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कॉप-28 में जीवाश्म ईंधन पर हुई बहस, भारत में कोयलों के बीच पनपने वाली जिंदगियों की कहानी
संयुक्त अरब अमीरात में 12 दिसंबर को खत्म हुए 28वें कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज या सीओपी-28 में अंतिम बयान पर 197 देशों और यूरोपीय संघ के बीच लगभग सहमति बनते-बनते रह गई.
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की ओर से आयोजित यह पहला साल था जब शिखर सम्मेलन में 2015 के पेरिस समझौते में तय लक्ष्यों को हासिल करने में देशों ने कितनी प्रगति की है उसके आंकड़ों को तैयार करने की योजना बनाई गई.
13 दिसंबर को जब सीओपी-28 के अध्यक्ष सुल्तान अल जाबेर ने पांच मिनट के भीतर ग्लोबल स्टॉकटेक टेक्स्ट पास किया, तो लोगों से भरे हुए रूम के साथ-साथ वर्चुअल रूप से भाग लेने वाले प्रतिभागियों के लिए भी यह भ्रम और कौतूहल की स्थिति थी. बैठक की कार्यवाही खत्म होने के लगभग 24 घंटे बाद यह हुआ. आगे की चर्चा के लिए कोई समय नहीं दिया गया. समोआ जैसे द्वीप राष्ट्रों ने ग्लोबल स्टॉकटेक टेक्स्ट में अपनी टिप्पणियों को जोड़ने की योजना बनाई थी, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला.
महत्वपूर्ण बात यह है कि विकासशील देशों के बीच "जीवाश्म ईंधन पर पूरी तरह रोक लगाने" या "जीवाश्म ईंधन पर धीरे-धीरे से रोक लगाने" जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर भारी बहस के बाद बैठक में इस बारे में बातचीत रुक गई. विकासशील देशों ने 1.5 डिग्री सेल्सियस के वैज्ञानिक लक्ष्य को बनाए रखने के लिए जलवायु वित्त और ऐतिहासिक उत्सर्जन की भूमिका पर भी जोर दिया.
यूएई की अंतिम सहमति में कहा गया है कि कोयले के इस्तेमाल पर "चरणबद्ध तरीके से रोक" लगाई जानी चाहिए और इसके इस्तेमाल पर "पूरी तरह से रोक" नहीं लगानी चाहिए. जिसके बाद चीन और भारत सरीखे देश कोयला का इस्तेमाल करते रहेंगे. इससे कार्बन उत्सर्जन जारी रहेगा.
इस साल अगस्त में भारत ने 2014 के बाद से कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि की अपनी दर में एक तिहाई की कटौती की है, लेकिन इसके बावजूद भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक बना हुआ है और कोयला के उत्पादन पर मौन है. भारत में लगातार कोयला निकाला जा रहा है.
दुबई में बैठक के दौरान भारत ने साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों की अपनी मांग दोहराई, जिससे भारत को उच्च ऊर्जा को जारी रखने के लिए थोड़ी और जगह मिल सके.
11 दिसंबर को प्रतिनिधिमंडलों के प्रमुखों की बैठक के दौरान भारत और चीन दोनों ने विकासशील देशों के लिए ऐसे किसी भी डाफ्ट का विरोध किया जिसका लहजा निर्देशात्मक हो, जबकि दोनों देशों ने संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप जैसे ऐतिहासिक उत्सर्जकों की जिम्मेदारी पर जोर देना जारी रखा जिसकी वजह से वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री से ज्यादा की वृद्धि हुई है.
छोटे द्वीप देशों के एक समूह ने कहा कि जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगाने के फैसले पर रोक लगाना विनाशकारी है.
समूह ने कहा कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को सामान्य से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित नहीं किया जाता है और यदि समुद्र के स्तर में लगातार वृद्धि जारी रहती है तो उनके देशों के समंदर में विलीन हो जाने की आशंका है.
मार्शल आइलैंड्स के एक प्रतिनिधि ने 10 दिसंबर को मजलिस या 'काउंसिल' नामक चुनिंदा देशों की एक बंद बैठक के दौरान कहा, "मैं संक्षेप में बोलूंगा, लेकिन मेरी बात दिल से निकलेगी."
प्रतिनिधि बोले, "हमारी राष्ट्रीय अनुकूलन योजना में कल्पना की गई है कि 2040 तक अगर कोई कदम नहीं उठाया जाता है तो मार्शल द्वीप समूह के लोगों को अपने कुछ द्वीपों को छोड़ने पर मजबूर होना पड़ेगा. हमें अपने घर, संस्कृतियों और अपने पूर्वजों की हड्डियों को त्यागकर दूसरे द्वीपों पर जाकर रहना होगा. हमारे मुद्दे पूरी तरह से स्पष्ट हैं."
भारत भी खराब मौसम के गंभीर हालातों से जूझ रहा है जो बदलते जलवायु पैटर्न से जुड़े हुए हैं. ये मौसम परिवर्तन कमजोर देशों को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं.
पिछले कुछ सालों में सीओपी के सफल होने के लिए भारत ने अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे विकसित देशों को ज्यादा जवाबदेह ठहराया है. भारत ने अपने इस रुख के साथ 'समान विचारधारा वाले विकासशील देशों' के समूह के साथ को अपने साथ लिया हुआ है.
इस साल, भारत ने 'एक पृथ्वी, एक परिवार और एक भविष्य' के निर्माण के लिए 'वसुधैव कुटुम्बकम' के अपने रुख पर काम किया है. भारत ने इस पर इसी साल दिल्ली में जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी करते समय जोर दिया था.
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने 13 दिसंबर को सम्मेलन के समापन सत्र में कहा, "आगे का रास्ता समानता और जलवायु न्याय पर आधारित होना चाहिए."
उन्होंने कहा, आइए हम वैश्विक स्टॉकटेक प्रक्रिया (जलवायु परिवर्तन को रोकने के क्या उपाय किए और वह कितने कारगर रहे) के जरिए से पेरिस समझौते को अक्षरश: लागू करें."
म्यूनिख के तकनीकी विश्वविद्यालय से वार्ता के पर्यवेक्षक डॉ फ्लोरेंटाइन कोपेनबोर्ग कहती हैं, "UNFCCC रियो सम्मेलन को अपनाए हुए 31 साल हो गए हैं और पहली बार अंतर्राष्ट्रीय समुदाय जलवायु संधि में जीवाश्म ईंधन को शामिल करने के लिए सहमत हुआ है. इस लिहाज से 'जीवाश्म ईंधन से दूर संक्रमण' करने का मुहावरा ऐतिहासिक है. दुनिया ने जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल के दौर से आगे बढ़ने की दिशा में पहला कदम उठाया है, लेकिन इसके लिए अपनाई गई भाषा कमजोर है. इसका मतलब इस दिशा में अभी कई और कदम उठाए जाने की दरकार है."
इस बीच भारत कोयला उत्पादन और इसके लगातार इस्तेमाल पर जोर दे रहा है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा क्षमताओं का निर्माण करना चाहता है.साल 2023 में भारत के सबसे बड़ा कोयला उत्पादक कोल इंडिया लिमिटेड ने ऐलान किया कि उसका मकसद थर्मल ऊर्जा के अपने उत्पादन को 2022-23 में 893 मिलियन टन से बढ़ाकर 2024-25 तक हर साल 1 बिलियन टन करना है.
कोयले के इस्तेमाल को कम करने की ओर
COP28 समझौते के अंतिम मसौदे में "जलवायु संकट के स्थायी और न्यायपूर्ण समाधान" की जरूरत पर जोर देता है जो "सभी हितधारकों की भागीदारी" पर आधारित हैं.
लेकिन कोयले के इस्तेमाल के विस्तार करने की भारत की महत्वाकांक्षा देश के अपने ही लोगों के लिए गंभीर साबित होंगे.
7 फरवरी 2022 की सुबह दुबई से हज़ारों किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के मेधौली गांव में 17 साल के राम कुमार बसोर अपनी बकरियां चराकर लौटे थे. राम कुमार बसोर ने अपने हाथ धोए और अपने घर के आंगन में दोपहर का खाना खाने लगे.
अचानक एक जोरदार विस्फोट हुआ. जिस दीवार के पास राम कुमार बैठे थे वह ढह गई और नीचे दबने से मौके पर ही उनकी मौत हो गई.
कोयला खान विनियम 2017 के मुताबिक, खदान के विस्फोट क्षेत्र से आवासीय इलाके की निर्धारित दूरी 500 मीटर है, लेकिन सिंगरौली जिले में बसा मेधौली गांव राज्य के स्वामित्व वाले नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के ओपन कास्ट कोयला खदान के किनारे से सिर्फ 75 मीटर की दूरी पर है. ये गांव जिला मुख्यालय वैधान से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर है.
यह गांव अनिश्चिताओं से भरा हुआ है. यहां कोयला निकालने के लिए बम ब्लास्ट होना रोज की बात है. ये इस हद तक आम हो चुकी है कि स्थानीय लोग हर दोपहर अपने घरों में बैठने से बचते हैं.
एक साल बाद अगस्त 2023 में छोटक बसोर की आंखें भर आई क्योंकि उनके आसपास के लोग उस हादसे के बारे में बात कर रहे थे जिसमें राम कुमार बसोर की मौत हो गई थी. राम कुमार के जुड़वां भाई लक्ष्मण एक तरफ खड़े होकर चुपचाप ये सब देख रहे थे.
नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) ने 2011 में बसोर को अपना घर तोड़ने के लिए नोटिस दिया था. उन्होंने कहा कि जो कुछ बचा था, वह दो कमरे और दो दीवारें थीं.
"1 जनवरी, 2022 को (एनसीएल के लोगों ने) हमारे घर की सामने की दीवार तोड़ दी और पीछे की दीवार को तोड़ने के लिए जा रहे थे, लेकिन इससे पहले हमारे बेटे की मौत हो गई."
बसोर के परिवार को राम कुमार की मौत के मुआवजे के तौर पर एनसीएल से 5 लाख रुपये मिले, लेकिन एनसीएल ने अभी तक उन्हें उनके घर के लिए मुआवजा नहीं दिया है. इसके अलावा एनसीएल ने बहोर परिवार को अब किसी दूसरे जगह बसने के लिए जगह भी नहीं दी है.
मेधौली हमेशा से खदान के इतने करीब नहीं था. लगभग 20 साल पहले यह गांव एक ऐसे क्षेत्र में था जो अब एनसीएल की ओपनकास्ट खदान में खो गया है क्योंकि एनसीएल ने गांव के निचले इलाकों को शामिल करने के लिए अपनी खदान का विस्तार किया था.
साल 2003 में एनसीएल ने मेधौली गांव को एक जगह से हटाकर दूसरी जगह बसा दिया. फिलहाल मेधौली उसी जगह है जहां उसे बसाया गया था, लेकिन साल 2023 में मेधौली को फिर से कहीं और बसाने की प्रकिया तेज कर दी गई है. हालांकि ये साफ नहीं है कि गांववालों को कहां बसाने की योजना चल रही है.
मेधौली गांव के घरों की सभी दीवारों में दरारें दिखाई दे रही हैं. निवासी अपने सोते हुए बच्चों पर ईंटों और दीवारों के ढहने के खौफ में रहते हैं. दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच विस्फोट के दौरान गांव के निवासी पास के महुआ और आम के पेड़ों के नीचे बैठे रहते हैं. उनके कुओं के पानी का इस्तेमाल अब कोयला खनन के लिए किया जाता है. इसके एवज में एनसीएल निवासियों के लिए पीने और घरेलू कामों के लिए पानी के टैंकर भेजता है.
थर्मल से अक्षय ऊर्जा में भारत के बदलाव की स्थिति बसोर परिवार जैसे लोगों के लिए काफी नहीं होगा जो भारत में कोयला खदानों के पास रहते हैं और उन्हें हर रोज मुश्किलों से दो-चार होने पड़ता है या प्रदूषण से निपटना पड़ता है. इन सब का प्रभाव लंबे समय तक स्वास्थ्य पर रहता है. यहां तक की अचानक मौत भी हो जाती है.
क्लाइमेट जस्टिस
सिंगरौली विरोधाभासों से भरा है. जंगल की जमीनें भारी बोझ की विशाल पहाड़ियों को अनदेखा करती है. इन इलाकों में कोयले की खुदाई से बची हुई मिट्टी और चट्टान का मलबा पसरा हुआ है. लोग अपना काम अपनी दिनचर्या के मुताबिक नहीं करते हैं बल्कि वे खदानों के विस्फोट टाइमिंग के हिसाब से अपने काम का समय तय करते हैं. गांवों और कस्बों में लोग अनिश्चितता में रहते हैं कि किसी भी समय किसी भी जगह को सरकार नए कोयला क्षेत्रों में तब्दील कर सकती है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोयले पर भी भारत की स्थिति इसी तरह विरोधाभासी है. भारत ने साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों के सिद्धांत पर चीन, सऊदी अरब और एलएमडीसी (लाइक माइंडेड डेवलपिंग कंट्री यानी एक जैसी सोच रखने वाले विकासशील देश) की देखादेखी की है.
चीन ने 10 दिसंबर को एक बंद मजलिस बैठक में कहा, "ऐसा नहीं है कि देर से आने वाले (जीवाश्म ईंधन को कम करने के लिए) कोशिश नहीं कर रहे हैं, ऐसा इसलिए है क्योंकि वे गरीब हैं और उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं. हम एक बड़ा परिवार हैं. इसलिए हमें एक-दूसरे की मदद करने और वित्त, क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी मुहैया करने की आवश्यकता है."
डॉ कोपेनबोर्ग ने कहा, "एलएमडीसी का एक बड़ा प्रभाव पड़ा क्योंकि उन्होंने किसी भी निर्देशात्मक नीतियों या क्षेत्रीय लक्ष्यों का जिक्र करने से रोक दिया, जो उच्च महत्वाकांक्षा वाले गठबंधन की ओर से मांगे गए ठोस लक्ष्यों और फेज आउट करने से बहुत दूर था."
वह कहती हैं, ग्लासगो में दो साल पहले की तुलना में भारत इस मुद्दे पर कुछ ज्यादा शांत था. ग्लासगो बैठक के दौरान भारत ने 'कोयले के जिम्मेदार इस्तेमाल के अधिकार' पर जोर दिया था. इस बार सऊदी अरब और चीन ज्यादा मुखर थे.
एलएमडीसी की ओर से उसी बैठक में बोलीविया ने इसके बजाय क्लाइमेट जस्टिस पर जोर दिया.
दक्षिण अमेरिकी देश के एक प्रतिनिधि ने कहा, "1.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का लक्ष्य सभी के लिए एक सामान्य लक्ष्य नहीं है और यह अब (विकसित और विकासशील देशों का) अंतर नहीं है."
विकसित देशों से क्लाइमेट फाइनेंस पर जोर देते हुए, बोलीविया ने जिक्र किया कि जिन देशों ने 150 सालों में उत्सर्जन को चरम पर पहुंचा दिया था, वे अब कम विकसित देशों को केवल 10 सालों में समान लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कह रहे हैं.
बोलीविया ने कहा, "यह कोई न्याय नहीं है."
एलएमडीसी ने जलवायु वित्त के प्रति प्रतिबद्धता की कमी और सार्वजनिक क्षेत्र से निजी क्षेत्र और बहुपक्षीय विकास बैंकों को जिम्मेदारियों को स्थानांतरित करने के लिए पेरिस समझौते को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए विकसित देशों की जोरदार आलोचना की है. एलएमडीसी ने विकसित देशों से अपनी जिम्मेदारियों को बदलने के लिए भी कहा जिससे जीवाश्म ईंधन के "फेज आउट" यानी "पूरी तरह से रोक" शब्द पर आम सहमति नहीं बन पाई है.
भारत की स्थिति इस सीओपी में एक नेता की तुलना में एक मूक पर्यवेक्षक की ज्यादा रही है.
खदानों के विस्तार की लागत
सिगरौली के निवासियों के लिए यह बातचीत बहुत कम मायने रखती हैं. एनसीएल का लगातार विस्तार हो रहा है और जैसा कि मेधौली के निवासी अखिलेश बसोर ने कहा, "सिंगरौली में एनसीएल सरकार है."
कोयले के खदानों के विस्तार में असल में बहुत खर्च है. भारत में ज्यादातर पुनर्वास मानकों के अनुसार, एनसीएल उन लोगों के प्रति उदार है, जिन्हें वह विस्थापित करता है. क्लाइमेट जस्टिस के सिद्धांतों के मुताबिक, जिन लोगों को विस्थापित किया जाता है, उन्हें उनकी जमीन, आजीविका और संपत्ति के नुकसान के लिए मुआवजा दिया जाता है. उन्हें अलग-अलग जगहों पर नए प्लॉट दिए जाते हैं. लोगों को तब पैसे दिए जाते हैं जब वो यह साबित कर दें की उन्होंने खुद अपने घरों को तोड़ा है.
पर करीब से देखने पर पता चलता है की राज्य सरकार की ओर से संचालित संगठन ऐसा करने में कोई खास दिलचस्पी नहीं लेती है.
अखिलेश ने कहा कि एनसीएल के अधिकारियों ने साल 2011 में धारा नौ के तहत विस्तारित कोयला खदानों के लिए मेधौली में भूखंडों का अधिग्रहण करने का दावा किया था. कोयला धारक क्षेत्र (अधिग्रहण और विकास) अधिनियम 1957 के तहत राज्य की ओर संचालित कंपनियों को केंद्र के निर्धारित कानूनी मानकों के अनुसार मुआवजा देने की ज़रूरत होती है.
साल 2013 में केंद्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम पारित किया था, जिसने पिछले भूमि अधिग्रहण अधिनियम की तुलना में हितधारकों को कहीं ज्यादा बेहतर और उदार मेहनताना दिया.
साल 2017 में एनसीएल ने मेधौली में जमीनों को मापा था, लेकिन तीन साल बाद जमीन के मापों के यह कहते हुए संशोधित किया कि जमीन उनके माप से छोटे हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि लोगों के मुआवजे में 20 प्रतिशत की कटौती की गई.
मेधौली के एक अन्य निवासी राम नरेश बसोर ने कहा, "हम आपकी विलासिताओं के लिए अपनी जान तक दे देते हैं.”
सिंगरौली में एनसीएल के जनसंपर्क अधिकारी ने कहा कि जमीन की सत्यापन की प्रक्रिया दोहराई गई क्योंकि 2017 के सर्वेक्षण के नतीजों पर शक था. उन्होंने आगे कहा कि दूसरे सत्यापन में पाया गया कि वहां ऐसे घर भी शामिल थे जो लाभार्थियों की सूची में मौजूद नहीं थे. 2020 का निरीक्षण लोगों के प्रतिनिधियों, स्थानीय सरकार और एनसीएल अधिकारियों के मौजूदगी में किया गया था.
उन्होंने कहा, ''जो भी मुआवजा समायोजित किया गया उसका हिसाब भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अनुसार की गई थी.''
एनसीएल के एक प्रबंधन अधिकारी, जिन्होंने नाम बताने से इसलिए इनकार कर दिया क्योंकि वे मीडिया से बात करने के लिए अधिकृत नहीं हैं, उन्होंने बताया कि, ''अगर देश को इसकी ज़रूरत है, तो यह काम सार्वजनिक हित में ज़रूरी है. यह भी कोयला वहन (क्षेत्र) अधिनियम और (भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजे और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम) के अनुसार ही होगा. एनसीएल एक जिम्मेदार कॉर्पोरेट है इसलिए जो भी होगा अधिनियम के तहत और लोगों के हित में होगा. हम इसके लिए लोगों से सहमति लेंगे.''
मेधौली निवासी ललई बसोर इसे दूसरे तरीके से देखते हैं.
वह कहते हैं, ''खदान के इलाकों में कोई संतुष्टि नहीं है. हम सबको वैसे भी मरना है, लेकिन आप हमें समय पहले ही क्यों मारना चाहते हैं?”
मृदुला चारी मुंबई स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं. डेनिस फर्नांडीस कोलोराडो-बोल्डर विश्वविद्यालय में पीएचडी शोधकर्ता हैं.
अनुवादक- चंदन सिंह राजपूत
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