Media
नरेंद्र के हिरेन ‘भाई’ की विदाई?
क्या हिरेन जोशी की विदाई हो चुकी है? या फिर ये कोई सामान्य तबादला है? या कोई खास फेरबदल है? या फिर किसी तरह की प्रशासनिक एडजस्टमेंट?
आधिकारिक तौर पर तो सब जगह चुप्पी है. यहां तक कि प्रधानमंत्री कार्यालय में भी. अब तो इसे ‘सेवा तीर्थ’ की संज्ञा दी गई है.. खैर, यहां सालों से ‘सेवा’ में लगे एक ‘बिग ब्रदर’ की विदाई हो गई. लेकिन हमें इस बात ने ज्यादा उदास किया कि इनके लिए ना कोई नोट, ना कोई अधिसूचना, यहां तक कि विदाई के वक्त कोई गुलदस्ता देने की भी ख़बर नहीं आई. जबकि यह शख्स बीते एक दशक से भी ज़्यादा वक्त से भारत भूमि के समाचार जगत को झिंझोड़े हुए था. कहीसुनी बातों की माने तो कभी यह ‘मीडिया मैनेज’ कर रहा था तो कभी उसे ‘धमका’ भी रहा था.
उदाहरण के लिए, जैसा कि ओपन मैगज़ीन ने एक बार मजाकिया लहज़े में लिखा था कि, हिरेन जोशी सिर्फ़ मोदी के इकोसिस्टम का हिस्सा नहीं हैं - वे इस इकोसिस्टम का मदरबोर्ड हैं. मोदी के खासमखास हैं. वह व्यक्ति जो ना सिर्फ़ प्रधानमंत्री को डिजिटल पॉलिसी पर राय देता रहा बल्कि ‘नमो’ के रूप में प्रधानमंत्री के लिए डिजिटल स्पेस में एक नई तरह का फैनबेस बनाया.
भीलवाड़ा से आने वाले पूर्व इंजीनियरिंग प्रोफ़ेसर, जोशी राजनीति के लिए तो नहीं बने थे. साल 2008 में मोदी के एक कार्यक्रम के दौरान एक तकनीकी गड़बड़ी को ठीक करने के बाद, उनकी एंट्री नाटकीय तरीके से किसी फिल्मी कहानी की तरह हुई. तब से, उनका गांधीनगर से दिल्ली तक आना और मोदी की ऑनलाइन छवि को आकार देते रहना चमत्कारिक है. साथ ही वो चुपचाप इस बात पर नज़र रखते रहे कि मीडिया में कौन ठीक से ‘लाइन पर चल’ रहा है और किसे थोड़ा ‘सही करने’ की ज़रूरत है.
2014 में जब मोदी पीएमओ में पहुंचे, तब तक जोशी उनके ठीक पीछे थे. 2019 तक, वे संयुक्त सचिव/ओएसडी (संचार एवं आईटी) के पद तक पहुंच गए थे. जिसका लुटियंस की भाषा में साफ मतलब है: संपादक, मालिक, मंत्री, और यहां तक कि भाजपा के अपने सोशल मीडिया वॉरियर भी उनकी निगाह में चढ़ने से बचते हैं.
व्यक्तिगत रूप से नरम लहजे वाले, असलियत में ‘सर्वव्यापी’, जोशी को लंबे समय से पीएम की "आंख और कान" कहा जाता रहा है. कहा तो यहां तक जाता है कि मीडिया को भेजे जाने वाले संदेशों, उसकी निगरानी, और कौन क्या पूछेगा, इस सब के पीछे एक ही शख्स हैं जोशी,
ऐसे में साफ है कि ये कोई "सामान्य तबादला" तो नहीं है. कम से कम दिल्ली के राजनीतिक और मीडिया जगत के गलियारों से वाकिफ लोग ये अच्छे से जानते हैं और उसे महसूस भी कर रहे हैं. और लुटियंस जोन्स की गलियों में तो मानो अटकलबाजियों की बाढ़ ही आ गई है. जो बस किसी तरह पुख्ता होने का इंतजार कर रही हैं.
आज कल जब सब कुछ व्हाट्सएप फ़ॉरवर्ड के दायरे में रहता है. वो जिसके जरिए हीरेज जोशी मीडिया के लिए प्राइम टाइम तक के मुद्दे सेट करते आए हैं. लेकिन हम उस बारे में कुछ नहीं कहेंगे.
हां, इस बीच पवन खेड़ा की प्रेस कॉन्फ्रेंस का जिक्र जरूरी हो जाता है. जिन्होंने इन अटकलबाजियों को और पुख्ता कर दिया. उन्होंने जोशी के व्यावसायिक संबंधों, विदेशी संबंधों और ‘कथित तबादले’ के बारे में पारदर्शिता की मांग करके इस अफवाह को आधिकारिक तौर पर ‘खबर’ बना दिया.
खेड़ा ने कहा कि जोशी कोई छोटा नाम नहीं है. "वह पीएमओ में सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हैं जिन्होंने इस देश में लोकतंत्र की हत्या करने और आप (मीडिया) का गला घोंटने का बहुत काम किया है." उफ़!
उन्होंने आगे कहा: "देश को यह जानने का पूरा हक़ है कि बिजनेस में उनके साझेदार कौन हैं. पीएमओ में बैठकर हीरेन जोशी क्या धंधा कर रहे थे, यह भी देश को जानने का हक़ है."
लेकिन हमारे पास पूछने के लिए और भी ज्यादा ज़रूरी सवाल है. अगर जोशी नहीं होंगे तो फिर टीवी चैनलों की ‘स्क्रिप्ट’ कौन लिखेगा?
अगर हीरेन जोशी बाहर गए, तो पीएमओ का मीडिया कमांड सेंटर कौन संभालेगा? रात 9 बजे की बहस मुद्दा कौन तय करेगा? "जॉर्ज सोरोस" को कोसने के लिए कौन कहेगा? कौन बताएगा कि आज खास विपक्षियों पर केंद्रित ‘देशद्रोही प्रोग्राम’ होगा? एंकरों को चर्चा के मुद्दे कौन व्हाट्सएप करेगा? बेशर्मों की वो लिस्ट कौन तैयार करेगा, जिसमें उन लोगों को चिन्हित किया जाएगा जिन्होंने सत्ता को जवाबदेह ठहराने जैसा ‘घिनौना’ काम करने की हिम्मत की.
इस सबके बीच, नोएडा फिल्म सिटी के न्यूज़रूम्स से लेकर हर ओर सन्नाटा पसरा है.. उनके सामने अस्तित्व बचाने का संकट आ खड़ा हुआ है.
एक सीनियर लीडर ने इस बीच एक एंकर से जो कहा वो हमें पता चला.. उन्होंने कहा, "अरे मैडम, एंकर परेशान हैं. उनके हिरेन भाई चले गए. अब उनको खुद स्टोरी ढूंढनी पड़ेगी."
ज़रा कल्पना कीजिए, स्टोरीज़ ढूंढ़नी पड़ेंगी? सूत्रों को फ़ोन करना होगा? पत्रकारिता?? ये सब एक प्राइमटाइम एंकर का सबसे बड़ा डरावना सपना है.. जो अब हकीकत बनेगा?
हमें नहीं पता कि हिरेन जोशी को हटाया गया है, शिफ्ट किया गया है, साइडलाइन किया गया है, प्रमोशन दिया गया है, या 2047 के लिए होलोग्राफ़िक एआई पुश नोटिफिकेशन डिज़ाइन करने के लिए भेजा गया है. लेकिन हम ये ज़रूर जानते हैं: यूपीए-2 के आखिरी दौर के बाद से दिल्ली में इतनी गपशप नहीं हुई थी और हम सब जानते हैं कि वो कैसे हुई है. खैर सच्चाई जो भी हो, एक बात तो साफ़ है: एक ऐसा शख्स जिसने देश में समाचारों की सुर्खियों तक को ‘तय’ किया हो उसका खुद का जाना शायद वो सबसे बड़ी कहानी हो सकती है, जिसके बारे में कोई कभी लिखेगा ही नहीं.
भ्रामक और गलत सूचनाओं के इस दौर में आपको ऐसी खबरों की ज़रूरत है जो तथ्यपरक और भरोसेमंद हों. न्यूज़लॉन्ड्री को सब्सक्राइब करें और हमारी भरोसेमंद पत्रकारिता का आनंद लें.
Also Read
-
BJP wins Bengal. TV news finds a new god | TV Newsance 341
-
4 tests, 1 question: Did SIR shape Bengal outcome?
-
East India’s Hindutva turn may fuel a new era of India-Bangladesh hostility
-
Congress-DMK split: How Rahul-Stalin bonhomie collapsed over Vijay’s rise
-
South Central 74: Vijay, the Governor and future of INDIA alliance