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पुणे में इफ्तारी कर रहे लोगों पर भीड़ का हमला: कई घायल, चार दिन बाद भी कोई गिरफ्तारी नहीं
महाराष्ट्र के पुणे से एक शर्मनाक वाकया सामने आया है. वहां रमज़ान के पवित्र महीने में इफ्तार कर रहे रोजेदारों पर सैंकड़ों लोगों की भीड़ ने जानलेवा हमला कर दिया. इस दौरान कई रोजेदारों को गंभीर चोटें आई हैं. घटना पुणे के सासवड़ इलाके के पास बोपदेव घाट में एक तालाब के किनारे बीते शुक्रवार, 13 मार्च को करीब साढ़े छह बजे हुई. इस मामले में पुलिस ने आरोपियों को अज्ञात बता कर एफआईआर दर्ज कर ली है, लेकिन घटना के चार दिन बाद तक भी इस मामले में किसी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं होना पुलिस प्रशासन के रवैये पर सवाल खड़ा करता है.
हमले में घायल हुए फिरोज जावेद सैय्यद ने बताया कि 13 मार्च को वह और उनके 14 दोस्त रोज़ा इफ्तारी के लिए तालाब के किनारे जुटे थे. तभी अचानक बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंच गए.
फिरोज न्यूज़लॉन्ड्री से बताते हैं, "भीड़ अचानक से हम पर टूट पड़ी. हमारे एक साथी आमीन को सिर में 14 टांके आए हैं. वहीं शाकिब की पीठ पर गहरे घाव हैं. ‘मुसलमान यहां नहीं बैठ सकते हैं’ ऐसा कहते हुए उन्होंने हमें बेहरमी से पीटा. इस हमले में मेरे 8 दोस्तों- आमीन अशफाक शेख, साकिब बनेदार, अफनान अल्ताफ शेख, फरदीन हुसैनी, परवेज मुल्ला, अली अब्बास, जुबैर बागवान, अल्तमश शेख को चोटें आई हैं. घटना के वक्त हमने 112 नंबर पर कॉल करके पुलिस को बुलाया. काफी कशमकश के बाद देर रात हमारी एफआईआर दर्ज की गई."
न्यूज़लॉन्ड्री के पास मौजूद एफआईआर के मुताबिक आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 118 (1), 189 (2), 190, 191(2), 191(3), 351(2), 351(3), 352 के तहत मामला दर्ज किया गया है. इसके अलावा आर्म्स एक्ट 1959 की धारा 4 और 25 तथा महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम 1951 की धारा 135 भी लगाई गई है.
हमले में गंभीर रूप से घायल हुए आमीन अशफाक शेख बताते हैं कि उनके सिर में 14 टांके आए हैं और वे दो दिन तक आईसीयू में भर्ती रहे.
आमीन कहते हैं, "मैं दो दिन तक आईसीयू में ही रहा. मैंने पुलिस को भी अपना स्टेटमेंट आईसीयू में ही दिया. हम सब लोग इफ्तारी के लिए बैठे थे. हमने देखा कि लगातार वहां टू व्हीलर्स की संख्या बढ़ती जा रही थी, इसके बाद 2-3 कारें भी आ गईं. फिर वे इकट्ठा होकर 'जय श्री राम' के नारे लगाते हुए हमारी ओर बढ़े. जब तक हम कुछ समझ पाते उससे पहले ही कहने लगे कि ये तुम्हारे बाप की जगह है क्या जो यहां बैठे हो? इसके बाद गाली देते हुए हमें पकड़ लिया और फिर सभी को बेहरमी से पीटना शुरू कर दिया. मेरे सर में लोहे की एक रॉड जैसे किसी हथियार से हमला किया. हम वहां से भागे तो हमारे ऊपर पत्थरों से हमला किया गया. हम बमुश्किल वहां से जान बचाकर भागे. मेरे सर में चोट लगने के बाद मुझे चक्कर आने लगे थे. मेरा आईफोन छीन लिया गया. इसकी जानकारी मैंने पुलिस को भी दी है. हमारे सिर की टोपियां उतार लीं. कपड़े फाड़ दिए गए. बोला गया कि यहां पर दोबारा कभी पठानी कुर्ता पहनकर नहीं आना."
हमले में पुणे के एक कॉल सेंटर में काम करने वाले फरदीन हुसैनी भी घायल हुए हैं. हुसैनी बताते हैं कि वह पहले भी कई बार दोस्तों के साथ यहां आ चुके हैं और कभी कोई समस्या नहीं हुई.
वे कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि हम यहां पहली बार आए थे. हम इससे पहले भी यहां आए हैं. लेकिन ऐसा हमारे साथ पहली बार हुआ है. दोस्तों से मिले हुए काफी समय हो जाता है. ऐसे में रोजे के बहाने साल में एक बार सब मिल लेते हैं. इसी योजना के तहत हमने हर साल की तरह यहां जाने का प्लान किया था."
फरदीन के मुताबिक हमले में उन्हें गंभीर चोटें आई हैं.
वह बताते हैं, "मेरी नाक और आंख में चोटें आई हैं. पीठ पर भी रॉड से हमला किया है. मेरी नाक से काफी खून निकला है. भीड़ के इस झुंड ने हमारे एक साथी पर आते ही लात से हमला कर दिया. हम लोगों ने भागने की कोशिश की तो उन्होंने हमें पकड़ लिया और बेरहमी से मारा. इस बीच पुलिस का व्यवहार बहुत घटिया था. पुलिसकर्मी हमें ही उल्टा बोल रहे थे कि हमें ज्यादा कानून मत सिखाओ. प्रशासन से हमें कोई सपोर्ट नहीं मिला. इसी का नतीजा है कि अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है. हमने कुछ लोगों की पहचान करके उनकी तस्वीरें पुलिस के साथ साझा की थीं पुलिस ने उन्हें हिरासत में तो लिया लेकिन बाद में पता नहीं किस दबाव में उन्हें छोड़ दिया."
स्थानीय एक्टिविस्ट और एडवोकेट ताज सिद्दिकी कहते हैं कि पुणे ग्रामीण के इस इलाके में लगातार ऐसी घटनाए हो रही हैं जिनमें अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है. बीते दिनों एक मुस्लिम ट्रक ड्राइवर को भैंसों की अवैध ढुलाई के आरोप में जबरन गोबर खिलाया गया था. इलाके से काफी मुस्लिम परिवार पलायन कर गए हैं. उनका दावा है कि यहां हिंदुओं की जमीनें हिंदू ही खरीदेगा और अगर कोई मुस्लिम अपनी जमीन बेचता है तो वह भी हिंदू ही खरीदेगा. यही नहीं इलाके में ‘बाहरी’ मुसलमानों के नमाज़ पढ़ने पर प्रतिबंध है.
न्यूज़लॉन्ड्री ने इस पूरे मामले पर विस्तार से रिपोर्ट की है. जिसमें बताया गया है कि कैसे तोड़फोड़, धमकियों और बहिष्कार के बाद गांव के 350 मुस्लिम निवासियों में से कम से कम 250 को कथित तौर पर गांव छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है.
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के प्रदेश अध्यक्ष अजहर तंबोली का मानना है कि यह हमला अचानक नहीं हुआ है बल्कि सोची-समझी योजना का हिस्सा है.
वह कहते हैं, "यह घटना कोई अचानक नहीं हुई थी. एक प्री-प्लान के साथ ऐसा हुआ है. जहां पर यह घटना हुई है, वहां पर रोजों में कोई न कोई ग्रुप रोजाना इस तरह से इफ्तारी करने के लिए यहां आता है. यह लोग इफ्तारी की तस्वीरें और रील सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे थे. इसके चलते इस सबकी जानकारी इन लोगों को थी क्योंकि कोई भी 10 से 15 मिनट में इतनी भीड़ नहीं जुटा सकता है. ऐसे में जैसे ही ये लोग वहां पहुंचे इन पर पहले से प्लान के तहत हमला कर दिया गया."
अजहर तंबोली आगे कहते हैं, "बच्चों को भड़काकर-बहकाकर लाया जा रहा है और वे इसे धर्म का काम समझ रहे हैं. हमने एसपी को पत्र लिखकर निष्पक्ष कार्रवाई की मांग की है, क्योंकि प्रशासन दवाब में काम कर रहा है."
तंबोली का दावा है कि पुलिस ने इस मामले में कुछ लोगों को हिरासत में लिया था लेकिन बाद में आस-पास के गांववालों के दवाब में आरोपियों को छोड़ दिया.
पुलिस का क्या कहना है?
इस मामले पर स्थानीय पुलिस का कहना है कि अभी तक किसी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है. स्थानीय थाना प्रभारी कुमार कदम के मुताबिक, "इस मामले में अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है क्योंकि यह सब लोग अभी गांव छोड़कर भागे हुए हैं. उम्मीद है जल्दी ही आरोपी गिरफ्त में होंगे."
पीड़ितों द्वारा आरोपियों की पहचान और तस्वीरें दिए जाने के सवाल पर कदम कहते हैं, "उन्होंने जो फोटो दिए हैं, उनकी हमने उस दिन की घटना के हिसाब से सवेरे से शाम तक करीब 15 घंटों की एक्टिविटी देखी है. इसके लिए हमने बहुत सीसीटीवी खंगाले. हमने पाया कि इनमें से कोई भी युवक इस घटना में शामिल नहीं था. इसलिए फिर हमने उन्हें अगले दिन छोड़ दिया. हमने 10 लोगों को हिरासत में लिया था. लेकिन तहकीकात में पता चला कि वे शामिल नहीं थे. हमने पाया कि जब यह घटना हुई थी तब ये लोग वहां मौजूद नहीं थे."
कदम के मुताबिक, "कुछ मुस्लिम भाई वहां शाम के करीब साढ़े छह बजे इफ्तारी के लिए गए थे, उसी वक्त आस-पास गांव के लड़कों ने इकट्ठा होकर उन्हें धमकाया और पिटाई शुरू कर दी. ज्यादातर लोग भाग गए थे लेकिन 4-5 लोग इनके हाथ आ गए उन्हें पीटा गया. इन्होंने निर्दोष लड़कों की पिटाई की है. पीड़ितों का कहना है कि पीटने में 150 से ज्यादा युवा शामिल थे. हालांकि, हमें लगता है कि इनकी संख्या 50 के आसपास रही होगी."
सीसीटीवी कैमरों को ढंकने के आरोप पर पुलिस का कहना है कि मौके पर मौजूद कैमरे उस समय चालू ही नहीं थे.
कदम कहते हैं, "हम घटना के बाद करीब साढ़े नौ बजे मौके पर पहुंच गए और सभी कैमरे चेक किए. हमने देखा कि वह कैमरे चालू ही नहीं थे. ढंकने जैसा कुछ भी नहीं है. वह पूरा सुनसान वाला इलाका है. हालांकि, हमने कुछ लोगों की पहचान कर ली है लेकिन अभी आपको नाम नहीं बता सकते हैं. एफआईआर अज्ञात के खिलाफ दर्ज की गई क्योंकि तब किसी आरोपी की पहचान नहीं हुई थी."
पुलिस के अनुसार जिन लोगों की पहचान हुई है, वे आसपास के गांवों के रहने वाले हैं और किसी संगठन से जुड़े होने की पुष्टि अभी तक नहीं हुई है.
इस मामले पर पुणे (ग्रामीण) के पुलिस अधीक्षक संदीप सिंह गिल से भी प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला. यदि इस संबंध में उनका पक्ष सामने आता है तो रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.
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