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संचार साथी एप: एंटी फ्रॉड के नाम पर कहीं सरकारी निगरानी का रास्ता तो नहीं खुल रहा?
संचार साथी को अनिवार्य बनाने के साथ ही भारत अब उन बेहद चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा हो गया है, जहां सरकारें नागरिकों के फ़ोन में ऐसी एप डालती हैं, जिन्हें हटाया नहीं जा सकता. और यह कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है, जिस पर गर्व किया जाए.
इस बीच गोपनीयता को लेकर उठते सवालों पर संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सफाई देने की कोशिश की. उनका कहना था कि भले ही एप प्री-इंस्टॉल होगी, लेकिन यूजर चाहें तो इसे हटा सकेंगे. उन्होंने कहा, 'इसे एक्टिवेट करना होगा.'
हालांकि, मंत्री का यह दावा सरकार के ही निर्देशों के बिंदु 7(बी) से बिल्कुल उलट बात है, जिसमें साफ़ कहा गया है कि संचार साथी 'पहली बार डिवाइस सेटअप में उपयोगकर्ता को दिखाई दे और इसके किसी भी फीचर को न ही डिसेबल किया जाए और न ही रेस्ट्रिक्ट.'
टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी नियमों के तहत, मार्च 2026 से बिकने वाले हर नए फोन में यह एप अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल होगी, और कंपनियों को 120 दिनों के भीतर इसकी कंपलायंस रिपोर्ट जमा करनी होगी.
दूरसंचार विभाग का दावा है कि यह कदम 'नकली हैंडसेट से सुरक्षा, दुरुपयोग की आसान रिपोर्टिंग और संचार साथी की प्रभावशीलता' बढ़ाने के लिए है.
लेकिन दुनिया में ऐसे उदाहरण कितने हैं? जवाब है बहुत कम.
मालूम हो कि रूस ने 2025 से सभी नए फोनों में मैक्स नामक सरकारी मैसेजिंग एप को अनिवार्य किया. ये एक तरह से व्हाट्सएप का सरकारी क्लोन समझिए. इसकी निगरानी क्षमताओं को लेकर गंभीर चिंता जताई जा रही है. इससे पहले 2024 में 40 अनिवार्य एप्स की एक सरकारी सूची भी जारी हुई थी.
चीन ने 2017 में शिनजियांग में जिंगवांग वेइशी एप थोप दिया. ये कीवर्ड स्कैनिंग, कंटेंट मॉनिटरिंग और मूवमेंट ट्रैकिंग के लिए है. पुलिस इस एप के बारे में चेकिंग करती थी और एप न होने पर हिरासत या गिरफ्तारी तक संभव थी.
इसी तरह उत्तर कोरिया ने 2022 में अपने नागरिकों को क्वांगम्योंग एप इंस्टॉल करने का आदेश दिया, ताकि वे देश में मौजूद इंट्रानेट पर सरकारी अखबार और सीमित सेवाओं तक पहुंच सकें.
दक्षिण कोरिया ने 2015 में नाबालिगों के लिए कंटेंट-ब्लॉकिंग एप अनिवार्य की, लेकिन गोपनीयता पर भारी विरोध के बाद इसे वापस लेना पड़ा.
इस तरह एक पूरी सूची है. और दक्षिण कोरिया को छोड़ दें तो बाक़ी सारे उदाहरण अधिनायकवादी या भारी निगरानी वाले शासन तंत्र के हैं. तो अब भारत को किस खांचे में रखा जाए?
जो भी हो एक बात साफ़ होनी चाहिए कि 'दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक' भारत का नाम रूस और चीन जैसे देशों की फोन के जरिए नागरिकों पर निगरानी रखने की नीतियों के साथ नहीं आना चाहिए.
‘साइबर सुरक्षा’ या 'टोटल कंट्रोल'?
इंटरनेट फ्रीडम फ़ाउंडेशन (आईएफएफ) ने चेतावनी दी है कि आदेश में 'टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी' जैसे बेहद अस्पष्ट शब्दों का सहारा लिया गया है. बिना यह बताए कि एप की वास्तविक सीमाएं क्या हैं.
आईएफएफ के मुताबिक, 'आज यह एप आईएमईआई चेक करने वाला साधारण टूल दिखती है. लेकिन कल इसे सर्वर-साइड अपडेट के ज़रिए ‘बैन एप’ स्कैनिंग, वीपीएन की निगरानी, सिम गतिविधियों की ट्रैकिंग या एसएमएस लॉग की निगरानी जैसे कामों के लिए बदला जा सकता है. आदेश इन संभावनाओं पर कोई रोक नहीं लगाता है.'
आईएफएफ ने कहा कि सरकार 'हर स्मार्टफोन में एक खुला, अपडेटेबल निगरानी ढांचा' अनिवार्य करना चाहती है. वो भी बिना उन बुनियादी संवैधानिक सुरक्षा-कवच के जो किसी भी लोकतंत्र में अनिवार्य होने चाहिए.
विशेषज्ञों की चेतावनी
साइबर विशेषज्ञ आनंद वी के मुताबिक, यह एप एसएमएस पढ़ने और भेजने, कॉल लॉग एक्सेस करने, फोन और नेटवर्क स्टेटस देखने जैसी कई एक्सेस मांगती है.
एक इंटरनेट अधिकार विशेषज्ञ ने रॉयटर्स से कहा कि सरकार 'उपयोगकर्ता की सहमति को अर्थहीन' बना रही है.
मीडियानामा के संस्थापक निखिल पाहवा का कहना है कि संचार साथी मूल रूप से खोया फोन ट्रैक करने के लिए है, लेकिन जब इसे हटाया नहीं जा सकता तो यह 'सरकारी ट्रैकर' बनकर खड़ा हो जाता है. उन्होंने कहा कि डेटा संरक्षण कानून ने निजी कंपनियों को अधिक और सरकार को कम जवाबदेह बना दिया है.
असली सवाल: अपने ही फोन पर किसका नियंत्रण?
अनिवार्य और न हटाई जा सकने वाली सरकारी एप उस मूल सीमा को पार करती है जिस पर हर मुक्त समाज कायम होता है, वो है- डिवाइस पर नागरिक का नियंत्रण.
आपका स्मार्टफोन एक तरह से आपका दूसरा दिमाग है. वह आपकी गतिविधियों, कॉन्टैक्ट्स, आदतों, फोटो, मैसेज, राजनीतिक झुकाव, स्वास्थ्य जानकारी यानि लगभग सब कुछ अपने पास रखता है. ऐसे में जब सरकार कहती है कि वो फोन में ऐसी एप डालेंगे जिसे आप हटा नहीं सकते तो यह साफतौर पर कोई डिजिटल सुरक्षा नहीं बल्कि कंट्रोल का ऐलान है.
भारत में यह चिंता और गहरी इसलिए है क्योंकि एप क्या डेटा लेती हैं, यह सार्वजनिक रूप से साफ़ नहीं है. और आज अगर यह 'एंटी-फ़्रॉड' है, तो क्या कल 'राष्ट्रीय सुरक्षा', परसों 'पब्लिक ऑर्डर' के नाम पर इसका दायरा नहीं बढ़ेगा?
यूरोप ने कोविड के दौरान भी अनिवार्य एप से इनकार कर दिया था. सऊदी अरब ने सार्वजनिक स्थानों में प्रवेश के लिए तवक्कलना एप ज़रूर अनिवार्य किया, लेकिन वह भी हटाई जा सकती थी.
तो फिर अगर एक एप अनिवार्य हो सकती है, क्या अगला मंत्रालय कल अपनी एप आपके फोन पर ठूंसने से रुकेगा?
लोकतंत्र की सेहत अक्सर इन्हीं बारीकियों में दिखती है और हर नागरिक के निजी फोन पर एक स्थायी सरकारी एप, कोई मामूली बात नहीं. यह वह रेखा है, जिसे किसी भी लोकतंत्र को पार नहीं करना चाहिए.
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