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‘ओरायन’ से ‘टीजे’ तक: कैसे एक चीनी रोबोट को मीडिया ने भारत का ‘अविष्कार’ बता कर बेचा
भारत एआई इम्पैक्ट समिट में गलगोटियास यूनिवर्सिटी ने जिस चीज़ को 'खुद के अविष्कार' के तौर पर पेश किया, वह असल में एक चीनी रोबोट निकला.
समिट में यूनिवर्सिटी ने ‘ओरायन’ नाम का एक रोबोटिक कुत्ता दिखाया और दावा किया कि इसे यूनिवर्सिटी ने 350 करोड़ रुपये खर्च कर बनाया है. लेकिन असल में 'ओरायन' यूनिट्री कंपनी का बना हुआ गो2 मॉडल है. जो एक कमर्शियल रोबोट है. इसे भारत में भी ऑनलाइन ऑर्डर किया जा सकता है.
यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ को इस चार पैरों वाले रोबोट का डेवलपर बताया गया. यूनिवर्सिटी की एक प्रोफेसर ने दूरदर्शन और प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया जैसे प्लेटफॉर्म्स से कहा कि यह रोबोट विश्वविद्यालय में ‘डेवलप’ किया गया है. बाद में जब सोशल मीडिया पर लोगों ने इसकी असल पहचान सामने रखी तो विश्वविद्यालय का रुख बदल गया. वहीं, विवाद के बाद गलगोटिया को एआई समिट से जाने को कहा गया.
हालांकि, यूनिवर्सिटी की ओर से शुरुआत में इस बात से इनकार किया गया और पूरे विवाद के लिए मीडिया के सिर पर ठीकरा फोड़ा गया. कहा गया कि मीडिया ने इसकी ‘गलत व्याख्या’ की. यूनिवर्सिटी के प्रतिनिधियों का कहना था, ‘एक वायरल ट्वीट पूरी तरह गलत दिशा में चला गया और उसे गलत तरीके से समझा गया. हमने कहीं नहीं कहा कि हम ये चीजें मैन्युफैक्चर या डिजाइन करते हैं. हमने हमेशा यही कहा है कि हमारी यूनिवर्सिटी एआई में 350 करोड़ रुपये का निवेश कर रही है.'
लेकिन टीवी पर दर्शकों को यही बात नहीं बताई गई. दूरदर्शन के एक रिपोर्टर ने यह जांचने की कोशिश तक नहीं की कि जिस उन्नत अविष्कार (‘कटिंग-एज इनोवेशन’) की वह तारीफ कर रहे हैं, वह ऑनलाइन खरीदा जा सकता है या नहीं. उन्होंने रोबोट को ‘क्यूट’ और 'काफी नॉटी' बताते हुए उसका प्रदर्शन किया. आईओएस ऐप्स, 3डी प्रिंटर, ड्रोन और छात्र स्टार्टअप्स का जिक्र करने के बाद रिपोर्टर ने कहा, 'गलगोटिया जैसी यूनिवर्सिटीज़ एआई शिक्षा में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं, जिससे भारत 2047 तक विकसित भारत बन सके.'
उधर, पीटीआई ने एक प्रेस रिलीज़ के आधार पर खबर चलाई, जिसकी हेडलाइन थी: 'गलगोटिया यूनिवर्सिटी पवेलियन एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में 350+ करोड़ के एआई शोकेस के साथ प्रमुख आकर्षण.' इसमें बताया गया कि पवेलियन का सबसे बड़ा आकर्षण 'ओरायन' था, जो प्रतिनिधियों से बातचीत कर रहा था और इंटेलिजेंट सिस्टम्स का लाइव डेमो दे रहा था.
फिर कहानी में नया मोड़ आया. वही यूनिट्री गो2 रोबोट इस बार 'टीजे' बनकर सामने आया.
पीटीआई के एक वीडियो कैप्शन में दावा किया गया कि विप्रो ने समिट में 'अपना' डॉग रोबोट पेश किया है. कैप्शन में लिखा था, 'विप्रो ने एआई समिट में अपना डॉग रोबोट दिखाया, जो एआई-आधारित रोबोटिक्स और ऑटोमेशन की प्रगति को दर्शाता है. विप्रो के हेड ऑफ इनोवेशन वरुण दुबे ने इसके फीचर्स और संभावित इस्तेमाल पर बात की.'
हालांकि, विप्रो के प्रतिनिधि ने सीधे यह दावा नहीं किया कि रोबोट उनकी कंपनी ने बनाया है, लेकिन जिस तरह से इसे पेश किया गया, उससे यह एक उनके घरेलू अविष्कार जैसा ही लगा. रोबोट पर कहीं भी 'टीजे' की ब्रांडिंग नहीं थी. उसके 'सिर' के बाईं तरफ यूनिट्री गो2 का 'O2' निशान साफ दिख रहा था.
न्यूज़18 इंडिया की एक ख़बर का शीर्षक था: 'AI सम्मेलन में छाया TJ डॉग.' ख़बर में रोबोट की खूबियों का विस्तार से जिक्र हुआ लेकिन उसकी असलियत का जरा भी नहीं.
एनडीटीवी ने भी 'AI Summit में रोबॉटिक डॉग ने जमाई धाक!' शीर्षक से रिपोर्ट चलाई, जिसमें 'टीजे' स्क्रीन पर इतराता दिखा.
यानी एक ही चीनी रोबोट को पहले 'ओरायन' और फिर 'टीजे' नाम देकर अलग-अलग न्यूज़रूम में पेश किया गया और कहीं भी कोई बुनियादी सवाल नहीं उठा. मामला टीवी तक सीमित नहीं रहा. इस रोबोट की तारीफ करते हुए केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय के आधिकारिक एक्स हैंडल से भी पोस्ट शेयर किए गए. साफतौर पर सरकार इसे समर्थन करती नजर आई. हालांकि, विवाद बढ़ा तो ये ट्वीट डिलीट कर दिए गए.
असलियत में 'चीनी रोबोट' विवाद सिर्फ एक एक्सपो की बात नहीं है, बल्कि ये बात उस पूरे इकोसिस्टम की है जहां 'अविष्कार' (डेवल्प्ड) जैसे शब्दों की संजीदगी को कम आंका जाता है. जहां प्रेस रिलीज़ ही असली ख़बर है. और नाम बदलने या रीब्रांडिंग को ही असली रिसर्च समझ लिया जाता है. जहां मीडिया बुनियादी फैक्ट-चेकिंग से ज्यादा प्रेजेंटेशन को तरजीह देती है. साथ ही ये शिक्षा व्यवस्था पर भी एक बड़ा सवाल है, जहां छात्रों को असली शिक्षा की बजाए मार्केंटिंग से बहलाया जा रहा है.
वैसे ये पहली बार नहीं है जब गलगोटिया यूनिवर्सिटी विवादों में घिरी हो. साल 2024 में जब उसके छात्र प्लेकार्ड लेकर प्रदर्शन करते दिखे. हालांकि, वह प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं इसका ठीक से जवाब भी नहीं दे पा रहे थे. तब यूनिवर्सिटी ने अमर उजाला में फुल-पेज विज्ञापन छपवाया था.
वहीं, रिपब्लिक भारत यूथ समिट 2024 में बोलते हुए सीईओ ध्रुव गलगोटिया ने कहा था, 'हमें पश्चिम की नकल करने की जरूरत नहीं है, बल्कि हमें अपने समृद्ध इतिहास की ओर देखना चाहिए और अपने गुरुकुलों में अपनाई गई बेहतरीन प्रथाओं से सीखना चाहिए.'
इस नजरिए से देखें तो 'ओरायन-टीजे' की यह कहानी कुछ हद तक प्रतीकात्मक लगती है.
एआई के जश्न वाले इस समिट में असली कमी दरअसल 'नॉन-आर्टिफिशियल' इंटेजीजेंस की ही नजर आई.
मणिकर्णिका घाट से काशी विश्वनाथ कॉरिडोर तक, उजड़े (ढहा दिए गए) घरों और खामोश हो चुके मोहल्लों के बीच यह सीरीज़ बताएगी कि कैसे तोड़फोड़ की राजनीति बनारस की सिर्फ़ इमारतें नहीं, उसकी आत्मा को भी बदल रही है. बनारस पर हमारे इस सेना प्रोजेक्ट को सपोर्ट करिए.
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