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सीएम धामी के चार साल: 1800 से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं पर तीन सौ पंद्रह करोड़ का खर्च
न्यूज़लॉन्ड्री की पहली रिपोर्ट में अब तक आपने यह जाना कि उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने टेलीविज़न चैनलों को विज्ञापन देने और विज्ञापन तैयार कराने पर कितना व्यय किया.
इस रिपोर्ट में हम समाचार पत्र- पत्रिकाओं, सरकार की ओर से प्रचार के लिए प्रकाशित करवाई गई पुस्तकों एवं बुकलेट्स पर हुए व्यय का विश्लेषण विस्तार से प्रस्तुत करेंगे. लेकिन उससे पहले आपको एक पत्रिका की कहानी बताते हैं. जिसने दिल्ली से लेकर उत्तराखंड और खुद मुख्यमंत्री कार्यालय तक हलचल मचा दी.
दरअसल, जनवरी, 2022 में पुष्कर सिंह धामी सरकार ने दिल्ली की एक पत्रिका ख़बर मानक को विज्ञापन के बदले 71.99 लाख रुपये जारी करने का फ़ैसला लिया. दिलचस्प बात यह है कि यह पत्रिका उस वक्त तक ‘आधिकारिक तौर पर अस्तित्व’ में ही नहीं थी. प्रेस रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (पूर्व में आरएनआई) के रिकॉर्ड के मुताबिक, ख़बर मानक का आधिकारिक पंजीकरण जुलाई, 2022 में हुआ.
ख़बर मानक की ओर से सरकार को दिए दस्तावेज़ों में अर्चना राजहंस का मोबाइल नंबर मिला. जो तब इस पत्रिका की प्रधान संपादक थीं. फिलहाल वह खुद को "पूर्व पत्रकार" बताती हैं. उनके सोशल मीडिया पर अक्सर मुख्यमंत्री धामी के बारे में की गई पोस्ट नजर आती हैं.
न्यूज़लॉन्ड्री ने जब उनसे ख़बर मानक को लेकर बात की तो उन्होंने इस पत्रिका से कोई संबंध होने से ही इनकार कर दिया. राजहंस ने बातचीत में कहा, “मैंने 25 जगहों पर काम किया है, उनमें से एक खबर मानक भी थी. अब मैं वहां की किसी चीज़ की ज़िम्मेदार नहीं हूं.” इसके बाद उनसे संपर्क नहीं हो सका क्योंकि उन्होंने रिपोर्टर का नंबर ब्लॉक कर दिया.
पत्रिका के मालिक के तौर पर जनार्दन कुमार का नाम दर्ज है. हालांकि, जनार्दन या पत्रिका का कोई ऑनलाइन निशान नहीं मिलता. सिवाय एक फेसबुक पेज- क्राइम दस्तक रिपोर्टर्स के. सितंबर 2024 में बने इस पेज पर फिलहाल 5 हजार से ज्यादा फॉलोअर्स हैं. इस पेज के कवर पर चार लोगो नज़र आते हैं- क्राइम दस्तक, ख़बर मानक, वर्तमान क्रांति, क्राइम दस्तक रिपोर्टर्स.
हालांकि, इस पेज पर खबर मानक के नाम से जो पोस्ट किए गए हैं, वे समाचार नहीं बल्कि पत्रिका के आईडी कार्ड और प्रशस्ती पत्र हैं. यहां ख़बर मानक के संपादक के तौर पर अब संदीप चौबे का नाम दर्ज है.
न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में चौबे ने कहा कि वे जनार्दन कुमार से संपर्क करवाएंगे. इसके बाद उन्होंने एक शख्स से कॉन्फ्रेंस कॉल पर बात करवाई. जो खुद को कपिल साहू और जनार्दन कुमार का पीए बता रहे थे. जब उत्तराखंड के विज्ञापन पर सवाल पूछे तो उन्होंने जनार्दन की बजाए लालचंद से संपर्क करवाया. जब हमने लालचंद से बात की तो उन्होंने खुद को खबर मानक में “फ्रीलांसर” बताया. उनसे हमने जनार्दन कुमार का नंबर मांगा तो नंबर नहीं होने की बात कह कर उन्होंने फोन रख दिया. इस तरह काफी प्रयासों के बावजूद जनार्दन तक नहीं पहुंचा जा सका.
जनवरी 2022 में जब खबर आई कि इस पत्रिका को लगभग 72 लाख रुपए विज्ञापन के बदले दिए जा रहे है तब उत्तराखंड में इसको लेकर काफी हंगामा हुआ था. नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स और भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व सदस्य अशोक नवरत्न ने सवाल उठाए थे. नवरत्न ने इस विज्ञापन भुगतान को लेकर उत्तराखंड के लोकायुक्त को पत्र लिखा था, जिसकी एक प्रति राज्यपाल और नैनीताल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी भेजी गई थी. वहीं यूनियन ने भी राज्यपाल और मुख्यमंत्री धामी को पत्र लिखा था. इसके बाद फरवरी, 2022 में राज्यपाल के हस्तक्षेप के बाद यह भुगतान अस्थायी रूप से रोक दिया गया. हालांकि, न्यूज़लॉन्ड्री के पास मौजूद उत्तराखंड सूचना विभाग के दस्तावेज के मुताबिक ख़बर मानक को यह राशि अंततः वित्त वर्ष 2022-23 में जारी कर दी गई.
ख़बर मानक की कहानी ये बताने के लिए काफी है कि उत्तराखंड की धामी सरकार ने पिछले चार वित्तीय वर्षों में विज्ञापनों पर कितनी संजीदगी से खर्च किया होगा. बीते पांच सालों में प्रिंट मीडिया के जरिए विज्ञापनों पर 355.37 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. जिसमें से 314.37 करोड़ धामी के मुख्यमंत्री बनने के बाद खर्च हुए.
प्रिंट मीडिया में जो खर्च हुआ है, वह मुख्य रूप से तीन तरह से हुआ है. एक- अख़बारों और पत्रिकाओं को सीधे विज्ञापन देना, दूसरा- एजेंसियों के माध्यम से अख़बारों को विज्ञापन देना और तीसरा- सरकार द्वारा बुकलेट्स का प्रकाशन.
वित्त वर्ष 2020-21 जब प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत थे. तब अख़बारों, पत्र-पत्रिकाओं और बुकलेट्स के जरिए विज्ञापन पर 41 करोड़ रुपये खर्च हुए. इन 41 में से 27 करोड़ तो समाचार पत्र-पत्रिकाओं को सीधे भुगतान किए गए. वहीं, 9.07 करोड़ एजेंसियों के माध्यम से और 4.86 करोड़ बुकलेट्स छपवाने पर खर्च हुए.
त्रिवेंद्र सिंह रावत के इस्तीफे के बाद तक़रीबन सौ दिन के लिए तीरथ सिंह रावत मुख्यमंत्री बने. उनके इस्तीफा देने के बाद 4 जुलाई, 2021 से पुष्कर सिंह धामी प्रदेश के सीएम हैं.
इन्हें मिला सबसे ज्यादा विज्ञापन
प्रिंट विज्ञापन नियमावली, 2016 के अनुसार, उत्तराखंड सरकार ने प्रकाशनों को तीन श्रेणियों में बांटा है. राष्ट्रीय श्रेणी- इन प्रकाशनों को तीन संस्करण प्रकाशित करने होंगे: एक दिल्ली से और दो अन्य राज्यों से. कम से कम एक संस्करण की न्यूनतम प्रसार संख्या 75,000 प्रति (कॉपियां) होनी चाहिए और उनमें से किन्हीं दो की संयुक्त प्रसारित प्रतियां कम से कम 1.25 लाख होनी चाहिए. राज्य श्रेणी- यह कम से कम दो संभागों से प्रकाशित होने चाहिए. वहीं कम से कम एक संस्करण की प्रसारित प्रतियां 50,000 होनी चाहिए और सभी संस्करणों की संयुक्त प्रसार संख्या न्यूनतम 75,000 होनी चाहिए. क्षेत्रीय श्रेणी- इसके अंतर्गत 2,000 प्रतियों की प्रसार संख्या अनिवार्य है. हालांकि, अगर प्रकाशन पहाड़ी क्षेत्रों में है तो कम से कम 1,000 प्रतियों का मानदंड रखा गया है.
सीएम धामी के कार्यकाल की बात करें तो राष्ट्रीय स्तर पर दैनिक जागरण 6 करोड़ रुपये के विज्ञापनों के साथ शीर्ष पर रहा. वहीं अमर उजाला 4.59 करोड़ रुपये के विज्ञापनों के साथ दूसरे स्थान पर रहा. इसके बाद हिंदुस्तान (4.14 करोड़ रुपये), इंडिया टुडे (4.02 करोड़ रुपये) और पाञ्चजन्य को 1.91 करोड़ रुपये मिले हैं.
सूचना विभाग के दस्तावेजों में हमें पंजाब केसरी को कुल 2.09 करोड़ रुपये दिए जाने का जिक्र मिलता हैं. हालांकि, ये स्पष्ट नहीं है कि ये पंजाब केसरी के किस समूह को गए हैं. मालूम हो कि पंजाब केसरी समूह सालों पहले दो हिस्सों में बंट चुका है. केसरी समूह के बंटवारे की कहानी आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं.
उत्तराखंड से प्रकाशित क्षेत्रीय-राज्य-स्तरीय प्रकाशनों में द संडे पोस्ट 1.26 करोड़ रुपये के साथ शीर्ष पर है. उसके बाद न्यूज़ वायरस (70.62 लाख रुपये), दैनिक हॉक (70.13 लाख रुपये), गढ़वाल पोस्ट (57.74 लाख रुपये) और क्राइम स्टोरी (55.94 लाख रुपये) का नंबर आता है.
उत्तराखंड से प्रकाशित न होने वाले कई समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने भी सरकारी विज्ञापनों का एक बड़ा हिस्सा हासिल किया. लखनऊ से प्रकाशित दस्तक टाइम्स पत्रिका को सबसे ज्यादा 93.67 लाख रुपये का भुगतान किया गया. इसके बाद दिल्ली से प्रकाशित पत्रिका हिल मेल (83.47 लाख), खबर मानक (71.99 लाख) , अमर भारती (64.08 लाख) और दैनिक टॉप स्टोरी को 54.33 लाख रुपये का विज्ञापन मिला है.
इनके अलावा लखनऊ स्थित राष्ट्रीय स्वरूप को 52.8 लाख रुपये, कानपुर से प्रकाशित उर्दू दैनिक मता-ए-आखिरत को 39.61 लाख रुपये, मुंबई से प्रकाशित हिंदी विवेक को 35.45 लाख रुपये, गाजियाबाद के दैनिक हिन्ट को 33.24 लाख रुपये और राजस्थान बाल कल्याण समिति की स्मारिका को 26.24 लाख रुपये का भुगतान उत्तराखंड सरकार ने किया है.
विज्ञापनों पर कुछ यूं खर्च हुआ साल दर साल
साल 2021-22 में उत्तराखंड सरकार ने 900 से ज्यादा समाचार पत्र-पत्रिकाओं को दिए विज्ञापन पर 31.44 करोड़ रुपये खर्च किए. इनमें प्रदेश से बाहर से प्रकाशित 57 पत्र-पत्रिकाएं भी शामिल हैं, जिन पर कुल 19.56 करोड़ रुपये खर्च हुए.
प्रदेश से बाहर से प्रकाशित अखबारों में सबसे ज़्यादा 5.50 करोड़ का विज्ञापन दैनिक जागरण को मिला. इसके बाद अमर उजाला को 4.06 करोड़, फिर हिंदुस्तान समहू को 3.68 करोड़, इंडिया टुडे पत्रिका को 1.57 करोड़ और पाञ्चजन्य/ ऑर्गेनाइज़र को 91.34 लाख रुपये के विज्ञापन मिले.
वहीं, विदेशी पत्रिका टाइम को फ्रेंड्स मीडिया पीआर एजेंसी के जरिए 26.77 लाख रुपये और द इकोनॉमिस्ट एशिया को 31.49 लाख रुपये का विज्ञापन दिया गया.
हमने टाइम, द इकोनॉमिस्ट एशिया और फ्रेंड्स मीडिया को भी इस बारे में सवाल भेजे हैं. अगर उनका कोई जवाब आता है तो उसे इस रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा.
2022-23: उत्तराखंड से प्रकाशित अख़बारों का दबदबा
इस साल प्रिंट के विज्ञापनों पर धामी सरकार ने थोड़ी कम राशि खर्च की. 1500 से ज़्यादा पत्र-पत्रिकाओं को विज्ञापन देने पर कुल मिलाकर 23.61 करोड़ रुपये खर्च हुए. इसमें प्रदेश से बाहर से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं को 3.97 करोड़ रुपये का विज्ञापन मिला. जिसमें सबसे ज्यादा 78.75 लाख रुपये पाञ्चजन्य को मिला. वहीं विवादित पत्रिका ‘खबर मानक’ को 71.99 लाख रुपये का भुगतान इसी साल किया गया.
इसके बाद इंडिया टुडे पत्रिका को 52.49 लाख रुपये, अमर उजाला के सभी संस्करणों को 27.70 लाख रुपये और राजस्थान बाल कल्याण समिति की स्मारिका को 26.24 लाख रुपये का विज्ञापन दिया गया. महज 19.33 लाख रुपये के साथ दैनिक जागरण पांचवें स्थान पर रहा.
अगर उत्तराखंड से प्रकाशित होने वाले अख़बारों की बात करें तो दी संडे पोस्ट को 31.89 लाख, गढ़वाल पोस्ट को 20.99 लाख, क्राइम स्टोरी को 17.64 लाख, हिमालय हुंकार को 15.56 लाख और न्यूज़ वेट को 13.66 लाख रुपये का विज्ञापन दिया गया.
2023-24: पत्रिकाओं पर मेहरबान धामी सरकार
लोकसभा चुनाव वाले इस साल में समाचार पत्र-पत्रिकाओं पर उत्तराखंड सरकार ने ठीक-ठीक खर्च किया. लगभग 1600 पत्र-पत्रिकाओं को कुल 33.78 करोड़ रुपये के विज्ञापन दिए गए. इसमें से लगभग 10 करोड़ रुपये प्रदेश के बाहर से छपने वाले पत्र-पत्रिकाओं पर खर्च हुए.
इस बार सबसे ज्यादा 1.04 करोड़ रुपये इंडिया टुडे को मिले. इसके बाद पंजाब केसरी दिल्ली (77.30 लाख) और जालंधर (4.82 लाख) को मिलाकर कुल 82.12 लाख रुपये का भुगतान किया गया. तीसरे नंबर पर दैनिक राष्ट्रीय सहारा (44.59 लाख रुपये) रहा.
लखनऊ से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका दस्तक टाइम्स को 41.39 लाख रुपये, दिल्ली से प्रकाशित हिल मेल को 39.37 लाख रुपये और दैनिक टॉप स्टोरी को 37.28 लाख की राशि विज्ञापनों के बदले दी गई.
वहीं, अखबारों में दैनिक जागरण को 23.97 लाख और अमर उजाला को सिर्फ 4.01 लाख रुपये का विज्ञापन दिया गया. पाञ्चजन्य को 15.75 लाख, आउटलुक पत्रिका को 15.74 लाख और टाइम मैगजीन को 11.02 लाख रुपये का भुगतान किया गया.
इनके अलावा दैनिक हिन्ट को को 24.06 लाख रुपये, राष्ट्रीय स्वरुप को 20.02 लाख रुपये, उड़िया भाषा में प्रकाशित होने वाले ओडिशा भास्कर को 11.68 लाख का विज्ञापन जारी किया गया. वहीं, नागपुर से मराठी में प्रकाशित तरुण भारत को लगभग 8.64 लाख और गुजराती अख़बार गुजरात वैभव को 4 लाख रुपये के विज्ञापन दिए गए हैं.
प्रदेश से प्रकाशित होने वाले अख़बारों की बात करें तो सबसे ज़्यादा विज्ञापन 48.39 लाख रुपये का विज्ञापन न्यूज वायरस को मिला. इसके बाद गढ़वाल पोस्ट को 36.75 लाख, दी संडे पोस्ट को 32.45 लाख, उत्तर भारत लाइव को 27.98 लाख रुपये और क्राइम अफेयर्स को 22.50 लाख रुपये का विज्ञापन मिला.
2024-25: प्रिंट पर खुल्लम खुल्ला खर्च
पिछले पांच सालों में प्रिंट मीडिया पर सबसे ज़्यादा खर्च बीते वित्त वर्ष यानि 2024-25 में हुआ. धामी सरकार ने 40.77 करोड़ रुपये अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं के विज्ञापन पर खर्च किए. इसमें से 13.43 करोड़ प्रदेश के बाहर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र पत्रिकाओं पर खर्च किए गए. इस बार 1800 से ज़्यादा पत्र-पत्रिकाओं में धामी सरकार का विज्ञापन छपा.
अगर प्रदेश से बाहर प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र-पत्रिकाओं की बात करें तो राष्ट्रीय सहारा को 1.19 करोड़, इंडिया टुडे पत्रिका को 88.22 लाख, पंजाब केसरी, दिल्ली को 69.30 लाख, दैनिक अमर भारती को 41.73 लाख और उर्दू अख़बार दैनिक मता-ए-आख़िरत को 39.61 लाख रुपये धामी सरकार ने विज्ञापन के बदले दिए हैं.
अमर उजाला को 21.08 लाख रुपये और दैनिक जागरण दोनों को इस बार 7.03 लाख रुपये मिले. दिल्ली से प्रकाशित जनलोक चिंतन को 30.64 लाख रूपये, गृहशोभा को 25.19 लाख, वहीं, प्रयागराज से प्रकाशित होने वाले दैनिक न्यायाधीश को 21.57 लाख का विज्ञापन मिला. द इकनॉमिस्ट पत्रिका को 34.65 लाख रुपये का विज्ञापन दिया गया.
अगर उत्तराखंड से प्रकाशित अख़बारों की बात करें तो दी संडे पोस्ट को 62.57 लाख, हरिद्वार से प्रकाशित दैनिक हॉक को 63.60 लाख रुपये का भुगतान किया गया.
दक्षिणपंथी पत्रिकाओं पर मेहरबान धामी
जैसा कि आपने देखा कि पाञ्चजन्य और ऑर्गेनाइजर को हर साल विज्ञापन मिला है. धामी के सीएम बनने के बाद इसे 1.91 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है. वहीं इससे पहले साल 2020-21 में इन पत्रिकाओं को मात्र सवा चार लाख रुपये का ही विज्ञापन दिया गया था.
पत्रिका हिमालय हुंकार को 52.50 लाख रुपये बीते चार सालों में विज्ञापन के तौर पर मिले हैं. साल 2019 में इस पत्रिका का विमोचन हुआ था. यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मीडिया विंग विश्व संवाद केंद्र, देहरादून से संबद्ध है.
साप्ताहिक पत्रिका हिंदी विवेक को बीते 4 सालों में 35.45 लाख रुपये का विज्ञापन मिला. मुंबई की इस पत्रिका का मालिकाना हक हिंदुस्तान प्रकाशन संस्था के पास है.
दिल्ली से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका मंथन को बीते वर्ष 2024-25 में 20.99 लाख का विज्ञापन मिला है. इसके संपादक अरविन्द सिंह है. सिंह के एक्स हैंडल के मुताबिक वो ‘मोदी के परिवार’ से हैं और बीजेपी कार्यकर्ता हैं. इनका पिन ट्वीट पीएम मोदी का एयरपोर्ट पर स्वागत करती हुई तस्वीर है.
इसके अलावा विश्व संवाद केंद्र, आगरा से प्रकाशित होने वाली पत्रिका बृज संवाद को कुल 9.99 लाख रुपये का विज्ञापन मिला. पत्रिका नवोत्थान को 5.24 लाख और युगवार्ता को 10.50 लाख रुपये का विज्ञापन दिया गया.
महिला विषयों पर केंद्रित पत्रिका जाह्नवी को 2020 से लेकर 2023 के बीच 5.67 लाख रुपये का विज्ञापन दिया गया. दीनदयाल शोध संस्थान की पत्रिका स्मारिका ग्रामोदय को 5.25 लाख रुपये का विज्ञापन मिला. वहीं लखनऊ स्थित दीन दयाल उपाध्याय सेवा प्रतिष्ठान की पत्रिका नव अन्त्योदय को 2.50 लाख रुपये का विज्ञापन मिला.
मार्केट से नदारद, विज्ञापन गदागद
ये ऐसे पत्र-पत्रिकाएं हैं, जो आपको आसानी से बाजार में न तो दिखेंगी न ही मिलेंगे लेकिन सरकारी दस्तावेजों में ये लाखों का विज्ञापन पा रहे हैं.
जैसे फ्रीडम एक्सप्रेस को ले लीजिए. मेरठ से प्रकाशित इस अख़बार को उत्तराखंड सरकार ने तीन सालों में कुल 26.03 लाख रुपये का विज्ञापन दिया गया. इसके एडिटर राजेश कुमार शर्मा हैं. शर्मा दावा करते हैं कि उनका अख़बार मेरठ और देहरादून से छपता है. मेरठ में सर्कुलेशन 15 हजार और देहरादून में छह हजार है. हालांकि, वो हमसे ई-पेपर (अखबार की डिजिटल कॉपी) साझा नहीं करना चाहते. हमने सवाल किया कि एक साल इतना ज़्यादा विज्ञापन मिलना और दूसरे साल में इतना कम, ये कैसे हुआ? इस सवाल के जवाब में शर्मा कहते हैं, ‘‘वहां पर जो लोग मेरे साथ काम करते थे, वो छोड़कर चले गए.’’
न्यूज़लॉन्ड्री ने मेरठ और देहरादून, दोनों जगहों पर कई पत्रकारों से बात की. लेकिन कोई भी इस अखबार की बाजार में उपस्थिति की तस्दीक नहीं कर पाया. इस बारे में हमने उत्तराखंड सूचना विभाग को सवाल भेजे हैं. अगर उनका कोई जवाब आता है, उसे इस ख़बर में जरूर शामिल किया जाएगा.
इसी तरह एक पत्रिका है- हिल मेल. दिल्ली से छपती है. इसकी टैगलाइन है- ‘एक अभियान पहाड़ों की ओर लौटने का’. इसे बीते चार सालों में 83.52 लाख रुपये का विज्ञापन हासिल हुआ है.
न्यूज़लॉन्ड्री ने हिल मेल से संपर्क किया. पत्रिका की मालकिन चेतना नेगी ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, “प्रदेश सरकार से हमें कभी विज्ञापन मिल जाता है और कभी नहीं मिलता है. हम रजिस्टर्ड पत्रिका हैं. पत्रिका के अलावा एक सालाना, रैबार नाम से कार्यक्रम करते हैं. इस कार्यक्रम को भी सरकार से विज्ञापन मिला है.”
सूचना विभाग द्वारा दिए गए विज्ञापनों में ऐसे दर्जनों उदाहरण मौजूद हैं. जिन अख़बारों-पत्र-पत्रिकाओं का उसके शहर में भी लोग नाम नहीं जानते, लेकिन उसे लाखों का विज्ञापन मिल रहा है.
परिवार एक- अखबार अनेक
उत्तराखंड में एक और दिलचस्प चीज़ देखने को मिली. एक ही परिवार के लोग कई अखबार प्रकाशित कर रहे हैं. और ऐसे लोगों की संख्या भी ठीक-ठाक है.
जैसे कि हरिद्वार से निकलने वाले दैनिक मनीष टाइम्स, दैनिक मानव जगत और हरिद्वार गजट (उर्दू) का प्रकाशन वीर सिंह करते हैं. तीनों में स्वामी, मुद्रक और प्रकाशक के तौर पर सिंह का नाम दर्ज है. दैनिक मानव जगत को 11.47 लाख और हरिद्वार गजट को 5.61 लाख रुपये का विज्ञापन मिला है. इस तरह दोनों को कुल 17.08 लाख रुपये का विज्ञापन मिला है.
इसी तरह देहरादून का ही एक बहुगुणा परिवार है. जिनके यहां से चार अख़बार प्रकाशित होते हैं. साप्ताहिक लोक एकता, हिमालय की पुकार, गिरिराज हिमालय टाइम्स और समय बड़ा बलवान. इसके संपादक क्रमशः, मीना बहुगुणा, शशि बहुगुणा, विवेक बहुगुणा और शालिनी बहुगुणा हैं.
न्यूज़लॉन्ड्री ने विवेक बहुगुणा से बात की. उन्होंने बताया कि एक अख़बार उनकी पत्नी मीना बहुगुणा, दूसरा उनकी मां शशि बहुगुणा और तीसरा उनके भाई की पत्नी शालिनी बहुगुणा के नाम पर है. हालांकि, शालिनी बहुगुणा के ‘संपादन’ में निकलने वाला अख़बार बंद हो गया है.
विवेक से हमने पूछा कि ऐसा करने के पीछे सरकारी विज्ञापन हासिल करना कारण है? इसके जवाब में वो कहते हैं, ‘‘काम-धाम है नहीं. ऐसे में लोगों ने सोचा कि घर- परिवार वालों के नाम पर अख़बार खोल लेते हैं.’’
गौरतलब है कि उत्तराखंड सरकार ने 2016 में प्रिंट विज्ञापन नियमों में संशोधन किया. इस संशोधन के अनुसार अगर एक ही परिवार के कई सदस्य एक ही स्थान से एक से अधिक पत्र/पत्रिकाएं प्रकाशित करते हैं, तो उस परिवार के केवल दो प्रकाशन ही एक वित्तीय वर्ष में सूचीबद्ध होने के पात्र होंगे. यहां परिवार का तात्पर्य समाचार पत्र के स्वामी या प्रकाशक, उनके जीवनसाथी, माता-पिता और अविवाहित पुत्र या पुत्रियों से है. पहले यह संख्या एक परिवार से एक ही प्रकाशन की थी.
एजेंसियों के जरिए भी विज्ञापनों की बंदरबांट
प्रदेश सरकार ने सूचना विभाग के जरिए सीधे तौर पर विज्ञापन तो दिए ही साथ ही एजेंसियों के रास्ते भी विज्ञापनों पर खर्च किया. इन विज्ञापनों में भी धामी के मुख्यमंत्री बनने के बाद लगातार बढ़ोतरी देखने को मिली है.
बीते पांच साल में विज्ञापन एजेंसियों पर सरकार ने कुल 137.81 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. जिसमें से अकेले धामी के कार्यकाल में 128 करोड़ रुपये खर्च किए गए. साल 2020-21 में उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने तीन एजेंसियों को कुल 9.07 करोड़ रुपये दिए. अगले साल (2021-22) भी इन्हीं एजेंसियों को 25.42 करोड़ का भुगतान किया गया. वहीं, इसके बाद 2022-23 में विज्ञापन एजेंसियों की संख्या तीन से बढ़कर सात हो गई और इन पर कुल खर्च 16.60 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.
अगले साल 2023-24 देश में लोकसभा का चुनाव था. उत्तराखंड के सरकारी विज्ञापनों में बड़ी वृद्धि देखी गई. यह वृद्धि न्यूज़ पेपर एजेंसी पर हुए खर्च में भी देखने को मिली. इस साल उत्तराखंड सरकार ने 50.84 करोड़ रुपये के विज्ञापन एजेंसी के जरिए दिए. इस बार कुल 11 एजेंसियों को ये भुगतान किया गया.
वहीं बीते साल (2024-25) में एजेंसियों पर खर्च में कमी देखने को मिली. हालांकि, एजेंसियों की संख्या 11 ही थीं, लेकिन खर्च घटकर 35.86 करोड़ रुपये रह गया.
इन बीते सालों में सबसे ज्यादा 43.26 करोड़ रुपये का भुगतान ओडिशा की कंपनी संकेत कम्यूनिकेशन को किया गया. उत्तराखंड में एजेंसी के असिस्टेंट मैनेजर सुमित गोयल से हमने बात की. उन्होंने कहा, ‘‘वर्तमान में 15 एजेंसियां उत्तराखंड में काम कर रही हैं. हमें क्या काम दिया जाता है इसकी जानकारी आपको सूचना विभाग ही दे सकता है.’’
इसके आगे उन्होंने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया.
किताबों और बुकलेट के प्रकाशन पर खर्च हुए करोड़ों
उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने बीते पांच वर्षों में समाचार पत्र-पत्रिकाओँ को विज्ञापन देने के साथ-साथ प्रचार–प्रसार के उद्देश्य से पुस्तकों और पुस्तिकाओं को छपवाने पर कुल 60.87 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. जिसमें से अकेले धामी के कार्यकाल में 56.01 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. मालूम हो कि इसमें डेढ़ करोड़ के करीब वो खर्च भी शामिल है, जो इनके ट्रांसपोर्टेशन पर हुआ है.
दस्तावेज बताते हैं कि 2020-21 में उत्तराखंड सरकार ने सबसे ज़्यादा 1.97 करोड़ रुपये खर्च कर ‘राज्य की स्थापना दिवस के 20 वर्ष पूर्ण होने के मौके पर विकास पुस्तिका’ का प्रकाशन कराया. वहीं, प्रदेश सरकार के तीन साल पूरे होने पर 1.08 करोड़ में विकास पुस्तिका का प्रकाशन कराया गया.
इसी साल देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर किसानों ने कृषि कानूनों के विरोध में डेरा जमा लिया था. उत्तराखंड से भी काफी संख्या में किसानों ने इस आंदोलन में हिस्सा लिया था. इस बीच उत्तराखंड सरकार ने 53 लाख रुपये खर्च कर ‘कृषि सुधार कानून’ और ‘किसानों के हित में सरकार’ विषय पर दो अलग-अलग फोल्डर्स का प्रकाशन कराया.
2021-22 में यह खर्च बीते वर्ष की तुलना में थोड़ा कम हुआ. जो 4.54 करोड़ रुपये था. इसमें से आधे से ज्यादा (2.52 करोड़ रुपये) सिर्फ एक पन्ने का सूचना कैलेंडर प्रकाशित करने पर खर्च हुआ. इसके अलावा ‘विकल्प रहित संकल्प, नये इरादे, युवा सरकार, उत्तराखंड विकास के स्वर्णिम पथ पर’ नामक विकास पुस्तिका के प्रकाशन पर 43.65 लाख रुपये खर्च किए गए. पुस्तिका के अलावा इसी नाम से एक बुकलेट का भी प्रकाशन हुआ. जिसपर 93.19 लाख रुपये खर्च किए गए. इस तरह कुल 1.68 करोड़ रुपये खर्च हुए. इस वक्त तक पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल चुके थे.
साल 2022-23 में पुस्तकों के प्रकाशन पर खर्च बीते दो सालों के मुकाबले दोगुना होकर 9.18 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. इस बार ‘100 दिन विकास के, समर्पण प्रयास के’ विकास पुस्तिका के प्रकाशन पर 3.16 करोड़ रुपया खर्च किया गया. बता दें कि 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा जीतकर सत्ता में आई थी और धामी एक बार फिर से मुख्यमंत्री बने थे.
इसके अलावा उत्तराखंड स्थापना दिवस के मौके पर ‘संकल्प नये उत्तराखंड का’ नामक पुस्तिका के प्रकाशन के लिए 4.52 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया. इस साल सात पेज के सूचना कैलेंडर के प्रकाशन पर 89.04 लाख रुपये का खर्च भी दर्ज है.
वर्ष 2023-24 में यह खर्च बढ़कर 16.66 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. मुख्यमंत्री धामी ने 'आदर्श चंपावत, बढ़ते कदम- एक साल, नई मिसाल' नामक विकास पुस्तिका और इसी शीर्षक से एक सात पृष्ठीय कैलेंडर का प्रकाशन कराया. इन दोनों पर कुल 15.57 लाख रुपये खर्च किए गए. मालूम हो कि धामी चंपावत से विधायक हैं.
इसके अलावा प्रदेश के गठन के 24 वर्ष पूरे होने पर ‘‘सशक्त नेतृत्व, समृद्ध उत्तराखंड’’ नामक विकास पुस्तिका के प्रकाशन पर 5.48 करोड़ रुपये खर्च किए गए. साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पुस्तक ‘मेरी योजना’ के प्रकाशन पर 37 लाख रुपये का खर्च बताया गया.
2020-21 की तुलना में 2024-25 में पुस्तक और पुस्तिकाओं के प्रकाशन पर खर्च लगभग छह गुना तक बढ़कर 25 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. इसमें से 80 लाख से ज्यादा का भुगतान इन पुस्तिकाओं के ट्रांपोर्टेशन के नाम पर दर्ज है.
इस 25 करोड़ में से अकेले 11.23 करोड़ रुपये का खर्च ‘नई योजनाएं, नई पहल, निर्णायक फैसलों से बदलती प्रदेश की तस्वीर’ शीर्षक से प्रकाशित सामग्री के नाम दर्ज है. जिसमें से 8.38 करोड़ रुपये विकास पुस्तिका और 2.85 करोड़ रुपये 12 पृष्ठीय पुस्तिका के नाम पर खर्च हुए बताए गए.
इसके इतर एक बार फिर प्रदेश के गठन के मौके पर ‘संकल्प सतत विकास का’ नामक पुस्तिका के प्रकाशन पर 5.33 करोड़ रुपये खर्च किए गए. वहीं केंद्र एवं राज्य सरकार की ‘मेरी योजना’ पुस्तिकाओं के प्रकाशन पर 83.26 लाख खर्च कर किए गए.
सूचना विभाग के लिए इन पुस्तिकाओं का प्रकाशन देहरादून स्थित एलाइड प्रिन्टर्स से करवाया जाता है. यह प्रिंटिंग प्रेस देहरादून के पलटन बाज़ार की संकरी गलियों में स्थित है, जिसके आसपास कुछ किताबों की दुकानें और अन्य प्रिंटिंग प्रेस हैं. न्यूज़लॉन्ड्री की टीम मंगलवार को जब यहां पहुंची तो हमें दो कर्मचारी और एक बुज़ुर्ग व्यक्ति मिले. पुस्तिकाओं के प्रकाशन के बारे में पूछे जाने पर प्रिंटिंग प्रेस प्रमुख अनुराग राजवंशी ने हमें राज्य सूचना विभाग से अनुमति लाने की बात कही. उन्होंने कहा, "मैं आपको सब कुछ उपलब्ध करा दूंगा."
वहीं, इस बारे में हमने सूचना विभाग के प्रमुख बंशीधर तिवारी को भी सवाल भेजे हैं लेकिन ख़बर प्रकाशित किए जाने तक उनका कोई जवाब नहीं आया है.
सूचना विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक, बीते पांच सालों में प्रकाशन पर जो कुल 60.87 करोड़ रुपये खर्च किए गए उसमें से 59.30 करोड़ रुपये का भुगतान एलाइड प्रिंटर्स को किया गया.
93 लाख का विज्ञापन और ‘गुणगान’ में लगा दस्तक टाइम्स
उत्तराखंड की धामी सरकार ने उत्तर प्रदेश के कई अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं को लाखों का विज्ञापन दिया है. इसी में से एक पत्रिका दस्तक टाइम्स भी है. धामी के सत्ता में आने के बाद से इसे विज्ञापन मिलना शुरू हुआ.
2020-21 में इसे 23.09 लाख, 2021-22 में 41.39 लाख, 2023-24 में 5.24 लाख और 2024-25 में 23.93 लाख का विज्ञापन मिला है.
वैसे तो यह पत्रिका लखनऊ से छपती है लेकिन इसके ज़्यादातर अंक उत्तराखंड की धामी सरकार के ‘विकास धुन’ में रमे हुए नजर आते हैं. अभी हाल के ही तीन अंकों की ही बात करें तो जुलाई, 2025 में पत्रिका की कवर स्टोरी थी, ‘नए लक्ष्य की तरफ उत्तराखंड’. कवर पर सीएम धामी की तस्वीर हैं और लिखा है, ‘‘प्रधानमंत्री मोदी ने हमें वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य दिया, उसी को आधार मानकर विकसित उत्तराखंड बनाकर इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए हम दृढ़ संकल्पित हैं.’’
इसमें ‘21वी सदी का तीसरा दशक उत्तराखंड का होगा’ शीर्षक से मुख्यमंत्री धामी का एक लेख भी है. धामी लिखते हैं, “चार वर्ष की अवधि में एक ऐसी मज़बूत आधारशिला रखने का प्रयास किया गया है, जो आने वाले वर्षों में विकसित उत्तराखंड और विकसित भारत के सपने को साकार करने में बढ़ी भूमिका निभाएगी.’’
अगस्त, 2025 में कवर पर पीएम नरेंद्र मोदी हैं और लेख है, ‘‘मोदी क्यों ज़रूरी?’’ इस अंक के संपादकीय में राजकुमार सिंह लिखते हैं, ‘‘देश के लिए बड़े गर्व और सम्मान का विषय है कि उसे ऐसा प्रधानमंत्री मिला जो बुद्धिमान, न्यायप्रिय, अनुभवी और क्रियाशील है. मोदी दिन में 18 घंटे काम करते हैं और कभी छुट्टी नहीं लेते हैं. वे दिन रात देश की सेवा में जुटे रहते हैं.’’
इसी संपादकीय में सिंह, धामी की तारीफ में लिखते हैं, “पुष्कर सिंह धामी सरकार ने अपने चार साल के कार्यकाल में औधोगिक निवेश के क्षेत्र में रिकॉर्ड तोड़ प्रगति की है.....धामी ने अपने पूर्ववर्ती 9 मुख्यमंत्रियों की रेखा मिटाये बिना तरक्की की एक और बढ़ी रेखा खींच दी.’’
राजकुमार सिंह की एक रिपोर्ट भी प्रकाशित हुई. जिसका शीर्षक हैं, ‘‘दूसरी औद्योगिक क्रांति की तरफ उत्तराखंड’. जिसमें सिंह ने बताया कि उत्तराखंड अब केवल देवभूमि नहीं बल्कि उद्योग भूमि और नवाचार भूमि के रूप में उभर रहा है.
इस ‘रिपोर्ट’ में धामी को युग परिवर्तनकारी बताया गया है.
अब आते हैं, सितंबर, 2025 के अंक पर. एक बार फिर धामी जी, दस्तक के कवर पर लौटे. इस बार कवर स्टोरी है, ‘‘आपदा प्रबंधन के मास्टर’’. फिर प्रधान संपादक राजकुमार सिंह ने ‘रिपोर्ट’ लिखी. जिसमें वो कहते हैं, ‘‘इस मानसून में देश ने अभूतपूर्व प्राकृतिक आपदाएं झेली हैं, विशेष रूप से उत्तराखंड ने. ऐसे मुश्किल हालात में उत्तराखंड के सीएम धामी ने ग्राउंड जीरो पर डेरा डाल आपदा प्रबंधन की गजब मिसाल पेश की, जिसे अन्य राज्य सीख लेकर अमल कर सकते हैं.’’
इस अंक में सीएम धामी का इंटरव्यू भी छपा. जिसमें वो कहते हैं, ‘‘आपदा में खुद कमांडर बनना पड़ता है.’’
मई, 2024 के अंक में धामी और योगी आदित्यनाथ को उत्तर के हिंदू हृदय सम्राट कहा गया है. रामकुमार सिंह, अपने संपादकीय में लिखते हैं- ‘‘जिहादी ज़हर के लिए कहर बने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड राज्य को दुनिया भर के सनातनी आशाभरी निगाहों से देख रहे हैं. राष्ट्रीय फलक पर योगी और धामी का हिन्दु-आ सूर्य के रूप में उभार एक ऐतिहासिक और सामाजिक घटना है. … यह प्रतीत होता है कि बहुसंख्यक समाज को उत्तर के इन दो सपूतों में अपना ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ दिखा देने लगा है. यह महज भावनात्मक टिप्पणी भर नहीं बल्कि तार्किक और तथ्यात्मक आधार पर कही जा रही बात हैं.’’
जब हमने सिंह से संपर्क किया तो उन्होंने हमारे किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया.
यूपी के बाद सबसे ज़्यादा अख़बार उत्तराखंड में
उत्तराखंड की आबादी लगभग 1.10 करोड़ के आसपास है. बीते वित्त वर्ष में धामी सरकार ने उत्तराखंड के 1800 से ज्यादा अखबारों को विज्ञापन दिया है.
न्यूज़लॉन्ड्री को केंद्रीय संचार ब्यूरो (सीबीसी) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पिछले कुछ सालों से उत्तराखंड से सबसे ज्यादा समाचार पत्र-पत्रिकाओं के रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन आ रहे हैं. सीबीसी की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी भी इस बात की पुष्टि करती है.
गौरतलब है कि सरकारी विज्ञापनों के लिए समाचार पत्र-पत्रिकाओं को सीबीसी में इम्पैनल होना जरूरी होता है. आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश से 2573 समाचार पत्र-पत्रिकाएं इम्पैनल हैं. इस तरह यह पहले स्थान पर है. वहीं, दूसरे स्थान पर उत्तराखंड है, जहां से 957 समाचार पत्र-पत्रिकाएं इम्पैनल हैं. उत्तराखंड के बाद मध्य प्रदेश (694), राजस्थान (530) और दिल्ली (459) हैं. जबकि आबादी के मामले में राजस्थान, उत्तराखंड से आठ गुणा और मध्य प्रदेश सात गुणा बड़ा है.
उत्तराखंड से इम्पैनल 957 समाचार पत्र-पत्रिकाओं में से 624 देहरादून से प्रकाशित होते हैं.
इस रिपोर्ट में उल्लेखित प्रकाशनों पर जानकारी के लिए हमने भारत के प्रेस रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया से भी संपर्क किया. हालांकि, उन्होंने प्रकाशन की गोपनीयता बनाए रखने की बात कहते कोई भी जानकारी देने से इनकार कर दिया.
इसके अलावा सूचना विभाग के निदेशक बंसीधर तिवारी और उपनिदेशक आशीष त्रिपाठी से भी टिप्पणी के लिए संपर्क किया है. अगर वह जवाब देते हैं तो इस रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा. हमने इस मामले पर मुख्यमंत्री धामी के कार्यालय को भी एक प्रश्नावली भी भेजी है. अगर उनका जवाब आता है तो इस रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.
इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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