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छत्तीसगढ़ के विस्थापित आदिवासी: क्या वे 17 साल बाद भी घर जा सकते हैं?
पिछले साल अप्रैल के महीने में दूधी गंगा मृत पाए गए थे, उनका शव छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में कोंटा के पास सड़क के किनारे पड़ा हुआ मिला था.
35 वर्षीय गंगा, छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के अरलमपल्ली गांव के आदिवासी थे. खबरों के अनुसार, वह माओवादी हिंसा के डर से 2015 में राज्य से भाग गए थे. गंगा ने आंध्र प्रदेश के गेलेटवाड़ा गांव में एक नया जीवन बसाया था.
उनकी मृत्यु के कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का एक प्रतिनिधिमंडल, जो या तो माओवादियों या सलवा जुडूम के कारण विस्थापित हुए थे, ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकात की और छत्तीसगढ़ में पुनर्वास की मांग की थी. न्यू पीस प्रोसेस नामक एक समूह के नेतृत्व में उन्होंने 154 आदिवासियों के नाम प्रस्तुत किए, जो वर्तमान में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में रह रहे हैं और घर लौटना चाहते हैं.
इस सूची में दूसरा नाम गंगा का था.
इस बैठक के तुरंत बाद, गंगा ने न्यू पीस प्रोसेस के सदस्यों को बताया था कि वह हर 12 साल में होने वाले डूडी कबीले समारोह में भाग लेने के लिए सुकमा में अपने मूल गांव जा रहे थे.
गंगा कभी नहीं लौटे. अक्टूबर में माओवादियों द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, माओवादियों ने उनकी मौत की जिम्मेदारी ली, उनका मानना था कि वह जुडूम का सदस्य था और उसने ग्रामीणों के खिलाफ "अत्याचार" में भाग लिया था.
गंगा अपने पीछे दो पत्नियां छोड़ गए हैं. उनकी कोई संतान नहीं थी. उनकी मृत्यु ने पुनर्वास प्रक्रिया में भी बाधा डाल दी.
न्यू पीस प्रोसेस के संयोजक शुभ्रांशु चौधरी ने कहा, "उसकी हत्या के बाद, सूची में अपना नाम डालने वालों में से कम से कम 50 प्रतिशत अपना नाम वापस लेना चाहते थे." सूची कैसे तैयार की गई, इस पर उन्होंने कहा कि जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने इसके लिए कहा तो आदिवासियों ने खुद इसे तैयार किया.
लेकिन यह पहला पुनर्वास प्रयास नहीं है जो पटरी से उतर गया है. 2019 में 35 परिवारों को आंध्र प्रदेश से वापस छत्तीसगढ़ में बसाया गया था, लेकिन वे एक महीने बाद ही छोड़ गए जब एक माओवादी ने एक स्थानीय व्यक्ति को मार डाला. चौधरी ने कहा, "वे डरे हुए थे कि अगले वे ही होंगे."
नतीजतन, जैसा कि कई विस्थापित आदिवासियों ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि "घर जाना" अब विकल्प नहीं है. गंगा की तरह "मुखबिर" होने के संदेह में हत्या का डर हमेशा बना रहता है. पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 2000 से 2020 के बीच, 1,769 आदिवासियों को पुलिस मुखबिर होने के संदेह में मार दिया गया. माओवादी होने के झूठे आरोप में सुरक्षा बलों द्वारा सैकड़ों और लोगों को गिरफ्तार किया गया है.
मडकम देवा, जो 2007 में छत्तीसगढ़ छोड़कर तेलंगाना के लिए रवाना हुए थे, अप्रैल 2022 में विस्थापित आदिवासियों के पुनर्वास पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करने के लिए दिल्ली गए प्रतिनिधिमंडल के सदस्य थे. गंगा की मृत्यु के बाद उन्हें मरने की भी चिंता सता रही थी.
देवा ने कहा, “छत्तीसगढ़ के हालात अभी भी नहीं सुधरे हैं. हत्याएं अभी तक नहीं रुकी हैं. यहां कम से कम हमारे पास कुछ शांति है और कुछ रुपए कमाने का अवसर है. अगर मैं वापस जाता हूं तो मैं आसान निशाना बन सकता हूं.”
मडकम संभू, जो 2005 में सिर्फ 18 साल की उम्र में छत्तीसगढ़ के बस्तर से तेलंगाना भाग गए थे, उन्होंने भी न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि वह उस राज्य में वापस नहीं जाना चाहते हैं जो कभी उनका घर हुआ करता था.
उन्होंने कहा, "जब तक यह युद्ध जारी रहता है, तब तक हमारे लिए वापस लौटना सुरक्षित नहीं है. हम फिर से गोलीबारी में फंस सकते हैं. कम से कम यहां ऐसी कोई आशंका नहीं है और हम रोजी-रोटी कमाने में सक्षम हैं.”
घर जा रहे हैं, पर कैसे?
इस साल 4 अप्रैल को, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने घोषणा की कि उनकी सरकार विस्थापित आदिवासियों की वापसी की सुविधा प्रदान करेगी. बघेल ने हाल ही में न्यू पीस प्रोसेस प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की थी और उन्हें आश्वासन दिया था कि वह उनकी वापसी के लिए अनुकूल माहौल तैयार करेंगे.
बघेल के कार्यालय से एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, “सलवा जुडूम के दौरान छत्तीसगढ़ के सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा जिले से जिन्होंने पलायन किया और अब वापस आना चाहते हैं, उन्हें राशन की दुकान, स्कूल, रोजगार सहित खेती के लिए जमीन समेत हर तरह की सुविधा मुहैया कराई जाएगी.”
चौधरी, जो बघेल के साथ बैठक का हिस्सा थे, ने कहा कि यह तय किया गया था कि जो आदिवासी वापस लौटना चाहते हैं, उन्हें शुरू में उनकी सुरक्षा के लिए सड़क किनारे शिविरों में बसाया जाएगा. प्रेस विज्ञप्ति में इस बारे में कोई विवरण नहीं था कि यह पुनर्वास कैसे होगा.
मई में छत्तीसगढ़ सरकार ने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में विस्थापित आदिवासियों का सर्वेक्षण यह जानने के लिए किया कि वे वापस लौटना चाहते हैं या नहीं. सुकमा के जिला कलेक्टर हारिस एस ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि दोनों राज्यों में लगभग 85 गांवों को कवर करने के लिए पांच टीमों को भेजा गया था.
उन्होंने कहा, “हमने लगभग 9,700 ग्रामीणों से बात की. केवल आठ या नौ ने कहा कि वे वापस आना चाहते हैं. हमने सर्वेक्षण के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार की और जून में इसे उच्च अधिकारियों को भेज दिया." उन्होंने कहा कि वे अभी भी कार्रवाई के लिए आगे की प्रक्रिया के निर्देश का इंतजार कर रहे हैं. न्यूज़लॉन्ड्री इस रिपोर्ट की कॉपी तक पहुंचने में असमर्थ रही.
तब से छह महीने बीत चुके हैं और कोई बात नहीं हुई है.
पूर्व विधायक मनीष कुंजम, छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा विस्थापित आदिवासियों को "सड़क के किनारे" पुनर्वसित किए जाने की योजना के आलोचक थे.
उन्होंने कहा, “सबसे पहले, हमारे लोग स्वतंत्र रूप से घूमना पसंद करते हैं. उन्हें पशुओं और अन्य चीजों के लिए जमीन की जरूरत होगी. हमारे लोग कैद में नहीं रह सकते. दूसरा, कोई भी खाली जमीन या तो गांव की होती है या गांव की सीमा पर होती है. इसलिए, वन अधिकार अधिनियम और अनुसूचित क्षेत्रों के लिए पंचायत विस्तार अधिनियम के अनुसार वहां एक गांव स्थापित करने के लिए ग्राम पंचायत की अनुमति लेनी होगी, और मुझे नहीं लगता कि कोई गांव अपनी जमीन देगा. इसलिए मुझे नहीं लगता कि यह एक व्यावहारिक समाधान है."
उनका मत है कि विस्थापित आदिवासियों को उनके मूल गांवों में बसाया जाना चाहिए, जिसके लिए राज्य सरकार को सर्व आदिवासी समाज और कोया समाज जैसे आदिवासी निकायों के साथ परामर्श करने की जरूरत होगी.
आदिवासियों के लौटने से डरने पर कुंजम ने कहा कि "शीर्ष माओवादी नेताओं" को उनकी वापसी से "कोई समस्या नहीं" है. उनका कहना था कि मुद्दा स्थानीय माओवादी नेताओं के साथ है, जो "अजीब निर्णय लेते हैं और शीर्ष नेतृत्व के ज्ञान के बिना हत्याओं को भी अंजाम दे सकते हैं.” उनकी उम्मीद है कि आदिवासी निकाय, जो अक्सर इन नेताओं के साथ दूरदराज के गांवों में मिलते हैं, लौटने के इच्छुक लोगों के लिए मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं.
कुंजम ने यह भी कहा कि यह केंद्र सरकार पर निर्भर है कि वह हस्तक्षेप करे और इन मुद्दों को सुलझाए. उन्होंने बताया, "इसमें तीन राज्य शामिल हैं. केंद्र सरकार का हस्तक्षेप आवश्यक है."
न्यू पीस प्रोसेस से जुड़े चौधरी भी इससे सहमत हुए. उन्होंने वन अधिकार अधिनियम के खंड 3.1.एम का हवाला दिया, जो अनुसूचित जनजातियों और पारंपरिक वनवासियों को "इन सीटू अर्थात मूल जगह पर पुनर्वास का अधिकार" देता है.
उन्होंने कहा, "यह समस्या लंबे समय से चली आ रही है और इसके जल्द समाधान की जरूरत है. तेलंगाना और आंध्र प्रदेश भी यहां पीड़ित हैं और उन्हें स्थायी समाधान के लिए प्रक्रिया शुरू करने के लिए केंद्र पर दबाव डालना चाहिए. लेकिन छत्तीसगढ़ को अग्रिम पहल करनी चाहिए, जहां आईडीपी (आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों) ने अपने आवेदन किए हैं लेकिन इतने सालों में उनके लिए कोई काम नहीं किया गया है.”
2019 में क्या गलत हुआ?
17 साल पहले विस्थापित हुआ कोई आदिवासी, अगर अब अपने पैतृक गांव लौटता है तो क्या उसका घर में स्वागत होगा?
यह जमीन पर कैसे होगा, इसकी एक छवि जंगलों के अंदर स्थित मराइगुडा गांव में देखी गई.
मरैगुदा छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के एक शहर और तहसील कोंटा से लगभग 30 किमी दूर है. यात्रियों को कोंटा से सुकमा जाने के लिए हाईवे से उतरना पड़ता है और एराबोर से गगनपाली नामक गांव तक कीचड़ भरी, कच्ची सड़क लेनी पड़ती है. एक झील को पार करके और सात किमी तक एक झाड़ीदार रास्ते पर चलकर आप यहां पहुंचते हैं.
2019 में, यहीं पर आंध्र प्रदेश के कन्नापुरम गांव में रहने वाले 35 विस्थापित आदिवासियों के परिवारों के पुनर्वास का प्रयास किया गया था. चौधरी ने कहा कि परिवारों ने 2018 में मदद के लिए उनसे संपर्क किया और उनसे "जितनी जल्दी हो सके" घर वापसी का आयोजन करने के लिए कहा ताकि वे अगली फसल के मौसम के लिए अपनी जमीन तैयार कर सकें.
चौधरी और उनकी टीम ने सुकमा के जिला कलेक्टर चंदन कुमार से मुलाकात की, जिन्होंने चौधरी को "इसे लिखित में प्राप्त करने" के लिए कहा कि मरैगुदा के ग्रामीण "विस्थापित आदिवासियों का वापस स्वागत करेंगे और उनके साथ रहेंगे".
टीम ने ऐसा ही किया. चौधरी ने कहा, "हम मरैगुदा गए और एक प्रस्ताव लिखा, 'हम उनका स्वागत करते हैं, वे हमारे लोग हैं, कृपया उन्हें वापस लाएं.' इस पर सभी ग्रामीणों ने हस्ताक्षर किए थे. हमने ग्रामीणों से यह भी पूछा कि क्या दादालोग" - माओवादियों के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द - "इसे ठीक मानेंगे, और उन्होंने हामी भरी थी."
चौधरी ने हस्ताक्षरित प्रस्ताव जिला कलेक्टर को सौंपा और आदिवासियों को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू हुई. वे मार्च 2019 में छत्तीसगढ़ लौट आए.
लेकिन 35 परिवार बस एक महीने के लिए मरैगुदा में रुके, इसके बाद वे बोरिया-बिस्तर बांधकर चले गए.
गांव के स्कूल के एक शिक्षक ने कहा कि परिवारों को "यहां आकर फिर से एडजस्ट करना बहुत मुश्किल लगता है". एक अन्य गुमनाम ग्रामीण ने कहा कि "हत्या हुई, जिसके बाद वे चले गए". कोई भी ऑन रिकॉर्ड बोलने को तैयार नहीं था, यहां तक कि किसी पत्रकार से बात करने को भी तैयार नहीं था.
चौधरी ने, हालांकि, "हत्या" की बात को दोहराया, यह कहते हुए कि एक माओवादी ने एक ग्रामीण को मार डाला था और 35 परिवार दहशत में छोड़ गए. लेकिन उन्होंने सीधे तौर पर पुलिस पर दोष मढ़ दिया.
उन्होंने आरोप लगाया, “पुलिस ने गांव में लौटने वाले आदिवासियों का दौरा किया और उनका ‘स्वागत करते हुए’ बयान भी जारी किए. यह स्पष्ट था कि माओवादी प्रतिक्रिया देंगे. एक और ग्रामीण के मारे जाने के बाद, लौटे हुए आदिवासी डर गए, चिंतित थे कि अगला नंबर उनका होगा.”
उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि उनके पुनर्वास के इस प्रयास को, जानबूझकर या अनजाने में, पुलिस ने सोच-समझकर तोड़ दिया था." उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उन्होंने पुलिस को इस प्रक्रिया से "दूर रहने" के लिए कहा था, लेकिन उन्होंने इसके विपरीत किया.
लेकिन यह कहानी उन विस्थापित आदिवासियों को हैरान नहीं करती जिन्होंने न्यूज़लॉन्ड्री से बात की.
अब तेलंगाना के भद्राद्री कोठागुडेम के पलेवागु टोले में रहने वाले एक विस्थापित आदिवासी वंगाराम वंजम पूछते हैं कि पीछे रह गए ग्रामीण उनका स्वागत क्यों करेंगे.
उन्होंने कहा, "कुछ ग्रामीण मारे गए, कुछ जुडुम में शामिल हो गए, कुछ हिंसा से बचने के लिए यहां आए. अब, अगर हम कहते हैं कि हम वापस जाना चाहते हैं, तो वे हमें स्वीकार नहीं करेंगे. वे कहेंगे कि जब लोग मारे जा रहे थे तब हम भागे थे, और वो ही थे जो इन सब से गुजरे और जमीन को बचाया. अब वे हमें जमीन क्यों देंगे?”
2005 में छत्तीसगढ़ छोड़ने वाले आदिवासियों की एक बड़ी संख्या वाले पलेवागु गांव के कई अन्य ग्रामीणों ने कहा कि वे कभी भी वापस नहीं जाना चाहते हैं, भले ही उनके पास एक जलधारा के अलावा बिजली, स्कूल, अस्पताल या यहां तक कि पीने का पानी भी नहीं है.
वंजम ने कहा, "भले ही यहां सुविधाएं कम हैं, लेकिन यहां जीवन शांतिपूर्ण है. कौन मारे जाने के लिए वापस जाना चाहता है? यहां कम से कम इस तरह के तनाव नहीं हैं. यहां से अस्पताल जाना मुश्किल होता है और हम अक्सर इलाज के लिए वन्य जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन हम तब भी इस जगह से प्यार करते हैं.”
लेकिन वट्टम सतीश, जिन्होंने 2007 के मध्य में छत्तीसगढ़ को स्व-परिभाषित "नारकीय जीवन" से बचने के लिए छोड़ दिया था, इससे आश्वस्त नहीं हैं. वह कुछ अन्य लोगों के साथ बीजापुर के विधायक विक्रम मंडावी से पिछले साल फरवरी और जून में दो बार इस उम्मीद में मिले थे कि उन्हें छत्तीसगढ़ में सरकारी जमीन आवंटित हो जाए, ताकि वे वापस लौट सकें.
लेकिन वे कड़वे स्वर में कहते हैं, "लेकिन कुछ नहीं हुआ. यहां हम सरकार की दया पर रहते हैं. हमारे साथ क्या होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है. आज उन्होंने हमारी जमीन छीन ली है. कल वे हमें जाने के लिए भी कह सकते हैं. मैं जीवन भर दौड़ता रहा हूं. क्या मेरे बच्चे भी उसी राह चलेंगे?”
तीन भागों में आने वाली रिपोर्ट्स की श्रृंखला का यह दूसरा भाग है. पहला यहं पढ़ें.
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