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हिमाचल के हाईवे: ‘प्रगति की नई गति’ या पहाड़ों की दुर्गति
हिमाचल प्रदेश की बाढ़ ने ज़ोरशोर से खड़े किए गए उन हाईवेज़ की असलियत भी उजागर की है जिनके निर्माण और प्रचार में हज़ारों करोड़ रुपए खर्च किए गए. केंद्र सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की टैगलाइन है: ‘प्रगति की नई गति’ लेकिन बाढ़ में राजमार्गों समेत सारी सड़कों ने पूरे प्रदेश की दुर्गति कर दी. इनमें से कीरतपुर मनाली हाईवे काफी चर्चित हैं और इसे अपने उद्घाटन से पहले ही बारिश और बाढ़ के कारण बंद करना पड़ा.
इस हाईवे पर अटके वाहनों में से एक के ड्राइवर सतीश कुमार ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, “इस सीज़न में हर महीने (पर्यटकों को लेकर) दो बार यहां आता हूं. यह (नया हाईवे) अभी कुछ दिन पहले ही जनता के लिए खोला गया लेकिन बारिश के कारण बंद करना पड़ा है. सोचा नहीं था कि इतने सालों में बना ये हाईवे एक बरसात में ही टूट जाएगा.”
हिमाचल प्रदेश में बाढ़ के कारण राज्य में करीब 1200 जगह सड़कें बंद हुईं. अकेले कुल्लू ज़िले में ही 170 जगह सड़कें ब्लॉक हुईं लेकिन जब राज्य का सबसे हाई प्रोफाइल कीरतपुर-मंडी-कुल्लू-मनाली हाईवे भी अन्य सड़कों की तरह ढह गया तो सड़क निर्माण की क्वालिटी और स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं.
बेरोकटोक तोड़फोड़ और अवैज्ञानिक निर्माण
कुल 197 किलोमीटर लंबा कीरतपुर मनाली हाईवे हिमाचल की सबसे बड़ी योजनाओं में है, जिसकी कीमत शुरुआत में 1800 करोड़ रूपए से अधिक आंकी गई लेकिन एनएचएआई के शीर्ष अधिकारी अब्दुल बासित ने कहा कि अब तक इसमें करीब 14,000 करोड़ खर्च हो चुका है. बासित का अनुमान है कि एनएचएआई को हिमाचल में आई बाढ़ में कम से कम 500 करोड़ रुपए की क्षति हुई है हालांकि उनके मुताबिक नुकसान के अधिक सटीक आंकड़े के लिए इंतज़ार करना होगा.
चंडीगढ़ से मनाली यात्रा मार्ग की लंबाई कम करने और समय बचाने के लिए इस हाईवे में 37 बड़े पुलों और 14 सुरंगों का निर्माण किया जा रहा है लेकिन बारिश और बाढ़ में यह हाईवे कारगर साबित नहीं हुआ.
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने राज्य के दौरे के बाद यह स्वीकार किया कि संवेदनशील पहाड़ बारिश और नदी का ज़ोर नहीं झेल पा रहे. प्रभावित हिस्सों का दौरा करने के बाद गडकरी ने कहा, “इन पहाड़ों में बहुत कम जगह पर ठोस रॉक (चट्टान) है. अधिकांश जगह पत्थर और मिट्टी है जो बहुत फ्रैजाइल (जल्द दरक जाने वाला) है जिस कारण बरसात आती है तो वह तुरंत टूट जाता है और बह जाता है.”
ऑल वेदर रोड के नाम पर हिमालयी क्षेत्र में बनाए जा रहे चौड़े हाईवे हर साल बरसात में बह जाते हैं. गडकरी ने पहाड़ी क्षेत्र में नदी के प्रवाह को भी एक समस्या बताया और कहा कि यह सड़क के टूटने का कारण है. लेकिन जानकार कहते हैं कि सड़क टूटने का प्रमुख कारण पहाड़ या नदी नहीं बल्कि अवैज्ञानिक तरीके से हो रहा सड़क निर्माण है.
हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर भूविज्ञानी वाई पी सुंदरियाल ने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा कि हिमालयी सड़कों के निर्माण का कार्य प्रशिक्षित लोगों की निगरानी में नहीं हो रहा बल्कि पहाड़ों को मनमाने तरीके से काटकर या तोड़फोड़ कर किया जा रहा है.
सुंदरियाल ने न्यूजलॉन्ड्री से कहा, “मुझे आश्चर्य है कि जहां पर रोड चौड़ा करने का काम होता है वहां पर मज़दूर और जेसीबी ऑपरेटर ही काम करते रहते हैं. मैंने अभी तक यह नहीं देखा कि कोई इंजीनियर या अधिकारी वहां पर खड़ा हो और इन लोगों को बता रहा हो कि उन्हें किस तरह से काम करना है.”
न्यूज़लॉन्ड्री ने मनाली हाईवे पर काम कर रहे मज़दूरों से बात कर इसकी पुष्टि की जिन्होंने कहा कि उन्हें सड़क निर्माण की कोई ट्रेनिंग नहीं मिली. ज़्यादातर मज़दूरों ने कहा कि वह खुद ही सड़क बनाते हैं और ‘धीरे-धीरे काम सीख जाते हैं’.
पिछले साल हाईकोर्ट ने कहा कि यह सुनिश्चित हो कि सड़क निर्माण का मलबा गोविन्द सागर में न डाला जाए.सड़क निर्माण के तरीके को लेकर जानकारों ने सवाल खड़े किए हैं.कुल्लू के डिप्टी कमिश्नर आशुतोष गर्ग मानते हैं कि सड़क निर्माण के काम में पहाड़ को काटने में खामी है. गर्ग ने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा, “हिमाचल प्रदेश में केवल कुल्लू ही नहीं जहां पर भी हमारा हाईवे निर्माण का काम चला है वहां सड़कें जिस तरह से टूट रही हैं वह हमारे लिए एक बहुत बड़ा अनुभव और सीख है. ऐसा देखने को मिल रहा है कि जहां पहाड़ों को बिल्कुल सीधा खड़ा काटा गया है वहां निर्माण के 4-5 साल बाद भी वहां पहाड़ स्थिर नहीं हुआ है. इससे न केवल सड़क बार बार बंद हो रही है बल्कि इससे बहुत सारी निजी और सरकारी संपत्ति का नुकसान हो रहा है.”
सुंदरियाल कहते हैं कि सड़क निर्माण के बाद ढलानों को प्रकृति के भरोसे छोड़ दिया गया है लेकिन नाज़ुक पहाड़ों को जब इस तरह काटा जाता है तो ढलानों को स्थिर होने में कई साल लग जाते हैं. उन्होंने बताया कि सड़क किनारे पहाड़ न खिसकें इसके लिए निर्माण के वक्त उनके कटान का कोण एक सीमा से अधिक नहीं हो सकता. इस कोण को एंगिल ऑफ रिपोज़ कहा जाता है.
वह आगे कहते हैं, “जो हमारे 45 या 40 डिग्री के ढलान होते हैं उन्हें हम स्थिर मान लेते हैं. लेकिन अगर हम उन ढलानों को 90 डिग्री पर बिल्कुल वर्टिकल काट लेते हैं तो भूविज्ञान की भाषा में कहा जाता है कि हमने उस ढलान का एंगिल ऑफ रिपोज़ बदल दिया. जहां हम एंगिल ऑफ रिपोज बदल देते हैं वहां भूस्खलन की संभावना कई गुना बढ़ जाती है.”
खराब गुणवत्ता और भ्रष्टाचार
आपदा के एक महीने बाद भी पूरे राज्य में 300 से अधिक जगह सड़कें बंद हैं और भूस्खलन हो रहे हैं. हिमाचल सरकार में कई पदों पर काम कर चुके और अभी जन अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही भूमि अधिग्रहण प्रभावित मंच के अध्यक्ष बी आर कौंडल हाईवे निर्माण में अधिकारियों और निजी कंपनियों की मिलीभगत का आरोप लगाते हैं.
वह कहते हैं, “मनाली से लेकर कीरतपुर तक सारा काम ठेकेदारों के हवाले किया गया. जितनी प्राइवेट कंपनियां हैं उन्होंने यहां पहाड़ों की कटिंग मनमाने तरीके से की और अवैज्ञानिक तरीके से काटा जबकि उन्हें पता था कि यह संवेदनशील पहाड़ा है.”
कौंडल कहते हैं कि हाईवे निर्माण का हज़ारों टन मलबा नदी में फेंक दिया गया जो इस साल बाढ़ का प्रमुख कारण बना. एक मामले में पिछले साल हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट ने अधिकारियों को आदेश दिया कि मलबा गोविन्द सागर बांध और उसमें पानी ले जाने वाले नालों में न फेंका जाए.
कांग्रेस नेता और सामाजिक कार्यकर्ता विद्या नेगी पिछले कई दशकों से मनाली क्षेत्र में रह रही हैं जो इस बाढ़ में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ और वहां हज़ारों टूरिस्ट फंसे. वह नदियों पर अतिक्रमण और अवैज्ञानिक तरीके से हुए निर्माण पर सवाल करते हुए बताती हैं कि नदी हमारे पास नहीं आई है बल्कि पिछले कई सालों में हमने देखा है कि हम नदी के पास चले गए हैं और इस कारण यह सारा नुकसान हुआ है.
नेगी ने हाईवे निर्माण में जल्दबाज़ी और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. वह सवाल करती हैं, “फोर लेन और टू लेन का जो भी काम हुआ है उसकी गुणवत्ता क्या है? इस क्षेत्र (की गंभीरता) को ध्यान में रखते हुए यहां अधिक बजट का प्रावधान था लेकिन मुझे नहीं लगता है कि वह पैसा उस तरह से यहां पर खर्च किया गया.”
नेगी बताती हैं कि नदियों पर बिना सरिया या सीमेंट के पत्थर लगाकर मिट्टी भर दी गई और जैसे ही नदी का प्रवाह बढ़ा तो पूरी मिट्टी नदी में चली गई. वह कहती हैं कि इसमें “भ्रष्टाचार हुआ है और अपनों को खुश करने की कोशिश” की गई है.
बाढ़ के लिए हमें ज़िम्मेदार ठहराना ग़लत: एनएचएआई
न्यूज़लॉन्ड्री ने इन आरोपों पर नेशनल हाईवे अथॉरिटी के अधिकारी अब्दुल बासित से बात की जो हिमाचल में चल रहे प्रोजेक्ट्स के प्रमुख हैं. बासित ने कहा कि एनएचएआई बड़ी एजेंसी है और लोगों को सुविधाएं देती है और ज़मीन पर काम करती नज़र आती है. इसलिए आसानी से उस पर दोष मढ़ दिया जाता है.
उन्होंने कहा, “हाईवे के लिए नदियों पर अतिक्रमण नहीं किया है और उन इलाकों में भी बाढ़ आ रही है जहां एनएचएआई के प्रोजेक्ट नहीं हैं तो हम बाढ़ के लिए कैसे ज़िम्मेदार हैं.”
हालांकि हिमाचल सरकार ने अपनी एक पनबिजली परियोजना को क्षति के लिए एनएचएआई के फोर लेन प्रोजेक्ट के ज़िम्मेदार ठहराते हुए 658 करोड़ रुपए का मुआवज़ा मांगा है.
हाईवे निर्माण के लिए पहाड़ी ढलानों के अवैज्ञानिक कटान पर बासित ने माना कि हर जगह एंगल ऑफ रिपोज़ का पालन करना संभव नहीं होता. उन्होंने कहा, “कुछ जगह पहाड़ ही वर्टिकल (खड़े) हैं और कुछ जगह ज़मीन की उपलब्धता नहीं है. वहां हमें प्रोटेक्शन वर्क करना पड़ता है जो कभी कामयाब होता है और कभी नहीं. इसलिए हमारी कोशिश है कि अधिक से अधिक सुरंगें बनाई जाएं जो कि ऑल वेदर कनेक्टिविटी देती हैं और दूरी कम करती हैं.”
बासित ने यह भी कहा कि निजी कंपनियों और ठेकेदारों से काम ज़रूर लिया जा रहा है लेकिन उनके पास ‘फ्री हैंड’ नहीं होता. उन्होंने कहा, “हमारे इंजीनियर और सुपरवाइज़र सारे कामों को देखते हैं और अगर कुछ गलत हो रहा होता है तो नोटिस जारी करते हैं.”
मंत्री जी का “लॉन्ग टर्म” उपाय
अपने हिमाचल दौरे के बाद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने तबाही से बचने के लिए ‘नदी का रास्ता सीधा करने’ का सुझाव दिया. उन्होंने कहा, “नदी के बाजू में रोड बने हुए हैं. हमने बहुत बार कोशिश की कि इसका हल कैसे किया जाए. तो इसके कुछ लॉन्ग टर्म उपाय हैं.” गडकरी ने कहा कि नदी तल ऊपर आता जा रहा है जिस कारण पानी बाहर निकल जाता है और तबाही करता है.
उन्होंने कहा, “टेक्निकल कमेटी से रिपोर्ट लेकर बाढ़ प्रोटेक्शन के रूप में इसे (नदी को) 2-3 मीटर खुदाई कर उससे निकलने वाले पत्थरों से नदी के दोनों ओर कंक्रीट और पत्थर की ऐसी मज़बूत दीवार बनाएंगे कि पानी कहीं नहीं जाएगा.”
मंत्री नितिन गडकरी के इन सुझावों पर जानकारों ने सवाल उठाए हैं. भूविज्ञानी प्रोफेसर सुंदरियाल कहते हैं कि गंगा, व्यास या सतुलज जैसी विराट हिमालयी नदियों के गुस्से से बचने का तरीका उन्हें प्राकृतिक रूप से बहने देना है. इतनी बड़ी और लंबी नदियों के पानी को रोकने के लिए ऐसे उपायों में अरबों रुपए खर्च हो सकते हैं और यह कोई वैज्ञानिक हल नहीं है.
उन्होंने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा, “कंक्रीट या आरसीसी की दीवार इन नदियों के प्रवाह को नहीं बांध सकती. हमें समझना होगा कि नदी हमारे घरों में नहीं घुस रही. हमने नदियों पर निर्माण और अतिक्रमण कर उसका रास्ता रोका है. आने वाले दिनों में चरम मौसमी घटनाओं के कारण नदियों में अचानक पानी बढ़ेगा और तब ऐसे उपाय बेकार साबित हो सकते हैं.”
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