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संघ समर्पित मीडिया का पत्रकारिता अवार्ड और खुशकिस्मत चेहरे
लाल कालीन बिछा हुआ था, कैमरे जमे हुए थे और समारोह का दीपक प्रज्वलित हो चुका था. मंच पर चकाचौंध रोशनी का नृत्य हो रहा था. दिल्ली स्थित होटल अशोक के समारोह कक्ष में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्रों पाञ्चजन्य और ऑर्गनाइजर की 75वीं वर्षगांठ का समारोह 22 मई को संपन्न हुआ. समारोह का मुख्य कार्यक्रम मीडिया महामंथन नाम का एक आयोजन था, जो मीडिया के हालात के सर्वेक्षण और पत्रकारिता में "उत्कृष्टता, गहराई, गुणवत्ता और प्रभाव" को सम्मान देने के लिए था.
11 घंटे के मैराथन समारोह में भाजपा शासित सात राज्यों के मुख्यमंत्रियों का आना-जाना हुआ, व्यस्तता के कारण उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ऑनलाइन जुड़े. भाजपा के नफरत फैलाने वाले नेता कपिल मिश्रा को लोगों ने सुना. सरकारी और कॉरपोरेट पत्रकारों के हुजूम को पुरस्कार मिलते हुए तालियां बजाई गईं. (जी हां, यह हमारे लिए भी एक ख़बर थी.)
दिन, आशा के अनुरूप ही चला. श्रोताओं को किसी भी अप्रत्याशित पल से बचाने के लिए यहां वाद विवाद और बातचीत के मुद्दे समान नागरिक संहिता, गौ-हत्या, मदरसे, लाउडस्पीकर, बुलडोजर और सच्चे या काल्पनिक प्राचीन मंदिरों के पुनरुद्धार तक ही सीमित रहे.
"मीडिया और बोलने की आजादी" पर रखे गए पहले सत्र में, सोशल मीडिया एनफ्लुएंसर की पदवी प्राप्त शेफाली वैद्य, नफरत के कारखाने चलाने वाला कपिल मिश्रा, टीवी पर हर दिन, हर विषय पर साधिकार बोलने वाले आनंद रंगनाथन, लोक गायिका मालिनी अवस्थी और मुसलमानों पर टिप्पणी करने वाले अंशुल सक्सेना मौजूद थे. इस सत्र का संचालन वैसे इसे निर्देशन कहना बेहतर होगा- ऑर्गेनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर और पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर बारी-बारी से कर रहे थे.
केतकर ने बातचीत की शुरुआत उच्चतम न्यायालय के 1950 बृजभूषण केस में दिए गए निर्णय से की, और बताया कि इस निर्णय ने किस प्रकार जवाहरलाल नेहरू को पहले संविधान संशोधन के जरिए अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार में कटौती करने से रोक दिया था. इसके बाद उन्होंने अपना रुख वहां मौजूद पैनल की ओर मोड़ते हुए रंगनाथन को "अभिव्यक्ति का उग्रवादी" घोषित कर दिया.
यह इशारा था जब रंगनाथन ने अपना व्यक्तित्व "ब्लैक एंड व्हाइट" घोषित कर दिया. यह जानकारी उनके लिए खास है जो हर रात टीवी पर उन्हें देखकर भी अब तक समझ नहीं पाएं हैं. रंगनाथन ने कहा, "मुझे ग्रे पसंद नहीं है, क्योंकि ग्रे में लोगों को अपना पाखंड छुपाने का मौका मिल जाता है."
रंगनाथन ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रतन लाल के बोलने की आजादी के अधिकार का समर्थन किया, जिन्हें पिछले सप्ताह वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद में मिले तथाकथित शिवलिंग को लेकर की गई आपत्तिजनक पोस्ट लिखने के लिए गिरफ्तार किया गया था. उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि हर कोई सलमान रश्दी और शार्ली हेब्दो के पत्रकारों- जिन का सर कलम किया गया और गोली मार दी गई थी- के साथ खड़ा रहेगा. (पत्रकारों को गोली मार दी गई थी. एक अध्यापक का चार्ली हेब्दो के कार्टून अपने छात्रों को दिखाने की वजह से सर काट दिया गया था.) अगर आप उनके साथ खड़े हैं, इसका अर्थ है कि आप उनके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करना चाहते हैं. आप भले ही उनसे राजी न हों, लेकिन आप यह चाहते हैं कि वह जो भी बोलना चाहते हैं उसे बोलें. तो फिर यहां यह पाखंड क्यों? रतन लाल ने जो कहा मुझे वह अच्छा नहीं लगता लेकिन उन्हें यह कहने का हक है."
संभवतः कार्यक्रम का यह इकलौता अवसर था जहां कुछ तार्किक बात हुई. इसके बाद पूरा सत्र इल्जाम लगाने, व्हाटअबाउटरी और मरणासन्न हो चुकी कांग्रेस की आलोचना पर केंद्रित रहा. कपिल मिश्रा खासतौर से पूरी रौ में थे, लोग उनकी बात पर ठहाके लगाते रहे. सुपर एक्सक्लूसिव "अच्छी खबर" को ब्रेक करते हुए, मानो वो एक प्राइम टाइम एंकर हों. उन्होंने घोषणा की, "बेटा, बाप जैसा ही लगता है. उन्होंने इस पर तब तक विश्वास नहीं किया जब तक बेटे ने अपने पिता के जैसे ही कपड़े नहीं पहन लिए." वह राहुल गांधी की बात कर रहे थे. अगर आप भी इस बात का मतलब समझने के लिए परेशान हैं, तो कतार में आइए.
समारोह के अगले नौ घंटे घिसटते हुए बीते, जहां भाजपा के तमाम मुख्यमंत्री, मणिपुर से एन बीरेन सिंह, हरियाणा से मनोहर लाल खट्टर, उत्तराखंड के पुष्कर सिंह धामी, असम से हेमंत विश्व सर्मा और हिमाचल प्रदेश के जयराम ठाकुर तेजी से आए और उतनी ही तेजी से चले गए. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने, कैबिनेट मीटिंग और विधानसभा सत्र की व्यस्तता में से समय निकालकर इंटरनेट के जरिए हिस्सा लिया.
केतकर या शंकर से बातचीत करते हुए, मुख्यमंत्रियों ने मोदी सरकार की नीतियों की तारीफ के पुल बांधे और गौहत्या, मंदिरों की वापसी, जीर्णोद्धार और मदरसे जैसे "जरूरी" मामलों पर अपनी राय दी.
आदित्यनाथ ने लाउडस्पीकरों को हटवाने और ईद की नमाज को सड़क पर न होने देने के लिए अपनी सरकार की तारीफ की. सावंत ने कहा कि उन्होंने क्षतिग्रस्त मंदिरों के पुनरुद्धार के लिए अपने बजट में जगह दी है और समान नागरिक संहिता की मांग की है. सर्मा ने "मांग की" कि मदरसा शब्द हमारी शब्दावली से गायब हो जाना चाहिए.
दो मुख्यमंत्रियों के पास मीडिया को लेकर भी कुछ शब्द थे. केतकर ने शोक जताते हुए कहा कि दिल्ली मीडिया उत्तर-पूर्व भारत की रिपोर्टिंग ठीक से नहीं करता. उन्होंने सवाल पूछा, "स्थानीय पत्रकार नकारात्मक खबरों पर ध्यान ही क्यों देते हैं?"
एक समय पत्रकार रह चुके बी वीरेन सिंह ने उत्तर दिया, "हां नकारात्मक. पहले यह धारणा थी कि सरकार के खिलाफ नकारात्मक खबरें ज्यादा पढ़ी जाएंगी और अखबार के वितरण में बढ़ोत्तरी होगी. लेकिन अब यह बदल चुका है. अब लोग केवल अच्छी खबरों को जानना चाहते हैं."
यह वही बीरेन सिंह हैं, जिनकी सरकार ने स्थानीय पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून और सरकार की बुराई करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा लगाई जिसकी वजह से उन्होंने जेल में 100 दिन बिताए.
जबकि ठाकुर इससे कहीं ज्यादा स्पष्टवादी थे, उन्होंने कहा, "मेरे मीडिया से रिश्ते अच्छे हैं."
इसके बाद पुरस्कार देने की घड़ी आ गई.
नौ श्रेणियों में प्रदान किए गए पुरस्कारों के लिए 22 लोगों को बुलाया गया, जिनमें सरकारी प्रसारक प्रसार भारती के भी पांच लोग थे. इनके अलावा कुछ विशिष्ट पुरस्कार भी थे. हिंदी में उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए दिया जाने वाला अटल बिहारी वाजपेयी पुरस्कार सबसे ज्यादा तालियों की गड़गड़ाहट के बीच, रोहित सरदाना को मृत्यु के उपरांत दिया गया. अंग्रेजी में उत्कृष्ट पत्रकारिता में केआर मलकानी पत्रकारिता पुरस्कार, समाचार चैनल वियॉन की मैनेजिंग एडिटर पालकी शर्मा को दिया गया, जिन्होंने कथित तौर पर पश्चिम में कोविड-19 से हुई मौतों की संख्या छुपाने के लिए और भारतीय श्मशान के ऊपर ड्रोन भेजने के लिए काफी खरी-खोटी सुनाई थी.
हिंदी न्यूज़ वेबसाइट प्रभासाक्षी के पूर्व संपादक और इस समय माइक्रोसॉफ्ट के कर्मचारी बालेंदु शर्मा दधीच को अंग्रेजी में विज्ञान और तकनीकी पत्रकारिता में उत्कृष्ट काम करने के लिए पुरस्कार मिला. इसके जैसा ही हिंदी अवार्ड सेहन 365 नाम से न्यूज़ वेबसाइट चलाने वाली निशी भट्ट को दिया गया. हाल ही में उन्होंने ऐसे कानून की इच्छा जताई थी जिससे रतन लाल जैसे लोग सलाखों के पीछे ही रहें.
राम मंदिर के शिला पूजन कार्यक्रम की कवरेज के लिए दूरदर्शन के अश्वनी मिश्रा को पुरस्कार मिला और दैनिक जागरण के नैमिष हेमंत को आरएसएस, अल्पसंख्यकों और चुनावों की रिपोर्टिंग के लिए पुरस्कृत किया गया. हेमंत को अपना पुरस्कार, पंजाब केसरी समूह के अखबार नवोदय टाइम्स के एक रिपोर्टर निशांत राघव के साथ साझा करना पड़ा.
लेकिन, इन सब को पीछे छोड़ते हुए "आम बुद्धिजीवी" के तौर पर पेश की गई शेफाली वैद्य को कला व संस्कृति पुरस्कार मिला. यह पुरस्कार उन पत्रकारों को दिया जाता है जिनके "कवरेज" से, कला संस्कृति और मनोरंजन के क्षेत्र में "नए आयाम व नई दिशाएं बनती हैं."
स्वराज्य के सलाहकार संपादक आनंद रंगनाथन को डीडी न्यूज़ के कंसल्टिंग एडिटर अशोक श्रीवास्तव के साथ साझा तौर पर सोशल मीडिया अवार्ड मिला. श्रीवास्तव द्वारा सरकार के बचाव की सोशल मीडिया पर अनगिनत तस्वीरें हैं. रोचक बात यह है कि ऑर्गनाइज़र की वेबसाइट पर मौजूद पुरस्कार सूची में सोशल मीडिया अवार्ड दर्ज ही नहीं है.
अनलिस्टेड पुरस्कारों की श्रेणी में एक और पुरस्कार रहा फैक्ट चेकिंग का, जो पाञ्चजन्य के रिपोर्टर अंबुज भारद्वाज को मिला. उन्होंने हाल ही में यह झूठ फैलाया था कि कांग्रेस पार्टी ने उदयपुर में अपने चिंतन शिविर के तंबुओं का रंग पाकिस्तान के झंडे जैसा हरा और सफेद रखा है. उनके इस वक्तव्य को ऑल्ट न्यूज़ ने फैक्टचेक किया था. यहां उन्हें फैक्ट चेकिंग का पुस्कार मिला.
विडंबना ने यहां आकर भी दम नहीं तोड़ा!
भारद्वाज का परिचय देते हुए संचालक तृप्ति श्रीवास्तव, जिन्होंने पहले बीबीसी और जी न्यूज़ में काम किया है, ने कहा, "मैं उनकी कुछ रिपोर्ट्स की ओर ध्यान दिलाना चाहती हूं. हाथरस मामले को आपसी प्रेम प्रसंग की बजाय घटना को दलित एंगल दिया जा रहा था. उन्होंने इसका पर्दाफाश किया था."
22 वर्षीय भारद्वाज फलाना दिखाना नाम की एक वेबसाइट के संस्थापक भी हैं, जो कथित तौर पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कानून के दुरुपयोग के मामलों पर प्रकाश डालने के लिए काम करती है.
स्वराज्य की एक संपादक स्वाति गोयल शर्मा को डिजिटल पत्रकारिता में "उत्कृष्टता, गहराई, गुणवत्ता और प्रभाव" के लिए पुरस्कृत किया गया.
जन्म टीवी के गौतम आनंदनारायण को "मरीचझापी हिंसा पर विशेष स्टोरी करने, हाथरस मामले में सिद्दीकी कप्पन के शामिल होने और उनके पीएफआई व सांप्रदायिक हिंसा से संबंधों" के लिए पुरस्कार दिया गया. (कप्पन के साथ जो हुआ उसके लिए न्यूज़लॉन्ड्री की यह सीरीज पढ़ सकते हैं.)
पुरस्कृत किए जाने वालों में डिजिटल न्यूज़ संस्थान ईस्टमोजो के कर्मा पालिजोर, इंडियन एक्सप्रेस के दिवंगत रवीश तिवारी, कश्मीर इमेजेस के बशीर मंजर और डीडी की दिव्या भारद्वाज शामिल हैं.
इन विजेताओं का चुनाव एक ज्यूरी ने किया था जिसमें प्रसार भारती के सीईओ शशि शेखर वेम्पति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर केजी सुरेश, सूचना व प्रसारण मंत्रालय के सलाहकार कंचन गुप्ता और दैनिक जागरण के एग्जीक्यूटिव एडिटर विष्णु त्रिपाठी शामिल थे.
इस लकदक पुरस्कार समारोह का कुछ खर्चा देश के करदाताओं ने भी उठाया, क्योंकि इसके प्रायोजकों में गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सरकारें शामिल थीं.
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