भारत में मानसून के दौरान नमी और तापमान बढ़ रहा है.
Report

क्लाइमेट चेंज का असर: डेंगू ने तोड़ी पारंपरिक सीमाएं, ठंडे देशों तक पहुंचा

आमतौर पर उष्णकटिबंधीय जलवायु और कम आय वाले देशों में होने वाला डेंगू अब अपनी पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकल अन्य क्षेत्रों में भी अपने पैर पसार रहा है. सोसाइटी ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड हाइजीन ने 21 देशों के आंकड़ों का अध्ययन किया, जिसके अनुसार, अब दुनिया के ठंडे इलाकों में भी डेंगू के मामले बढ़ सकते हैं. क्योंकि जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, डेंगू के मामले भी बढ़ रहे हैं. दुनिया भर में बढ़ती गर्मी और लू जैसी घटनाएं डेंगू फैलने का एक बड़ा कारण बन सकती हैं.

अध्ययन के मुताबिक, 26 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले 21 देशों में साल 2050 तक डेंगू के मामले दोगुने से भी अधिक हो सकते हैं. ये देश ज्यादातर दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में स्थित हैं. वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में एनवायरमेंट हेल्थ की सहायक प्रोफेसर और इस अध्ययन की प्रमुख लेखिका मारिसा चाइल्ड्स ने अपने एक बयान में कहा, “तापमान का असर हमारी उम्मीद से कहीं ज्यादा है. तापमान में मामूली बढ़ोतरी भी डेंगू के प्रसार को बढ़ा सकती है, और जलवायु परिवर्तन का असर हमें अभी से दिखने लगा है.”

ताजा आंकड़ों और अध्ययन के अनुसार, दुनिया की लगभग आधी आबादी पर डेंगू का खतरा मंडरा रहा है. हर साल तकरीबन 10 से 40 करोड़ लोग इसकी चपेट में आते हैं. भारत दुनिया के 30 सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक है. अगस्त 2024 में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में जोखिम वाली आबादी का विश्लेषण किया गया और बताया कि डेंगू के बढ़ते मामलों में 80% से ज्यादा हिस्सेदारी सिर्फ पांच एशियाई देशों की है, जिनमें भारत और चीन सबसे आगे हैं.”

मच्छरदानी वाला बिस्तर. डेंगू, जो आमतौर पर गर्म इलाकों और कम आय वाले क्षेत्रों में ज्यादा देखा जाता है, अब अपनी पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकलकर, दूसरे इलाकों में भी अपने पैर पसार रहा है.

ड्रग्स फॉर नेग्लेक्टेड डिजीज (डीएनडीआई) साउथ एशिया में सीनियर साइंटिफिक अफेयर्स मैनेजर, शिखा तनेजा मलिक बताती हैं कि दुनिया भर में डेंगू के सबसे अधिक मामले भारत में है. पिछले एक दशक में भारत में डेंगू के हर साल आने वाले मामलों में पांच गुना बढ़ोतरी हुई है. उन्होंने इसके लिए वैश्वीकरण, वायरस का बदलता स्वरूप और जलवायु परिवर्तन जैसे कई कारणों को जिम्मेदार ठहराया है.

जलवायु परिवर्तन को एक मुख्य कारण बताते हुए उन्होंने कहा, “हमने जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और डेंगू के बढ़ते खतरे के बीच एक चिंताजनक संबंध देखा है. बढ़ता तापमान इसमें अहम भूमिका निभाता है, क्योंकि ये डेंगू फैलाने वाले एडीज एल्बोपिक्टस और एडीज एजिप्टी मच्छरों के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा करता है. ये मच्छर 25°C से 30°C के बीच पनपते हैं. गर्मी न सिर्फ मच्छरों को तेजी से बढ़ने में मदद करती है, बल्कि उनके अंदर वायरस विकसित होने के समय को भी कम कर देती है और उनके काटने की दर बढ़ा देती है.”

इस साल की शुरुआत में प्रकाशित एक अलग अध्ययन ने भी भारत में जलवायु परिवर्तन और डेंगू के बीच के संबंध को उजागर किया था. अध्ययन में खास तौर पर पुणे शहर में, जहां डेंगू के मामले ज्यादा देखे जाते हैं, जलवायु- डेंगू संबंधों की जांच की गई. शोधकर्ताओ ने मौसम और डेंगू के बीच के संबंध को समझते हुए एक मशीन-लर्निंग मॉडल बनाया है. यह मॉडल न सिर्फ पुणे में जलवायु परिवर्तन के असर को समझने में मदद करता है, बल्कि इसका इस्तेमाल अन्य क्षेत्रों के लिए भी एक खाके के रूप में किया जा सकता है. यह अध्ययन बताता है कि जलवायु किस तरह डेंगू के फैलने पर असर डालती है और साथ ही भविष्य के जोखिमों का अनुमान लगाने का एक तरीका भी पेश करता है. अध्ययन के अनुसार, “डेंगू एक ऐसी बीमारी है जो जलवायु के प्रति संवेदनशील है और मौसम के बदलावों से काफी हद तक प्रभावित होती है.”

इसके पीछे और भी कारण हैं; सिर्फ अत्यधिक गर्मी ही नहीं, बल्कि नमी और बारिश भी मच्छरों की प्रजनन क्षमता में वृद्धि का कारण बनती हैं. तनेजा मलिक ने एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा, “जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढ़ा है और जिससे हवा में नमी और बारिश में भी बढ़ोतरी हुई है. इन सभी कारणों से मच्छरों की प्रजनन क्षमता बढ़ गई है, उनके अंडों से बच्चे जल्दी निकलने लगे है और लार्वा तेजी से विकसित होने लगा है. इसका मतलब है कि अब मच्छर बहुत ही कम समय में वयस्क हो जाते हैं.”

तो आखिर उमस इसमें क्या भूमिका निभाती है?

मानसून, जिसे आमतौर पर हम सुहावने मौसम और ठंडी हवाओं के लिए जानते हैं, अब अक्सर काफी उमस भरा और गर्म रहने लगा है.

पुणे में हुआ डेंगू अध्ययन बताता है, ‘गर्मी के बाद वाले मानसून सीजन (जून से सितंबर) के दौरान जब हवा में नमी का स्तर 60 से 78% के बीच होता है, तब वहां डेंगू से होने वाली मौतों का खतरा बढ़ जाता है.’ इसका कारण क्या है? अध्ययन के अनुसार, उमस डेंगू के मच्छरों के अंडे फूटने, उनके जीवित रहने की क्षमता और उनके बार-बार काटने की आदत को बढ़ा देती है.

कई अन्य अध्ययनों में भी डेंगू के मामलों का सीधा संबंध बढ़ते तापमान, बारिश और उमस को माना है. इसके अलावा, बारिश मच्छरों को उनके पैदा होने के शुरूआती समय में जीवित रखने में मदद करती है, जबकि हवा में मौजूद नमी मच्छरों के आवासों और वयस्क मच्छरों को सूखकर मरने से बचाती है.”

डिजिटल हेल्थकेयर प्रोवाइडर फार्मईजी ने अपने लैब डेटा के आधार पर एक विश्लेषण किया और पाया कि डेंगू के मामले भारतीय मानसून और उमस से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं. लैब डेटा के अनुसार, डेंगू के मरीज जुलाई से बढ़ना शुरू होते हैं, अगस्त से अक्टूबर के बीच यह बीमारी अपने चरम पर होती है और दिसंबर आते-आते मामलों में कमी आने लगती है. भारत में मानसून का समय आमतौर पर जुलाई से सितंबर तक होता है.”

एक मादा ‘एडीज एल्बोपिक्टस’ मच्छर. ये मच्छर 25°C से 30°C के बीच के तापमान में पनपते हैं और बढ़ता तापमान इन मच्छरों के पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करता है.

जब तनेजा मलिक से पूछा गया कि नमी डेंगू के प्रसार को कैसे प्रभावित करती है, तो उन्होंने कहा, “डेंगू फैलाने वाले मच्छर गर्म और नम मौसम में तेजी से बढ़ते हैं. बढ़ता तापमान, उच्च आर्द्रता, भारी बारिश, तूफान और बाढ़, ये सभी डेंगू के पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करते हैं.” उन्होंने यह भी कहा कि निम्न गुणवत्ता वाले आवास, अनियोजित शहरीकरण, गंदगी और सीवेज जैसी समस्याएं भी इस बीमारी के फैलने के बड़े कारण हैं. इन स्थितियों से निपटने के लिए मच्छर नियंत्रण अभियान चलाना और अस्पतालों की व्यवस्था को मजबूत करना बेहद जरूरी है.

भारत अब रिसर्च के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है. इसमें नई टेक्नोलॉजी जैसे आधुनिक सेंसर का इस्तेमाल, मच्छरों की अलग-अलग प्रजातियों पर नजर रखना और उनके जीन की जांच (जीनोम सीक्वेंसिंग) शामिल है. 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन में पहली बार भारत में ‘एडीज एल्बोपिक्टस’ मच्छर का पूरा जेनेटिक डेटा सामने आया. रिपोर्ट में कहा गया, ”यह व्यापक समझ वेक्टर को नियंत्रित करने के नए तरीके खोजने और उनके खास जीन्स की पहचान करने का रास्ता साफ कर सकती है.” इस अध्ययन से भारतीय ‘एडीज एजिप्टी’ और ‘एडीज एल्बोपिक्टस’ मच्छरों की उच्च-गुणवत्ता वाले जीनोम प्राप्त हुए हैं, जिससे वेक्टर प्रजातियों के बारे में हमारी समझ बढ़ी है और इस विषय पर जो जानकारियां अब तक उपलब्ध नहीं थीं, उन्हें पूरा करने में मदद मिली है.”

साभार- मोंगाबे इंडिया

यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा पहली बार 3 नवंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी.

Also Read: यूएनआई से खाली करवाई गई जमीन: दिल्ली पुलिस की पत्रकारों से बदतमीजी और जबरदस्ती पर उठे सवाल

Also Read: मनरेगा से जी-राम-जी तक: ‘रेवड़ी या हक़’ के आईने में रोजगार के अधिकार कानून का खात्मा