Video
जेएनयू में 5 जनवरी की रात क्या हुआ? कैंडल मार्च, नारे और पूरा विवाद
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) एक बार फिर विवादों में है. बीते 5 जनवरी को यूनिवर्सिटी के साबरमती हॉस्टल के लॉन में एक कैंडल मार्च का आयोजन किया गया था. इस दौरान कथित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को लेकर कुछ आपत्तिजनक नारे लगाए जाने का दावा किया गया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.
वीडियो सामने आने के बाद एक बार फिर इन नारों की तुलना जेएनयू में साल 2016 के कथित देश-विरोधी नारों से की जाने लगी और मामला राजनीतिक रंग लेने लगा.
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि की बात करें तो जेएनयू छात्रसंघ (जेएनयूएसयू) की ओर से 5 जनवरी को यह कैंडल मार्च आयोजित किया गया था. छात्रों का कहना है कि यह मार्च 5 जनवरी, 2020 को जेएनयू में हुए हिंसक हमले की बरसी पर हर साल निकाला जाता है. छात्रों के मुताबिक, 2020 में हुए हमले में कई छात्र घायल हुए थे लेकिन आज तक न तो किसी की गिरफ्तारी हुई और न ही कोई ठोस कार्रवाई हुई. जिसके विरोध में यह आयोजन किया जाता है.
जेएनयू से पीएचडी कर रहे और सीआरजेडी के छात्र नेता अक्षन रंजन कहते हैं, “हम हर साल 5 जनवरी को 2020 की घटना को याद करते हैं. इस दिन जेएनयू में बाहरी नकाबपोशों ने लाठी-डंडों से छात्रों पर हमला किया था. यह महज इत्तेफाक था कि इस बरसी पर उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत याचिकाएं खारिज कीं. मीडिया ने इसे गलत तरीके से जोड़ा और यह दिखाया गया कि यह विरोध उसी फैसले के बाद हुआ, जबकि ऐसा नहीं है. हम 2020 से हर साल यह कैंडल मार्च करते आ रहे हैं.”
विवाद बढ़ने के बाद जेएनयू प्रशासन ने दिल्ली पुलिस को पत्र लिखकर कथित नारेबाज़ी में शामिल छात्रों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और कड़ी कार्रवाई की मांग की है.
वहीं, इसके विरोध में 7 जनवरी को एबीवीपी से जुड़े छात्रों ने रात करीब 9 बजे साबरमती हॉस्टल के लॉन में प्रदर्शन किया. इस दौरान छात्रों ने ‘एंटी नेशनल एलिमेंट’ का पुतला फूंका और नारेबाजी की. इस पूरे मामले को लेकर हमने जेएनयू कैंपस में छात्रों से बात की और अलग-अलग छात्र संगठनों की राय भी जानी.
पीएचडी छात्र अखिलेश कुमार का कहना है, “यह कोई नई बात नहीं है. यहां पहले भी इस तरह के नारे लगते रहे हैं. ये नारे प्रतीकात्मक होते हैं, किसी को सच में फिजिकली नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं.”
एक छात्र ने यह भी कहा कि अंग्रेजी में ऐसे शब्द रोज बोले जाते हैं, लेकिन हिंदी में कह दिया जाए तो विवाद खड़ा कर दिया जाता है. छात्रों ने इस पूरे मामले में मीडिया की भूमिका पर भी नाराजगी जताई. उनका कहना है कि एक बार फिर अधूरी और भ्रामक जानकारी के आधार पर जेएनयू का मीडिया ट्रायल किया जा रहा है.
देखिए पूरी वीडियो रिपोर्ट-
बीते पच्चीस सालों ने ख़बरें पढ़ने के हमारे तरीके को बदल दिया है, लेकिन इस मूल सत्य को नहीं बदला है कि लोकतंत्र को विज्ञापनदाताओं और सत्ता से मुक्त प्रेस की ज़रूरत है. एनएल-टीएनएम को सब्स्क्राइब करें और उस स्वतंत्रता की रक्षा में मदद करें.
Also Read
-
Behind JNU’s latest ‘media trial’: What happened on the night of January 5?
-
‘Disastrous’: Modi govt allows commercial plantations in forests, drops safeguards
-
Hostel for SC/ST girls in Ghaziabad now ‘houses only snakes, not students’
-
SC’s baffling bail order rattled the press. Voter rolls exercise should terrify it
-
बुलडोज़र से बैरिकेड तक: तुर्कमान गेट में चप्पे-चप्पे पर तैनात सुरक्षाबल और 'शांति का भ्रम' पैदा करता सन्नाटा!