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दस साल में नहीं बन पाया इस केंद्रीय विश्विद्यालय का स्थायी परिसर, केंद्र से जारी नहीं हुई राशि
अगस्त 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘प्रधानमंत्री का बिहार पैकेज’ की घोषणा की थी. जिसमें भागलपुर में केंद्रीय विश्वविद्यालय का निर्माण कराना भी शामिल था.
तकरीबन दस साल बाद न्यूज़लॉन्ड्री को सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) के तहत मिली जानकारी के मुताबिक, इस विश्वविद्यालय का ‘ड्राफ्ट डीपीआर’ बनाकर मंत्रालय को भेजा गया है लेकिन इस पर अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ है.
एक तरफ जहां भागलपुर को केंद्रीय विश्वविद्यालय नहीं मिला तो वहीं बिहार के मोतिहारी स्थित महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय (एमजीसीयू) के पास 9 साल बाद भी कोई स्थायी परिसर नहीं है. दरअसल, यहां साल 2016 से पढ़ाई शुरू हो गई थी.
आरटीआई में पूछे गए सवाल के जवाब में शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग ने बताया कि एमजीसीयू में स्थायी परिसर के लिए कोई धनराशि जारी नहीं की गई है.
इसी आरटीआई में स्थायी परिसर के लिए गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय को 298 करोड़, आंध्र प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय को 290 करोड़ और सिक्किम विश्वविद्यालय को 235 करोड़ रुपये मंत्रालय द्वारा दिए जाने का जिक्र है.
वहीं, करीब दस साल बीत जाने के बाद भी एमजीसीयू के पास अपना स्थायी कैंपस नहीं है. छात्रों को अलग-अलग किराये की बिल्डिंग में पढ़ने को मजबूर होना पड़ रहा है.
विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर 2015-16 से 2019-20 तक के वार्षिक रिपोर्ट उपलब्ध हैं. साल 2015-16 की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘‘विश्वविद्यालय के स्थायी परिसर के लिए 301.75 एकड़ भूमि के हस्तांतरण का मामला, राज्य सरकार द्वारा बारिया ग्राम के पास मोतिहारी इंजीनियरिंग कॉलेज के पास प्रदान किया जाना था, जिसे साइट चयन समिति द्वारा पहचान और विधिवत अनुमोदित किया गया था. केंद्र सरकार द्वारा प्रक्रिया में है.’’
साल 2016-17 में स्थायी परिसर को लेकर जानकारी दी गई, ‘‘राज्य सरकार ने मोतिहारी शहर से सटे बनकट-बैरिया गांव के पास लगभग 302 एकड़ भूमि की पहचान कर ली है. जिसमें से लगभग 136 एकड़ भूमि को बिहार सरकार जल्द ही अधिसूचित करने जा रही है.’’
इसी रिपोर्ट में बताया गया कि स्थाई परिसर नहीं होने के कारण प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्य किराये पर लिए गए भवन में चल रहे हैं.
कैम्प कार्यालय- कैम्प कार्यालय, जो वर्तमान में विश्वविद्यालय के मुख्यालय के रूप में कार्य करता है, रघुनाथपुर, ओपी थाना के पास, मोतिहारी, जिला-पूर्वी चंपारण में विश्वविद्यालय द्वारा किराए पर ली गई इमारत में स्थित है. कुलपति, रजिस्ट्रार और वित्त अधिकारी के कार्यालय कैम्प कार्यालय में स्थित हैं.
अस्थायी परिसर (टेम्प कैंप): विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियां बिहार सरकार द्वारा मोतिहारी के जिला स्कूल परिसर में किराए के आधार पर उपलब्ध कराए गए भवन से संचालित की जा रही हैं, जिसे ‘अस्थायी परिसर (टेम्प कैंप)’ नाम दिया गया है.
अस्थायी महिला छात्रावास: विश्वविद्यालय ने मोतिहारी के हवाई अड्डा चौक के पास छोटा बरियारपुर में विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के लिए एक भवन किराए पर लिया है. इसमें एक समय में 50 छात्राएं रह सकती हैं. छात्रावास से अस्थायी परिसर जाने के लिए गाड़ी का इंतज़ाम है, जिसके लिए छात्राओं को प्रति महीने 500/- रुपये देने होते हैं.
वहीं, छात्रों के छात्रावास के संबंध में विश्वविद्यालय उपयुक्त भवन की तलाश में है और जैसे ही विश्वविद्यालय को उपयुक्त आवास मिल जाएगा, यह सुविधा उपलब्ध करा दी जाएगी.
आज तक यही स्थिति है. परिसर किराये के भवन में ही चल रहा. आगे चलकर किराये पर चल रहे इन भवनों का नामकरण कर दिया गया. वहीं छात्रों के लिए अभी तक छात्रावास का कोई इंतज़ाम नहीं हो पाया है.
हालांकि, स्थायी परिसर के लिए भूमि उपलब्ध कराने को लेकर मामला वहीं पर अटका पड़ा है. बीते कई सालों की रिपोर्ट में एक ही जिक्र है कि सरकार जल्द ही इसके लिए भूमि को अधिसूचित करने वाली है.
वहीं, साल 2019-20 के बाद से तो जमीन अधिग्रहण को लेकर कोई जानकारी वेबसाइट पर नहीं दी जा रही है. अगस्त 2024 में यहां के कुलपति संजय कुमार श्रीवास्तव ने एक कार्यक्रम में बताया कि स्थायी परिसर के निर्माण के लिए 303 एकड़ जमीन की ज़रूरत थी जिसमें से 262 एकड़ उपलब्ध करा दी गई. भवन निर्माण के लिए डीपीआर निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं. अगले ढाई वर्ष में संस्थान के पास अपना स्थायी परिसर होगा.
न्यूज़लॉन्ड्री ने जब इसके बारे में जानकारी निकाली तो सामने आया कि अभी तक डीपीआर तो दूर जमीन का ठीक तरह से अधिग्रहण तक नहीं हुआ है.
भूमि अधिग्रहण में क्यों हुई देरी?
एमजीसीयू के डिप्टी रजिस्ट्रार सच्चिदानंद सिंह भूमि अधिग्रहण में हुई देरी की वजह प्रशासनिक प्रक्रिया बताते हैं. न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए वो कहते हैं, ‘‘प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण हमें भूमि नहीं मिली है. अगर अभी के समय की बात करें तो 90 प्रतिशत भूमि मिल गई है. अभी तक डीपीआर तैयार नहीं हुआ प्रक्रिया चल रही है. डीपीआर बनाने के लिए एजेंसी हायर कर ली गई.’’
दस साल में स्थायी परिसर नहीं बन पाया? इसपर सिंह कहते हैं, ‘‘हमें तो जमीन बीते साल ही मिली है. उसके बाद लोकसभा चुनाव आ गया. इस कारण ही देरी हुई है.’’
छात्रों की पढ़ाई पर असर?
संस्थान के पास स्थायी कैंपस नहीं होने की वजह से छात्रों की पढ़ाई पर असर पड़ता है. यहां बीटेक (कंप्यूटर साइंस) की पढ़ाई होती है. इसकी शुरुआत 2017 में हुई. उसके बाद 2019 में कंप्यूटर साइंस एडमिशन शुरू हुए. वहीं, 2019 में ही यहां एमटेक का कोर्स शुरू हुआ. चाणक्य नाम की बिल्डिंग में बीटेक के छात्रों की पढाई होती है.
2019-23 के बीच कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई करने वाले एक छात्र बताते हैं, ‘‘पढ़ने के लिए कमरा नहीं होने के चलते हमें परेशानियों का सामना करना पड़ता था. जब मेरा एडमिशन हुआ था तो दो बीटेक के और एक एमटेक का बैच मौजूद था. तीनों बैच में 80 के करीब छात्र थे. हमें एक कमरा मिला था जिसमें हम दोपहर बाद क्लास करते थे. उससे पहले वहां अन्य क्लास लगती थी. फिर कोरोना आ गया तो ऑनलाइन पढ़ाई होने लगी. कोरोना खत्म हुआ तो कई और कोर्स शुरू हुए, जिसका असर यह हुआ कि हमें सुबह के 7 बजे क्लास लेने के लिए बुलाया जाने लगा. हमें कहा जाता था कि सुबह 9 बजे से पहले क्लास कर लो क्योंकि उसके बाद दूसरे क्लास के छात्रों की पढ़ाई होगी.’’
ये छात्र आगे बताते हैं, ‘‘तब तक चार बैच हो गए थे. जिसके बाद दो कमरे में चार बैच की पढ़ाई होने लगी थी. कुछ क्लास कम्प्यूटर लैब में हो जाती थी. कोरोना के बाद भी कुछ विषयों की पढ़ाई ऑनलाइन ही होती थी. क्लास खत्म करने के बाद हमें मज़बूरन बाहर रहना पड़ता था. अभी भी यही स्थिति है. सिर्फ कमरे की बात नहीं है, लैब भी कोई खास बेहतर नहीं है. जिससे कि इंजीनियरिंग का छात्र कुछ सीख सके.’’
दूसरे छात्र भी ऐसी ही परेशानी बताते हैं. यहां मास कम्युनिकेशन के लिए ग्रेजुएशन और मास्टर की पढ़ाई 2019 से शुरू हुई. जिसकी पढ़ाई दीनदयाल उपाध्याय कैंपस में होती है. यहां से पढ़ाई करने वाले एक छात्र जो अभी एक राष्ट्रीय दैनिक अख़बार में काम करते हैं. वो बताते हैं, ‘‘कैंपस नहीं होने के कारण कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि हम किसी सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे हैं. स्कूल जैसा महसूस होता था. मीडिया के छात्रों को थ्योरी से ज़्यादा प्रैक्टिकल की ज़रूरत पड़ती है लेकिन यहां उसकी भी कोई सुविधा नहीं थी.”
यहां छात्रों के अलावा प्रोफसर्स के लिए भी केबिन तक उपलब्ध नहीं हैं.
देश की 20 यूनिवर्सिटीज़ में शामिल हुआ एमजीसीयू
एक तरफ एमजीसीयू के पास अपना स्थायी कैंपस नहीं है. छात्रों के लिए हॉस्टल नहीं हैं. कम्प्यूटर लैब की कोई बेहतर सुविधा नहीं है. वहीं दूसरी तरफ यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, यह देश के 50 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के बीच इंडियन इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (आईआईआरएफ) 2024 की लिस्ट में 20वें स्थान पर है. यह रैंकिंग एक प्राइवेट संस्थान द्वारा दी जाती है.
भारत सरकार हर साल नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क जारी करती है. 2024 की ही इस लिस्ट में एमजीसीयू का नाम टॉप 100 में भी शामिल नाम नहीं है.
आईआईआरएफ की रैंकिंग को लेकर एमजीसीयू के प्रोफेसर ही सवाल उठा रहे हैं. एक प्रोफेसर ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि पैसे देकर संस्थान ने ये सर्टिफिकेट ख़रीदा है. हालांकि, आईआईआरएफ से जुड़े शिव शंकर शर्मा इससे इनकार करते हैं. वो कहते हैं, ‘‘हम किसी से पैसे नहीं लेते हैं. हालांकि, सर्टिफिकेट के लिए संस्थानों को मात्र छह हज़ार रुपये देने पड़ते हैं. लेकिन सर्वे में ही हमारा लाखों का खर्च हो जाता है. जिसके सामने छह हजार रुपये कुछ भी नहीं हैं.’’
इस रैंकिंग में प्लेसमेंट परफॉरमेंस में एमजीसीयू की काफी तारीफ की गई है. लेकिन यहां पढ़े छात्रों का कहना है कि कैंपस प्लेसमेंट के नाम पर कुछ नहीं होता. मास कॉम की पढ़ाई कर पटना में नौकरी कर रहे एक पूर्व छात्र बताते हैं, ‘‘एक-दो प्रोफेसर हैं, जिनकी मीडिया में अच्छी जान-पहचान है. वो अपनी तरफ से संपादक को फोन कर देते हैं. वहीं, बाकी लोग अपनी पहचान से ही आगे बढ़ते हैं. मेरी जानकारी में तो कभी किसी को कैंपस प्लेसमेंट नहीं मिली.’’
वहीं, बीटेक किए एक छात्र भी ऐसा ही कहते हैं. वो बताते हैं, ‘‘कहने को तो यहां प्लेसमेंट सेल है लेकिन वो सक्रिय नहीं है. यहां से पढ़कर लोग खुद ही नौकरी ढूढ़ते हैं या आगे की पढ़ाई करते हैं. प्लेसमेंट कैंपस करवाता है, यह कहना मज़ाक होगा.’’
प्लेसमेंट के सवाल पर सच्चिदानंद सिंह कहते हैं, ‘‘हमारे लिए प्लासमेंट का मतलब यह है कि हमारे यहां से पढ़ा छात्र आगे जाकर नौकरी कर रहा है.’’
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