Report
संभल: तीन गोली और महीनों के इंतजार के बाद अब मुकदमे के आदेश से आंख चुराती पुलिस
24 नवंबर, 2024 को आलम हर रोज की तरह घर से बिस्कुट बेचने के लिए निकला. जब वह संभल की जामा मस्जिद के पास पहुंचा तो सामने भारी भीड़ और पुलिस दल बल था. आलम ने देखा कि पुलिस ने भीड़ को तितर बितर करने के लिए हाथों में लिए हथियारों से गोलियां चलानी शुरू कर दी हैं. वह जान बचाने के लिए भागा और इस दौरान उसे लगातार तीन गोली लगीं.
घायल आलम की जान तो बच गई लेकिन अब पुलिस उसे हिंसा का आरोपी बता रही है. वहीं, आलम का कहना है कि उसे पुलिस ने गोली मारी है. वह इस मामले में जांच करवाने के लिए एफआईआर दर्ज करवाना चाहता था लेकिन काफी चक्कर काटने के बाद भी जब एफआईआर दर्ज नहीं हुई तो उसने अपने पिता के जरिए संभल कोर्ट में याचिका दायर की.
सुनवाई के बाद कोर्ट ने पुलिस को एफआईआर दर्ज कर मामले की विवेचना के आदेश दिए. हालांकि, पुलिस एफआईआर दर्ज न कर कोर्ट के आदेशों को चुनौती देने की बात कर रही है. इस सबके बीच आलम है, जो तीन गोली खाने, लाखों का बिल भुगतान करने और महीनों के इलाज के बीच अब संभल हिंसा में आरोपी के तौर पर नामजद हो गया है.
याचिका में लगाए गए आरोप
4 फरवरी 2025 को कोर्ट में दाखिल याचिका में यामीन का कहना है कि उसका बेटा आलम 24 नवंबर की सुबह अपना तीन पहिया ठेला लेकर बिस्कुट बेचने के लिए घर से निकला था. सवेरे करीब 8:45 बजे जब वह जामा मस्जिद के पास पहुंचा. तब वहां पहले से भारी भीड़ मौजूद थी.
याचिका में आरोप है कि इसी दौरान क्षेत्राधिकारी संभल अनुज चौधरी, थाना संभल के इंस्पेक्टर अनुज कुमार तोमर समेत 15- 20 अन्य पुलिसकर्मियों ने भीड़ पर अपने हाथों में लिए हथियारों से जान से मारने की नीयत से फायरिंग शुरू कर दी. इस फायरिंग में आलम को पीठ में दो गोलियां और हाथ में एक गोली लगी.
यामीन ने दावा किया है कि वह अपने बेटे के इलाज के लिए संभल, मुरादाबाद और अलीगढ़ तक भटकते रहे, लेकिन कहीं उसका इलाज नहीं किया गया क्योंकि अस्पतालों ने कहा कि पुलिस ने संभल हिंसा में घायल लोगों को भर्ती करने से मना किया है. इसके बाद पुलिस के डर से उन्होंने अपने बेटे को तीन दिनों तक घर पर ही रखा. हालत ज्यादा बिगड़ने पर वे उसे मेरठ लेकर गए.
याचिका के साथ आलम के इलाज से जुड़े दस्तावेज और ऑपरेशन के दौरान शरीर से निकाली गई गोली की रिपोर्ट भी अदालत में पेश की गई.
शिकायतों के बाद कोर्ट का रुख
आलम के पिता ने 31 दिसंबर 2024 को मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश और 1 जनवरी 2025 को पुलिस अधीक्षक संभल, जिला अधिकारी संभल, डीआईजी मुरादाबाद और पुलिस महानिदेशक लखनऊ समेत मानवाधिकार आयोग को इस बारे में शिकायत देने की बात बताई. उनका कहना है कि जब किसी भी स्तर पर उनकी शिकायत का संज्ञान नहीं लिया गया, तब 4 फरवरी 2025 को उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
जब आलम का इलाज मेरठ में चल रहा था, तब हमने उनसे बातचीत की थी. आलम के पिता यामीन ने कहा था कि उनके बेटे को तीन गोलियां लगी थीं और उसका ऑपरेशन हुआ है. उन्होंने कहा था, “हम लोग बिस्कुट बेचने का काम करते हैं. जब गोली लगी, तब भी लड़का बिस्कुट बेचने ही गया था. हम आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं.”
'पहले आरोपी नहीं, कोर्ट जाने पर नाम जोड़ा गया'
यामीन ने कहा कि हिंसा के बाद दर्ज हुई एफआईआर में भी उनके बेटे का नाम नहीं था. ना ही हिंसा के बाद जब पुलिस ने सार्वजनिक तौर पर आरोपियों के पोस्टर लगाए, उनमें आलम की कोई तस्वीर थी. उन्होंने दावा किया कि कोर्ट में याचिका दाखिल करने के बाद पुलिस ने आलम को आरोपी बना दिया.
यामीन के वकील कमर हुसैन बताते हैं कि 4 फरवरी 2025 को कोर्ट में याचिका दाखिल करने के बाद पुलिस द्वारा जारी की गई चार्जशीट में पहली बार 21 फरवरी 2025 को आलम का नाम प्रकाश में आया.
क्या कहते हैं संभल के पुलिस अधीक्षक?
इस पूरे मामले पर संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार विश्नोई ने कहा, “कोर्ट के आदेश के खिलाफ हम माननीय उच्च न्यायालय में अपील करेंगे. इस आदेश से हम संतुष्ट नहीं हैं. हम इसे चैलेंज करेंगे. एफआईआर दर्ज नहीं करेंगे. इस मामले में ज्यूडिशियल इंक्वायरी पूरी हो चुकी है और उसमें पुलिस कार्रवाई को सही पाया गया है.”
आलम के आरोपी बनाए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा, “मुझे अभी याद नहीं है, इसे देखना होगा. दूसरी बात यह है कि आलम को 32 बोर के तमंचे से गोली लगी है, जिसकी पुष्टि आगरा की प्रयोगशाला से हुई है. जब पुलिस ने गोली चलाई ही नहीं, तो कोर्ट ने पुलिस पर मुकदमा दर्ज करने का आदेश कैसे दे दिया.”
कानूनी प्रक्रिया जारी, जमानत के लिए हाईकोर्ट पहुंचे हैं आलम
वकील कमर हुसैन ने कहा कि एफआईआर दर्ज करने का यह आदेश एक लंबी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है. वह कहते हैं, “इस मामले में 15 से ज्यादा बार बहस हुई है. घायल से जुड़े मेडिकल दस्तावेज और अन्य सबूत कोर्ट में पेश किए गए, जिसके बाद यह आदेश आया.”
पुलिस ने जिस एफआईआर में आलम को मुलजिम बनाया है, वह थाना संभल में 24 नवंबर 2024 को दर्ज हुई थी. इसमें 8 नामजद व 800-900 अज्ञात का जिक्र किया गया है. इन नामजद आरोपियों में आलम का नाम शमिल नहीं था. आरोपी बनाए जाने के बाद अब पुलिस आलम को गिरफ्तार करेगी.
आलम के केस की मौजूदा स्थिति पर कमर हुसैन बताते हैं कि आलम की ओर से कोर्ट में दाखिल अंतरिम जमानत याचिका बीते नवंबर में जिला अदालत ने खारिज कर दी है. इसके बाद वे अंतरिम जमानत के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे हैं, जहां अगली सुनवाई 16 जनवरी को होनी है.
इस मामले में हमने पीड़ित के परिजनों से भी बात करने की कोशिश की. आलम के बहनोई शहनवाज कहते हैं, “मुझे इसकी जानकारी न्यूज़ के जरिए मिली है कि अनुज चौधरी के खिलाफ कोर्ट ने मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया है.”
वे बताते हैं कि आलम का मेरठ में लंबे समय तक इलाज चला है. कई लाख रुपये खर्च हो गए. करीब ढाई महीने तक लगातार इलाज चला. अभी भी दवाइयां चल रही हैं. मेरठ में ही आलम के तीन ऑपरेशन हुए. गनीमत है कि बस जान बच गई.
हमने इस पूरे मामले को लेकर संभल के तत्कालीन सीओ और वर्तमान में फिरोजाबाद के एएसपी अनुज चौधरी से बात की. उन्होंने किसी भी तरह की टिप्पणी से इनकार करते हुए कहा कि मामला न्यायालय में है, इसलिए मैं इस पर कुछ भी नहीं कहना चाहता.
बीते पच्चीस सालों ने ख़बरें पढ़ने के हमारे तरीके को बदल दिया है, लेकिन इस मूल सत्य को नहीं बदला है कि लोकतंत्र को विज्ञापनदाताओं और सत्ता से मुक्त प्रेस की ज़रूरत है. एनएल-टीएनएम को सब्स्क्राइब करें और उस स्वतंत्रता की रक्षा में मदद करें.
Also Read
-
India is nowhere near ready for a nationwide SIR. A passport scare showed me why
-
GK to Gurugram: A field guide to encroach like the rich (and never be called encroachers)
-
Rs 30 lakh a day on publicity: Rajasthan spent Rs 217 crore on government ads in 2 years
-
राजस्थान: हर दिन सरकारी प्रचार पर 30 लाख खर्च, पीएम मोदी के ‘स्वागत’ और 'थैंक्यू' पर करीब 5 करोड़
-
Marxist, Akali, Khalistan sympathiser: Jaswant Singh Khalra was harder to place than Satluj admits