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दिल्ली यमुना बाढ़: 'पहले हमारे जानवर निकालो बाद में हमें'
रात के करीब दो बजे. यमुना का वो इलाका जहां पानी का जल स्तर खतरे के निशान से दो मीटर ऊपर बह रह है. हजारों लोग सड़कों के किनारे, मेट्रो पुल या सड़कों के पुल के नीचे रात गुजारने के लिए मजबूर हैं. कुछ जागे हैं तो कुछ सोए हैं. वहीं कुछ लोग अपने फंसे लोगों के इंतजार में पानी की ओर टकटकी लगाए हैं. एनडीआरएफ की टीमें और दिल्ली पुलिस पानी में फंसे लोगों को बाहर निकालने के लिए कशमकश करती दिख रही है.
आधी रात से ज्यादा का समय और शरीर से लिपट रहे मच्छरों की भिन्न भिन्न की आवाज के बीच, यमुना से लोगों को निकालने के दौरान आने वाली परेशानियों के चलते ऑपरेशन में लगे अधिकारी और कर्मचारी आपस में नरम-गरम हो रहे हैं.
ट्रॉली के सहारे खड़े 46 वर्षीय देवेंद्र कुमार बढ़ते यमुना के पानी की ओर निहार रहे हैं. उनका जन्म यमुना क्षेत्र के नगली रजापुर जंगल में ही हुआ है. करीब 50 बीघा जमीन पर खेती करने वाले देवेंद्र न्यूज़लॉन्ड्री से कहते हैं, “हमने अपने खेत में अभी कई हरी सब्जियां बोई हुई हैं. इनमें भिंडी, मिर्ची, घिया और तोरी हैं, लेकिन बाढ़ के इस पानी से सब तबाह हो गया.”
नौ सदस्यों के परिवार के मुखिया देवेंद्र आगे कहते हैं कि सोमवार रात से यहां पर पानी बढ़ना शुरू हो गया था. लेकिन यह अंदाजा किसी को नहीं था कि पानी इतना भी बढ़ सकता है.
“हमारा इंजन समेत खेती करने का सभी सामान अंदर ही रह गया. दो भैंस, खाने पीने का राशन व अन्य जरूरी सामान भी अंदर ही छोड़कर भागना पड़ा.” उन्होंने कहा.
उन्हीं के साथ खड़े 39 वर्षीय नरेंद्र सिंह भी नगली रजापुर गांव के ही निवासी हैं. वह कहते हैं, “बढ़ते पानी को देख खेती का सभी सामान, पशु जिनमें दो भैंस एक कटिया और कुछ लोग भी अभी हमारे अंदर ही फंसे हैं.”
उन्होंने कहा, “आज (12 जुलाई) दोपहर में अचानक से पानी बढ़ गया तो टाइम ही नहीं लगा कि जानवर बाहर निकाल लें. हमारे भाई के तो काफी ज्यादा पशु अंदर ही रह गए हैं. ऐसे में अपनी जान बचाएं या जानवर की. अब तो हम सरकार के ही भरोसे हैं, खाना भी सरकार का खा रहे हैं.”
नरेंद्र आगे कहते हैं, “अभी 400 से 500 लोग अंदर ही फंसे हैं, और वो ऐसे बाहर आना भी नहीं चाहते हैं. उनकी शर्त है कि पहले हमारे जानवर निकालो फिर हम बाहर जाएंगे… क्योंकि अगर वो बाहर आ गए और पशु अंदर ही रह गए तो वो क्या खाएंगे, अगर हम बाद में अदर नहीं जा पाए तो. अंदर फंसे लोगों का कहना है कि अगर पानी ज्यादा बढ़ा तो हम या तो पेड़ पर चढ़ जाएंगे नहीं तो हमें तैरना भी आता है, जैसे होगा देख लेंगे, लेकिन जानवरों को छोड़कर बाहर नहीं जाएंगे.”
मजबूरी में बकरी वहीं छोड़नी पड़ गईं
इस बीच रेस्क्यू किए गए लोग सिर पर सामान रखकर पानी से बाहर निकलते हुए मयूर विहार फेस- 1 मेट्रो की ओर बढ़ रहे हैं. वह सड़क किनारे किसी खाली ठिकाने की तलाश में हैं. वह आपस में बातें करते हुए आगे बढ़ रहे हैं कि उनका काफी सामान अंदर रह गया है. कोई कह रहा है कि हमारी बकरी अंदर रह गई हैं तो कोई कह रहा है कि हमारे तो बर्तन भी वहीं रह गए हैं.
30 वर्षीय मुन्नी देवी न्यूज़लॉन्ड्री से कहती हैं, “हमारी पांच बकरी अंदर ही रह गई हैं. बाकी सामान पेड़ से बांधकर आ गए हैं. सामान चला भी जाए तो कोई बात नहीं है लेकिन हमारी बकरी बच जाएं बस, क्योंकि उनमें भी जान है. जो कपड़े पहने खड़े हैं बस वही हैं बाकी सब अंदर ही छोड़ आए हैं.”
42 वर्षीय भानू प्रताप सिंह कहते हैं, “मुझे अपनी भैंसों की चिंता हो रही है. मेरी पांच भैंस अंदर ही रह गई हैं. जिन्हें मैं खूंटे से बांधकर और ड्राम में चारा डालकर आ गया हूं. बाकी सब राम भरोसे हैं. उम्मीद है कि कल दोपहर तक पानी घट सकता है. यही सोचकर अभी उनकी फिलहाल की व्यवस्था करके आ गया हूं.”
यहां से आपका घर कितनी दूर है? इस सवाल पर वह कहते हैं कि यहां से करीब दो किलोमीटर अंदर हमारा घर है.
भानू पानी बढ़ने की वजह मेट्रो निर्माण को मानते हैं. उनका कहना है कि इस निर्माण के चलते कई रास्तों की चौड़ाई काफी कम कर दी गई है इसलिए पानी को निकासी नहीं मिल रही है. मेरठ मेट्रो प्रोजेक्ट के चलते सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है.
अलर्ट जारी था तो फिर इलाका क्यों नहीं किया खाली
बता दें कि हमने लोगों से पूछा कि बीते जब चार दिनों से कहा जा रहा था कि यहां पानी बढ़ सकता है तो आपने ये इलाका खाली क्यों नहीं किया? इस पर ज्यादातर सभी ने एक जैसा ही जवाब दिया.
लोगों का कहना है कि किसी को ऐसी उम्मीद नहीं थी कि इतना पानी आ भी सकता है. पानी तो हर साल ही आता है लेकिन इतना पानी पहली बार देखा है. इस बार जहां कभी पानी नहीं चढ़ा वहां भी चढ़ गया है.
हमारे बाप दादाओं ने भी नहीं देखा इतना पानी
बाढ़ पीड़ित 60 वर्षीय चंद्रशेखर बाढ़ के पानी के किनारे खड़े,अंदर फंसे अपने भतीजे के आने का इंतजार कर रहे हैं. वह कहते हैं, “हमारी 40-45 बीघा खेती है. हम तो जान बचाकर भागे हैं. एनडीआरएफ ने निकाला है. राम भरोसे सब वहीं छोड़कर आ गए हैं.”
“जब से हम पैदा हुए हैं तब से कभी हमने इतना पानी नहीं देखा है. हर साल पानी आता है लेकिन कभी इतना नहीं आया. 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान सबसे ज्यादा पानी आया था लेकिन तब भी इतना पानी नहीं आया था.” उन्होंने कहा.
62 वर्षीय बुजुर्ग महिला पैरों पर चिपक रहे मच्छरों को हाथ के पंखे से हटा रही हैं. वह कहती हैं, “पानी बहुत बढ़ गया है. इतना पानी कभी नहीं देखा. ऐसी अफरातफरी हुई कि सभी सामान बाहर ही छोड़कर भागना पड़ा.”
तहसीलदार लोगों को मनाने में जुटे
एनडीआरएफ की टीम में शामिल एक कर्मचारी नाम नहीं छापने पर कहते हैं कि हम अभी तक कम से कम 1000 से ज्यादा लोगों को निकाल चुके हैं, और अभी भी करीब 400-500 लोग अंदर ही फंसे हैं.
वह कहते हैं, “यमुना में अंदर दो लोकेशन हैं. एक राम मंदिर और एक हनुमान मंदिर. राम मंदिर वाली लोकेशन तकरीबन पूरी हो चुकी है. अब हम हनुमान मंदिर वाली लोकेशन पर लगे हैं. यहां से लोग आने के लिए तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि पहले हमारे जानवार निकालो फिर हम बाहर जाएंगे. उन्हें मनाने के लिए तहसीलदार अंदर गए हुए हैं. जबकि अंदर बुरी स्थिति है. सभी घर डूबे हुए हैं फिर भी लोग जानवर छोड़कर बाहर आने के लिए तैयार नहीं हैं.”
रेस्क्यू ऑपरेशन में लगे एडीएम पुनीत कुमार पटेल से भी हमने बात की. वह कहते हैं, “हमने सैकड़ों लोगों को बाहर निकाल लिया है लेकिन अभी भी काफी लोग अंदर फंसे हैं. कुछ लोग अपने जानवर और सामान छोड़कर बाहर नहीं आना चाह रहे हैं. लेकिन हम तो इनकी बकरी, सामान सभी लेकर आ रहे हैं. लोगों को समझाने में लगे हैं, लेकिन कुछ लोग मानने तैयार नहीं हैं. हमारे तहसीलदार साहब उन्हें अंदर मनाने गए हुए हैं.”
208 मीटर के पार पहुंचा जल स्तर, टूटे सभी रिकॉर्ड
बुधवार रात यमुना का जल स्तर 208.8 मापा गया है. यानी खतरे के निशान से भी दो मीटर ज्यादा.
न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, 1978 में आखिरी बार यमुना का जल स्तर सबसे अधिक 207.49 मापा गया था. जो अभी तक रिकॉर्ड माना जाता था.
बता दें कि हरियाणा के हथिनीकुंड बैराज से हर घंटे 1 से 2 लाख क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है. बुधवार को भी हथिनीकुंड बैराज से 30 लाख 70 हजार क्यूसेक से ज्यादा पानी छोड़ा गया है. इसके चलते यमुना का जलस्तर रिकॉर्ड स्तर पर है.
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