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ज़ी मीडिया ने बदला लेने के लिए कानूनी प्रकिया का दुरुपयोग किया: सुप्रीम कोर्ट
ज़ी मीडिया कॉरपोरेशन लिमिटेड ने अपने पूर्व पत्रकार के खिलाफ राजस्थान के एक पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज करवाकर ‘बदला लेने’ के लिए कानू का ‘दुरुपयोग’ किया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने 27 फरवरी के आदेश में ये बात कही. अदालत के मुताबिक, यह कदम ज़ी मीडिया द्वारा संभावित कानूनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए उठाया गया था, जो उसकी नकारात्मक रिपोर्टिंग के कारण बन सकती थीं.
जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने कहा, 'हम संतुष्ट हैं कि शिकायतकर्ता कंपनी ने हिसाब चुकता करने और तीखी रिपोर्टिंग के चलते संभावित आलोचना से बचने के लिए कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया.' अदालत ने यह भी कहा कि शिकायत ‘अस्पष्ट और अटकलों पर आधारित आरोपों से बुनी गई एक काल्पनिक कहानी’ है.
अदालत ने पत्रकार आशीष दवे के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए कहा कि शिकायत में आपराधिक आरोपों की बुनियाद रखने वाला 'एक भी ठोस आरोप नहीं' है.
मालूम हो कि दवे मार्च, 2023 से ज़ी मीडिया के साथ जुड़े थे और राजस्थान तथा ज़ी 24 घंटा (पश्चिम बंगाल) के प्रमुख के रूप में काम कर रहे थे. 4 सितंबर 2025 को उनसे इस्तीफा मांगा गया और उसी दिन जयपुर के अशोक नगर पुलिस स्टेशन में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई, जिसमें उन पर 'अनाधिकृत वित्तीय लेन-देन, अधिकारों का दुरुपयोग और कंपनी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की मंशा' के आरोप लगाए गए.
इस बारे में ज्यादा जानने के लिए न्यूज़लॉन्ड्री की यह रिपोर्ट पढ़िए.
शिकायत के अनुसार, दवे चैनल के महत्वपूर्ण संपादकीय और संचालन संबंधी फैसले लेते थे. ज़ी मीडिया ने आरोप लगाया कि उन्होंने लोगों को नकारात्मक खबर दिखाने की धमकी देकर पैसे मांगे. यह मामला भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धाराओं 308(2) (जबर्दस्ती वसूली), 318(4) (धोखाधड़ी) और 351(2) (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज किया गया.
दवे ने इसके बाद राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन अदालत ने 26 नवंबर को एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि आरोपों की जांच की जानी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि एफआईआर दर्ज करने में दिखाई गई असामान्य तेजी ज़ी मीडिया के 'प्रभाव' का परिणाम थी. अदालत ने टिप्पणी की कि यदि कोई आम नागरिक ऐसे अस्पष्ट आरोपों के साथ पुलिस के पास जाता, तो एफआईआर दर्ज ही नहीं होती. 'जिस तेजी से पुलिस ने शिकायतकर्ता कंपनी की शिकायत पर कार्रवाई की, वह उसके प्रभाव को दर्शाता है,' कोर्ट ने कहा.
अदालत ने एफआईआर के आधार पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि ज़ी मीडिया एक भी ऐसे व्यक्ति का नाम नहीं बता सकी, जो दवे के कथित 'अधिकारों के दुरुपयोग' का शिकार हुआ हो. दवे ने अपनी याचिका में कहा था कि कंपनी ने 'दुश्मनी और गलत मंशा' के तहत उन्हें परेशान करने के लिए झूठे आरोप लगाए.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह की कमी पूरी कानूनी प्रक्रिया में बनी रही और यहां तक कि राजस्थान सरकार के जवाबी हलफनामे में भी किसी पीड़ित व्यक्ति का जिक्र नहीं किया गया.
कानूनी आधारों पर राहत देते हुए अदालत ने कहा कि एफआईआर कोई 'विश्वकोश' नहीं होनी चाहिए, लेकिन उसमें बुनियादी तथ्यों का होना जरूरी है. एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस से यह अपेक्षा थी कि वह आरोपों का स्पष्ट विवरण प्रस्तुत करेगा.
बेंच ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसS) की धारा 173(3) का हवाला देते हुए कहा कि जिन मामलों में सजा तीन से सात साल तक हो सकती है, उनमें पुलिस को प्रारंभिक जांच करने का अधिकार और दायित्व है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं.
इसके बावजूद, अदालत ने पाया कि पुलिस अधिकारियों ने इस प्रावधान का उपयोग नहीं किया और बिना किसी प्रारंभिक जांच के 'यांत्रिक तरीके से' एफआईआर दर्ज कर ली. कोर्ट ने कहा कि यह कार्रवाई 'काल्पनिक और अनुमान आधारित आरोपों की जरा सी भी पुष्टि किए बिना' की गई.
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