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अडाणी पर ऐसा क्या ट्वीट किया कि पत्रकार रवि नायर को हो गई जेल
गुजरात की एक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने इनवेस्टिगेटिव पत्रकार रवि नायर को आपराधिक मानहानि के मामले में एक साल की जेल और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है. यह केस अडाणी एंटरप्राइजेज लिमिटेड ने दायर किया था. फैसला बीते दिन मंगलवार, 10 फरवरी को आया. मालूम हो कि रवि एक स्वतंत्र पत्रकार हैं. उन्होंने अडाणी-हिंडनबर्ग विवाद, कॉर्पोरेट एकाधिकार और कथित गलत कामों पर लगातार रिपोर्टिंग की है.
अदालत का यह फैसला अक्टूबर, 2020 से जुलाई, 2021 के बीच किए गए उनके कई पोस्ट और अडाणी वॉच पर छपी जांच रिपोर्टों के आधार पर दी गई है. जांच में सामने आया कि जिन पोस्ट को अदालत में पेश किया गया, उनमें से 14 में रवि ने टाइम्स ऑफ इंडिया, ब्लूमबर्ग, न्यूज़क्लिक, कारवां और अडाणी वॉच जैसी पब्लिकेशनों के लिंक साझा किए थे. कई बार उन्होंने इन लिंक के साथ अपनी टिप्पणी भी लिखी थी.
अडाणी एंटरप्राइजेज ने जिन पोस्ट को आपत्तिजनक बताया, उनमें एक अक्टूबर, 2020 का ट्वीट था. इसमें केंद्र सरकार के नैचुरल गैस मार्केटिंग सुधारों पर सवाल उठाए गए थे और कहा गया था कि अडाणी सीएनजी बाजार में नंबर वन बनना चाहते हैं.
11 अक्टूबर 2020 को रवि ने महाराष्ट्र के उरण में जेएनपीटी के प्रस्तावित निजीकरण के खिलाफ हड़ताल पर एक लेख साझा किया और साथ में सिर्फ “अडाणी?” लिखा. एक अन्य ट्वीट में उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के एक ओपिनियन लेख का लिंक शेयर करते हुए दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड पर अडाणी की बोली से जुड़े सरकारी फैसले की आलोचना की.
एक पोस्ट में उन्होंने यह भी सवाल किया कि हजारों करोड़ की बैंक धोखाधड़ी के आरोपी हीरा व्यापारी जतिन मेहता को भारत वापस क्यों नहीं लाया गया और क्या अडाणी परिवार से उसके संबंधों ने उसे बचाया.
अदालत ने क्या कहा?
ज्यूडिशियल मैजिस्ट्रेट (फर्स्ट क्लास) दामिनी दीक्षित ने कहा कि रवि आईपीसी की धारा 499 (आपराधिक मानहानि) के तहत दोषी हैं. बचाव पक्ष ने दलील दी कि ये पोस्ट सार्वजनिक महत्व के मामलों पर उचित टिप्पणी और आलोचना थे. उन्होंने कहा कि अडाणी एंटरप्राइजेज ने आर्थिक नुकसान का दावा तो किया लेकिन इसका कोई सबूत नहीं दिया.
कोर्ट ने यह दलील खारिज कर दी. अदालत ने कहा कि ट्वीट्स और लेख अलग-अलग नहीं देखे जा सकते. वे एक ही तरह के आरोप लगाते हैं- जैसे गलत काम, कानूनों में हेरफेर, सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग, पर्यावरण नियमों का उल्लंघन और पैसों की गड़बड़ी.
कोर्ट ने कहा कि ऐसे आरोप सिर्फ “राय” नहीं माने जा सकते. इससे किसी कंपनी की प्रतिष्ठा को नुकसान हो सकता है. अदालत ने यह भी कहा कि मानहानि साबित करने के लिए असली आर्थिक नुकसान का सबूत जरूरी नहीं है. यह देखना होता है कि बयान से प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने की संभावना है या नहीं.
फैसले में कहा गया कि बोलने की आजादी में कॉर्पोरेट और सरकारी नीतियों की आलोचना शामिल है, लेकिन यह आजादी पूरी तरह असीमित नहीं है. कानून जिम्मेदार आलोचना और लापरवाही से लगाए गए आरोपों के बीच साफ रेखा खींचता है.
क्रिमिनल मानहानि पर फिर बहस
इस फैसले के बाद आपराधिक मानहानि कानून को लेकर बहस फिर तेज हो गई है. कई सालों से पत्रकारों, नेताओं और एक्टिविस्टों के खिलाफ इसके इस्तेमाल पर सवाल उठते रहे हैं.
2016 में सुब्रमण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मानहानि को अपराध की श्रेणी से हटाने की मांग की थी. उस समय राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल भी इस मांग के पक्ष में थे.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने धारा 499 को संवैधानिक माना. अदालत ने कहा कि प्रतिष्ठा का अधिकार, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है.
कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) ने रवि की सजा पर चिंता जताई है और कहा कि वह इस मामले पर नजर रखे हुए हैं.
द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने भी फैसले पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि आपराधिक मानहानि मीडिया के लिए एक गंभीर खतरा बनी हुई है और भारत उन कुछ लोकतंत्रों में है, जहां मानहानि को अभी भी आपराधिक मामला बनाया जाता है.
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने फैसले को गलत बताया. उन्होंने कहा कि रवि नायर ने अडाणी के खिलाफ कुछ भी ऐसा नहीं लिखा जो सच न हो या गलत हो.
यह रिपोर्ट द न्यूज़ मिनट से साभार पुनः प्रकाशित की गई है. द न्यूज़ मिनट और न्यूज़लॉन्ड्री के बीच साझेदारी के बारे में पढ़ने के लिए यहां और हमारा सब्सक्राइबर बनने के लिए यहां क्लिक करें.
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