थी. 2026 तक उसकी जीत का अंतर बढ़कर 17,447 हो गया. यहां विचाराधीन कटौती 17,274 थी.
इसी तरह, बलरामपुर में भाजपा 2021 में 423 वोटों से जीती थी; 2026 तक उनकी बढ़त 35,051 हो गई. यहां विचाराधीन कटौती सिर्फ 1,037 थी.
कुल्टी में भाजपा 2021 में 679 वोटों से जीती थी; 2026 में उसकी बढ़त 26,498 तक पहुंच गई. यहां विचाराधीन कटौती 11,664 थी.
यह विश्लेषण दिखाता है कि दर्जनों विधानसभा क्षेत्रों में हटाए गए मतदाताओं की संख्या इतनी ज्यादा थी कि वे जीत-हार के अंतर पर सीधा असर डाल सकते थे. तो क्या यह नामों का हटाया जाना केवल वोटर लिस्ट में किया गया सुधार था या लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित करना था या फिर इन दोनों का मिला-जुला असर, इस सवाल का जवाब शायद ही मिले.
हालांकि, यह जनहित से जुड़ा एक ऐसा गंभीर सवाल है जिसके लिए पूरी तरह से स्पष्ट और पारदर्शी जवाब की जरूरत है, लेकिन चुनाव आयोग यह जानकारी देने से इनकार कर रहा है.
इस रिपोर्ट के लिए एसआईआर के तहत कटौती का डाटा सबर इंस्टीट्यूट से और जीत के अंतर का डाटा चुनाव आयोग की वेबसाइट से लिया गया है.
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