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अरावली में दिन रात होते खनन धमाकों का असर: घरों में दरारें, गांवों में बेचैनी
“इसकी ब्लास्टिंग इतनी हैवी होती है कि मकानों में दरारें आ गई हैं. स्कूलों में दरारें आ गई. जब ब्लास्टिंग की जाती है तो मकानों से बाहर निकलना पड़ता है. इससे बढ़िया हम यहां तंबू में तो बैठे हैं. मरेंगे तो पूरा गांव एक साथ मरे.”
कोटपूतली-बहरोड़ जिले के अजीतपुरा गांव के सरपंच प्रतिनिधि नेतराम ने अरावली में खनन के लिए हो रहे धमाकों पर कुछ इन्हीं शब्दों में प्रतिक्रिया दी. वह अपने गांववालों के साथ नेशनल लाइमस्टोन कंपनी प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ धरने पर बैठे हैं.
लेकिन ये अकेले नेतराम की चिंता नहीं है. अरावली की पहाड़ियों के साये में बसे पांच गांव- पवाना अहीर, अजीतपुरा, कांसली, कायमपुरा और जोधपुरा- पिछले कई सालों से खनन गतिविधियों के खिलाफ विरोध कर रहे हैं. लगभग 15 किलोमीटर के दायरे में फैले इन गांवों में सैकड़ों घर खनन विस्फोटों के कारण असुरक्षित हो चुके हैं.
ग्रामीणों का कहना है कि खदानों में होने वाले धमाकों से जमीन कांपती है और मकानों में नई-नई दरारें पड़ जाती हैं. डर के कारण कई परिवारों ने अपने घरों के भीतर सोना तक बंद कर दिया है.
स्कूल और छात्र भी खतरे में
पवाना अहीर गांव में एक सरकारी स्कूल और बालिका छात्रावास चार खदानों के बेहद करीब संचालित हो रहे हैं. छात्रों ने बताया कि खदानों से उड़कर आने वाले पत्थरों के डर से उन्होंने बाहर खेलना बंद कर दिया है. लगातार होने वाले धमाकों और शोर के कारण पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है.
शिक्षकों के अनुसार, स्कूल भवन में भी दरारें आ चुकी हैं. स्कूल प्रशासन ने खदानों को बंद कराने के लिए उच्च अधिकारियों को पत्र भी लिखा, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.
जोधपुरा का तीन साल लंबा धरना
जोधपुरा गांव के लोग पिछले तीन सालों से अधिक समय से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं. यहां अल्ट्राटेक सीमेंट (आदित्य बिड़ला समूह) की एक क्रशर यूनिट गांव के स्कूल से मात्र 200 मीटर की दूरी पर स्थित है.
ग्रामीणों का आरोप है कि क्रशर यूनिट से निकलने वाली धूल के कारण वायु प्रदूषण बढ़ गया है. कई घरों में धूल रोकने के लिए बड़े-बड़े पर्दे लगाए गए हैं. एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, सर्दियों में गांव का प्रदूषण स्तर सुरक्षित सीमा से तीन गुना तक अधिक हो सकता है.
एनजीटी का आदेश, फिर भी विरोध जारी
पिछले वर्ष नवंबर में राष्ट्रीय हरित ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने अल्ट्राटेक को 298 लोगों को स्वास्थ्य और पर्यावरणीय क्षति के लिए 20-20 हजार रुपये देने का आदेश दिया था. साथ ही, जिन मकानों को खनन से नुकसान पहुंचा है, उनके मालिकों को 50-50 हजार रुपये देने के निर्देश दिए गए.
कायमपुरा के ग्रामीणों ने भी एनजीटी का दरवाजा खटखटाया था. उनका कहना है कि खदान रिहायशी इलाके के बेहद करीब है और लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है.
हालांकि, एनजीटी के आदेश के बावजूद ग्रामीण अपना धरना खत्म करने को तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि जब तक पुनर्वास और उचित मुआवजा नहीं मिलता, उनका आंदोलन जारी रहेगा.
दरअसल, अरावली की पहाड़ियों के बीच बसे इन गांवों में लोग हर धमाके के साथ सिहर उठते हैं. मकानों में पड़ी दरारें उनके डर को और गहरा कर देती हैं.
ग्रामीणों का कहना है कि विकास और मुनाफे की कीमत वे अपनी जान जोखिम में डालकर नहीं चुका सकते. उनके लिए यह सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि अस्तित्व का सवाल है.
देखिए पूरी रिपोर्ट.
मणिकर्णिका घाट से काशी विश्वनाथ कॉरिडोर तक, उजड़े (ढहा दिए गए) घरों और खामोश हो चुके मोहल्लों के बीच यह सीरीज़ बताएगी कि कैसे तोड़फोड़ की राजनीति बनारस की सिर्फ़ इमारतें नहीं, उसकी आत्मा को भी बदल रही है. बनारस पर हमारे इस सेना प्रोजेक्ट को सपोर्ट करिए.
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