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नोएडा: मजदूरों की हड़ताल और हिंसा के बाद नोएडा में भारी जाम, सरकार ने मानी मांगें
उत्तर प्रदेश के नोएडा में वेतन बढ़ाने समेत कई मांगों को लेकर जारी विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के कर्मचारी बीते शुक्रवार से प्रदर्शनरत हैं. इनकी प्रमुख मांग न्यूनतम वेतन 20 हजार रुपये, अतिरिक्त काम के बदले अतिरिक्त वेतन और छुट्टी आदि की मांग है. कर्मचारियों के मुताबिक, मौजूदा वेतन करीब 12-13 हजार रुपये है, जो कि बढ़ती महंगाई में गुजारे के लिए पर्याप्त नहीं है.
हालांकि, सोमवार को यह प्रदर्शन उग्र हो गया. कुछ जगहों पर आगजनी एवं तोड़फोड़ की खबरें आईं, जिनमें गाड़ियों को आग लगाना, पुलिस वाहन में तोड़फोड़ और पत्थरबाजी आदि शामिल है. पुलिस ने हालात काबू में करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया और 50 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया है.
वहीं, प्रदर्शन के चलते नोएडा से दिल्ली आने वाले कई रास्तों पर भारी जाम लग गया है. साथ ही ऑटोचालकों के किराया दोगुना करने जैसी ख़बरें भी आ रही हैं.
मजदूरों का कहना है कि उनकी आय और खर्च के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है. वे हर महीने 4,000 से 7,000 रुपये तक किराया देते हैं, बच्चों की फीस और बाकी जरूरी खर्च अलग हैं. ऐसे में 200-300 रुपये की सैलरी बढ़ोतरी उनके लिए काफी नहीं है. उनका आरोप है कि कंपनियां उनकी बात सुनने को तैयार नहीं हैं.
प्रदर्शन कर रहे कई मजदूरों ने काम की परिस्थितियों को भी बेहद कठिन बताया. उनका कहना है कि फैक्टरी में समय की सख्ती इतनी ज्यादा है कि एक सेकंड की देरी पर भी वेतन में कटौती हो जाती है. कई बार उन्हें पानी पीने या लघुशंका आदि का भी समय नहीं मिलता और छुट्टी के दिन भी काम करने का दबाव बनाया जाता है.
यह विवाद तब शुरू हुआ जब कुछ मजदूर अपनी सैलरी को लेकर एचआर से मिलने गए. कंपनी की ओर से मामूली बढ़ोतरी का नोटिस जारी किया गया, जिससे मजदूर असंतुष्ट हो गए और धीरे-धीरे हड़ताल शुरू हो गई. बीते कुछ ही दिनों में यह हड़ताल बड़े स्तर पर फैल गई.
प्रदर्शन के दौरान पुलिस और मजदूरों के बीच तनाव भी बढ़ा. कुछ मजदूर नेताओं और प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया, जिसमें महिलाओं को भी न्यायिक हिरासत में भेजा गया. मजदूर संगठनों का आरोप है कि उन्हें गिरफ्तारी और केस से जुड़ी जानकारी समय पर नहीं दी गई.
वहीं, इस बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि मजदूरों को उनका हक मिलना चाहिए और उद्योगों को श्रम कानूनों का पालन करना चाहिए. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि हिंसा फैलाने वाले असामाजिक तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.
इस बीच सरकार ने फौरी तौर पर कुछ राहत उपायों का ऐलान किया है, जैसे डबल ओवरटाइम (अतिरिक्त काम के बदले दोगुना भुगतान) और शिकायत निवारण समितियां आदि. साथ ही सरकार ने न्यूनतम वेतन का भरोसा भी दिलाया है. हालांकि, मजदूर अपनी मुख्य मांग यानि न्यूनतम वेतन पर अड़े हुए हैं. उनका साफ कहना है कि जब तक 20,000 रुपये की सैलरी नहीं मिलेगी, उनका आंदोलन जारी रहेगा.
‘क्या उन्हें हमारी बात नहीं सुननी चाहिए?’
‘क्या वे सिर्फ तब आएंगे जब कोई जान चली जाएगी?’ हड़ताल पर बैठे एक मजदूर अरविंद ने पूछा. “क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन कवर करने लायक नहीं होता? क्या उन्हें हमारी बात नहीं सुननी चाहिए?”
मजदूर संगठन ‘मजदूर बिगुल’ के एक नेता रुपेश ने कहा, “मीडिया हमारी लड़ाई नहीं लड़ेगा. अगर वे नहीं आते, तो हमारे पास खुद का मीडिया है. हम सभी फेसबुक और इंस्टाग्राम इस्तेमाल करते हैं तो चलो लाइव चलते हैं.”
हालांकि, इस प्रदर्शन को बीते शनिवार से प्रमुख अखबारों में जगह मिलनी शुरू हो गई है. लेकिन मजदूरों का कहना है कि उनका असंतोष कई महीनों से बढ़ रहा था.
गौरतलब है कि सोनीपत और हरियाणा में हाल के प्रदर्शनों के बाद मजदूरों के न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी की गई है. ऐसे में नोएडा के कारखानों में काम करने वाले मजदूरों को उम्मीद थी कि मार्च या अप्रैल में होने वाले उनके वार्षिक बोनस में अच्छी बढ़ोतरी होगी लेकिन जब तनख्वाह आई तो उनकी उम्मीदें निराशा में बदल गई.
9 अप्रैल को रिचा ग्लोबल की प्रोडक्शन टीम के 20 से 25 मजदूर वेतन और बढ़ती महंगाई को लेकर एचआर विभाग से मिलने गए. मजदूरों का कहना है कि उनकी सुनवाई नहीं हुई. जिसके बाद उन्होंने फैक्टरी के अंदर ही विरोध शुरू कर दिया. कंपनी ने लगभग 340 से 360 रुपये वेतन बढ़ोतरी का नोटिस लगाया.
इसके बाद मजदूरों ने फिर विरोध शुरू कर दिया. 10 अप्रैल को जब मजदूर लौटे और उन्होंने वही नोटिस फैक्टरी गेट पर देखा तो आधे कर्मचारी हड़ताल पर चले गए.
11 अप्रैल तक फैक्टरी का कामकाज लगभग ठप हो गया.
महंगाई का संकट
नोएडा की फैक्टरियों में काम करने वाले ज्यादातर मजदूर 4,000 से 7,000 रुपये तक किराया देते हैं.
रिचा ग्लोबल के एक मजदूर आशिक का कहना है कि जहां उनकी सैलरी 300 रुपये बढ़ी, वहीं मकान मालिक हर साल 500 रुपये किराया बढ़ा देता है, जिससे उनकी स्थिति और खराब हो जाती है.
अनुराग भी लगभग यही बात दोहराते हैं. वह कहते हैं, “सैलरी बढ़ने का कोई असली फायदा नहीं होता. हमें 250- 300 रुपये की बढ़ोतरी मिलती है, लेकिन मकान मालिक जनवरी में ही किराया बढ़ा देता है.”
मजदूरों का कहना है कि अगर वह दो बच्चों की पढ़ाई का खर्च (करीब 4 हजार रुपये) भी जोड़ लें तो उन्हें समझ नहीं आता कि परिवार का खर्च कैसे चलाएं. सिर्फ इस बार में उन्होंने दाखिले पर 9 हजार रुपये खर्च किए. जिसके लिए उन्हें उधार लेना पड़ा.
प्रशांत कुमार पहले एक इलेक्ट्रॉनिक्स फैक्टरी में काम करत थे. अब वह दिहाड़ी-मजदूरी कर रहे हैं. वह कहते हैं, “क्या यह सही है कि हम कंपनी में 12 घंटे काम करें और बाकी समय गैस सिलेंडर भरवाने के लिए भटकते रहें?”
वह पूछते हैं- क्या सड़क पर खड़े सभी लोग पागल हैं?
फैक्टरी के अंदर ‘बंधुआ मजदूरी’
रिचा ग्लोबल की एक मजदूर संगीता काम के माहौल को बेहद कठोर बताती हैं. वह कहती हैं- “अगर हम एक सेकंड भी लेट होते हैं, तो हमारा ओवरटाइम काट लिया जाता है. कोई ग्रेस पीरियड नहीं दिया जाता, हमें हमेशा समय पर और भागते हुए रहना पड़ता है.”
उनका कहना है कि प्रोडक्शन टारगेट इतने ज्यादा हैं कि पानी पीने या वॉशरूम जाने का भी समय नहीं मिलता.
वह कहती हैं, “वे हमें मशीन से एक सेकंड के लिए भी हटने नहीं देते.”
संगीता और अन्य मजदूरों का यह भी आरोप है कि उनसे छुट्टी के दिन भी काम कराया जाता है लेकिन ऑडिट के समय उनसे झूठ बोलने के लिए दबाव बनाया जाता है.
रंभा देवी का कहना है कि हड़ताल में शामिल होने के कारण उनकी सैलरी काट ली गई.
उनकी सैलरी स्लिप में ओवरटाइम सहित 21 हजार रुपये दिखाए गए लेकिन उन्हें सिर्फ 19 हजार रुपये मिले. उनका आरोप है कि उनके दो से ढाई हजार रुपये सजा के तौर पर काट लिए गए.
मजदूरों ने ओवरटाइम के रिकॉर्ड में गड़बड़ी का भी आरोप लगाया. रंभा का कहना है कि उन्होंने 115 घंटे ओवरटाइम किया लेकिन स्लिप में सिर्फ 21 घंटे दिखाए गए.
संगीता का कहना है कि उन्होंने 80 घंटे काम किया लेकिन सिर्फ 13 घंटे दर्ज किए गए.
रिचा ग्लोबल ने इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की.
श्रम आयुक्त की प्रतिक्रिया
नोएडा के श्रम आयुक्त हरिओम गौतम ने फैक्टरी प्रबंधन से मुलाकात के बाद प्रदर्शन स्थल का दौरा किया. उन्होंने मजदूरों को डबल ओवरटाइम, साप्ताहिक अवकाश पर स्वैच्छिक काम और शिकायतों के समाधान के लिए समितियां बनाने का आश्वासन दिया.
हालांकि, कर्मचारियों की न्यूनतम वेतन की प्रमुख मांग पर उन्होंने कहा, “हम इस मांग को सरकार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी लेते हैं. कंपनियों से लिखित में आश्वासन लिया गया है कि जब सरकार ऐसा नियम लागू करेगी तो वे बढ़ा हुआ वेतन देंगी.”
उन्होंने आगे कहा, “हमें सरकार तक बात पहुंचाने के लिए समय दें और सरकार को निर्णय लेने के लिए समय दें.”
उत्तर प्रदेश के श्रम आयुक्त ने भी कुछ ऐसे ही वादे किए हैं.
फिलहाल, मजदूर अपनी मांग पर अड़े हुए हैं.
उनका कहना है, “हमारी सिर्फ एक मांग है. कम से कम 20,000 रुपये तन्ख्वाह और जब तक यह पूरी नहीं होगी, हम हड़ताल जारी रखेंगे.”
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