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आईआईएमसी के महानिदेशक संजय द्विवेदी के खिलाफ 18 साल पुराने मामले में कानूनी कार्रवाई का फैसला
छत्तीसगढ़ के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के वर्तमान महानिदेशक संजय द्विवेदी के खिलाफ 18 साल पुराने एक मामले में कानूनी कार्रवाई करने का फैसला लिया है.
कार्यपरिषद द्वारा की गई एक आपात बैठक में तीन लोगों के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई पर सहमति जताई गई है. इसमें संजय द्विवेदी, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शाहिद अली और डॉ. आशुतोष मंडावी शामिल हैं. यह फैसला विश्विद्यालय में संविदा नियुक्ति में हुई अनियमितता को लेकर किया गया है. बैठक में विधायक सत्यनारायण शर्मा, धनेन्द्र साहू, वरिष्ठ पत्रकार आवेश तिवारी, राजकुमार सोनी, समेत कुलपति और कुलसचिव मौजूद थे.
बता दें कि छत्तीसगढ़ लोक आयोग द्वारा जांच के निर्देश के बाद विश्वविद्यालय द्वारा एक जांच समिति का गठन किया गया था. तीन सदस्यीय टीम द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट पर कार्यपरिषद के सभी सदस्यों ने अपनी सहमति जताई है. कार्यपरिषद के सदस्यों के अनुसार जांच समिति की रिपोर्ट में आईआईएमसी के मौजूदा महानिदेशक संजय द्विवेदी के दस्तावेजों में बड़ी गड़बड़ी पायी गई.
कार्यपरिषद द्वारा लिए गए फैसले के आधार पर वैधानिक और प्रशासनिक कार्रवाई के लिए यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर को अधिकृत किया गया है.
क्या है मामला?
वर्ष 2004 में छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार द्वारा कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना की गई. आरोप है कि वर्तमान आईआईएमसी महानिदेशक संजय द्विवेदी की उस दौरान की गई संविदा नियुक्ति फर्जी दस्तावेज़ों पर आधारित थी और चयन समिति ने उनका चयन उनकी योग्यताओं और क्षमताओं को देख कर नहीं किया था. इस मामले को बिलासपुर हाईकोर्ट द्वारा कालातीत का होने के कारण खरिज कर दिया गया था.
अब एक बार फिर छत्तीसगढ़ लोक आयोग द्वारा इस मामले को उठाया गया है. लोक आयोग ने उच्च शिक्षा विभाग को एक पत्र लिखा जिसके बाद उच्च शिक्षा विभाग के निर्देश पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने सूक्ष्म जांच समिति का गठन किया.
न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में कार्यपरिषद के सदस्य और छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सोनी ने बताया, “सूक्ष्म जांच समिति की रिपोर्ट कुलपति द्वारा हमारे समक्ष प्रस्तुत की गई. रिपोर्ट कहती है कि यह नियुक्ति गलत थी. जिसके बाद यह फैसला लिया गया कि इस पर उचित वैधानिक कार्रवाई की जाए.”
वहीं इस फैसले की सूचना मिलने के बाद संजय द्विवेदी ने विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिख कर अपनी आपत्ति जताई है. उन्होंने 18 वर्ष पूराने एक मामले पर हो रही कार्रवाई को दुर्भावना से प्रेरित बताया है.
संजय द्विवेदी अपने पत्र में लिखते हैं, “एक मामले में हाईकोर्ट का निर्णय आने के बाद सूक्ष्म जांच समिति या किसी अन्य फोरम से जांच कराना वैध नहीं है. इतना ही नहीं इस मामले में सूक्ष्म जांच समिति या विश्वविद्यालय प्रशासन ने मेरा पक्ष लिए बिना मुझे लांछित करने का षडयंत्र किया, जिससे मेरी सार्वजानिक छवि को आघात पहुंचा है.”
उनका यह पत्र हमारे पास है, लेकिन संजय द्विवेदी ने हमसे बात करने या किसी तरह की टिप्पणी करने से इंकार कर दिया. संजय द्विवेदी के साथ ही कार्यपरिषद ने एक अन्य शिक्षक डॉ शाहिद अली के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की है.
सोनी बताते हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा डॉ. शाहिद अली को नोटिस भेज कर अपना पक्ष रखने को कहा गया है.
हमने कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलसचिव चंद्रशेखर ओझा से इस बारे में सवाल किया कि संजय द्विवेदी से उनका पक्ष जानने के लिए ऐसा कोई नोटिस भेजा गया है? उन्होंने ने इस मामले से जुड़ी कोई भी जानकारी साझा करने से मना कर दिया. वहीं इस बैठक में शामिल कांग्रेस विधायक सत्यनारायण शर्मा ने कहा, “संजय द्विवेदी के खिलाफ कार्रवाई का कोई सवाल नहीं उठता चूंकि वे पहले ही अपने पद से त्यागपत्र दे चुके थे.”
तो फिर कार्यपरिषद ने कानूनी कार्रवाई की सिफारिश क्यों की? इस सवाल पर शर्मा कहते हैं, “जब वो इस्तीफ़ा दे चुके हैं और इस संसथान के कर्मचारी नहीं हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई कैसे की जा सकती है?”
संजय द्विवेदी की IIMC में नियुक्ति पर भी उठ चुके हैं सवाल
संजय द्विवेदी को जुलाई 2020 में आईआईएमसी के महानिदेशक पद पर नियुक्त किया गया था. उनकी इस नियुक्ति पर डॉ. आशुतोष मिश्रा, जिनके द्वारा द्विवेदी की शैक्षणिक योग्यता और कार्य अनुभव को चुनौती देने वाला मामला अभी भी मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में लंबित है, ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर उन्हें इस पद के लिए अयोग्य बताया था.
डॉ. मिश्रा का कहना है कि प्रो. द्विवेदी के पास इस पद के लिए आवश्यक योग्यता नहीं है और उनके खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक मामलों के आरोप लंबित हैं. इस मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने डॉ मिश्रा की शिकायत को यह कह कर ख़ारिज कर दिया कि पत्रकारिता में करियर बनाने के लिए किसी विशिष्ट योग्यता की आवश्यकता नहीं होती है.
जिसके बाद आशुतोष मिश्रा सुप्रीम कोर्ट गए. सर्वोच्च न्यायलय द्वारा भी यह मामला रद्द कर दिया गया.
न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में डॉ मिश्रा ने प्रो द्विवेदी पर ग़लत तरीके से पीएचडी डिग्री हासिल करने का भी आरोप लगाया.
बता दें कि प्रोफेसर द्विवेदी लंबे समय तक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में जनसंपर्क विभाग के विभागाध्यक्ष रहे हैं. मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के साथ ही शिवराज सरकार में उन्हें विश्वविद्यालय का रजिस्ट्रार और प्रभारी कुलपति नियुक्त किया गया था.
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