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'उम्मीद है हम भूखे नहीं मरेंगे': महाराष्ट्र में खाद्यान्न योजना बंद होने पर संकट में ग्रामीण महिलाएं
साल 2018 में जब रेखा वाघमारे 39 साल की थीं, तब उनके पति नामदेव ने आत्महत्या कर ली. पिछले पांच सालों से फसल की बर्बादी से जूझ रहे 42 वर्षीय नामदेव महाराष्ट्र के उन 12,000 से अधिक किसानों में से एक थे जिन्होंने 2015 से 2018 के बीच आत्महत्या की. वह अपने पीछे रेखा, उनके दो बच्चे, 3.5 एकड़ का खेत और 4 लाख रुपए का बकाया कर्ज छोड़ गए.
हिंगोली जिले के नंदूसा गांव की रहने वाली रेखा खेती और दिहाड़ी का काम करती हैं. रेखा को यह चिंता नहीं थी कि वह अपने बच्चों का पेट कैसे भरेंगी, क्योंकि उन्हें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत राशन मिलता था. इस अधिनियम के तहत, राज्य सरकार किसान आत्महत्या से सर्वाधिक प्रभावित 14 जिलों में किसानों को रियायती दरों पर अनाज देती थी. यह जिले थे औरंगाबाद, जालना, बीड, नांदेड़, उस्मानाबाद, परभणी, लातूर, हिंगोली, अमरावती, वाशिम, अकोला, बुलढाणा, यवतमाल और वर्धा.
हिंगोली में रहने वाली रेखा को प्रति माह परिवार के हर सदस्य के लिए पांच किलो राशन मिलता था. वह दो रुपए किलो गेहूं और तीन रुपए किलो चावल खरीदती थीं. लेकिन अब ऐसा नहीं होगा.
28 फरवरी, 2023 को महाराष्ट्र सरकार ने एक प्रस्ताव पारित कर कहा कि इन 14 जिलों में खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत खाद्यान्न का वितरण बंद कर दिया जाएगा. इसके बजाय, हर घर के प्रत्येक सदस्य को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, या डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के रूप में 150 रुपए नकद हर महीने दिए जाएंगे.
"जब अनाज की कीमतें इतनी अधिक हैं तो इतने पैसों में हम क्या खरीद पाएंगे?" रेखा पूछती हैं, "बाजार में गेहूं का भाव 25-30 रुपए किलो से कम नहीं है. चावल की सबसे कम कीमत भी 25 रुपए प्रति किलो है. मुझे नहीं पता कि हम कैसे जिएंगे."
इन जिलों की कम से कम 10 महिलाओं ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि उनकी भी ऐसी ही हालत है. उन्हें इस बात की भी चिंता है कि घर के पुरुष यह पैसा शराब में उड़ा देंगे, और उनके बच्चे भूखे रह जाएंगे.
गौरतलब है कि कर्ज माफी की योजनाओं के बावजूद, राज्य में 2021 के मुकाबले 2022 में किसानों की आत्महत्या बढ़ी है. महाराष्ट्र में पिछले साल केवल आठ महीनों में 1,875 किसानों ने आत्महत्या की.
गरीबों पर कुठाराघात
नामदेव की मृत्यु के बाद, रेखा महीने में लगभग 10-15 दिन सुबह से शाम तक खेत में मजदूरी करती हैं, जिसके लिए उन्हें प्रतिदिन 150-200 रुपए मिल जाते हैं. गर्मी के चार महीनों में खेत में कोई काम होता, इसलिए वह दूसरे छोटे-मोटे काम करती हैं.
अपने काम से वह सालाना लगभग 45,000 रुपए कमा लेती हैं. लगभग 20,000 रुपए उनके पति का कर्ज चुकाने में जाते हैं, जबकि बाकी घर के खर्च, इलाज और बच्चों की शिक्षा पर खर्च होते हैं. नतीजतन, खाने के लिए वह सरकारी राशन पर “पूरी तरह से निर्भर” थीं.
“हम गरीब लोग हैं, मुश्किल से कुछ कमा पाते हैं," उन्होंने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया. “मैं खेती से जो कुछ भी कमाती हूं वह कर्ज चुकाने में चला जाता है. जिस दिन हम फसल बेचते हैं, उसी दिन साहूकार अपना पैसा वापस लेने के लिए हमारे दरवाजे पर होते हैं. मेरे बच्चे स्कूल में हैं; मुझे उनकी किताबों और अन्य जरूरतों की भी व्यवस्था करनी है.”
सरकार का यह निर्णय गरीबों पर कुठाराघात है. "केवल मेरी ही हालत ऐसी नहीं है. ग्रामीण महाराष्ट्र में सैकड़ों महिलाएं इसी परेशानी से गुजर रही हैं,” रेखा ने कहा. "सरकार को हमारी स्थिति पर विचार करना चाहिए और यह प्रस्ताव वापस लेना चाहिए."
29 वर्षीय वर्षा खरवड़े ने 2018 में अपने पति माधवराव की आत्महत्या के बाद एक स्कूल में क्लीनर का काम करना शुरू किया. माधवराव हिंगोली जिले के पारडी गांव में एक किसान थे. तीन साल लगातार फसल खराब हो जाने के कारण वह 1.7 लाख रुपए का कर्ज चुका पाने में असमर्थ थे.
वर्षा को अपनी चार बेटियों की जिम्मेदारी उठानी पड़ी, जिनमें से दो बेटियां माधवराव की पिछली पत्नी से थीं.
उन्होंने कहा, "मुझे स्कूल से 4,500 रुपए वेतन मिलता है. मुझे अपनी बड़ी बेटियों की शादी के लिए लिया गया कर्ज चुकाना है. मैं हर महीने 2,500 रुपए की किस्त चुकाती हूं और बाकी 2,000 रुपए से घर चलाती हूं."
यह 2,000 रुपए घरेलू जरूरतों और कक्षा 7 और 5 में पढ़ने वाली वर्षा की दो छोटी बेटियों की शिक्षा पर खर्च होते हैं.
वर्षा अपनी 1.75 एकड़ भूमि पर खेती भी करती हैं, तुवर और सोयाबीन उगाती हैं. “अगर फसल होती है तो मुझे लगभग एक क्विंटल तुवर मिलता है जिसका उपयोग मैं घर के लिए करती हूं, और दो क्विंटल सोयाबीन मिलता है जिसे मैं 4,000-5,000 रुपए सालाना में बेचती हूं," उन्होंने कहा. "सरकार से सब्सिडी पर मिलने वाला राशन मेरे लिए एक बड़ा सहारा था. भविष्य में स्थिति कठिन होगी."
रेखा की तरह वर्षा भी इस बात से परेशान हैं कि वह एक महीने में प्रति व्यक्ति 150 रुपए से अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे करेंगी. "पहले पेट भरने के लिए कम से कम भाकरी और चटनी तो मिल जाती थी, लेकिन अब वह भी निश्चित नहीं है," उन्होंने कहा. "उम्मीद है कि हम भूख से नहीं मरेंगे."
यवतमाल जिले में रहने वाली 35 वर्षीय उषा कुटे के पति विश्वजीत ने 2016 में आत्महत्या कर ली. लगातार दो वर्षों तक उनकी फसल खराब होने के कारण वह कर्ज नहीं चुका पा रहे थे. उषा के 16 और 15 साल के दो बच्चे हैं.
"हम तीन लोगों के परिवार में लगभग दो से पांच क्विंटल अनाज की सालाना खपत होती है, जिसमें चावल और गेहूं शामिल हैं," उन्होंने कहा. “हमें रियायती मूल्य पर प्रति वर्ष 1.8 क्विंटल अनाज मिलता था और बाजार से केवल 70-80 किलोग्राम अनाज खरीदना पड़ता था. अब हमें 7,000-8,000 रुपए खर्च करने होंगे जो हम जैसे लोगों के लिए बहुत बड़ी रकम है! यह आपके लिए बड़ी बात नहीं होगी, लेकिन हम मुश्किल से 70,000 रुपए सालाना कमाते हैं, और इसका आधा कर्ज चुकाने में चला जाता है. हमारी छोटी आय के लिए यह एक बड़ी राशि है.”
यवतमाल जिले के ही वर्दू जहांगे गांव की रहने वाली अनीता कुबड़े हैं. वह और उनके पति दिहाड़ी मजदूर हैं. वह एक दिन में करीब 200 रुपए कमा लेती हैं.
"सरकार का नया नियम अंततः हमें भुखमरी के कगार पर ले जाएगा," उन्होंने कहा. “हमारे जैसे कई परिवार हैं जो सब्सिडी वाले अनाज की मदद से भुखमरी से लड़ते हैं. अनाज के बदले पैसा देना अच्छी पहल नहीं है. कंट्रोल राशन की दुकान पर हमें 2 रुपए किलो के हिसाब से गेहूं और 3 रुपए किलो के हिसाब से चावल मिलते हैं. अब हमें बाजार भाव पर अनाज खरीदना होगा, जिसमें उतार-चढ़ाव होता रहता है. सामान्य गेहूं की कीमत 25-30 रुपए प्रति किलो और चावल की कीमत करीब 40 रुपए प्रति किलो है. हम इतनी महंगी दरों पर अनाज कैसे खरीद पाएंगे?"
नए प्रस्ताव के तहत पैसा सीधे उनके बैंक खातों में ट्रांसफर किया जाएगा. अनीता ने बताया कि इसमें क्या परेशानी है. "हमारे गांव में बैंक नहीं है. इसके लिए हमें लगभग चार किमी दूर झाड़गांव जाना पड़ता है,” उन्होंने कहा. "झाड़गांव आने-जाने का खर्चा 50 रुपए है. अगर हमें किसी और बैंक में जाना हो तो इसमें हमें अपनी 200 रुपए की दिहाड़ी से भी हाथ धोना पड़ सकता है. तो 150 रुपए पाने के लिए हमें 250 रुपए खर्च करने होंगे."
उन्होंने कहा कि अगर पैसा परिवार के पुरुषों के खातों में जाता है, तो “हो सकता है कि वह हम तक कभी भी न पहुंचे. वह अनाज की बजाय किसी दूसरे काम के लिए उसका उपयोग करेंगे".
महिला किसानों से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता सीमा कुलकर्णी ने कहा कि आप सोच भी नहीं सकते हैं कि यह महिलाएं किस हद तक सब्सिडी वाले खाद्यान्न पर निर्भर हैं.
"कोविड के दौरान पीडीएस ने इन्हें त्रासदी से बचाया था," उन्होंने कहा. "सरकार के हालिया फैसले से उनकी खाद्य सुरक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ेगा. इन परिवारों की महिलाओं को इस मनमाने फैसले का सबसे बुरा खामियाजा भुगतना पड़ेगा. नकद राशि का अक्सर घर के पुरुष दूसरा उपयोग कर लेते हैं और वह महिलाओं तक नहीं पहुंचती."
कुलकर्णी ने कहा कि परिणामस्वरूप महिलाएं इस नई योजना का "कड़ा विरोध" कर रही हैं.
न्यूज़लॉन्ड्री ने टिप्पणी के लिए खाद्य मंत्री रवींद्र चव्हाण से संपर्क करने की कोशिश की. अगर उनका जवाब मिलता है तो यह रिपोर्ट संशोधित कर दी जाएगी.
(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
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