Obituary
संकर्षण ठाकुर: मुलाक़ात बाकी रह गई…
यह मेरे लिए रिचुअल जैसा बन गया था. पिछले तीन बिहार विधानसभा चुनाव ऐसे रहे जब मैं बिहार जाने से पहले एक बार संकर्षण ठाकुर से मिलने जरूर जाता था. पहले जब वो पीटीआई वाली बिल्डिंग में बैठते थे फिर, आईएनएस वाली बिल्डिंग में. वैसे तो उन्होंने राजधानी दिल्ली में रहते हुए राष्ट्रीय राजनीति के इर्द गिर्द ही पत्रकारिता की, लेकिन बिहार की राजनीति पर उनकी पकड़ और उनके संपर्कों का दायरा बहुत विशाल था. उनकी तमाम किताबें इस बात की गवाह हैं. एक रिपोर्टर के मन में उन जानकारियों का लाभ उठाने का लोभ रहता ही है. साथ ही यह अधिकार बोध भी रहता था कि संकर्षण हमारे पहले एडिटर थे, उन्होंने हमारा इंटरव्यू लिया था. यह सिलसिला अठारह साल पुराना था. लेकिन इस बार जब बिहार एक बार फिर से चुनाव के मुहाने पर है, तब हमारी मुलाकात बाकी रह गई. संकर्षण ठाकुर 63 की अधपकी उम्र में चले गए.
संकर्षण को बहुत सारे लोग, बहुत अलग-अलग वजहों से जानते हैं. शायद यह उनकी शख्सियत का विस्तार हो. लेकिन जिस एक चीज के लिए लोग उन्हें सबसे ज्यादा जानते हैं वो है उनका खूबसूरत गद्य. पत्रकारिता की रूखी और तथ्य केंद्रित दुनिया में उनकी भाषा का लालित्य किसी सधे हुए साहित्यकार को भी शरमा देती थी. तथ्यों, आंकड़ों, घटनाओं के बीच गुजरते हुए वो कथा कहानियां, इतिहास-भूगोल जिस सहजता से लाते थे उसका एक अलग फैन बेस था.
हमारी आखिरी मुलाकात का बायस भी उनकी पत्रकारिता रही. करीब साल या डेढ़ साल पहले की बात है. उन्होंने ताउम्र अंग्रेजी भाषा में पत्रकारिता की. लेकिन उनके दीर्घ रिपोर्ताज का हिंदी में अनुवाद एक पुस्तक के रूप में छपा. इसका शीर्षक है कागद कलम काल. यह अनुवाद उनके किसी करीबी ने किया था, जिन्हें लगता था कि इतनी सारी खूबसूरत कहानियां सिर्फ भाषा की सीमा के कारण एक बड़े पाठकवर्ग से वंचित क्यों रहनी चाहिए. मेरी पहले भी उनसे इस बारे में एकाध बार हुई थी कि आपके लेख और रिपोर्ताज हिंदी में होते तो कितना अच्छा रहता.
एक दिन दोपहर के वक्त संकर्षण का फोन आया. बड़ी सकुचाहट के साथ उन्होंने कहा- अतुल एक किताब छपी है. हमारे किसी करीबी ने सारी पुरानी रिपोर्ट ट्रांसलेट कर दी थी. अब वो छप गई हैं. तुम पढ़ना चाहोगे? मैंने कहा आप पूछ क्यों रहे हैं. मैं आ जाता हूं आपसे लेने. हम इस पर बातचीत भी करेंगे. मैं किताब लेने पहुंचा. लेकिन ट्रैफिक जाम के कारण हमारी मुलाकात नहीं हुई. मैंने किताबें उनके ऑफिस से लीं. कागद कलम काल नाम से उनकी रिपोर्ट्स और लेखों का संकलन छपा था. बहुत बेसिक पुस्तिका थी. मैंने बहुत सारे रिपोर्टर्स और साथियों को वह किताब बांटी. वह पत्रकारों को लिखने और रिपोर्ट करने का शऊर सिखाती है. फिर वो द टेलीग्राफ के संपादक बन गए. उनकी व्यस्तता और बढ़ गई. हमारी मुलाकात नहीं हो पाई.
बहुतों के लिए संकर्षण ठाकुर चिड़चिड़े स्वाभाव वाले पत्रकार रहे. वो जल्द किसी से घुलते मिलते नहीं थे और झल्लाकर जवाब देते थे, लेकिन यह उनकी बॉडी लैंग्वेज का हिस्सा था, स्वभाव नहीं था. बहुत सारे लोग उनके सेंस ऑफ ह्यूमर के मुरीद हैं. संकर्षण के अंदर बहुत जबर्दस्त सेंस ऑफ ह्यूमर था. वो बिहारी सेंस ऑफ ह्यूमर जिसके चर्चे होते हैं. बहुत सारे लोगों के लिए संकर्षण ठाकुर चेन स्मोकर थे. उनके केबिन में सिगरेट की डिब्बियां नहीं आती थी, सिगरेट के डंडे आते थे. यानी बीस पैकेट एक साथ. ये सिगरेट ही शायद उनकी जिंदगी ले गई. उनकी मौत फेफड़े के कैंसर से हुई.
उनसे जुड़ी एक याद मैं अक्सर अपने दोस्तों को सुनाता हूं. मैंने नया-नया तहलका ज्वाइन किया था. पूरा दफ्तर नई मैगज़ीन की लॉन्चिंग के उत्साह से लबरेज और गहमा गहमी से भरा हुआ था. सिगरेट का धुआं और गंध उस पूरी गहमा गहमी को स्वप्निल अहसास से भर रही थी. पत्रिका में एक कॉलम की शुरुआत हो रही थी ‘द टू टियर’. यह भारत के छोटे शहरों के ऊपर आधारित सिरीज़ थी. इसका फॉर्मेट अनूठा था. यह कॉलम था लेकिन इसमें रिपोर्टिंग भी शामिल थी. पहले कॉलम के लिए खुद संकर्षण ठाकुर ने रिपोर्टिंग की थी. शहर था बनारस जो मेरा अपना शहर था. वह लेख कसी हुई रिपोर्टिंग और खूबसूरत गद्य का आदर्श मेल था.
मेरे सिर पर उस लेख का हिंदी अनुवाद करने की जिम्मेदारी आई. मैं लेख का प्रिंट लेकर पढ़ रहा था. संकर्षण मेरे पीछे आकर खड़े हो गए. उन्होंने ठेठ बिहारी टोन में कहा अतुलजी अच्छे से हिंदी में कर डालिए. मै सकुचा गया, फिर हंस कर बोला जी सर. उस लेख का पहला वाक्य मेरे लिए इतना घुमावदार और जटिल साबित हुआ कि मैं अटक गया. अंग्रेजी में जो वाक्य उन्होंने लिखा था वह सरल शब्दों में कुछ इस तरह से था- No matter which direction you enter Banaras from, you will have to head south. इसका भाव यह था कि आप बनारस में किसी भी दिशा से घुसे आपको उतरना गड्ढे में ही होगा. शहर की दशा इतनी बुरी है.
मैं ‘साउथ’ शब्द में अटक गया. पूरा वाक्य इस तरीके से रचा गया था कि कोई संदर्भ नहीं बन पा रहा था. अंतत: मैंने अपनी सहज बुद्धि के सहारे जो वाक्य रचना की वह कुछ इस प्रकार थी. वैसे तो बनारस में प्रवेश के कई रास्ते हैं, पर आपको दक्षिण दिशा से घुसना चाहिए. इस तरह से बाकी हिस्सा ट्रांसलेट करके मैंने पूरे लेख के हिंदी अनुवाद का प्रिंट संकर्षण को दे दिया. उन्होंने देखा और रख लिया. लगभग एक हफ्ते बाद उन्होंने समझाया कि वो क्या कहना चाहते थे.
उनकी लेखनी इसी तरह से चमत्कृत करती थी जैसे उनके जाने की खबर ने आज अविश्वास में डाल दिया. उनकी पत्रकारिता में सेकुलरिज्म, संविधान हमेशा रस बनकर मौजूद रहा. वही उनकी विरासत रहेगी.
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