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2 अक्टूबर विशेष: जब महात्मा गांधी ने कहा था- पूंजी नहीं पूंजीवाद को खत्म करूंगा
महात्मा गांधी 1931 में यूरोप गए थे. लंदन में प्रवास के दौरान पत्रकार चार्ल्स पेट्राश ने उनसे लंबी बातचीत की थी. यह बातचीत उस समय लेबर मंथली पत्रिका में प्रकाशित हुई थी. बाद में यह फ्रेंच अखबार ला मोंदे में पुनर्मुद्रित हुई. उसी बातचीत के चुनिंदा अंश-
आपके विचार से भारतीय राजाओं, भू-स्वामियों, उद्योगपतियों और बैंकरों ने अपनी संपत्ति में कैसे इजाफा किया है?
- वर्तमान हालात में जनता का शोषण करके.
क्या ये लोग भारतीय मजदूरों और किसानों के शोषण के बिना अमीर नहीं हो सकते?
- हां, कुछ हद तक हो सकते हैं.
क्या इन अमीरों के पास अपनी मेहनत से संपत्ति अर्जित करने वाले साधारण मजदूरों या किसानों से बेहतर जिंदगी जीने का सामाजिक अधिकार है?
- (कुछ समय शांत रहने के बाद...…) अधिकार नहीं है. मेरा सामाजिक सिद्धांत कहता है, हालांकि जन्म से सब समान होते हैं, इसलिए सबको समान रूप से अवसर मिलने चाहिए, लेकिन सब में एक समान क्षमताएं नहीं होतीं. प्राकृतिक रूप से यह संभव नहीं है कि सभी का स्तर समान हो. सभी का रंग, विवेक समान नहीं हो सकता. यही वजह है कि प्राकृतिक रूप से हम लोगों में से कुछ दूसरों की अपेक्षा वस्तुओं का लाभ प्राप्त करने में अधिक सक्षम होते हैं. जो लोग अधिक की कामना करते हैं वे अपनी क्षमताओं का इस दिशा में इस्तेमाल करते हैं. अगर वे अपनी क्षमताओं का सबसे बेहतर इस्तेमाल करेंगे तो लोगों के कल्याण के लिए काम कर रहे होंगे. ये लोग “ट्रस्टी” के अलावा कुछ नहीं होंगे. मैं व्यक्ति को बौद्धिकता से अधिक अर्जित करने की इजाजत दूंगा और उसकी योग्यता के आड़े नहीं आऊंगा. लेकिन उसकी बचत का बड़ा हिस्सा लोगों के पास जाना चाहिए. ठीक वैसे ही जैसे बच्चों को परिवार से मिलता है. वे अपने लाभ के केवल ट्रस्टी हैं, इसके अलावा कुछ नहीं. मुझे भले ही इसमें निराशा हाथ लगे, लेकिन मैं इस आदर्श को दृढ़ता से मानता हूं. मौलिक अधिकारों के घोषणापत्र में इसे समझा जा सकता है.
अगर किसान और मजदूर राजाओं, जमींदारों, पूंजीपतियों, अपने सहयोगियों और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ क्रांति करते हैं तो आप किसका पक्ष लेंगे? अगर आजाद भारत में इस तरह की क्रांति होती है, भले ही परिस्थितियां कैसी भी हों, तो आपका क्या दृष्टिकोण होगा?
- मेरी कोशिश होगी कि अमीर और संपन्न वर्ग को ट्रस्टी में तब्दील करूं जो वे पहले से हैं. वे धन को रख सकते हैं, लेकिन उन्हें उन लोगों के कल्याण के लिए काम करना होगा जिनकी बदौलत उन्होंने संपत्ति अर्जित की है. इसके बदले उन्हें “कमीशन” प्राप्त होगा.
महाराजा और जमींदार अंग्रेजों से मिल गए हैं और आप ऐसे लोगों को “ट्रस्टी” बनाना चाहते हैं. आपकी सच्ची अनुयायी आम जनता है जो महाराजाओं और जमींदारों को अपना दुश्मन मानती है. अगर यह जनता सत्ता हासिल करती है और इस वर्ग को समाप्त करती है तो आपका नजरिया क्या होगा?
- वर्तमान समय में जनता जमींदारों और राजाओं को अपना दुश्मन नहीं मानती. यह जरूरी है कि उन्हें बताया जाए कि उनके साथ क्या गलत हुआ है. मैं नहीं चाहूंगा कि जनता पूंजीपतियों को अपने दुश्मन के तौर पर देखे. मैं बताऊंगा कि ऐसा समझकर वे खुद का नुकसान कर रहे हैं. मेरे अनुयायी, लोगों से यह कभी नहीं कहते कि अंग्रेज या जनरल डायर बुरे हैं. वे बताते हैं कि ये लोग व्यवस्था के शिकार हैं और इसीलिए व्यवस्था को नष्ट करना जरूरी है, व्यक्ति को नहीं. इसी तरीके से ब्रिटिश अधिकारी लोगों के बीच बिना कष्ट रह सकते हैं.
अगर आपको व्यवस्था पर चोट करनी हो तो ब्रिटिश पूंजीवाद और भारतीय पूंजीवाद में कोई अंतर नहीं है. ऐसे में आप उन जमींदारों को लगान की अदायगी क्यों नहीं बंद कर देते जो वह आपकी भूमि से लेते हैं?
- जमींदार व्यवस्था का एक यंत्र भर हैं. उनके खिलाफ आंदोलन करना किसी भी लिहाज से आवश्यक नहीं है, खासकर ऐसे समय में जब ब्रिटिश व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन छिड़ा हो. दोनों के बीच अंतर स्पष्ट करना संभव है. हमने लोगों से कहा है कि जमींदारों को लगान देना बंद कर दें क्योंकि जमींदार यह लगान सरकार को देते हैं. हमारे जमींदारों से अच्छे संबंध हैं.
रबींद्रनाथ टैगोर, बर्नाड शॉ और अन्य दार्शनिकों के अनुसार, रूस में भूस्वामियों, पूंजीपतियों, साहूकारों और सोवियत की व्यवस्था ने जब सरकार की शक्ल ली तो बेहद कम समय में लोगों की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियां बेहतर हुईं. यह देखा जा रहा है कि क्रांति के समय रूस मुख्य रूप से कृषि पर आधारित था. सांस्कृतिक और धार्मिक नजरिए से देखा जाए जो उसकी स्थिति ठीक वैसी ही थी जैसी आज भारत की है. इस संबंध में आपका दृष्टिकोण क्या है?
- पहली बात तो यह कि मैं दूसरों के आधार पर अपना दृष्टिकोण नहीं बनाता. यही वजह है कि मैं रूस के हालात की प्रशंसा करने में असमर्थ हूं. इसके अलावा मैं मानता हूं और सोवियत के नेता खुद कहते हैं कि सोवियत की व्यवस्था ताकत के बल पर स्थापित हुई है. इसलिए मुझे इसकी सफलता पर बड़ा संदेह है.
किसान और मजदूर अपनी किस्मत खुद तय कर सकें, इसके लिए आपकी क्या योजना है?
- मेरी वही योजना है जिसकी व्याख्या कांग्रेस द्वारा की गई है. मैं मानता हूं कि इससे मजदूरों और किसानों की स्थिति में सुधार आएगा. वह स्थिति अब तक की श्रेष्ठ स्थिति होगी. मैं मजदूर और किसानों की स्थिति से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हूं. मेरा तात्पर्य असामान्य पुर्नजागरण से है. इसके कारण उनकी क्षमता प्रभावित रही और वे अन्याय और शोषण को बर्दाश्त करते रहे.
मशीन से आपका क्या मतलब है? क्या चरखा भी मशीन नहीं है? क्या मशीन का इस्तेमाल कामगारों का शोषण नहीं बढ़ाता?
चरखा और इस तरह के अन्य उपकरण साफ तौर पर मशीन हैं. इससे आप मशीन की मेरी परिभाषा को समझ सकते हैं. मैं यह मानता हूं कि मशीनों का गलत इस्तेमाल ही पूरी दुनिया में कामगारों के शोषण की प्रमुख वजह है.
आप लोगों का शोषण खत्म करने की बात कहते हैं जो पूंजीवाद को खत्म करके ही संभव है. क्या आप पूंजीवाद को कुचलना चाहते हैं? अगर ऐसा है तो क्या आप पूंजीपतियों को उनकी संपत्ति से वंचित करना चाहते हैं?
- अगर मैं सत्ता में आया तो मैं निश्चित तौर पर पूंजीवाद को खत्म कर दूंगा लेकिन मैं पूंजी को खत्म नहीं करूंगा. और यह तभी संभव है जब मैं पूंजीपतियों को खत्म न करूं. मैं मानता हूं कि पूंजी और श्रम का सामंजस्य संभव है. कुछ मामलों में मैंने इसे सफलतापूर्वक देखा भी है और जो एक मामले में सच है वह सभी मामलों में सच साबित हो सकता है. मैं पूंजी को बुराई के तौर पर नहीं देखता और न ही मैं मशीनी व्यवस्था को बुराई मानता हूं.
(डाउन टू अर्थ से साभार. गांधीजी का यह साक्षात्कार फ्रांस की एक पत्रिका में छपा था. मूल अंग्रेजी साक्षात्कार का अनुवाद भागीरथ ने किया है.)
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