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डिजिटल ब्लॉकिंग आदेशों पर मांगी जानकारी, सरकार ने आरटीआई में राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया
भारत में रॉयटर्स के सोशल मीडिया हैंडल्स को ब्लॉक करने के विवाद ने एक बार फिर देश में पत्रकारों और सोशल मीडिया अकाउंट्स पर की जा रही गुप्त ऑनलाइन सेंसरशिप को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
इस हफ्ते एक्स (पूर्व में ट्विटर) ने दावा किया कि उसे सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के आदेश पर रॉयटर्स और 2,300 से अधिक अकाउंट्स को ब्लॉक करना पड़ा. हालांकि, सरकार ने इस दावे से इनकार कर दिया. यह घटना ऑपरेशन सिंदूर के बाद आई है, जब एक्स ने बताया था कि सरकार ने 8,000 से ज़्यादा अकाउंट्स को हटाने के निर्देश दिए थे.
ब्लॉक किए गए अकाउंट्स में The Kashmiriyat, Free Press Kashmir, Maktoob Media, BBC Urdu जैसे कई स्वतंत्र पोर्टल्स और पत्रकार शामिल थे.
अब सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई जानकारी से यह सामने आया है कि सरकार इन ब्लॉकिंग आदेशों का विवरण साझा करने से इनकार कर रही है. कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव के वेंकटेश नायक द्वारा दायर आरटीआई को मंत्रालय ने "राष्ट्रीय सुरक्षा" का हवाला देकर खारिज कर दिया.
नायक का कहना है कि आईटी मंत्रालय ने आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(a) का हवाला तो दिया, लेकिन यह नहीं बताया कि इसके सात प्रावधानों में से किस आधार पर जानकारी रोकी गई. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को मामला स्थानांतरित किए जाने के बाद भी जवाबों में टाल-मटोल ही देखने को मिली.
वेंकटेश नायक ने इसे "मनमानी और पारदर्शिता की हत्या" बताते हुए कहा कि सरकार न केवल जरूरी सूचनाओं तक लोगों की पहुंच रोक रही है, बल्कि उनके जानने के अधिकार का भी दोहरा उल्लंघन कर रही है.
मई में, द वायर को भी कुछ समय के लिए ब्लॉक कर दिया गया था. समाचार पोर्टल ने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को पत्र लिखने के बाद उन्हें पता लगा कि राफेल जेट पर सीएनएन की एक रिपोर्ट का उल्लेख करने के कारण ब्लॉक किया गया. द वायर द्वारा लेख हटाने के बाद, यह ब्लॉक हटा लिया गया था.
इससे पहले 2021 के किसान आंदोलन के दौरान भी एक्स ने सरकार के कहने पर 250 से अधिक पत्रकारों और कार्यकर्ताओं के अकाउंट हटाए थे. इसी तरह कोविड संकट के समय सरकार की आलोचना करने वाले कई ट्वीट्स को भी हटाया गया.
2022 में एक्स ने कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सरकार पर आरोप लगाया कि वह उचित कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार कर एक अवैध ब्लॉकिंग सिस्टम चला रही है.
डिजिटल अधिकारों के लिए काम करने वाले सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर (एसएफएलसी) ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा, “सेंसरशिप से गलत सूचना नहीं रुकती, बल्कि लोगों की विश्वसनीय जानकारी तक पहुंच बाधित होती है.”
एसएफएलसी और कई नागरिक समूहों ने सरकार से मांग की है कि सभी ब्लॉकिंग आदेश सार्वजनिक किए जाएं और संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया जाए.
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