हवा का हक़
साफ हवा के नाम पर मिल रहा करोड़ों का फंड, पर नतीजे अब भी धुंधले
आप अगर कभी सर्दियों के दौरान उत्तर भारत में रहे हैं और जाड़े के दिनों में सांस लेने में कठिनाई और प्रदूषण से पैदा होने वाली जद्दोजहद से गुजरे होंगे तो मुमकिन है कि आपने एनसीएपी यानी राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के बारे सुना होगा.
इस कार्यक्रम की शुरूआत पर्यावरण मंत्रालय की ओर से की गई थी. इस कार्यक्रम के तहत 131 शहरों में साफ-सुथरी और स्वच्छ हवा का लक्ष्य रखा गया है, इस लक्ष्य के तहत हवा में मौजूद छोटे-छोटे कणों को साफ करना है.
लक्ष्य हासिल करने के तहत हवा में प्रदूषक तत्वों की 40 फीसदी की कटौती हासिल करने की समय सीमा 2025-26 है.
82 शहरों को इसके लिए सीधे एनसीएपी के तहत फंड मिलता है. बाकी के 42 शहरों और सात 'शहरी समूहों' को 15वें वित्त आयोग के तहत फंड मिलता है. 2019 से मई, 2024 तक सभी 131 शहरों को दोनों स्रोतों के जरिए से कुल 10,566 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं.
न्यूज़लॉन्ड्री को पता चला है कि एनसीएपी की ओर से फंड किए गए 82 शहरों ने पिछले पांच बरस में जारी 1,615.47 करोड़ रुपये में से 1,092 करोड़ रुपये का इस्तेमाल किया है यानी कुल आवंटित फंड का लगभग 66 फीसदी हिस्सा इस्तेमाल हो पाया.
दिल्ली-एनसीआर में पिछले महीने एक्यूआई 481 तक पहुंच गया था, लेकिन इसके बावजूद 40 फीसदी से कम फंड का इस्तेमाल हुआ.
131 में से केवल 55 शहर हवा में अपने पीएम 10 सांद्रता को कम से कम 20 फीसदी तक कम करने में कामयाब रहे. वहीं दिल्ली में सिर्फ 14 फीसदी की कमी दर्ज की गई.
फंड का कम इस्तेमाल और गलत आवंटन!
अक्टूबर में, एनसीएपी कार्यान्वयन समिति ने ऑनलाइन बैठक की. बैठक के ब्यौरे के अनुसार, 68 शहरों ने आवंटित फंड का 75 फीसदी इस्तेमाल ही नहीं किया.
मसलन, नोएडा ने 30.89 करोड़ रुपये के कुल आवंटन का 11 फीसदी इस्तेमाल किया. विशाखापत्तनम में 14 फीसदी और अनंतपुर में 20 फीसदी इस्तेमाल हुआ. मेट्रो शहरों में, बेंगलुरु का इस्तेमाल सबसे कम 30 फीसदी था, इसके बाद दिल्ली (31 फीसदी) और पुणे (46 फीसदी) का स्थान था.
बात जब राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा फंड के इस्तेमाल की हो तो दिल्ली उस कतार में सबसे पीछे खड़ा दिखता है. गुजरात यहां सबसे आगे है, उसने अपने फंड का 100 फीसदी इस्तेमाल किया है. इसके बाद ओडिशा ने 93.55 फीसदी और छत्तीसगढ़ ने 92.8 फीसदी उपयोग किया. कतार में 40 फीसदी के आंकड़े के साथ जम्मू-कश्मीर और दिल्ली एक साथ खड़े हैं और और मेघालय भी 44 फीसदी के साथ वहीं स्थान बनाए हुए है.
सितंबर में एनसीएपी की एपेक्स कमेटी की बैठक की डिटेल्स के अनुसार, कुल फंड का 67 प्रतिशत धूल नियंत्रण के उपायों पर खर्च किया गया, जैसे सड़कों की मरम्मत, पक्के फुटपाथ बनाना, ट्रैफिक जंक्शनों में सुधार करना, पानी का छिड़काव करना और सड़कों की मशीनों से सफाई करना.
अन्य प्रदूषकों के लिए फंड का बंटवारा कुछ ऐसा रहा: 14 प्रतिशत वाहन प्रदूषण पर, 11 प्रतिशत ठोस कचरा प्रबंधन और बायोमास जलाने पर, चार प्रतिशत क्षमता निर्माण और निगरानी पर, दो प्रतिशत कंस्ट्रक्शन और ध्वस्त इमारतों से जुड़े कचरे पर, जबकि एक प्रतिशत औद्योगिक प्रदूषण, सार्वजनिक जागरूकता और घरेलू ईंधन पर खर्च किया गया.
लेकिन धूल पर काबू पाने को लेकर इतना जोर क्यों दिया जा रहा है?
पर्यावरण मंत्रालय ने अगस्त में कहा कि इसका कारण यह है कि “अध्ययनों से पता चलता है कि सड़क, निर्माण और ध्वस्तीकरण गतिविधियों से उठने वाली धूल शहरों में पीएम 10 स्तर को सबसे अधिक प्रभावित करती है.”
मंत्रालय ने कहा, इसलिए, शहरों ने “प्रदूषण के स्रोतों के आधार पर अपनी प्राथमिकताएं तय की हैं.”
हालांकि, इसे इस तरह देखना चाहिए कि एनसीएपी का फंड प्रदर्शन के आधार पर मिलता है और प्रदर्शन का आकलन पीएम10 स्तरों में सुधार के आधार पर किया जाता है. इस साल की शुरुआत में, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक रिपोर्ट ने इस बात पर ध्यान खींचा कि फंड मुहैया कराने की यह नीति PM 2.5 प्रदूषण से ध्यान भटका देती है. इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट के तहत इस नतीजे को और अधिक घातक बताया है.
एनसीएपी कार्यान्वयन समिति की बैठक में इस मुद्दे पर भी चर्चा हुई कि अन्य जरूरी घटकों पर कम खर्च किया जा रहा है. बैठक के ब्योरे के अनुसार, मीटिंग में शामिल हुए लोगों ने 21 ऐसे अप्रासंगिक गतिविधियों पर सवाल उठाए जिन पर फंड खर्च किया गया जबकि उनका वायु गुणवत्ता सुधार से कोई सीधा ताल्लुक नहीं था. इस खर्च में स्ट्रीटलाइट लगाना, सौंदर्यीकरण के प्रोटोकॉल अपनाना, डंपिंग साइट पर सीसीटीवी कैमरे लगाना, कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर खरीदना और कंस्ट्रक्शन और ध्वस्तीकरण कचरा संयंत्रों में बिजली के बिल चुकाना शामिल हैं.
एक और दिलचस्प बात यह है कि जहां एनसीएपी किसी शहर के प्रदर्शन का आकलन PM10 स्तरों के आधार पर करता है, वहीं वह स्वच्छ वायु सर्वेक्षण नाम के कार्यक्रम के तहत शहरों को उन नीतियों के आधार पर रैंक करता है जो वायु प्रदूषण कम करने के लिए लागू की गई हैं.
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट में पाया गया कि इन दोनों रैंकिंग्स के बीच अक्सर तालमेल नहीं होता. उदाहरण के लिए, कोई शहर जो स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में अच्छी रैंकिंग पाता है, वह PM10 स्तरों में सुधार न करने की वजह से खराब प्रदर्शन करने की लिस्ट में शामिल हो सकता है.
इस अध्ययन की लेखिका अनुमिता रॉय चौधरी ने न्यूजलॉन्ड्री को बताया कि इस मुद्दे को हल करना बेहद जरूरी है. उन्होंने कहा, “दिल्ली के मामले में देखा जाए तो PM10 स्तरों में कमी के लिहाज से उसकी रैंकिंग खराब है. लेकिन स्वच्छ वायु सर्वेक्षण के तहत उसकी रैंकिंग टॉप 9 में है. इस तरह कार्रवाई और PM10 में कमी के बीच एक बड़ा अंतर है. इस अंतर को खत्म करना जरूरी है.”
लक्ष्य पूरे हुए? बिलकुल नहीं
एक सवाल है जिसका जवाब देश असल में जानना चाहता है. जब पीएम10 पर इतना फोकस किया जा रहा है, तो क्या इस प्रदूषण को कम करने के लिए खर्च किया गया पैसा अपना मकसद पूरा कर रहा है?
चलिए दिल्ली से समझने की शुरुआत करते हैं, इस शहर को एनसीएपी के तहत पांच साल में 42.69 करोड़ रुपये मिले, लेकिन उसने केवल 32 फीसदी फंड का इस्तेमाल किया. यह रकम मुख्य रूप से 14 मैकेनिकल रोड स्वीपर्स, 28 वाटर स्प्रिंकलर्स, स्मॉग गन्स और दो पॉटहोल रिपेयर मशीनों की खरीद पर खर्च की गई. इनमें से स्वीपर्स और रिपेयर मशीनों की खरीद अभी भी "प्रगति पर" है.
लेकिन दिल्ली में PM10 प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत इंडस्ट्री में हो रहे कामकाज हैं, जिसमें कोयला और राख का उड़ना अहम कारक है, जो गर्मियों में 37 प्रतिशत और सर्दियों में 12 प्रतिशत प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है. बायोमास और कचरा जलाने से 25.43 प्रतिशत और सड़क की धूल या कंस्ट्रक्शन की मिट्टी से 30 प्रतिशत प्रदूषण होता है. वहीं, सर्दियों में वाहनों का योगदान 19 प्रतिशत तक पहुंच जाता है. (यह ध्यान देने योग्य है कि एनसीएपी फंड पूरे साल के लिए होता है और हर शहर प्रदूषण के मौसमी आंकड़े उपलब्ध नहीं कराता.)
इसके बावजूद दिल्ली ने सर्दी और गर्मी, दोनों ही मौसमों में इंडस्ट्रियल प्रदूषण को कम करने के लिए फंड का कोई इस्तेमाल नहीं किया.
दूसरा शहर नवी मुंबई है, इस शहर को एनसीएपी के तहत पांच साल में 9.42 करोड़ रुपये आवंटित किए गए. नवी मुंबई ने अपने 92 प्रतिशत फंड को मैकेनिकल रोड स्वीपिंग, वाटर स्प्रिंकलिंग, ग्रीन बेल्ट बनाने, ई-बस खरीदने और सार्वजनिक जागरूकता जैसे कामों में खर्च किया. यह खर्च मुख्य रूप से धूल और वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर केंद्रित था.
वहीं, पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, नवी मुंबई में PM10 प्रदूषण का कारण सड़क की धूल (28 प्रतिशत), परिवहन (16 प्रतिशत), उद्योग (16 प्रतिशत), कोयला और राख (12 प्रतिशत), कचरा जलाना (15 प्रतिशत) और सेकेंडरी एरोसोल (13 प्रतिशत) हैं. नतीजतन, नवी मुंबई का PM10 प्रदूषण कम होने के बजाय और बढ़ गया. वार्षिक औसत पीएम10 सांद्रता 2017-18 में 88 थी, जो 2023-24 में बढ़कर 98 हो गई. (यह भी ध्यान दें कि दिल्ली जैसे कुछ शहर कोयला/राख को इंडस्ट्रियल प्रदूषण से अलग श्रेणी में नहीं गिनते.)
लुधियाना की बात करें, तो एनसीएपी के तहत आवंटित 97.75 करोड़ रुपये में से 90 प्रतिशत खर्च कर दिए गए. यह धनराशि मुख्य रूप से 114 किलोमीटर सड़कों पर फुटपाथ बनाने, हरित शहरी क्षेत्रों के विकास, मशीनों से सड़कों की सफाई, पानी का छिड़काव, निर्माण और ध्वस्तीकरण के कचरे को इकट्ठा करने और एंटी-स्मॉग गन्स पर खर्च की गई. हालांकि, लुधियाना में PM10 का 30 फीसदी प्रदूषण हर मौसम में औद्योगिक गतिविधियों से होता है. बावजूद इसके, लुधियाना सिर्फ चार फीसदी PM10 प्रदूषण कम करने में सफल रहा.
हिमाचल प्रदेश के बद्दी का हाल और परेशान करने वाला है. नवंबर में यहां का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) "बहुत खराब" श्रेणी में था. एनसीएपी के फंड से बद्दी ने केवल दो काम किए- पक्की सड़कों का निर्माण और एक कंटिन्यूअस एम्बियंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग सिस्टम की स्थापना. यह जानना जरूरी है कि यहां PM10 प्रदूषण का 21-22 फीसदी योगदान इंडस्ट्री से होता है.
अब ग्वालियर और भोपाल पर नजर डालें, जहां सड़क की धूल PM10 प्रदूषण का बड़ा कारण है- ग्वालियर में 88 फीसदी और भोपाल में 60 फीसदी. फिर भी इन दोनों शहरों में PM10 स्तरों को कम करने में कोई खास बढ़त नहीं हुई. ग्वालियर में PM10 सांद्रता 2017-18 में 126 थी, जो 2023-24 में बढ़कर 136 हो गई. वहीं, भोपाल में यह 112 से बढ़कर 113 हो गई.
ग्वालियर ने एनसीएपी फंड से 82 करोड़ रुपये खर्च किए और भोपाल ने 180 करोड़ रुपये. इसके बावजूद, ये दोनों शहर PM10 को कम करने के मामले में सबसे पीछे हैं. इन फंड्स का इस्तेमाल मुख्य रूप से सड़क को पक्का करने, फुटपाथ बनाने, शहर के कचरे को प्रोसेस करने वाले प्लांट बनाने, निर्माण और ध्वस्तीकरण के कचरे को निपटाने वाले प्लांट लगाने, पार्क और शहरी जंगल विकसित करने, सार्वजनिक जागरूकता कार्यक्रम और ई-वाहन चार्जिंग पॉइंट लगाने जैसे कामों पर किया गया.
मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित ख़बर को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
अनुवाद - चंदन सिंह राजपूत
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