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ठहरिए! दिल्ली सांस्कृतिक पुनर्जागरण से गुजर रही है, सीएम रेखा को धन्यवाद कहिए
14वीं सदी के यूरोपियन सांस्कृतिक पुनर्जागरण को भूलने का वक्त आ गया है. वैसे भी इतनी दूर क्यों जाना. जब हमारे अपने देश की राजधानी एक नई सांस्कृतिक पहचान कायम कर रही है. जी हां, आज एक आम दिल्लीवाले को भले ये पता हो या न हो लेकिन राजधानी की “सांस्कृतिक और सनातन पहचान पुनर्जीवित” की जा रही है. और इसके लिए खास धन्यवाद दीजिए दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता जी को.
ठहरिए जनाब, ये हम नहीं, खुद दिल्ली की भारतीय जनता पार्टी की सरकार का दावा है. यकीन न हो तो आज के हिंदी और अंग्रेजी अखबार उठाकर देख लीजिए. पूरे पन्ने का विज्ञापन छपा है. इसी दिल्ली के सांस्कृतिक पुनर्जागरण पर. जो बीते एक साल में दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार ने किया है.
विज्ञापन की मानें तो दिल्ली ने बीते एक वर्ष में अपनी पहचान को नया आयाम दिया है. “अब यह शहर सत्ता और प्रशासन” के केंद्र से आगे बढ़कर भारत की सांस्कृतिक धड़कन के रूप में उभर रहा है…. विकास और विरासत के संतुलन के साथ-साथ दिल्ली आज साझा संस्कृति, सहभागिता और संवेदनशील शासन का जीवंत उदाहरण बन चुकी है.”
आपके मन में सवाल आ सकता है, ये कैसा संवेदनशील शासन जहां रोज गड्ढों में लोग की मौत भेंट चढ़ रहे है, जहां आए दिन प्रदूषण नागरिकों के फेफड़े गला रहा है लेकिन ठहरिए, क्यों न आप सवाल की बजाए "कर्तव्य पथ से उठती सांस्कृतिक चेतना की लौ" पर ध्यान दें. ऑक्सीजन की चिंता छोड़ “आस्थान का सम्मान” करना सीखें. और, ज्यादा मन खट्टा हो रहा हो तो “भजन क्लबिंग” में आइए और सारे गम भूल जाइए. फिर भी आपका मन न मान रहा हो तो यह विज्ञापन ही पढ़ लीजिए और देखिए कैसे बीते एक साल में सरकार ने कितने ‘दिव्य और भव्य’ कदम उठाए हैं.
बीते साल की सांस्कृतिक उपलब्धियां
बीते साल में सरकार की “सांस्कृतिक उपलब्धियों का लेखा-जोखा काफी लंबा है. जैसे- “आजादी के बाद पहली बार कर्तव्य पथ पर भव्य दीपोत्सव”, “200 घाटों पर भोजपुर-मैथिली कार्यक्रम”, नवरात्रि, दुर्गा पूजा और गरबा के उत्सव और लाल किले पर शहीदी दिवस का कार्यक्रम.
विज्ञापन देखकर आपको भ्रम हो सकता है कि मानो दिल्ली में त्योहार मनाने की परंपरा का आविष्कार ही गुप्ता जी ने किया हो.
वैसे भी ‘दिल्ली अब शहर नहीं एक साझा पहचान’ बन रही है. आप कहेंगे साझा पहचान? लेकिन विज्ञापन देखेंगे तो पाएंगे कि इस साझी विरासत की एक कड़ी इस विज्ञापन से गायब है.
सदियों पुरानी विरासत से पहचान पाने वाले इस शहर की इस्लामी परंपराओं का ज़िक्र इस विज्ञापन से ‘सुविधानजनक तरीके से’ गायब है या सरकार को याद नहीं आया ये तो वही जानें.
लेकिन साझा विरासत की बात करें तो विज्ञापन में न न फूल वालों की सैर- जो लगभग रद्द होते होते बची, न रमज़ान में बंटने वाला मोहब्बत का शरबत, न जश्न-ए-रेख़्ता और न ही राजधानी में सूफ़ी उत्सवों का कोई जिक्र है.
यमुना तट पर छठ को लेकर जो कुछ इस विज्ञापन में लिखा गया है वो आपको और चुटकी काट सकता है. इसे “आस्था का सम्मान और संवेनशील शासन का उदाहरण” बताया गया है.
मानो भाजपा के सत्ता में आने से पहले कभी दिल्ली में प्रवासियों ने छठ मनाई ही न हो. और संवेदनशील शासन? उसकी तो बात ही छोड़ दीजिए.
शासन की संवेदनशीलता न्यूज़लॉन्ड्री की इस रिपोर्ट में बखूबी देख सकते हैं. जब छठ पूजा के बाद यमुना में जहरीला झाग तैर रहा था. मुश्किल से एक हफ्ता भी नहीं हुआ जब एक रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि कैसे नदी में न सिर्फ जानलेवा माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी है बल्कि यह जानलेवा है.
विज्ञापन में सावन में कांवड़ियों की सेवा के संकल्प का जिक्र भी अहम है. विज्ञापन कहता है, “मुखमयंत्री द्वारा कांवड़ियों पर पुष्पवर्षा और यह स्पष्ट संदेश की सरकार ‘आयोजक नहीं, सेवक है’- ने शासन समाज के बीच की दूरी को और कम कर दिया है. वाकई शासन ने सेवकों और ‘कारसेवकों’ का भेद मिटा दिया है. अब पूरा प्रशासनिक अमला फूल बरसाता रहता है और कानून व्यवस्था बगल में खड़ी बगलें झांक रही होती है.
विज्ञापन के सबसे दिव्य शब्द शायद यही हैं- दिल्ली, अब केवल शहर नहीं, साझा पहचान. जहां हर संस्कृति को स्थान और हर नागरिक को सम्मान मिलता है.
असल में दिल्ली हमेशा से ऐसी ही रही है. लेकिन रेखा गुप्ता सरकार ने इसके लिए खास और अलग क्या किया है? इसका जवाब विज्ञापन में शामिल नहीं है.
हकीकत यह है कि जातीय, नस्लीय और सांप्रदायिक भेदभाव से जूझते समुदाय आज भी संघर्ष कर रहे हैं. प्रशासन की संवेदनशीलता और सक्रियता पर सवाल उठ रहे हैं. शायद बीच-बीच में होने वाले “भजन क्लबिंग” कार्यक्रम इन सवालों से ध्यान हटा दें.
हां, आपने सही सुना “भजन क्लबिंग”- जहां भक्ति का आधुनिक संगीत और युवा ऊर्जा से “अनोखा संगम” कराया जाता है, और दावा है कि इसका मकसद "सामूहिक चेतना को मजबूत करना" है. पर क्या वाकई? बीते दिनों कैंपस में प्रदर्शनों पर प्रतिबंध की खबरों के बीच यह चेतना मजबूत करने दावा? आपको क्या लगता है, ये दावा कितना सही है?
हमें तो लगता है कि यहां सामूहिक चेतना का विकास नहीं बल्कि एक भेड़चाल वाली भीड़ तैयार करने प्रयास है. इनके लिए आधुनिक युवा की परिकल्पना एक सोचने-समझने वाला, सवाल पूछने वाला दिमाग नहीं, बल्कि ताल पर नाचने वाला अनुशासित नागरिक है, जो उसके दामन से छीने जा रहे लोकतांत्रिक अधिकारों को भी अनदेखा कर दे. बस उसे करा दिया जाए कि यही तो सांस्कृतिक पुनर्जागरण है.
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