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ईरान युद्ध: भारतीय मीडिया के दुर्लभ कारनामे, दशकों पुरानी ब्रेकिंग न्यूज़ और असलहा पूजन
भारतीय टीवी न्यूज़ एंकरों से बढ़ा-चढ़ाकर बातें सुनने की हमें आदत हो चुकी है, खासकर जब कहीं युद्ध या तनाव का माहौल हो. लेकिन कभी-कभी वे इससे भी दुर्लभ चीज़ पेश कर देते हैं, जैसे कि साल 1979 की ब्रेकिंग न्यूज़.
बीते दिन आज तक न्यूज़ चैनल पर अंजना ओम कश्यप ने एक ब्रेकिंग न्यूज़ पढ़ी. “ईरान के आतंकियों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास के अंदर 66 अमेरिकियों को बंधक बना लिया है.”
लेकिन इस ब्रेकिंग न्यूज़ के साथ बस एक छोटी-सी दिक्कत थी.
वो दरअसल, 1979 के ईरान बंधक संकट की बात कर रही थीं. जैसा कि उनके ही चैनल के रिपोर्टर प्रणय उपाध्याय ने विनम्रता से उन्हें याद दिलाया. हुआ यह कि व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट किसी पुराने संदर्भ का ज़िक्र कर रही थीं और अंजना ने उसे ताज़ा “ब्रेकिंग न्यूज़” समझ लिया. ऊपर से एक और छोटी-सी तकनीकी समस्या भी है- 1979 के बाद से अमेरिका का ईरान में कोई दूतावास है ही नहीं. ऐसे में उसी दूतावास के अंदर कोई नया बंधक संकट होना थोड़ा… मुश्किल लगता है.
कश्यप ने अपनी गलती के लिए माफी भी मांग ली. लेकिन असली दिलचस्पी इस बात में है कि औसत भारतीय न्यूज़ एंकर के लिए ये पूरा विषय कितना आउट-ऑफ-सिलेबस रहा होगा.
उधर उसी नेटवर्क के अंग्रेज़ी चैनल पर गौरव सावंत दर्शकों को अमेरिकी “डूम्सडे मिसाइल” मिनटमैन-III का लंबा चौड़ा बखान कर रहे थे. भारतीय टीवी पत्रकारिता की एक अनोखी शैली है. इसे कह सकते हैं, “अस्त्र प्रशंसा पत्रकारिता”.
एंकर मिसाइलों की रेंज, पेलोड, प्रोपल्शन सिस्टम और तबाही की क्षमता को ऐसे समझाते हैं, जैसे किसी नए गैजेट का रिव्यू कर रहे हों.
दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी चैनल भी अपने देश के हथियारों की तकनीकी खूबियों का इतने उत्साह से वर्णन नहीं करते. दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में युद्ध की रिपोर्टिंग का फोकस हथियारों के नतीजों पर होता है. भारतीय टीवी पर अक्सर फोकस होता है कि हथियार कितने “कूल” लगते हैं.
खैर, अंजना जी पर वापस आते हैं. भारतीय एंकरों के लिए एक छोटा-सा सुझाव है- अगर अगली बार ईरान पर प्राइम-टाइम ‘वॉर स्पेशल’ करना हो तो उससे पहले एक घंटा निकालकर मार्टिन स्मिथ की शानदार फ्रंटलाइन डॉक्यूमेंट्री बिटर राइवल्स: ईरान बनाम सउदी अरब देख लीजिए. या फिर ईरान के इतिहास पर एम्पायर पॉडकास्ट की सीरीज़ सुन लीजिए.
कम से कम इतना तो होगा कि अगली बार स्टूडियो से आने वाली “ब्रेकिंग न्यूज़” इस सदी की होगी.
और हां, मणिकर्णिका घाट से लेकर काशी विश्वनाथ कॉरिडोर तक, विकास के नाम पर बनारस किस तरह बदल रहा है और इसकी कीमत कौन चुका रहा है, हमारा नया एनएल सेना प्रोजेक्ट इसी सवाल का जवाब तलाश रहा है. तो आज ही योगदान दीजिए.
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