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लाल किला ब्लास्ट: जिन परिवारों की ज़िंदगियां उजड़ गई
“हम देर रात तक भाई की तलाश करते रहे. पहले तो उसका नाम मृतकों और घायलों की सूची में भी शामिल नहीं था. जब हम मोर्चरी पहुंचे तब शव दिखाया गया. तभी हमने दिनेश की पहचान की. उनका शव बेहद बुरी हालत में था. सिर पूरी तरह उड़ चुका था, केवल नीचे का हिस्सा बचा था, जिससे पहचान हो पाई.”
यह बात हमें उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के निवासी 35 वर्षीय दिनेश मिश्रा के पारिवारिक सदस्य सुनील द्विवेदी ने बताई. सुनील ऑटो-रिक्शा चलाते हैं. दिनेश चांदनी चौक स्थित एक प्रिंटिंग प्रेस में काम करते थे. वो किसी काम से कश्मीरी गेट गए थे, लेकिन लौटते समय दुर्भाग्य से उसी वक्त लाल किले के पास पहुंचे जहां कार में विस्फोट हुआ और उनकी मौत हो गई.
दिनेश के परिवार में माता-पिता, पत्नी, दो बेटियां और एक बेटा है. वह बीते करीब चार साल से दिल्ली में काम कर रहे थे. हालांकि, हादसे के वक्त उनका परिवार गांव में था. उनके भाई भी दिल्ली में ही रहते हैं. सुनील ने हमें बताया कि दिनेश के दो सगे भाई, तीन भतीजे और दोस्त जानकारी मिलते ही अस्पताल पहुंचे थे. उन्होंने कहा, “पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने शव को एंबुलेंस और एक पुलिस वाहन के साथ घर भेजा. हमारे साथ तीन पुलिसकर्मी और एक ड्राइवर थे.”
दिनेश के छोटे भाई गुड्डू मिश्रा भी दिल्ली में फर्नीचर का काम करते हैं. उन्होंने हमें बताया, "दिनेश से आखिरी बार शाम 6 बजे बात हुई थी. उसके बाद उनका फोन स्विच ऑफ आने लगा. पहले परिवार ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब रात 9 बजे तक वे घर नहीं लौटे, तब हमारी चिंता बढ़ी. हमने आसपास और रिश्तेदारों को फोन कर जानकारी लेने की कोशिश की, लेकिन कोई पता नहीं चला."
सुनील कहते हैं, “रात में करीब 11 बजे, दिनेश का फोन दोबारा चालू हुआ पर वह किसी अस्पताल कर्मचारी के पास था. उसने हमें कहा कि तुरंत लोकनायक अस्पताल पहुंचो. रात करीब ढाई बजे मोर्चरी में प्रवेश मिला तो वहां 7-8 शव रखे थे, जिनकी पहचान नहीं हुई थी. उसी में दिनेश का शव भी था.”
अमरोहा के अशोक सिंह और लोकेश अग्रवाल
अशोक और लोकेश उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के हसनपुर थाना क्षेत्र के थे. दोनों दोस्त थे. 34 वर्षीय अशोक दिल्ली में ही रहकर संविदा पर डीटीसी में कंडक्टर नौकरी करते थे. जबकि लोकेश अग्रवाल की अमरोहा में ही खाद की दुकान थी. वह अपने किसी बीमार रिश्तेदार को देखने के लिए दिल्ली आए थे. इस बीच उन्होंने अपने दोस्त अशोक को फोन कर बुला लिया. अशोक बाइक लेकर उनसे मिलने पहुंचे लेकिन दोनों ही इस दर्दनाक हादसे का शिकार हो गए.
अशोक के भाई सोमपाल सिंह ग्राम प्रधान हैं. उन्होंने बताया कि दोनों काफी अच्छे दोस्त थे. और हादसे के वक्त दोनों लाल किले के पास ही थे. उनके क्षेत्र में काफी गमगीन माहौल है. दोनों के शवों का एसडीएम और सीओ की मौजूदगी में अंतिम संस्कार कर दिया गया है.
सोमपाल सिंह ने बताया कि अशोक बीते 3 साल से परिवार के साथ जगतपुर में रह रहा था. परिवार में उनकी पत्नी सोनम, 3 वर्षीय बेटा, दो बेटियां हैं. अशोक के पिता की पहले ही मौत हो चुकी है. मां बीमार रहती हैं. उसके छोटे भाई की मानसिक हालत ठीक नहीं है. अशोक घर में अकेले ही कमाने वाले थे. वह रात में कंडक्टर और दिन में स्कूल वैन चलाते थे.
सोमपाल सिंह कहते हैं, “हमें टीवी पर आई न्यूज़ के माध्यम से जानकारी मिली थी. सबसे पहले मुझे ही गांव के एक व्यक्ति ने कॉल करके बताया कि तुम्हारे भाई के साथ दिल्ली में हादसा हो गया. फिर हमने भी टीवी पर देखा और गांव के एक ग्रुप में भी यह जानकारी साझा की गई. जिसमें अशोक के नाम के साथ सही जानकारी दी गई थी. इसके बाद थाने से पुलिस के फोन और पत्रकारों ने भी संपर्क किया. इसके बाद हम दिल्ली पहुंचे.”
वह बताते हैं, “एलएनजेपी अस्पताल में सभी कागजात पूरे करने के बाद हमें सुबह घर भेज दिया गया. पहले तो हमें शव लाने के लिए एंबुलेंस भी नहीं दी जा रही थी लेकिन बाद में मीडिया में ख़बर आई तो हमें एंबुलेंस मिल गई.”
फिलहाल अशोक का परिवार इस हादसे के गम में किसी से बात करने की स्थिति में नहीं है. अशोक के दोस्त लोकेश अग्रवाल सोमवार को अपनी बीमार समधन शशि अग्रवाल को देखने दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल आए थे. उनके समधी संदीप अग्रवाल बताते हैं, “मेरे बड़े भाई की पत्नी अपने घर में गिर गई, जिससे उसके दिमाग की नस फट गई थी. उन्हीं का इलाज अस्पताल में चल रहा था. उन्हें मिलकर लोकेश चले गए, मैं ही उन्हें मेट्रो स्टेशन छोड़कर आय़ा था. इसके बाद वह लाल किले पर उतर गए और अपने दोस्त अशोक को फोन करके वहीं बुला लिया.”
लोकेश के परिवार में दो बेटे, और एक बेटी है. उनकी पत्नी का निधन कई साल पहले हो गया था.
शामली के नोमान
उत्तर प्रदेश के शामली जिले के झींझक कस्बे के निवासी 19 वर्षीय नोमान भी इस हादसे का शिकार हुए. नोमान अपने परिवार के इकलौते कमाऊ सदस्य थे. वो अपने गांव में ही कॉस्मेटिक की छोटी सी दुकान चलाते थे. सोमवार सुबह वो अपने दोस्त अमान (21) के साथ एक टैक्सी बुक करके चांदनी चौक पहुंचे थे. करीब 10:30 बजे उन्होंने गाड़ी को आईएसबीटी के पास पार्किंग में खड़ा करवा दिया. वह दोनों खरीदारी के लिए चांदनी चौक मार्केट निकल गए. इस दौरान गाड़ी के ड्राइवर विरासत गाड़ी के पास ही रुके रहे.
नोमान के चाचा महबूब ने हमें बताया कि शाम करीब 8:00 बजे ड्राइवर विरासत में नोमान के पिता इमरान को फोन करके बताया कि वह काफी देर से नोमान को फोन लगा रहे हैं लेकिन फोन उठ नहीं रहा है.
फिर पिता इमरान ने अमान को फोन लगाया. किसी ने अमान का फोन उठाया और उन्हें बताया कि वह शायद ब्लास्ट में बुरी तरह जख्मी हो गए हैं और उनका इलाज दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में चल रहा है. वहीं, नोमान के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. फिर आनन-फानन मैं इमरान अपने छोटे भाई महबूब और परिवार के अन्य लोगों के साथ गांव से दिल्ली के लिए निकले.
दिल्ली में इनकी मुलाकात बुरी तरह से जख्मी अमान से हुई. फिर परिवार ने नोमान की तलाश शुरू की. महबूब के मुताबिक, एलएनजेपी अस्पताल में उन्हें बताया गया कि कुछ घायल लोगों को दिल्ली के बाकी अस्पतालों में भी इलाज के लिए ले जाया गया है. इसलिए वह दिल्ली के तीन अलग-अलग अस्पतालों में गए और नोमान के बारे में पता लगाने की कोशिश की लेकिन उन्हें कुछ नहीं पता चला.
महबूब कहते हैं कि वह दिल्ली के बारे में ज्यादा नहीं जानते इसलिए सुबह करीब 6:00 बजे तक वो और उनका परिवार उन्हें दिल्ली के अलग-अलग अस्पतालों में ढूंढते रहे. थक कर इन लोगों ने 112 पर पुलिस को कॉल किया. फिर पुलिस की मदद से 8:30 बजे इन्हें पता चला की इस धमाके में नोमान की मौत हो चुकी है और उनका मृत शरीर एलएनजेपी अस्पताल के शवगृह में रखा गया है. मंगलवार, दोपहर करीब 12:30 बजे नोमान के पार्थिव शरीर को उनका परिवार मोर्चरी से ले गया.
नोमान के एक बड़े भाई और चार बहने हैं. बड़े भाई का इलाज पहले से ही एलएनजेपी हॉस्पिटल में ही चल रहा है. जबकि पिता पशुपालक हैं. परिवार की माली हालत ठीक नहीं है. महबूब ने हमसे बातचीत में भावुक होकर कहा, “पुलवामा और ऑपरेशन सिंदूर के बाद हमें लगा था कि अब हमारे देश में ऐसा दोबारा नहीं होगा लेकिन फिर से ऐसा हुआ है. हम सरकार से चाहते हैं कि इस समस्या को हमेशा के लिए खत्म किया जाए, कब तक किसी का बाप, किसी का भाई, किसी का बेटा, किसी की बहन यूं ही मरते रहेंगे.”
पंकज सहनी (22 साल, दिल्ली)
मूल रूप से बिहार के समस्तीपुर के रहने वाले 22 वर्षीय पंकज सहनी दिल्ली के कांझावला में रहते थे. सहनी ने 10 दिन पहले ही उबर से जुड़ कर कैब सर्विस शुरू की थी. सोमवार शाम को वह अपने पड़ोसी को लाल किले के पास छोड़ने आए थे. इस दौरान उनकी वैगनार कार भी धमाके की चपेट में आ गई. जिसमें उनकी मौत हो गई.
पंकज के पिता रामबालक सहनी ने हमें बताया कि करीब 9:00 बजे उन्हें एक जानने वाले का फोन आया. उसने कहा कि लाल किले के पास धमाका हुआ है, जिसमें कई लोगों के मरने और घायल होने की खबर है. यह सुनकर रामबालक ने तुरंत अपने बेटे पंकज को फोन लगाया लेकिन पंकज का फोन पहुंच से बाहर आ रहा था. कई बार लगातार फोन लगाने के बाद भी जब पंकज का फोन नहीं मिला तो रामबालक को यह शक हुआ कि कहीं धमाके में पंकज भी तो चपेट में नहीं आ गया.
इसके बाद वह रात में करीब 10:00 बजे कुछ लोगों के साथ लाल किले के लिए निकले. वहां पहुंच कर उन्होंने देखा कि पंकज की गाड़ी धमाके की चपेट में तहस-नहस हो चुकी है. लेकिन पकंज की कोई खबर नहीं है. इसके बाद वह सीधा अस्पताल पहुंचे. जहां पुलिस की मदद से उन्होंने पंकज की पहचान की.
पंकज के परिवार में कुल छ: भाई बहन हैं. इनमें से दो भाई- बहनों की शादी हो चुकी है और बाकी दो बहनें और एक छोटा भाई पढ़ाई कर रहे हैं. पंकज का बड़ा भाई परिवार से अलग रहता है. लिहाजा परिवार की आर्थिक निर्भरता पंकज पर ही थी.
पंकज के पिता राम बालक कैब चलाते हैं. वह बताते हैं, “पंकज पहले छोटा-मोटा काम करके कुछ पैसे कमाते थे लेकिन वो काम छूट गया. इसलिए मैंने कहा कि घर वाली कैब ही चला लिया करो. सोमवार को मेरी तबीयत खराब थी तो वो कैब लेकर गया. वही इकलौता कमाने वाला था. अभी मुझे दो-दो बेटियों की शादी करनी है, बच्चों की पढ़ाई करवानी है, अब हमारा गुजारा कैसे होगा?”
मुआवजे की बात पर उन्होंने बताया कि सरकार की तरफ से अभी उन्हें किसी भी तरह की कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली है. हालांकि, वह चाहते हैं कि सरकार से कोई मदद तो मिले ताकि उनके परिवार का गुजर बसर हो सके.
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