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नेतन्याहू के साथ ‘भाईचारा’ या विदेश नीति में 'बदलाव': विदेशी मीडिया ने मोदी की इज़राइल यात्रा में क्या देखा?
इस हफ्ते जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजरायली संसद क्नेसेट में प्रवेश किया तो यह इमारत भारतीय तिरंगे के रंगों में जगमगा उठी. इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने उन्हें ‘दोस्त से बढ़कर’ बताया. भारत में कवरेज का बड़ा हिस्सा इसी गर्मजोशी, गले मिलने, मेहमाननवाजी, और रक्षा या व्यापार साझेदारी पर केंद्रित रहा. लेकिन यरुशलम से बाहर विदेशी मीडिया ने इस दौरे को कहीं अधिक बारीक नजर से देखा.
इज़राइल में ही, सरकार के सहयोगी मीडिया और बाकी मीडिया आउटलेट्स के बीच थोड़ा फ़र्क दिखा. यरुशलम पोस्ट ने ‘नमस्ते मोदी’ से शुरुआत की, जबकि हारेत्ज़ ने ‘अरबों डॉलर की हथियारों की डील से खिंचे चले आए भारत से मोदी’ हेडलाइन वाली ख़बर में दौरे के असली कारण की ओर इशारा किया.
जब मोदी क्नेसेट को संबोधित करने वाले थे तो इज़राइल के कुछ विपक्षी सांसदों ने वॉकआउट कर दिया. दरअसल, यह विरोध इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ था, क्योंकि उन्होंने न्यायपालिका के साथ चल रही खींचतान के बीच सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को नहीं बुलाया था. जो इस बात की तस्दीक है कि मोदी एक ऐसे देश में हैं, जो अंदरूनी राजनीतिक झगड़े और गाज़ा पर ग्लोबल आलोचना से जूझ रहा है.
यरुशलम पोस्ट ने अपने एक संपादकीय में लिखा, “इज़रायल के लिए मोदी का दौरा भारत को टॉप-टियर स्ट्रेटेजिक प्रायोरिटी मानने का समय है. इस रिश्ते में भरोसा, इतिहास और पॉलिटिकल केमिस्ट्री है… अब उन्हें और आगे बढ़ना होगा.”
यह दौरा दूसरे दिन भी अखबारों के पहले पन्ने की सुर्खी बना. जहां यरुशलम पोस्ट के पहले पन्ने के एनालिसिस में कहा गया कि “बिला शक: मोदी भारत को इजरायल के साथ जोड़ रहे हैं.”
अरब मीडिया का रुख अलग रहा. यूएई के खलीज टाइम्स ने मुख्यतः एजेंसी की रिपोर्ट्स प्रकाशित कीं. वहीं, सऊदी आउटलेट अरब न्यूज़ ने भी कई रिपोर्ट्स प्रकाशित कीं, जिनमें से एक में कहा गया, “अक्टूबर 2023 में इज़राइल के गाजा पर हमला करने के बाद से नई दिल्ली ज़्यादातर चुप्पी साधे है. फ़िलिस्तीनी इलाके में जंग में 71 हजार से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी मारे गए हैं और 1 लाख 71 हजार से ज़्यादा घायल हुए हैं.”
इंडिपेंडेंट आउटलेट मिडिल ईस्ट आई की एक रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे मोदी ने नेतन्याहू को ‘खुश’ किया. “क्क्नेसेट में, मोदी का स्वागत बच्चों ने इज़रायली और भारतीय झंडे लहराकर किया. कुछ ने उनके साथ सेल्फी ली, इज़रायली प्रेस भी इस तमाशे में शामिल हो गया, जिसमें द यरुशलम पोस्ट ने उनके दौरे को खास तौर पर पहले पेज पर छापा.”
अखबार ने आगे लिखा, “पिछली रात, क्नेसेट खुद भारतीय तिरंगे के रंगों में रोशन था, मोदी ने अपने भाषण के दौरान इस प्रयास की तारीफ़ की. मोदी के भाषण से पहले, इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने क्नेसेट को संबोधित किया, जिसमें उन्होंने मोदी को अपना ‘भाई’ बताया.”
कतर के हेडक्वार्टर वाले अल जज़ीरा ने मोदी के दौरे पर कई लेख छापे. जिसमें गाज़ा के हालात के बावजूद भारत-इज़राइल की बढ़ती नज़दीकियों पर एक्सप्लेनर और वीडियो रिपोर्ट, भारत द्वारा ‘इज़राइली मॉडल’ को अपनाने पर रिपोर्ट’, मोदी के दौरे पर कुछ अन्य रिपोर्ट, और एक लेख भी शामिल था, जिसमें सुरक्षा और विदेशी मामलों के जानकारों के हवाले से बताया गया कि मोदी का दौरा पाकिस्तान से सुरक्षा के लिए क्यों ज़रूरी है. यह नेतन्याहू की ‘कट्टरपंथी शियाओं’ और ‘उभरते सुन्नियों’ के ख़िलाफ़ प्रस्तावित ‘गठबंधनों के षटकोण’ (हेक्सागॉन ऑफ अलायंसेज़) के बारे में की गई बातों को ध्यान में रखते हुए था.
लेख में आगे कहा गया, “पश्चिम एशिया के मौजूदा परिदृश्य में, जहां तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान इज़राइल के खिलाफ तीखे और लगातार बयान देते रहे हैं, और जहां सऊदी अरब और पाकिस्तान ने सितंबर, 2025 में एक रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते पर औपचारिक मुहर लगाई है. ऐसे में इन तीनों ही सुन्नी-बहुल देशों को तेल अवीव के नजरिए से उभरती संभावित “धुरी” को समझना मुश्किल नहीं है. ऐसे माहौल में इज़राइल के साथ भारत की गहराती सामरिक साझेदारी सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहती. विश्लेषकों का मानना है कि इसका सीधा असर पाकिस्तान की सुरक्षा रणनीति और क्षेत्रीय आकलन पर पड़ सकता है. पहले से तनावग्रस्त भू-राजनीतिक वातावरण में यह समीकरण इस्लामाबाद को अपने कूटनीतिक और सैन्य विकल्पों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकता है.”
वहीं, ईरानी मीडिया अमेरिका के साथ आने वाले युद्ध की अटकलों को लेकर चिंताओं से भरा दिखा.
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भारत से मोदी के दौरे के दौरान फ़िलिस्तीनी अधिकारों का मुद्दा उठाने की अपील की. इंडिया टुडे के साथ एक इंटरव्यू में, अराघची ने ईरान के चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट के लिए इस साल कोई फंड न देने के भारत के फैसले पर निराशा जताई.
प्रेस टीवी ने कहा, “2014 में सत्ता संभालने के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इज़राइली शासन के साथ भारत के संबंधों को लगातार बढ़ाया है और इस प्रक्रिया में देश के फिलिस्तीनी स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति ऐतिहासिक समर्थन से धीरे-धीरे दूरी बनाई है.”
रिपोर्ट में आगे कहा गया, “दिल्ली, जो 1948 में इज़राइल के अस्तित्व के दावे का विरोध करने वाले देशों में शामिल था, आज उसी देश से हथियार खरीदने वाला सबसे बड़ा ग्राहक बन चुका है.”
कट्टरपंथी माने जाने वाले आउटलेट कायहान ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच व्यक्तिगत मित्रता अब भारत की विदेश नीति में आए एक बड़े बदलाव का प्रतीक मानी जा रही है- ऐसा बदलाव, जो नई दिल्ली के फिलिस्तीनी अधिकारों के प्रति उसके ऐतिहासिक समर्थन और ‘ग्लोबल साउथ’ में उसकी नैतिक स्थिति को कमजोर कर सकता है. जुलाई 2017 में जब मोदी पहली बार तेल अवीव के बेन गुरियन एयरपोर्ट पर उतरे थे, तो नेतन्याहू ने गर्मजोशी से गले लगाकर उनका स्वागत किया था. उस दौरान दोनों नेताओं ने नई दिल्ली और तेल अवीव के बीच बची हुई दूरियों को खत्म करने की बात कही थी और रिश्तों को नई ऊंचाई देने का संकल्प जताया था.”
सरकारी अखबार तेहरान टाइम्स के ग्लोबल आइसोलेशन पर इज़राइल के जवाब पर लिखे एक लेख में मोदी के दौरे का कोई ज़िक्र नहीं था.
इस बीच, मिडिल ईस्ट मॉनिटर में एक लेख में तीखी भाषा का इस्तेमाल हुआ. लेख में कहा गया कि इज़राइल के साथ भारत के “हाइफ़नेटेड” या संतुलन साधने वाले रिश्ते उसके उपनिवेशवाद-विरोधी ऐतिहासिक रुख से विचलन का संकेत देते हैं.
लेख में आगे कहा गया कि इस रिश्ते पर यह आरोप भी लगते रहे हैं कि उसने ऐसा माहौल बनाने में भूमिका निभाई है, जहां फिलिस्तीनी अधिकारों का समर्थन करना “भारत-विरोधी” या “हमास समर्थक” करार दिया जाता है, और इसे किसी तरह इस्लामोफोबिया के उभार से भी जोड़ दिया जाता है.
लेख के अनुसार, इस साझेदारी के भीतर स्पष्ट भू-राजनीतिक विरोधाभास मौजूद हैं. एक ओर भारत और इज़राइल के बीच करीबी रिश्ते हैं, वहीं दूसरी ओर भारत को अरब देशों और ईरान के साथ भी संबंध बनाए रखने होते हैं- जो कई बार इज़राइल के हितों से टकराते हैं. यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र में भारत का रुख कई बार झूले की तरह बदलता दिखाई देता है- कभी इज़राइल के पक्ष में, तो कभी फिलिस्तीन के समर्थन में.
लेख का निष्कर्ष था कि पश्चिम एशिया को लेकर भारत की नीति का स्पष्ट केंद्रीय आधार तलाशना आसान नहीं है, क्योंकि वह लगातार संतुलन साधने की कोशिश में दिखाई देती है.
तुर्किये के सरकारी मीडिया अनादोलु एजेंसी ने उल्लेख किया कि बातचीत में रक्षा सहयोग प्रमुख मुद्दा रहने की संभावना है. यह इस तथ्य को दर्शाता है कि उन्नत सैन्य तकनीक के प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में इज़राइल की भारत में महत्वपूर्ण भूमिका है. एक रिपोर्ट में स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया कि 2020 से 2024 के बीच इज़राइल के कुल रक्षा निर्यात का 34 प्रतिशत हिस्सा भारत के खाते में गया.
एजेंसी ने इज़राइल के पूर्व डिप्लोमैट एलन लिएल के हवाले से लिखा कि इज़राइल ने हाल के वर्षों में “अपनी अंतरराष्ट्रीय साख का बड़ा हिस्सा खो दिया है”, जिसमें पश्चिमी सहयोगियों के साथ संबंधों में आई गिरावट और कई देशों द्वारा फिलिस्तीन को मान्यता देना शामिल है. उन्होंने कहा, “चूंकि इज़राइल इस समय काफी हद तक अलग-थलग है… ऐसे में इस दौरे को नेतन्याहू एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश कर सकते हैं.”
ब्रिटिश प्रसारक बीबीसी की एक रिपोर्ट में इज़राइल और भारत- दोनों जगह मौजूद राजनीतिक विपक्ष की ओर ध्यान दिलाया गया. रिपोर्ट में कहा गया, “जहां मोदी भारत-इज़राइल संबंधों की सराहना करेंगे, वहीं वे इस बात का भी ध्यान रखेंगे कि पश्चिम एशिया में उन देशों के साथ भारत के लंबे समय से चले आ रहे रिश्ते प्रभावित न हों, जो इज़राइल की आलोचना करते रहे हैं.”
अमेरिकी पत्रिका फॉरेन पॉलिसी में प्रकाशित एक विश्लेषण में कहा गया कि इज़राइल के प्रति भारत का खुला समर्थन खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ के अगुवा के रूप में पेश करने की उसकी प्राथमिक कोशिशों को जटिल बना सकता है. लेख के अनुसार, मुस्लिम बहुल देशों सहित कई राष्ट्रों ने गाज़ा युद्ध को लेकर इज़राइल की तीखी आलोचना की है. हालांकि, इसमें यह भी कहा गया कि ऐसी चिंताएं मोदी को पीछे हटने के लिए मजबूर नहीं करेंगी.
विश्लेषण के मुताबिक, “नई दिल्ली अपने करीबी सहयोगियों से आसानी से दूरी नहीं बनाती, और इज़राइल- जिसने पिछले वर्ष पाकिस्तान के साथ संघर्ष के दौरान भारत का खुला समर्थन किया था- उस ‘करीबी मित्र’ की श्रेणी में मजबूती से स्थापित है. साथ ही, भारत के भू-राजनीतिक हित इज़राइल के साथ गहरी साझेदारी की मांग करते हैं.”
अमेरिकी अख़बार द वाशिंगटन पोस्ट ने इस दौरे पर समाचार एजेंसी एपी के हवाले से एक रिपोर्ट प्रकाशित की. उसमें कहा गया कि नेतन्याहू ने इस सप्ताह दौरे की घोषणा करते हुए खुद को और मोदी को “निजी मित्र” बताया था. रिपोर्ट के अनुसार, गाज़ा में युद्ध शुरू होने के बाद से कई सहयोगी देशों के साथ संबंधों में आई गिरावट के बीच यह दौरा इज़राइल के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन को बढ़ावा देने का अवसर बन सकता है.
अमेरिकी समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “दौरे के दौरान मोदी इज़राइल में निर्मित मिसाइलों की एक बड़ी खरीद को अंतिम रूप दे सकते हैं. यह जानकारी नई दिल्ली के एक अधिकारी के हवाले से दी गई, जिन्होंने बातचीत की गोपनीयता के कारण अपनी पहचान उजागर न करने की शर्त रखी. रिपोर्ट के अनुसार, सौदे के ब्योरे सार्वजनिक किए जाने की संभावना कम है, क्योंकि दोनों पक्ष इस यात्रा का फोकस व्यापक रणनीतिक रिश्तों पर बनाए रखना चाहते हैं. भारत के विदेश मंत्रालय ने इस संभावित ऑर्डर पर टिप्पणी के अनुरोध का तत्काल जवाब नहीं दिया.”
वहीं, ब्रिटिश अख़बार फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट ने रेखांकित किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पर अपने भू-राजनीतिक दांव संतुलित रखने का दबाव बना रहे हैं.
रिपोर्ट में कहा गया कि मोदी सरकार की रणनीति बहुआयामी है- जापान के साथ सप्लाई चेन जोखिमों पर सहयोग से लेकर इज़राइल के साथ ड्रोन निर्माण और जल प्रौद्योगिकी में साझेदारी तक. साथ ही, लैटिन अमेरिका में महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों के समझौते और आसियान के साथ समुद्री सहयोग को भी तेज किया जा रहा है.”
मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित इस रिपोर्ट को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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