Book Review
पुस्तक समीक्षा: सुपर इंटेलिजेंस मशीन और अल्प-चेतस मनुष्य!
नोआह हरारी की नवीनतम रचना का शीर्षक है: ‘नेक्सस: ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ इन्फ़ॉर्मेशन नेटवर्क्स फ्रॉम द स्टोन ऐज टू ऐआई’. छह साल में दुनिया कितनी बदल गई! 2018 में प्रकाशित हरारी की पूर्ववर्ती रचना ‘21 लेसंस फॉर द 21स्ट सेंचुरी’ नयी शताब्दी में प्रवेश करने से पहले मानव समाज को कुछ ख़ास क़िस्म के सबक़ प्रस्तावित करते हुए उन पर गहरे विमर्श की अपेक्षा कर रही थी. इक्कीसवीं सदी के लिए इक्कीस सबक.
ओर्वेल की रचना ‘1984’ में छायी हुई बिग ब्रदर की निगहबानी- ‘बिग ब्रदर इज़ वॉचिंग यू’ को हरारी ने बदलते हुए वक्त के संदर्भ में यह कहते हुए- ‘बिग डेटा इज़ वॉचिंग यू’ से प्रतिस्थापित कर दिया. (देखें, पृष्ठ.44, जॉनेथन केप, 2018).
लेखक ने पाया नयी सदी में ज़्यादा से ज़्यादा यह होगा कि दबदबा बदल जाएगा. यह मनुष्य के हाथ से छिनकर आंकड़ों और गणनाओं के भयावह पंजों में जा फंसेगा. यहां ‘ऐल्गोरिदम’ की हुकूमत होगी. ख़तरा इस बात का होगा कि हम आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (एआई) में अधिक निवेश करने लगेंगे और उसके सापेक्ष मानव चेतना के विकास में कम; और इस तरह यह विकसित एआई आदमी की पूर्व-मौजूद मूर्खता को और ताकतवर बनाएगी (संदर्भ पृष्ठ.70).
वहीं, हरारी की नयी रचना इसी प्रमेय का विस्तार है. सुपर इंटेलिजेंस मशीन और अल्प-चेतस मनुष्य! दोनों साथ साथ! एक ही काल, एक ही आयाम में!
‘नेक्सस’ एक नज़र में इतिहास में सूचना नेटवर्क्स की ताक़त का अध्ययन है. इस ताक़त का प्रयोग भलाई के लिए भी हुआ और भय के लिए भी. भय और भलाई की यह द्वैत और सहवर्ती उपस्थिति इन सूचना नेटवर्क्स को और अधिक पहेलीनुमा संरचनाओं में बदलती है. हरारी पाते हैं कि ‘स्टोन ऐज’ से लेकर ‘सिलिकॉन ऐज तक मनुष्य ने जितनी दिलचस्पी ‘कनेक्टिविटी’ के विस्तार में ली है, उसने उतनी रुचि विवेक के परिष्कार और सच्चाई के अवगाहन में कभी नहीं ली. (देखें, नेक्सस, पृष्ठ,17, फ़र्न प्रेस/पेंगुइन रैंडम,2024)
सूचना के इन नेटवर्क्स की मदद से वह हर क़ीमत पर असीम लाभों के लिए अपने परिवेश से ‘जुड़ना’ तो चाहता रहा किंतु यह ‘कनेक्टिविटी’ इस बात की गारंटी कभी नहीं रही कि वह हमेशा इस दृश्यमान दुनिया के किसी सच्चे और वास्तविक रूप को ही प्रतिनिधित्व देगी. प्राचीन समाजों में व्याप्त कथाएं और मिथ वस्तुतः सूचनाओं के नेटवर्क का सृजन करते थे. सत्ताएं नौकरशाही के साथ इन नेटवर्क का प्रयोग कुछ इस प्रकार से करती रहीं कि यह सोशल ऑर्डर और स्थिरता को बनाये रखें. सूचना के यह नेटवर्क्स सबके काम आये; सेनाओं के, मसीहाओं के, शासकों के, व्यापारियों के, अधिकारियों के, धर्माधिकारियों के. यहां तक कि एकांतजीवी ‘नियंडरथल’ के मुक़ाबले हमारे ‘होमो सैपियंस’ पुरखे इन सूचना नेटवर्क्स का सही इस्तेमाल कर अस्तित्व की लड़ाई में बाज़ी मार ले गए.
सूचनाओं ने समाज बदले और समाज ने सूचनाएं. सूचनाएं परिणाम-बहुल स्थितियों का निर्माण करती रही हैं. ऐतिहासिक विकास-क्रम में वह कभी धर्मों को सुधरने पर मजबूर करतीं तो कभी तानाशाहों का ध्यान खींचतीं. उनकी उपस्थिति लोकतंत्र और अधिनायकतंत्र दोनों में सर्वोपरि थी.
‘नेक्सस’ में एक पूरा अध्याय इस विमर्श पर केंद्रित है. एक सिस्टम में वह सापेक्षिक रूप से मुक्त थीं तो दूसरे में सापेक्षिक रूप से नियंत्रित. हरारी ‘नेक्सस’ के अध्याय पांच में इस पूरे विमर्श को लाते हैं कि समाज और सत्ता का पूरा का पूरा स्वरूप सूचना के प्रवाह के स्वरूप से तय होता है.
गुटनबर्ग द्वारा आविष्कृत प्रिंटिंग प्रेस ने सोलहवीं सदी में मास मीडिया के उदय की नींव डाली.1983 में बेनेडिक्ट एंडरसन अपनी क्लासिक रचना ‘इमेजिंड कम्युनिटीज़: रिफ्लेक्शंस ऑन द ऑरिजिन एंड स्प्रेड ऑफ़ नेशनलिज्म’ में यह बता चुके थे कि किस प्रकार से प्रिंट की तकनीक ने देशज भाषाओं से जुड़कर आधुनिक राष्ट्रीय चेतना के उदय की भूमिका तैयार की. 1962 में यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो प्रेस से प्रकाशित मार्शल मकलूहान की किताब ‘द गुटनबर्ग गैलेक्सी: द मेकिंग ऑफ़ टाइपोग्राफ़िक मैन’ में इस बात को रेखांकित किया जा चुका था कि मानव इतिहास के अलग काल-खंडों में हुए मीडियाई बदलाव दरअसल उसकी चेतना के पुनर्लेखन की तरह थे. ‘नेक्सस’ में अमेरिकी समाज और स्टैलिन-क़ालीन रूसी समाज की पड़ताल करते हुए हरारी पाते हैं कि मास मीडिया ने मास डेमोक्रेसी और मास तानाशाही दोनों प्रवृत्तियों की दिशा में जाने वाले रास्ते खोले. जिन समाजों के पास स्वयं को दुरुस्त कर सकने की संवैधानिक प्रणालियां मौजूद थीं वो इस रास्ते में पड़ने वाले भंवर पार करते रहे और जो यह नहीं कर सके, वो इसी सूचना समाज में ‘टोटल कंट्रोल’ की अपनी नियति के परे नहीं जा पाए.
बीसवीं सदी की राजनीति को लोकतंत्र और तानाशाही की बाइनरी से समझा जाता रहा किंतु इक्कीसवीं सदी में यह विभाजन इतना सरल नहीं रहेगा. इस बार यह अंतर मुख्यतया ह्यूमन और नॉन-ह्यूमन एजेंट्स के बीच होगा. यह समय इन दोनों के बीच एक ‘सिलिकॉन कर्टेन’ के आ जाने का है. आपके जीवन-नियंता साधारण नौकरशाह और एग्जीक्यूटिव नहीं बल्कि नए क़िस्म के ‘एल्गोरिदमिक ओवरलॉर्ड’ होंगे. यहां से हरारी की रचना ‘ह्यूमन नेटवर्क्स’ के समय को अतीत मानकर दूसरे हिस्से ‘ इनॉर्गेनिक नेटवर्क्स’ के समय में प्रवेश करती है.
दोनों नेटवर्क्स के बीच अंतर करते हुए हरारी पाते हैं कि प्रिंटिंग प्रेस और रेडियो की दुनिया एआई की तुलना में बहुत सीमित ख़तरों वाली दुनिया थी. रेडियो का इस्तेमाल किसी भी क़िस्म की स्पीच देने में ज़रूर किया जा सकता था लेकिन किसी भी क़िस्म की स्पीच को तैयार करना रेडियो की क्षमता से बाहर था. वह एक ‘पैसिव टूल’ था. वह स्वयं कुछ उत्पादित नहीं कर सकता था लेकिन इस सदी में एआई आधारित मीडिया टूल न केवल कंटेंट प्रचारित कर सकते हैं बल्कि स्वयं की निर्णय-क्षमताएं बनाकर उसे अपने उद्देश्यों के लिए निर्मित कर सकते हैं.
दोनों सदी के नेटवर्क्स के बीच यह बड़ा फ़र्क़ है और यह फ़र्क़ एक नयी क़िस्म की ‘कंप्यूटर पॉलिटिक्स’ को जन्म दे चुका है. ये टूल्स अख़बार, टीवी, रेडियो की तरह ‘इग्नोर’ नहीं किए जा सकते. ये ‘रेलेंटलेस’ हैं, सर्वत्र साथ हैं. इन्होंने पहली बार सर्विलांस को इतना सरल बना दिया है कि ख़ुद नागरिक इस काम में जासूसों का हाथ बंटा रहा है. ख़ुद नागरिक अपने जीवन के सारे रूप इन टूल्स के माध्यम से उजागर कर रहा है.
जीवन के हर हिस्से में किसी न किसी तरह का कंप्यूटर घुसा बैठा है और यह जीवन के किसी एक ख़ास पल पर ही अपनी निगाहें नहीं गढ़ाए हुए है, बल्कि ज़िंदगी के पूरे पैटर्न को चुपचाप पढ़ रहा है. इन सोशल नेटवर्क्स ने काम से ‘ब्रेक’ को असंभव बना दिया है. अवकाश पर होते हुए अवकाश को अलभ्य कर दिया है.
हरारी की किताब के कुछ आख़िरी चैप्टर्स कई क़िस्म की चेतावनी के संग्रह हैं. पूर्ववर्ती कृति ‘सैपियंस’ की तरह हरारी की यह किताब बांध कर रखती है. लगभग हर अध्याय में तथ्यों का संयोजन इस प्रकार से हुआ है कि पाठक अतीत और वर्तमान के बीच निरंतर यात्रारत रहता है. इस किताब में ‘एक्टिंक्श ऑफ स्मार्टेस्ट’ पढ़ते हुए पिछली सदी के एक उत्तर-आधुनिक चिंतक मार्शल मैकलूहान की यह टिप्पणी बरबस याद आ जाती है-
“Nothing will hold on the speed of light”. मतलब प्रकाश की गति से भागती सूचनाओं के आगे हर क़िस्म के परंपरागत ढांचे ढह जाएंगे. यदि इस शताब्दी का मनुष्य समय रहते ‘सेल्फ-करेक्टिंग मैकेनिज्म’ खोजने से चुका तो यह एआई चालित दुनिया किसी अंत की तरफ़ चली जा रही होगी. एक ऐसी अंत-यात्रा की ओर जिसकी कल्पना टी. एस इलियट की ‘फोर क्वॉर्टेट्स' में दिख पड़ती है-
“और हम सब चलें उस ख़ामोश जनाज़े में, जो जनाज़ा किसी का नहीं, क्योंकि कोई है नहीं दफ्नाने को.”
“And we all go with them, into the silent funeral, nobody’s funeral, for there is no one to bury.” (L. 110.11, East Coker, Four Quartets, 1940)
(ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)
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