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सीमांचल में ओवैसी: क्या दोबारा उड़ेगी ‘पतंग’ या महागठबंधन काट देगा डोर?
रात के 11 बज रहे थे. पूर्णिया से किशनगंज होते हुए पश्चिम बंगाल की ओर जाने वाली बस एक ढाबे पर रुकी. वहां एक 17-18 साल का लड़का, जिसका नाम तबरेज था, लगातार ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी से जुड़ी रील देख रहा था. मैंने उससे पूछा कि इस इलाके में चुनाव का माहौल कैसा है. युवक ने कहा, ‘‘पतंग का जलवा है. ओवैसी साहब ही जीतेंगे.’’ मालूम हो किन पतंग एआईएमआईएम का चुनाव चिन्ह है.
अगली सुबह, बायसी विधानसभा के बाजार में दर्जनों युवा मोटरसाइकिल पर एआईएमआईएम का झंडा लगाए यात्रा निकालते नजर आए. इस यात्रा को देख रहे एक बुजुर्ग काजी शाहबाज से जब हमने पूछा कि क्या इस बार भी यहां ओवैसी की लहर है तो झुंझलाते हुए उन्होंने कहा, ‘‘जिनका कोई पत्ता नहीं, वे पतंग के साथ हैं.’’
हार्डवेयर की दुकान चलाने वाले शाहबाज आगे कहते हैं, ‘‘ओवैसी साहब यहां आकर कह रहे हैं कि 18 प्रतिशत लोगों को महागठबंधन वाले कुछ नहीं दे रहे हैं. वे लोगों से ‘अपनी कयादत-अपना वोट’ का नारा लगवा रहे हैं. लेकिन क्या 18 प्रतिशत अकेले कुछ कर सकते हैं? नहीं कर सकते. उन्हें किसी न किसी सेकुलर दल के साथ जाना ही होगा. अपने को जुल्म से बचाना है तो किसी का साथ देना ही पड़ेगा. इनके साथ बच्चे भी घूम रहे हैं, जो भावनाओं में बह रहे हैं.’’
साल 2020 के विधानसभा चुनाव में सीमांचल इलाके में एआईएमआईएम ने महागठबंधन (कांग्रेस + राजद + लेफ्ट) को भारी नुकसान पहुंचाया था. यहां की 24 विधानसभा सीटों में से पांच पर उसे सफलता मिली थी. पूर्णिया जिले की बायसी और अमौर, किशनगंज जिले की कोचाधामन और बहादुरगंज तथा अररिया जिले की जोकीहाट सीट पर एआईएमआईएम ने जीत दर्ज की थी. इनमें कुछ सीटों पर जीत का अंतर काफी बड़ा था.
ओवैसी ने लगाया कैंप, लेकिन इसबार वो बात नहीं
साल 2020 की तरह इसबार भी असदुद्दीन ओवैसी किशजगंज के रफ्तारी होटल पर अपना ‘कैंप’ लगाए लगाए हुए है. हर रोज दर्जनों सभा कर रहे हैं. महागठबंधन उनके निशाने पर है. हालांकि उनकी पार्टी इस गठबंधन का हिस्सा बनना चाहती थी. खुद ये बात ओवैसी कह चुके हैं.
वहीं, महागठबंधन के निशाने पर भी ओवैसी ही हैं. कांग्रेस से सांसद इमरान प्रतापगढ़ी, सपा सांसद इकरा हसन और अफजाल अंसारी समेत कई दिग्गज मुस्लिम नेता यहां प्रचार कर रहे हैं. इकरा हसन ने कहा, ‘‘क्या वो (ओवैसी) सरकार बना सकते हैं. अगर वो सरकार के नजदीक पहुंचते हैं तो बेशक आप उन्हें वोट दे दीजिए. लेकिन वो नहीं पहुंच रहे हैं. अगर उन्हें वोट दिया जाएगा और वोट बंटेगा तो एकबार फिर बीजेपी की सरकार बनेगी. इसबार बीजेपी नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री भी नहीं बनाएगी.’’
वहीं, इमरान प्रतापगढ़ी तो ओवैसी पर सीधा हमला बोलते हुए उनके आरोपों का जवाब देते हैं. इमरान कहते हैं, “जो कांग्रेस को वोट देगा, दरी बिछायेगा. यहीं कह रहे हैं न? गाली दे रहे हैं न? कौन सी कयादत खड़ी कर रहे हो आप. प्रोफेसर मुसव्विर आलम को हराकर,किसी और को जिताकर कौन सी कयादत खड़ी कर रहे हो आप.’’
गाजीपुर के सांसद अफज़ाल अंसारी ने तो यहां तक कहा कि जितने ओवैसी की पार्टी में विधायक नहीं हैं, उतने मेरे घर में विधायक हैं. आलम ने कहा, ‘‘जहां 70–80 फीसदी मुसलमान हैं, वहां ओवैसी चुनाव लड़ते हैं, जबकि गाजीपुर में सिर्फ 9 फीसदी मुसलमान होने के बावजूद मैं पांच बार विधायक और तीन बार सांसद रहा हूं. मेरे बड़े भाई, छोटे भाई और दो भतीजे विधायक रह चुके हैं. पूरे देश में जितने ओवैसी के विधायक हैं, उतने तो हमारे परिवार में ही हैं.”
महागठबंधन के नेताओं का ओवैसी पर हमले का कारण है कि जिन पांच सीटों पर ओवैसी की पार्टी ने जीत दर्ज की, वहां से महागठबंधन के उम्मीदवार जीतते रहे हैं.
एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष की सीट- अमौर
2020 में एआईएमआईएम के पांच विधायक जीते थे लेकिन उसमें एक अख्तरुल ईमान ही पार्टी के साथ रहे बाकी सब राजद में चले गए. ईमान को अमौर सीट पर करीब 95 हज़ार वोट मिले. वहीं, दूसरे नंबर पर जेडयू की सबा आज़ाद को 42 हजार. तीसरे नंबर पर कांग्रेस के अब्दुल जाली मस्तान थे. जिन्हें महज 31 हजार वोट मिले थे. मस्तान पूर्व में मंत्री भी रहे चुके हैं. इसबार भी तीनों प्रमुख पार्टियों ने 2020 में ही लड़े उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है.
अमौर में हमारी मुलाकात 42 वर्षीय मोहम्मद असलम से हुई. असलम कहते हैं, ‘‘ईमान साहब हमारे क्षेत्र के भी नहीं हैं. 2020 में हम लोग इन्हें लेकर आए थे. मैंने भी दिन रात इनके लिए काम किया. प्रचार में जुटे रहे लेकिन जब जीत गए तो भूल गए. गुलाबी उर्दू बोलकर इन्होंने अवाम को रिझाया था लेकिन अब यह काम नहीं आने वाला है. मस्तान साहब अनुभवी व्यक्ति हैं. हम लोग अब इनके साथ हैं.’’
मोहम्मद असलम के पास में ही बैठे 30 वर्षीय मोहम्मद आज़ाद उनसे इतफ़ाक़ नहीं रखते हैं. आज़ाद कहते हैं, ‘‘किसी की उर्दू बेहतरीन है तो उसे गुलाबी उर्दू कहकर मज़ाक उड़ाना कौन सी बात हुई. जब से बड़े हुए मस्तान साहब ही यहां के विधायक हैं. इलाके की बेहतरी के लिए उन्होंने किया क्या है? ईमान साहब तो उर्दू शिक्षकों की मांग उठा रहे हैं. जिससे हज़ारों युवाओं का भला होगा. ये क्या ही करेंगे. हम तो ईमान के साथ थे और रहेंगे. सिर्फ नौजवान ही नहीं, बड़े बुजुर्ग और महिलाऐं भी ओवैसी साहब के साथ हैं.’’
यहां तो वैसे तमाम पार्टियों ने उम्मीदवार उतारे हैं, लेकिन लड़ाई जेडयू, कांग्रेस और एआईएमआईएम के बीच ही है. तीनों उम्मीदवार सूर्यपुरी मुस्लिम ही हैं. जिनकी आबादी सीमांचल इलाके में सबसे ज़्यादा है. वहीं यहां भी हिंदू आबादी लगभग 30 प्रतिशत हैं. जिसमें बड़ी आबादी यादव तबके की हैं.
बिहार में ऐसा माना जाता है कि यादव वोटर राजद के पक्ष में मतदान करते हैं. लेकिन इस इलाके में ऐसा नहीं होता है. यहां हिंदू तबके का वोट एकतरफा एनडीए के पक्ष में गिरता है. हालांकि, यहां हमारी मुलाकात मोती गोस्वामी से हुई. जो ब्रह्मण समुदाय से आते हैं. वो कांग्रेस के पक्ष में बोलते नजर आए. गोस्वामी कहते हैं, ‘‘कांग्रेस ही बेहतर काम करती है. ओवैसी सिर्फ मुस्लिम की बात करते हैं लेकिन कांग्रेस सबको साथ लेकर चलती है. इस बार हिन्दू वोटर भी कांग्रेस के साथ है. हम अमौर नहीं पटना देख रहे हैं.’’
इस इलाके में बाढ़ बड़ी समस्या है. मोहमद आज़ाद ने बताया कि आज भी हमारे घर की तरफ की रोड जो बाढ़ में खराब हुई थी वैसी की वैसी ही है. सरकार की भी नज़र इस तरफ नहीं है और ना ही स्थानीय नेताओं की.
बायसी- एआईएमआईएम के जिस उम्मीदवार ने पाला बदला वो चुनाव से बाहर
यहां से एआईएमआईएम की टिकट पर सैयद रुक्नुद्दीन अहमद 2020 में चुनाव जीते थे. हालांकि, बाद में वह राजद में शामिल हो गए. सैयद रुक्नुद्दीन अहमद ने बीजेपी के विनोद यादव को 16 हजार वोटो से हराया था. राजद यहां तीसरे नंबर पर चली गई तो उसके उम्मीदवार अब्दुस सुबान को महज 38 हजार वोट मिले थे. एआईएमआईएम से 30 हज़ार कम.
राजद ने यहां से अपने पुराने उम्मीदवार अब्दुस सुबान को ही उम्मीदवार बनाया है. बीजेपी से भी विनोद यादव हैं. वहीं रुक्नुद्दीन अहमद इस बार राजद को समर्थन दे रहे हैं. एआईएमआईएम ने गुलाम सरवर को मैदान में उतारा है. इन्हीं तीनों में लड़ाई मानी जा रही है. यहां जनसुराज के भी उम्मीदवार हैं लेकिन लोगों का दावा है कि वो लड़ाई में नहीं हैं.
यहां प्रिंटिंग प्रेस चलाने वाले नोमान आलम दो उम्मीदवारों का परचा छापने में व्यस्त नज़र आते हैं. चुनावी माहौल पूछने पर कहते हैं, ‘‘रुक्नुद्दीन ने टिकट नहीं मिलने के बाद समर्थन तो दे दिया है लेकिन उनके समर्थक राजद के साथ नजर नहीं आते हैं. मेरी नजर में बीजेपी भी यहां से मज़बूत हैं. बेचारा विनोद यादव यहां से कई बार से मेहनत कर रहा है लेकिन हार जाता है. इस बार वो भी बाजी मार सकता है.’’
यह सीट भी मुस्लिम बाहुल्य है लेकिन हिन्दू मतदाताओं की संख्या 70 हज़ार के आसपास है. यहां भी हिन्दुओं में यादव बड़ी संख्या में हैं. कुर्मी, मल्लाह और हरिजन भी ठीक-ठाक संख्या में हैं.
यादव वोटर बीजेपी के पक्ष में मतदान करता है. हालांकि, यहां हमारी मुलाकात अरविन्द यादव से हुई. जो पप्पू यादव की पार्टी से जुड़े रहे हैं. अरविन्द कहते हैं, ‘‘यहां 100 में से 60 यादव वोटर इसबार पटना की तरफ देख रहा है. उसे तेजस्वी की सरकार बनानी है. इसलिए वो राजद के उम्मीदवार को वोट करेगा न कि बीजेपी के. पहले 100 में से 90 बीजेपी को वोट देते थे. इसबार यहां से राजद के उम्मीदवार की जीत होगी.’’
हालांकि, हमें कई ऐसे मतदाता भी मिले जो नीतीश कुमार को ध्यान में रखकर बीजेपी को वोट देंगे. बुजुर्ग शम्सुद्दीन कहते हैं, ‘‘यहां की जनता एहसान फरामोश है. मज़दूर से काम कराकर मज़दूरी नहीं देती है.’’ इस वाक्य को समझाते हुए कहते हैं, ‘‘नीतीश कुमार ने काम किया है. आज यहां सड़कें देखिए. बिजली देखिए. क्या था बिहार में? ये सब दिया नितीश कुमार ने लेकिन हिन्दू-मुस्लिम करके हर बार किसी-किसी को जिता देते हैं. मिलता क्या है? जो कल पतंग में था वो आज लालटेन के साथ है. आज जो पतंग के साथ है, वो कल किसी और के साथ होगा.
यहां महागठबंधन को मज़बूती मिलने के पीछे कारण है कि इस इलाके के दो दिग्गज नेता पप्पू यादव, जो कांग्रेस के साथ चले गए और संतोष कुशवाहा, जो इस क्षेत्र से विधायक भी रहे हैं और पूर्णिया के दो बार सांसद भी रहे, वो राजद के साथ हैं.
जोकीहाट- जहां दो भाई आमने सामने
सीमांचल में राजद के दिग्गज नेता रहे तस्लीमुद्दीन के दोनों बेटे सरफराज और शाहनवाज इसबार यहां के अररिया जिले के जोकीहाट से आमने-सामने हैं. शाहनवाज, 2020 में एआईएमआईएम से चुनाव जीते थे लेकिन आगे चलकर राजद में शामिल हो गए. वहीं सरफराज 2020 में राजद के उम्मीदवार थे. वहीं इसबार वो जनसुराज की टिकट पर मैदान में हैं. हालांकि, यहां जनसुराज मायने नहीं रखता है. अपने कई इंटरव्यू में सरफराज भी ये बात बोल चुके हैं. उनके समर्थक भी ऐसा ही कहते हैं.
यहां अलग-अलग बाजारों और गांवों में लोगों से बात करने के बाद सामने आया कि लड़ाई में जनसुराज, राजद, एआईएमआईएम और जदयू हैं. हालांकि, मुख्य टक्कर दोनों भाइयों के बीच में ही है.
जोकीहाट बाज़ार में किराना दुकान तौसीफ कहते हैं, ‘‘कई दिग्गज नेता हमारे यहां से रहे लेकिन क्षेत्र पिछड़ा है. इसबार यहां एआईएमआईएम लड़ाई से बाहर है. लड़ाई दोनों भाइयों में है, इसी में से कोई जीतेगा और कोई हारेगा. शाहनवाज ज़्यादा मिलनसार हैं. साथ ही लोग तेजस्वी को मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं. यादव समाज के लोग भी इस बार आगे बढ़कर वोट कर रहे हैं. इस क्षेत्र में मल्लाह भी ठीक-ठाक संख्या में हैं, सहनी के इधर आने के कारण यह वोट भी राजद को मिलेगा. ऐसे में ज़्यादा मौका शाहनवाज का लग रहा है.’’
वहीं, सरफराज के एक प्रशंसक सिसौना गांव के रहने वाले मोहम्मद गुफरान अहमद का कुछ और ही दावा है. वो कहते हैं, ‘‘सरफराज के साथ धोखा हुआ है. 2020 में सरफराज राजद से चुनाव लड़े थे. हार गए. शाहनवाज जीते और राजद में आ गए. 2024 में राजद ने शाहनवाज को ही लोकसभा का उम्मीदवार बनाया. तब वो हार गए. अब उन्हें विधानसभा का टिकट दे दिया. सब शाहनवाज को ही मिलेगा. सरफराज के साथ जो हुआ, उसका बदला लेने का समय आ गया है. वो दिलों में रहते हैं.’’
इस बार सीमांचल में क्या हो सकता है?
लंबे समय से सीमांचल को कवर करने वाले पत्रकार और ‘मैं मीडिया’ के फाउंडर तंज़ील आसिफ बताते हैं, ‘‘जिस तरह की चर्चा आवैसी की 2020 में थी और उसका जो असर हुआ ऐसा होता इस बार नज़र नहीं आ रहा है.’’
तंजील बताते हैं, ‘‘2020 के विधानसभा चुनाव में में यहां कांग्रेस 11 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और पांच पर जीत दर्ज की थी. वहीं, राजद ग्यारह में से सिर्फ एक सीट जीत पाई थी. भाकपा (माले) ने अपनी एक सीट बचाई ली थी और एक सीट पर हार हुई थी. इस तरह सिर्फ सात सीटें ही महागठबंधन जीत पाई थी. वहीं एनडीए खेमे में 12 सीटें चली गई थी. बीजेपी आठ और जेडयू चार के पास. बाकी एआईएमआईएम ने जीती थी. अभी की जो स्थिति है. महागठबंधन का क्रेज बढ़ा हुआ दिख रहा है. राजद एक से आगे बढ़ रही है. कांग्रेस ने भी थोड़ा बदलाव किया है. अपने पुराने नेताओं की जगह नए चेहरों को मौका दिया है. उसका भी असर दिख रहा है.’’
ओवैसी को असर को लेकर तंज़ील कहते हैं, ‘‘इसबार यह देखने में आ रहा है कि ओवैसी अपना दायरा बढ़ाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं. पिछली बार कटिहार के इलाके में वो जमकर प्रचार नहीं किये थे. उनका तब फोकस किशनगंज और उसके आसपास के इलाके पर था लेकिन इसबार वो अररिया, पूर्णिया, किशनगंज और कटिहार चारों जिलों में जा रहे हैं. वो यहां के 24 सीटों में से 15 पर एआईएमआईएम के उम्मीदवार हैं. जिसमें रोजाना लगभग 10 सीटों पर ओवैसी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं. अगर एआईएमआईएम की जीत की बात करें तो जो पांच सीटें जीती थी, वहां लड़ाई में तो हैं.’’
सीमांचल में मुस्लिम जातियों की अलग-अलग जाति भी मायने रखती है. जैसे यहां सबसे बड़ी जाति सूर्यपुरी हैं, जिनकी आबादी 25 लाख के आसपास है. उसके बाद शेरशाबादी और कुल्हैया हैं, जिनकी आबादी 12-13 लाख के बीच में है. सूर्यपुरी जाति से आने वाले आठ उम्मीदवारों को महागठबंधन ने उतारा है. यहां की सियासत जातियों के आधार पर चलती है.
एनडीए इसबार यहां कमज़ोर हुई है. उसके कई दिग्गज नेता इसबार राजद में चले गए या चुनाव ही नहीं लड़ रहे हैं. वहीं, कुछ बागी भी हो गए हैं. जैसे यहां जदयू के दिग्गज सूर्यपुरी नेता थे मास्टर मोजाहिद, जो राजद में शामिल हो गए हैं. दूसरे सूर्यपुरी नेता थे नौशाद आलम, वो चुनाव ही नहीं लड़ रहे हैं. ये नेता जेडयू के नाम पर और अपनी जाति एवं पहचान के कारण मुस्लिमों का वोट बटोर लेते थे लेकिन उनकी अनुपस्थिति से नुकसान होने की संभावना है. हालत यह है कि सबसे बड़ी आबादी वाले सूर्यपुरी मुस्लिमों में एनडीए गठबंधन का कोई भी बड़ा नेता नहीं है.
वहीं, पूर्णिया में जदयू की बड़ी नेता मानी जाने वाली विभा भारती और पूर्णिया के दो बार के सांसद संतोष कुशवाहा राजद में शामिल हो गए हैं. वर्तमान सांसद पप्पू यादव कांग्रेस से जुड़ गए हैं. ऐसे में पूर्णिया भी एनडीए गठबंधन के लिए मुश्किल बन गया है.
अगर कटिहार की बात करें तो पूर्व उप मुख्यमंत्री तारकेश्वर प्रसाद की सीट भी फंसी हुई नजर आ रही है. यहां से बीजेपी के दिग्गज नेता माने जाने वाले अशोक अग्रवाल के बेटे सौरभ उनके खिलाफ मुकेश सहनी की पार्टी से उम्मीदवार हैं. ऐसे में यह सीट जो बीजेपी के लिए सुरक्षित मानी जाती थी, वो फंस गई है.
सीमांचल में मतदान 11 नवंबर को होंगे और बिहार के नतीजे 14 को आएंगे.
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