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अंबेडकर जयंती: संसद मार्ग पर फिर गूंजी जय भीम की जयकार, उमड़ा जनसैलाब
इसमें कोई दो राय नहीं कि संविधान निर्माता डॅा. भीमराव रामजी अंबेडकर की जयंती आज एक लोकपर्व का रूप ले चुकी है. यही वजह है कि हर साल 14 अप्रैल को देश के लगभग हर शहर और गांव में अंबेडकर जयंती पूरे उत्साह और धूमधाम के साथ मनाई जाती है.
लेकिन इस उत्सव के पीछे एक सच यह भी है कि आज लगभग हर राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से डॉ. अंबेडकर को परिभाषित कर रहा है और उनके विचारों पर दावा पेश कर रहा है. ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या डॉ. अंबेडकर के मायने वही हैं, जो राजनीतिक पार्टियां हमें बताती हैं. क्या अंबेडकर सिर्फ एक प्रतीक बनकर रह गए हैं? या उनकी सोच और विरासत इससे कहीं अधिक व्यापक है?
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए हम दिल्ली के संसद मार्ग पहुंचे. जहां बीते चार दशकों से अंबेडकर जयंती के मौके पर एक अनोखा मेला लगता है. देश के कोने-कोने से लाखों लोग हर साल यहां पहुंचते हैं. यह मेला बाकी मेलों से अलग है. यह सिर्फ उत्सव नहीं बल्कि विचारों, संघर्ष और पहचान का संगम है.
सुबह होते ही लोग हाथों में भारतीय संविधान की प्रतियां, बाबा साहेब की तस्वीरें और नीले झंडे लेकर संसद मार्ग पर जुटने लगे. “जय भीम” के नारों से पूरा इलाका गूंज उठता है. कई लोग अपने परिवार और बच्चों के साथ पहुंचते हैं ताकि नई पीढ़ी को संविधान और बाबा साहेब के विचारों से जोड़ा जा सके.
कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की भी खास झलक देखने को मिलती है. दलित साहित्य और इतिहास पर आधारित गीत, कविताएं और प्रस्तुतियों के जरिए लोगों ने बाबा साहेब के संघर्ष और विचारों को याद किया. युवाओं ने आर्ट और पोस्टरों के माध्यम से शिक्षा, रोजगार और सामाजिक बराबरी जैसे मुद्दों को सामने रखा जाता है.
वैसे तो देश में कई महापुरुषों की जयंती मनाई जाती है. लेकिन जिस व्यापकता और जुनून के साथ अंबेडकर जयंती मनाई जाती है, वैसा माहौल कम ही देखने को मिलता है. इसके बावजूद मुख्यधारा की मीडिया में इस आयोजन को बहुत कम जगह मिलती है.
इसीलिए इस रिपोर्ट के जरिए हम डॉ. अंबेडकर की बढ़ती प्रासंगिकता, वंचित तबकों के लिए उनके मायनों और इस उत्सव के विविध रंगों को आपके सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं. देखिए हमारी यह खास वीडियो रिपोर्ट.
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