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उदयपुर में हिंदू दर्जी की हत्या का रथ यात्रा पर असर
1 जुलाई को उदयपुर के जगन्नाथ मंदिर से रथ यात्रा निकली. यह यात्रा करीब एक लाख श्रद्धालुओं तथा शरबत, लस्सी, चाय और पकोड़े बेचती दुकानों से भरी शहर की पुरानी और संकरी गलियों से होकर निकली. कोविड की वजह से पिछले दो सालों से त्योहार न मना पाने के कारण इस साल भीड़ काफी ज्यादा रही. लेकिन लोगों का बड़ी संख्या में उमड़ने का एक कारण और भी था, दो कट्टरपंथी मुसलमान युवकों के द्वारा हिंदू दर्जी कन्हैया लाल तेली की निर्मम हत्या के कारण समाज में भावनाएं भड़की हुई थीं, और यात्रा में भी इस तनाव को महसूस किया जा सकता था.
हाथों में हनुमान तथा महाराणा प्रताप के चित्र बने भगवा झंडे लिए मोटर साइकिल पर सवार लोग गलियों से गुजरते हुए "जय श्री राम", "वंदे मातरम" और "भारत में यदि रहना होगा तो वंदे मातरम कहना होगा", के नारे लगा रहे थे. इनमें से आखिरी नारा साफ तौर पर मुस्लिम समुदाय की ओर केंद्रित था, जो अधिकतर ऐतिहासिक शहर उदयपुर की दीवार से घिरे इलाके में रहते हैं."
भक्तों को भोजन करने के लिए मंदिर की पार्किंग में स्थापित रसोई के एक स्वयंसेवी पंकज कुमार सेन कहते हैं, "यह उदयपुर के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है. लोग भगवान जगन्नाथ की पूजा करने पूरे भारत से आते हैं. कर्फ्यू और दुर्भाग्यपूर्ण घटना की वजह से भीड़ कुछ हद तक कम है."
कन्हैयालाल की हत्या के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने जवाब देते हुए जरा सा भी संकोच नहीं दिखाया. पंकज ने कहा, "सब हिंदू संगठित हो गए हैं. शहर के वह लोग जो पहले यात्रा से दूर रहते थे, अब साथ आ गए हैं. यह एक शक्ति प्रदर्शन है. यात्रा एक संदेश है की हम कन्हैयालाल के परिवार के साथ खड़े हैं. हम चरमपंथियों के कायरता से भरे कदमों से डरने वाले नहीं हैं."
शहर के कुछ नागरिकों ने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा कि शहर में अभी तक हिंदू और मुसलमान शांतिपूर्ण ढंग से रहते रहे हैं, लेकिन कन्हैया लाल की हत्या ने इसमें दरार डाल दी है.
राजस्थान के थार के इलाके में बसे शहरों की तुलना में, अरावली में बेस उदयपुर का मौसम ठंडा रहता है, लेकिन इस समय शहर में एक अजीब सी शांति छाई हुई है जैसे कि यह समझ नहीं आ रहा कि इस परिस्थिति का सामना कैसे किया जाए. शहर के लोग कन्हैयालाल के दुखी परिवार से सहानुभूति जताते हैं और अशोक गहलोत की सरकार के प्रति गुस्सा और झल्लाहट प्रकट करते हैं. लोगों को कहते सुना जा सकता है, "उसे धोखे से मारा गया." "शहर के कुछ हिस्सों में आतंकवादियों को पनाह दी गई है." "आतंकवादियों को तुरंत फांसी दी जानी चाहिए."
उदयपुर कलेक्ट्रेट के एक अधिकारी कहते हैं, "इस बात में सच्चाई है की अविश्वास बढ़ गया है. अब हमारा नजरिया एक नहीं रहा है. मेरे 15-20 मुसलमान दोस्त हैं, लेकिन उन सब का दवा है की यह हत्या उनके धर्म के खिलाफ है. उनका कहना है, “कोई धार्मिक व्यक्ति कभी ऐसा नहीं करेगा. यह हमारे धर्म के खिलाफ था."
उन्होंने बताया की यात्रा के लिए इस साल हत्या की वजह से शहर से काफी ज्यादा लोग आए जबकि शहर के बाहर से आने वालों की संख्या कम रही. योजना समिति के एक सदस्य राजेंद्र श्रीमाली के अनुसार श्रद्धालुओं की संख्या करीब एक लाख रही.
शहर में एक रेस्टोरेंट के मलिक महेंद्र प्रकाश का कहना है, “यात्रा हमारे धर्म पर सवाल उठाने वालों के लिए करारा जवाब थी.” श्रद्धालुओं को पकौड़े बेचने के लिए दुकान लगाने में व्यस्त प्रकाश कहते हैं, "मुसलमानों की तरह ही हम भी अपने धर्म में गहरा विश्वास रखते हैं. कन्हैयालाल गरीब परिवार से आने वाले एक साधारण व्यक्ति थे. उन्हें धोखे से मारा गया."
एक स्वयंसेवी कुलदीप सिंह राठौड़ पुराने शहर के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र को शक की निगाह से देखते हैं. हत्या के मुख्य आरोपियों मोहम्मद रियास अत्तारी और गौस मोहम्मद के मोहल्ले को लेकर वह कहते हैं, "खांजी पीर आतंकवादियों की स्लीपर सेल में बदल गया है. वहां हिंदुस्तान के अन्य इलाकों से आकर लोग रहने लगे हैं. उन सभी को निकाल देना चाहिए."
20 वर्षीय गौरव सिंह रूखेपन से कहते हैं, "अभी कुछ मत पूछिए. परिस्थिति तनावपूर्ण है."
एक होटल चलाने वाले लक्ष्मण सिंह कहते हैं, "देखिए उनके पास 2611 नंबर वाली एक मोटरसाइकिल थी. इसका मतलब है कि वह ऐसा जघन्य अपराध करने के लिए बस एक बहाना ढूंढ रहे थे." वह बताते हैं कि 2611 असल में 2008 मुंबई हमलों का एक कोड है. पुलिस ने बताया कि RJ27AS 2611 नंबर वाली मोटरसाइकिल जिसका पंजीकरण अत्तारी के नाम पर है अपराध में इस्तेमाल हुई थी.
दुपहिया वाहन किराए पर देने की एक दुकान चलाने वाले 75 वर्षीय शहर के निवासी उदयपुर के इस शोकपूर्ण हालात पर खेद व्यक्त करते हैं. "अपने इकलौते बेटे के सेटल न होने के कारण" अपनी पहचान बताने से माना कर रहे इस नागरिक ने कहा, "शहर कभी भी ज्यादा शांतिपूर्ण नहीं रहा. हत्याएं तो हुई हैं लेकिन सांप्रदायिक सद्भाव बना रहा. लेकिन अब ऐसा नहीं है." उन्होंने सरकार पर "ऐसे लोगों का समर्थन" करने का इल्जाम लगाया. "यह तभी रुक सकता है जब दिनेश एमएन जैसे अफसर हों. नेताओं को उनका अनुसरण करना चाहिए."
दिनेश उदयपुर के एसपी या उदयपुर रेंज के आईजी नहीं हैं. वह राज्य की एंटी करप्शन ब्यूरो के अतिरिक्त डायरेक्टर जनरल हैं और उन्हें शहर को सांप्रदायिक उन्माद में डूबने से बचाने के लिए लाया गया है.
2004 में जब वे उदयपुर के एसपी थे, तब उन पर सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर का इल्जाम लगा था. 2017 में मुंबई अदालत में दिनेश को बरी कर दिया. 28 जून की हत्या के बाद उदयपुर के आला अधिकारी एक कदम पीछे हो गए हैं और दिनेश के नियंत्रण में सब कुछ हो रहा है. जहां भी वह जाते हैं, युवक दौड़कर उनके साथ सेल्फी लेने के लिए आते हैं. गुरुवार को जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कन्हैयालाल के घर गए, तब वहां एकत्रित भीड़ ने "दिनेश एमएन जिंदाबाद" के नारे लगाए, जबकि दिनेश उस समय वहां मौजूद नहीं थे. इससे एक दिन पहले जब गुस्साई भीड़ ने उस कब्रिस्तान का बोर्ड हटाने का प्रयास किया, जिसके बगल वाले श्मशान में कन्हैयालाल का अंतिम संस्कार हुआ था, तब भी दिनेश ने उन्हें शांत कर दिया था.
पुलिस बंदोबस्त
शाम 4:30 बजे शुरू हुई यात्रा के ऊपर ड्रोन उड़ रहा था और पुलिस के आला अधिकारी अपनी सुनिश्चित जगहों से नजर रख रहे थे. करीब 2000 पुलिसकर्मी आंसू गैस के गोले और ढाल लिए हुए किसी भी अप्रिय घटना से निपटने के लिए तैयार खड़े थे. रथ पर भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के साथ बड़े डीजे उपकरणों पर संगीत बजने लगा. साथ ही शंख, डमरू की आवाज और बढ़ा दी. भीड़ नारे लगा रही थी, "हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैयालाल की", जगदीश चौक बॉलीवुड के भजनों की धुनों से गूंज रहा था.
जैसे-जैसे रथ आगे बढ़ा डीजे पर बैठे हुए एक आयोजक ने अचानक आवाज कम की और घोषणा की, "तलवार लिए हुए यह युवक कौन है? इसे हटाइए. हमें इतने संघर्ष के बाद यात्रा आयोजन करने की मंजूरी मिली है. कृपया इसे शांतिपूर्ण बनाए रखें."
शहर के अन्य इलाकों के लोग अपने अपने जुलूसों के साथ मुख्य यात्रा में मिल गए. जीप मैं बैठे हुए सेना के जवानों को दिखाती झांकी भी शामिल हुई. कई अलग-अलग संस्थाओं ने उदयपुर के अन्य हिस्सों से देवी और देवताओं का भी चित्रण किया.
शहर में कर्फ्यू लगा होने की वजह से, पुलिस ने पहले की तरह यात्रा को मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों से गुजरने की मंजूरी नहीं दी. छोटी यात्राओं की संख्या में भी बड़ी कमी आई थी. करीब छह घंटे बाद जब यात्रा सूरजपोल पहुंची, तो दो किलोमीटर तक उसका अंत ही दिखाई नहीं पड़ रहा था. करीब 5.5 किलोमीटर की यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ आधी रात के बाद मंदिर लौटे. दिन की शुरुआत में कई हिंदुत्ववादी संगठनों के करीब 500 लोगों ने बाजार में कन्हैया लाल के लिए न्याय की मांग करते हुए जुलूस निकाला था. शाम के लगभग 7:00 बजे करीब 200 लोग शहर के मुख्य चौराहे पर एकत्रित हुए और उन्होंने पाकिस्तान और मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ नारेबाजी की.
एक गाइड सत्यनारायण सिंह तंवर कहते हैं, "यहां मुसलमान प्रबल हो गए हैं. जो भी हमारे धर्म पर सवाल उठाएगा, उसे छोड़ा नहीं जाएगा. हम अपनी जान देने के लिए तैयार हैं."
'पुलिस पर विश्वास करें'
मालदास स्ट्रीट पर कन्हैयालाल की दुकान "सुप्रीम टेलर्स" से कुछ ही दूरी पर स्थित भोरावाड़ी मोहल्ला वह इलाका था, जहां हत्या की रात लोगों का गुस्सा सबसे पहले फूटा. दोनों समुदायों ने एक दूसरे के ऊपर पत्थरबाजी की. 50 वर्षीय मोहम्मद फिरोज कहते हैं, "सारे पत्थर बस शहर के दूसरे इलाकों से थे. मेरी दो बाइक जला दी गईं और एक स्कूटी जर्जर हालत में बची है. यह व्यापारी बोहरा समुदाय का इलाका है. लेकिन हम प्रशासन और पुलिस में विश्वास रखते हैं कि वे हमारी सुरक्षा करेंगे. हम तनाव और डर में रह रहे हैं."
कुछ किलोमीटर दूर अत्तारी और गौस के निवास खांजीपीर में, वहां की सभासद 60 वर्षीय शम्मा खान हत्या की भर्त्सना करती हैं, "धर्म हमें एक दूसरे से नफरत करना नहीं सीखाता. अमन और चैन को तोड़ा गया है. दोनों समुदाय तनाव में हैं."
उदयपुर में पहले भी इस प्रकार की लड़ाईयां हुई हैं. लेकिन शांति बनाए रखने की जारी लड़ाई कठिनतम लड़ाईयों में से एक है. सांप्रदायिक सद्भाव को कितनी हानि पहुंची है यह तो कर्फ्यू हटने के बाद ही पता चल पाएगा.
(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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