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सत्ता बदली, हवा नहीं: प्रदूषण पर सरकार की पुरानी चाल, सिर्फ 3 बैठकों में निकाल दिया पूरा साल
सर्दी की दस्तक के साथ ही देश की राजधानी दिल्ली समेत पूरा एनसीआर हर साल दमघोंटू हवा की चपेट में आ जाती है. हालात ऐसे हो जाते हैं कि सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है. दिवाली बीतते-बीतते प्रदूषण का स्तर ‘इमरजेंसी’ की स्थिति में पहुंच जाता है. इस बार स्थिति और भी गंभीर है.
विपक्ष में रहते हुए वायु प्रदूषण को लेकर आक्रामक रुख अपनाने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) खासकर दिल्ली की सत्ता में आने के बाद इसी मुद्दे पर कठघरे में खड़ी नजर आती है. दिल्ली सरकार ने आंकड़ों में हेर-फेर कर हालात को सामान्य दिखाने और अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश की. न्यूज़लॉन्ड्री ने इसका खुलासा किया था.
लेकिन सिर्फ दिल्ली ही नहीं एनसीआर के दूसरे शहरों जैसे कि गाजियाबाद, नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद आदि में हवा की हालत बहुत खराब है.
जिम्मेदार क्या कर रहे हैं?
देश के नागरिकों को बेहतर हवा मिले इसको लेकर पर्यावरण मंत्रालय जिम्मेदार हैं. इसके मंत्री हैं भूपेंद्र यादव. न्यूज़लॉन्ड्री ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत जानकारी मांगी कि केंद्रीय मंत्री यादव ने एक जनवरी 2025 से 25 नवंबर 2025 तक वायु प्रदूषण के मुद्दे पर कुल कितनी बैठकें की और साथ में यह भी पूछा कि इसमें से कितनी बैठकें ‘दिल्ली-एनसीआर’ में खराब हवा को ध्यान में रखकर की गई हैं.
इसके जवाब में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने जो जानकारी दी, उसके मुताबिक कुल तीन बैठकें हुई है. ‘दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण नियंत्रण’ के तहत यह बैठकें 16 सितंबर, 10 अक्टूबर और 11 नवंबर 2025 को दिल्ली स्थित इंदिरा पर्यावरण भवन में हुई. आखिरी की दो बैठकें पहली बैठक में लिए गए फैसलों की समीक्षा को लेकर थी.
आरटीआई के तहत हासिल दस्तावेज बताते हैं कि बैठकों में फैसले तो लिए गए लेकिन उस तेजी से काम नहीं हुआ. जैसे कि 16 सितंबर की बैठक में कुल 19 फैसले लिए गए थे, लेकिन बाद की बैठकों के मिनट्स से साफ होता है कि इनमें से कई फैसलों पर अमल में भारी देरी हुई. एक और जानकारी मिलती हैं कि जब हवा खराब होने लगती तब इसको लेकर बैठकें शुरू हुई जबकि एहतियातन बैठक और उन बैठकों में हुए फैसलों पर कार्रवाई पहले ही शुरू हो जानी चाहिए थी.
औद्योगिक उत्सर्जन
अधिकारियों ने पहली बैठक में 2,433 प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों में ऑनलाइन कंटीन्यूअस एमिशन मॉनिटरिंग सिस्टम (ओसीईएमएस) लगाने की कड़ी निगरानी का फैसला किया था. सितंबर तक एक एसओपी को अंतिम रूप दिया जाना था और 2 अक्टूबर तक निगरानी तंत्र लागू होना था. लेकिन 11 नवंबर की बैठक तक सिर्फ 179 इकाइयों में यानी करीब 7 प्रतिशत में ही सिस्टम लगाए जा सके थे. बाकी इकाइयों के लिए अब 31 दिसंबर 2025 की समय सीमा तय की गई. हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं है कि अब तक लक्ष्य पूरा हुआ या नहीं.
उत्सर्जन मानक
औद्योगिक उत्सर्जन पर आईआईटी कानपुर की एक अहम स्टडी को 15 अक्टूबर तक अंतिम रूप दिए जाने और 31 अक्टूबर तक नए उत्सर्जन मानकों को अधिसूचित करने का फैसला हुआ. हालांकि, 10 अक्टूबर को हुई बैठक में दर्ज किया गया कि रिपोर्ट अभी फाइनल नहीं है. इसे लेकर नवंबर के पहले हफ्ते में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में एक समीक्षा बैठक का प्रस्ताव रखा गया.
11 नवंबर को हुई बैठक में दर्ज किया गया कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को अभी अंतिम फैसला लेना बाकी है. आईआईटी से रिपोर्ट मिल चुकी है, अब सीपीसीबी उस रिपोर्ट के अध्ययन और आगामी फैसलों के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी बनाएगा. जो कि वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) के साथ मिलकर 25 नवंबर तक अंतिम फैसला लेगी. इसके बाद क्या हुआ, इसकी कोई जानकारी नहीं है.
सड़क पर उड़ती धूल
सितंबर में मंत्रालय ने सड़क परिवहन मंत्रालय, वन महानिदेशालय और अपने विभाग के अधिकारियों की बैठक बुलाने का फैसला किया था, ताकि गड्ढों से उठने वाली धूल पर चर्चा हो सके. लेकिन अक्टूबर की बैठक के मिनट्स में सड़क मरम्मत का कोई जिक्र नहीं मिलता. नवंबर तक आते-आते दिल्ली सरकार से सिर्फ गड्ढों की मरम्मत पर एक रिपोर्ट मांगी गई.
निर्माण और डेमोलिशन से पैदा कचरा
दिल्ली में प्रदूषण का बड़ा स्रोत मानी जाने वाली निर्माण कार्यों से उठती धूल पर बार-बार चर्चा हुई, लेकिन कोई स्पष्ट दिशा नहीं दिखी. सितंबर में दिल्ली सरकार को एकीकृत वेस्ट मैनेजमेंट प्लान तैयार करने को कहा गया. हालांकि, इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई.
इसके बाद पत्राचार और बैठकों की एक श्रृंखला प्रस्तावित हुई, जिसके अंत में नीति आयोग की अगुवाई में संयुक्त चर्चा होनी थी. यह स्पष्ट नहीं है कि यह बैठक कभी हुई भी या नहीं.
अक्टूबर में यह जिम्मेदारी सीएक्यूएम को दे दी गई कि वह एक और बैठक करे. नवंबर की बैठक में तय हुआ कि दिल्ली-एनसीआर के नगर निगम आयुक्तों एक “व्यापक योजना” तैयार कर उसे लागू करने से पहले सीएक्यूएम को समीक्षा के लिए सौंपेंगे.
पराली जलाना
तीनों बैठकों में पंजाब और हरियाणा सरकारों के साथ पराली जलाने के मुद्दे पर बातचीत की योजना दर्ज है. लेकिन RTI जवाबों से यह साफ नहीं होता कि ऐसी कोई बैठक वास्तव में हुई या कोई ठोस कार्रवाई की गई.
ऐसे में सवाल हैं कि पर्यावरण मंत्रालय ने उस संकट पर पहली बैठक सितंबर में क्यों बुलाई, जो हर बार सर्दियों में तय समय पर लौट आता है? औद्योगिक निगरानी सिस्टम महज 8 प्रतिशत से भी कम इकाइयों में क्यों लग पाए? उत्सर्जन मानकों को अंतिम रूप देने में इतनी देरी क्यों हुई? और पराली जलाने के लिए जिम्मेदार राज्यों के साथ समन्वय को लेकर कोई स्पष्टता क्यों नहीं है?
चंद लोगों के लिए फिल्टर्ड हवा
जहां आम दिल्लीवासी जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं, वहीं सार्वजनिक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी सीलबंद कमरों और फिल्टर्ड हवा में काम कर रहे हैं.
एक अलग आरटीआई जवाब से पता चलता है कि मंत्रालय के कार्यालयों में कुल छह एयर प्यूरीफायर लगाए गए हैं, जिनकी कुल लागत 2.65 लाख रुपये है. इनमें से पांच एयर प्यूरीफायर फरवरी, 2025 में खरीदे गए थे. ठीक उसी समय जब पिछले साल दिल्ली में सर्दियों के दौरान वायु प्रदूषण अपने चरम पर था. खास बात यह है कि इन छह में से पांच एयर प्यूरीफायर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह के कार्यालयों में लगाए गए हैं.
गौरतलब है कि दिल्ली में सर्दियों के दौरान एक्यूआई अक्सर 400 के पार चला जाता है, जिसे “खतरनाक” श्रेणी माना जाता है. यह सांस और हृदय से संबंधित गंभीर रोग पैदा करता है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, वायु प्रदूषण हर साल दुनिया भर में करीब 70 लाख लोगों की समय से पहले मौत का कारण बनता है. भारत में यह आंकड़ा 17 लाख से अधिक बताया जाता है. हालांकि, नरेंद्र मोदी सरकार के पास तो इस संबंध में कोई आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं है.
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के एक हालिया आकलन के मुताबिक, 2025 में एनसीआर के अधिकांश शहर भारत के वार्षिक PM2.5 मानकों को पार कर गए और दिल्ली सबसे प्रदूषित शहर के रूप में सामने आई. यह विश्लेषण सीपीसीबी के 30 दिसंबर 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित है.
हालांकि, दिल्ली सरकार इसे सुधार के तौर पर देख रही है. पर्यावरण मंत्री मंजिंदर सिंह सिरसा ने हाल ही में 2025 को राजधानी के लिए पिछले आठ वर्षों का सबसे साफ साल बताया.
लेकिन इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक दिल्ली का औसत AQI अब भी “बहुत खराब” श्रेणी में बना हुआ है.
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