Report
पैदल यात्री ज़ोन बने ड्राइववे और पार्किंग स्थल: वो समृद्ध वर्ग के अतिक्रमण जिन्हें प्रशासन छूना नहीं चाहता
यह रिपोर्ट सार्वजनिक स्थानों पर प्रभावशाली वर्गों द्वारा किए जा रहे अतिक्रमण और उनके प्रति सिस्टम की अनदेखी पर आधारित हमारी श्रृंखला का हिस्सा है. इस शृंखला की पिछली रिपोर्ट्स पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
ग्रेटर कैलाश-2 में एम ब्लॉक मार्केट के सामने एक पार्क के पास लगे बोर्ड पर लिखा है, "अब कोई अतिक्रमण नहीं. दुकानों का अवैध विस्तार नहीं. फुटपाथों पर अस्थायी दुकानें नहीं."
लेकिन कुछ ही कदम की दूरी पर, हर जगह गाड़ियां खड़ी हैं - सड़कों पर, दुकानों के सामने, यहां तक कि मार्केट के ठीक सामने वाली सड़क पर भी. फुटपाथ और पैदल चलने वालों का आना-जाना बंद हो गया है.
यह नज़ारा दक्षिण दिल्ली के समृद्ध इलाकों में बारमबार दिखाई देता है. ग्रेटर कैलाश-2, सीआर पार्क, डिफेंस कॉलोनी और न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में, जहां भी सार्वजनिक पैदल चलने की जगहें मौजूद हैं, निजी इस्तेमाल किए जाने से निगल ली गई हैं.
यह उसी शहर में हो रहा है, जहां अवैध निर्माण और अतिक्रमण के नाम पर हुई तोड़फोड़ में हजारों लोग विस्थापित हुए हैं.
'बमुश्किल कोई फुटपाथ'
आज का ग्रेटर कैलाश, जहां अब बुटीक स्टोर और गेट वाले घर हैं, कभी खेतिहर भूमि हुआ करता था. 1955 में सरकार ने जमरुदपुर और देवली गांव के किसानों से यह जमीन अधिग्रहित कर ली. 1959 तक इसका एक हिस्सा रियल एस्टेट की दिग्गज कंपनी डीएलएफ को आवासीय कॉलोनी के लिए सौंप दिया. ग्रेटर कैलाश-1 की सफलता ने आखिरकार ग्रेटर कैलाश-2 के विकास को जन्म दिया, जो नई दिल्ली के आउटर रिंग रोड के बेहद नजदीक थी.
वर्तमान में अकेले ग्रेटर कैलाश-2 में 6,000 से ज्यादा घर हैं. कई घरों में एक से ज़्यादा कारें हैं, और अक्सर पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती. नतीजा यह होता है कि कारें बाहर गलियों में फैल जाती हैं.
न्यूज़लॉन्ड्री ने ब्लॉक एम और ई का दौरा किया.
एम ब्लॉक में, एक लेन का पैदल वाला रास्ता पूरी तरह से घरों के बाहर खड़ी कारों से घिरा हुआ था.
ई ब्लॉक में, गेट नंबर 4 के आगे, दोनों तरफ के घरों में बड़े-बड़े ड्राइववे हैं जहां कारें खड़ी हैं.
भारतीय सड़क कांग्रेस के दिशा-निर्देशों के अनुसार, आवासीय क्षेत्रों में फुटपाथों के लिए तीन अलग-अलग जोन होने आवश्यक हैं: एक फ्रंटेज या डेड ज़ोन, एक खुला पैदल यात्री क्षेत्र, और एक फर्नीचर या अन्य कामों में इस्तेमाल होने वाला इलाका. इनमें पैदल यात्री क्षेत्र कम से कम 1.8 मीटर चौड़ा होना चाहिए. इन दिशा-निर्देशों के अनुसार किसी सड़क का पैदल चलने योग्य स्कोर, अन्य चीजों के अलावा, "अतिक्रमण मुक्त फुटपाथों" पर निर्भर करता है.
लेकिन जीके-2 रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के सचिव संजय रैना का दावा है कि मुख्य सड़कों को छोड़कर कॉलोनी के अंदर बमुश्किल ही कोई फुटपाथ है. वे बताते हैं, “जहां स्टिल्ट पार्किंग (इमारत के नीचे खाली जगह में पार्किंग) नहीं बनाई गई थी, वहां निवासी अक्सर गमले लगाते थे या नालियों पर टाइलें बिछाते थे, जबकि मूल रूप से इन जगहों को फुटपाथ के रूप में पक्का किया जाना था. "लेकिन चूंकि वहां उचित जल निकासी की व्यवस्था नहीं है, इसलिए फुटपाथ कभी नहीं बनाए गए, और अब लोग उस जगह को अपने घरों के विस्तार के रूप में इस्तेमाल करते हैं."
राणा का दावा है कि एमसीडी में कई शिकायतें दर्ज कराने के बावजूद, हर बार जवाब एक ही रहा है: "फंड नहीं हैं."
उनका कहना है कि उन्होंने अतिक्रमण के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, लेकिन केवल बाजार में विक्रेताओं द्वारा किए गए अतिक्रमण के खिलाफ. ये मामला न्यायालय में विचाराधीन है.
आईआईटी दिल्ली के परिवहन अनुसंधान एवं चोट निवारण कार्यक्रम (टीआरआईपीपी) की अध्यक्ष प्रोफेसर गीतम तिवारी का दावा है कि अभिजात्य इलाकों में, मौजूदा पैदल यात्री दिशा-निर्देशों की नियमित रूप से अनदेखी की जाती है. "वे कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं हैं. अगर होते, तो एजेंसियों को जवाबदेह ठहराया जा सकता था और दंडित किया जा सकता था… जब कारें फुटपाथ पर कब्जा कर लेती हैं, तो पैदल यात्री कैरिजवे पर धकेल दिए जाते हैं. वे तेज गति वाले यातायात और अत्यधिक तनावपूर्ण पैदल वातावरण के जोखिमों के संपर्क में आते हैं."
आवासीय इलाकों में पार्किंग स्थलों को लेकर अस्पष्टता स्थिति को और भी बदतर बना रही है.
जून 2024 में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने एमसीडी और डीडीए को सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण करने वालों पर नियम बनाने और जुर्माना लगाने का आदेश दिया. लेकिन दोनों अधिकारियों ने स्वीकार किया कि उनके पास ऐसा करने के लिए तंत्र का अभाव है. न्यायालय ने उल्लंघन करने वालों को दंडित करने और जनता के लाभ के लिए शुल्क वसूलने के लिए एक ढांचे की मांग की थी.
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद 2018 में गठित 15 सदस्यीय विशेष कार्यबल को, दिल्ली भर में सरकारी भूमि पर अतिक्रमणों की पहचान करने और उन्हें वापस लेने का काम सौंपा गया था. 29 मई, 2025 को अपनी नवीनतम रिपोर्ट में, इस विशेष कार्यबल ने 191.7 किलोमीटर सड़कों और फुटपाथों को अतिक्रमण मुक्त करने का जिक्र किया है, जिसमें एमसीडी (दक्षिण) द्वारा मई में 134,964 वर्ग मीटर सड़क किनारे का क्षेत्र खाली कराया गया था. हालांकि, इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि इसी महीने एमसीडी (दक्षिण) ने एक भी चालान जारी नहीं किया.
प्राधिकरण को 31 मई तक अवैध कब्जे से संबंधित लगभग 62,000 शिकायतें मिलीं, जिनमें से लगभग 2,000 अभी भी लंबित हैं. निपटाई गई शिकायतों में से 37,000 से ज्यादा पर "कोई कार्रवाई नहीं की गई" की श्रेणी में रखा गया था.
सीआर पार्क: 'चलना मुश्किल हो जाता है'
कुछ ही किलोमीटर दूर बिपिन चंद्र पाल मार्ग है, जो चितरंजन पार्क की पहचान है, जिसे स्थानीय रूप से सीआर पार्क के नाम से जाना जाता है.
देश विभाजन के बाद, तत्कालीन बंगाल क्षेत्र के बुद्धिजीवियों और नौकरशाहों ने खुद को पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के बीच बंटा हुआ पाया. कई लोग भारत चले आए और राजधानी में रहने की तलाश शुरू कर दी. 1954 में, एक समूह ने पूर्वी पाकिस्तान विस्थापित व्यक्ति (ईपीडीपी) संघ का गठन किया और सरकार से जमीन के लिए पैरवी की. 1960 के दशक तक उन्हें दिल्ली के सुदूर, वनाच्छादित दक्षिणी इलाके में जमीन आवंटित कर दी गई. लगभग 2,000 लोगों को राजधानी में निवास और रोजगार के प्रमाण के आधार पर प्लॉट दिए गए, जिससे ब्लॉक ए से के की नींव पड़ी. बाद में कॉलोनी का विस्तार आठ और ब्लॉकों के साथ हुआ, जिसमें लगभग 700 अतिरिक्त परिवार रहने लगे.
लेकिन सीआर पार्क की स्थिति ग्रेटर कैलाश से बहुत अलग नहीं है.
सीआर पार्क मार्केट नंबर 1 से सीआर पार्क मार्केट नंबर 2 तक जाने वाले रास्ते पर फुटपाथ तो हैं, लेकिन आस-पास के घरों के मुख्य द्वारों के हिसाब से उनकी ऊंचाई बदलती रहती है. यह भारतीय सड़क कांग्रेस के दिशा-निर्देशों से कोसों दूर है, जिसमें कहा गया है कि पैदल चलने वालों की बेरोकटोक आवाजाही के लिए फुटपाथ ज़मीन से एक समान ऊंचाई पर होने चाहिए.
दोनों बाजारों को जोड़ने वाली सड़क के पास कई ब्लॉक हैं. न्यूज़लॉन्ड्री ने उनमें से दो ब्लॉक - बी और सी का दौरा किया. इन ब्लॉकों में फुटपाथों पर कारें खड़ी थीं, यानी सीआर पार्क भी इस व्यापक चलन से अछूता नहीं रहा.
बी ब्लॉक रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के मानद सदस्य बी बोस कहते हैं, "खासकर मेरे जैसे वरिष्ठ नागरिकों के लिए बिना फुटपाथ वाली सड़कों पर चलना मुश्किल हो जाता है. हमने कई बार अधिकारियों से शिकायत की है, लेकिन शायद ही कोई कार्रवाई होती है. हर घर में एक से ज्यादा कारें होती हैं, और अंत में वो फुटपाथ के लिए आवंटित ज़मीन पर ही पार्किंग करते हैं."
डीडीए के पूर्व निदेशक और ईपीडीपी के सचिव अशोक भट्टाचार्जी कहते हैं, “बिपिन चंद्र पाल मार्ग पर फुटपाथ तो हैं लेकिन दुर्भाग्य से उन पर या तो कारों या विक्रेताओं ने अतिक्रमण कर लिया है. कॉलोनी के अंदर फुटपाथ हैं ही नहीं. जब कॉलोनी के अंदरूनी हिस्से से भी ज्यादा व्यस्त सड़कों पर फुटपाथ बनाना इतना मुश्किल है, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि कॉलोनी के अंदर उचित फुटपाथ बनाना कितना मुश्किल होगा."
भट्टाचार्य कहते हैं कि एसोसिएशन ने इस मामले को बार-बार एमसीडी, ट्रैफिक पुलिस और स्थानीय पुलिस के सामने उठाया है. "हम पैदल चलने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक ठोस प्रयास का इंतजार कर रहे हैं."
पीडब्ल्यूडी के पूर्व अधिकारी दिनेश कुमार का दावा है कि पुलिस के पास सुरक्षा गार्ड बूथ जैसी चीजों को जब्त करने, या नष्ट करने, या ट्रैफिक पुलिस के जरिए कारों का चालान करने का अधिकार है. लेकिन इन्हें लागू करने में लचरता रही है.
इस पर बुनियादी ढांचों के विशेषज्ञ हितेश वैद्य का कहना है, "भारतीय सड़क कांग्रेस द्वारा निर्धारित स्पष्ट मानकों के बावजूद दिल्ली में, खासकर नियोजित कॉलोनियों में, नियमों का पालन ठीक से नहीं हो रहा है. इस अनियमितता के लिए एजेंसियों के बीच आपस में समन्वय की कमी, राजनीतिक दबाव और अपर्याप्त संस्थागत जवाबदेही को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है."
सीआर पार्क (जो जीके-2 को भी कवर करता है) के पार्षद आशु ठाकुर ने इस विषय पर हमारे प्रश्न के उत्तर में कहा, "फुटपाथों से अतिक्रमण हटाने के लिए अभियान चलाने की योजना है."
न्यूज़लॉन्ड्री ने टिप्पणी के लिए एमसीडी, डीडीए और डीसीपी ट्रैफिक (दक्षिण) कुशल पाल सिंह से संपर्क किया. उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया मिलने पर इस खबर में जोड़ दिया जाएगा.
मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
छोटी टीमें भी बड़े काम कर सकती हैं. बस एक सब्सक्रिप्शन की ज़रूरत है. अभी सब्सक्राइब करें और न्यूज़लॉन्ड्री के काम को आगे बढ़ाएं.
Also Read
-
The same 2 witnesses in 165 FIRs: How a young lawyer exposed Indore Police’s ‘stock witness’ malaise
-
‘Cops didn’t do their job, FIR named me’: Hanuman devotee who defended Muslim shopkeeper vs Bajrang Dal
-
Watch: The Great Nicobar Project: Millions of trees, and tribes at risk
-
How close is the US to massive civil conflict? ICE may hold the answer
-
आयुर्वेद: करामाती नुस्ख़े या कारगर इलाज?