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दिल्ली के पब्लिक टॉयलेट्स: सफाई से दूर, गंदगी के करीब
देश की राजधानी दिल्ली इन दिनों विज्ञापनों से पटी हुई है. वजह, रेखा गुप्ता सरकार के एक साल पूरे होना और विकास के दावे. लेकिन इन दावों में ऐसा बताया जा रहा जैसे दिल्ली के दिन बदल गए हैं. दिल्ली को वर्ल्ड सिटी शहर बनाने के दावे किए जा रहे हैं. ऐसा ही दावा पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी किया था. जो यहां तकरीबन एक दशक मुख्यमंत्री रहे हैं.
इन दावों से इतर दिल्ली बदहाल है. यहां के सार्वजनिक शौचालयों की हालत कई इलाकों में बेहद खराब है. कहीं पानी की एक बूंद तक नहीं, कहीं फर्श पर शराब की खाली बोतलें और गंदगी बिखरी पड़ी है. कई जगहों पर इतनी तेज बदबू है कि लोग नाक पर रुमाल रखकर गुजरने को मजबूर हैं.
महिला शौचालयों की स्थिति और भी चिंताजनक है. ज़्यादातर जगहों पर ये बंद पड़े हैं और, जहां खुले हैं वहां भी महिलाएं जाने से कतराती हैं. कहीं गेट नहीं है, तो कहीं गंदगी इतनी है कि खड़ा होना मुश्किल हो जाता है. कई जगहों पर महिलाओं के शौचालयों को पुरुष इस्तेमाल कर रहे हैं.
इसके अलावा दिव्यांगों के लिए बने शौचालय भी अधिकांश स्थानों पर बंद पड़े मिले. यह स्थिति तब है जब दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) को ‘ओडीएफ++’ का दर्जा मिल चुका है.
ऐसा भी नहीं है कि सरकार को इस समस्या की जानकारी नहीं है. नवंबर 2019 में केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा कराए गए सर्वे में सामने आया था कि करीब 55 प्रतिशत सार्वजनिक शौचालय या तो पूरी तरह अनुपयोगी थे या बेहद गंदे थे. इस सर्वे में 1175 शौचालय शामिल किए गए थे.
प्रजा फाउंडेशन की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में सार्वजनिक शौचालयों की संख्या आबादी के मुकाबले बेहद कम है. आंकड़ों के मुताबिक, 9,767 पुरुषों और 10,343 महिलाओं पर एक शौचालय सीट उपलब्ध है.
बीते साल जून में दिल्ली हाईकोर्ट ने सार्वजनिक शौचालयों के रखरखाव में “पूरी तरह से उदासीनता और असंवेदनशीलता” को लेकर नगर निकायों को फटकार लगाई.
ऐसा भी नहीं है कि सरकार इनके लिए कोई बजट आवंटित नहीं कर रही. दिल्ली के सार्वजनिक शौचालयों पर खर्च होने वाला सरकार का बजट कहां जा रहा है, जानने के लिए देखिए हमारी यह खास रिपोर्ट.
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