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'पक्ष'कारिता: एक पत्रकार के रूप में आंबेडकर को भुलाकर हमने क्या खो दिया
क्या कभी हमने यह पता करने की कोशिश की है कि हिंदी के अखबारों में डॉ. भीमराव आंबेडकर समाचार व विचार के पन्नों पर किस तरह आते हैं?
आज आंबेडकर जयंती पर हिंदी के अखबार उठाकर देखें तो हम दो तरह की प्रस्तुतियां पाते हैं- पहली विज्ञापनों के रूप में, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मनोहर खट्टर और अरविंद केजरीवाल के चेहरे हैं जिनमें इनकी सरकारों द्वारा अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए किए गए कामों को गिनवाया गया है. दूसरी कवरेज कुछ ऐसी घटनाओं की है जो बरबस ध्यान खींचती हैं, जैसे हमीरपुर जिले में आंबेडकर की मूर्ति का अचानक गायब हो जाना या फिर उज्जैन में आंबेडकर की प्रतिमा का दुग्धाभिषेक, वाहन रैली, शोभायात्राएं और गोबर के छोत से बनाई आंबेडकर की तस्वीर.
कवरेज की तीसरी श्रेणी में विद्यार्थियों के लिए लाभप्रद सूचनाएं दी गई हैं. मसलन, दैनिक जागरण दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ डॉ. आंबेडकर के साझा किए जाने वाले उद्धरणों को गिनवाता है तो जनसत्ता और नवभारत टाइम्स सिखाते हैं कि आंबेडकर जयंती पर भाषण की तैयारी कैसे करें.
समाचार के इन पन्नों के समानांतर संपादकीय और विचार के पन्नों पर कम से कम एक लेख आंबेडकर पर छापा जाना जरूरी समझा जाता है. आज छपे ऐसे लेखों में ज्यादातर एक प्रतीक के रूप में या तो आंबेडकर की फैलती ख्याति और प्रभाव का जिक्र है (बद्री नारायण, दैनिक जागरण) या फिर आंबेडकर के जीवन के किसी पहलू पर प्रकाश डाला गया है.
आज जनसत्ता को छोड़ लगभग सभी अखबारों ने यही किया है. इन सभी में एक समानता यह है कि आनंद कुमार (हिंदुस्तान) और मोहनदास नैमिषराय (नवभारत टाइम्स) के सिवा तीसरा कोई बुद्धिजीवी अखबारों को इस विषय पर लिखने को नहीं मिला. लिहाजा सभी ने नेताओं का लिखा आंबेडकर पर छापा- अर्जुन राम मेघवाल, कलराज मिश्र, आरके सिन्हा, रामदास अठावले. आप चाहें तो बद्री नारायण तिवारी को भी इसी सूची में जोड़ सकते हैं क्योंकि वैचारिक रुझान के मामले में वे भी मेघवाल-मिश्र-अठावले-सिन्हा की ही पालकी आजकल ढो रहे हैं.
मोहनदास नैमिषराय लिखते हैं कि सभी राजनीतिक दल बाबासाहब का नाम खूब लेते हैं लेकिन उनके विचारों पर अमल नहीं करते. वे शुरुआती पंक्तियों में ही बहुत कड़वी बात कह देते हैं, ''आंबेडकर कभी हिंदू विरोधी थे, आज हिंदुत्व को बचाने वाले हैं''. वे सवाल उठाते हैं कि आखिर सामाजिक न्याय की राजनीति आंबेडकर की मूर्ति पर आकर खत्म क्यों हो जाती है. इसके बरक्स आप बद्री नारायण का लेख रखकर पढ़ें तो पाएंगे कि वे समकालीन हिंदुत्व और आंबेडकर मिशन के बीच सहकार की अपनी थ्योरी को समझाते हुए उत्तर प्रदेश चुनाव के परिणामों के आलोक में खुद को सही ठहरा रहे हैं. एक तरह से देखें तो दोनों ही लेखक बात एक ही कह रहे हैं, बस फर्क यह है कि नैमिषराय जो सवाल उठाते हैं बद्री नारायण के पास उसके जवाब के रूप में आरएसएस और भाजपा के अलावा कुछ नहीं होता जबकि सवाल का दायरा उससे कहीं व्यापक है.
अखबारों को अगर हम अपने समाज का आईना मानें, तो कुल मिलाकर ऐसा जान पड़ता है कि आंबेडकर के अपहरण की दक्षिणपंथी कोशिशें अब वांछित नतीजे तक पहुंच चुकी हैं और आंबेडकर उनके नहीं बचे जिनका उन्हें होना था. वे उनके हो चुके हैं जिनका उन्हें नहीं होना था. संपादकों ने भी मान लिया है कि आंबेडकर अब चूंकि व्यापक समाज और लोकतंत्र का विषय नहीं रह गए लिहाजा उनके ऊपर संपादकीय लिखने का कोई मतलब नहीं है, इसलिए महज एक लेख छापकर अपने कर्तव्य की इतिश्री की जा सकती है. संस्थानों के भीतर इसको लेकर किसी किस्म का प्रतिरोध इसलिए नहीं उपजता क्योंकि अखबारों के भीतर पिछड़ी जातियों और दलितों की नुमाइंदगी नगण्य है जबकि सामान्य जाति के पत्रकारों के लिए आम तौर से यह कोई परेशान करने वाला सवाल नहीं है. यह स्थिति क्यों और कैसे आई? क्या यह केवल नुमाइंदगी का मसला है? या समस्या कहीं और है?
आंबेडकर का पत्रकारीय पक्ष
आंबेडकर एक पत्रकार भी थे. 'मूकनायक' से लेकर 'बहिष्कृत भारत', 'समता', 'जनता' और 'प्रबुद्ध भारत' तक उन्होंने पर्याप्त पत्रकारीय और संपादकीय भूमिकाएं निभाईं. अपने लेखन में उन्होंने जातिगत पत्रकारिता के संदर्भ में एक बड़े काम की बात कही थी जिसे आज याद करना प्रासंगिक होगा: ''यह समाज एक जहाज की तरह है. मान लीजिए कि एक जहाजी दूसरे जहाजियों को नुकसान पहुंचाने की मंशा से उनके कमरे में छेद कर देता है तो उनके संग-संग वह भी पहले नहीं तो बाद में डूबेगा ही डूबेगा.''
दार्शनिक स्तर पर देखें तो यह कथन वर्ग समन्वय और सह-अस्तित्व का एक आदर्श नमूना है लेकिन इस कथन में वह इतिहासबोध गायब है जो समाज के जातियों और वर्गों में बंटे होने से उपजता है. समाज बेशक एक जहाज हो सकता है और यह भी संभव है कि कोई किसी को नुकसान पहुंचाने की मंशा से कोई काम न करे, इसके बावजूद जहाज का डूबना तय है यदि जहाज के घटक समानुपातिक और परस्पर संतुलन में न हों. समाज को जहाज कहने में दिक्कत नहीं है लेकिन जहाज की बनावट में ऐतिहासिक असंतुलन ही वह प्रेरक तत्व है जिसने आंबेडकर को बनाया था. यदि ऐसा जहाज जस का तस स्वीकार्य है तब तो सवाल ही नहीं बचता. यदि स्वीकार्य नहीं है, तब सवाल खड़े होते हैं. फिर चुनौतियां भी आती हैं.
आंबेडकर जहाज की बनावट को समझते थे, इसीलिए उन्होंने लिखा था कि अखबारों को आंख बंद कर के जनता को संबोधित नहीं करना चाहिए बल्कि लोकतांत्रिक विचारों को विकसित करने की शिक्षा देनी चाहिए. इसके पीछे उनकी ठोस सोच थी कि हिंदू समाज दरअसल एक ऐसी बहुमंजिला इमारत के जैसे है जिसकी एक मंजिल और दूसरी मंजिल के बीच कोई संपर्क-मार्ग नहीं है. इसी संपर्क साधन को बढ़ाने के उद्देश्य से वे अंतरजातीय विवाह की हिमायत किया करते थे. 'बहिष्कृत भारत' के एक संपादकीय में उन्होंने लिखा था कि हिंदू समाज परस्पर मेलजोल और सम्मिश्रण की बुनियादी भावना को ही साकार नहीं कर पाया है. इसी सामाजिक संपर्क का अभाव समाज के भीतर जातिगत हिंसा को पैदा करता है.
जहाज और बहुमंजिला इमारत के दोनों मुहावरों को मिलाकर पढ़ें, तो समझ आता है कि नुकसान पहुंचाने की मंशा के बगैर भी जहाज डूब सकता है या हिंसा हो सकती है क्योंकि समस्या संरचना में है. इस संरचनात्मक समस्या को परस्पर संवाद, संपर्क और शिक्षण से पाटा जाना है. इस सोच की व्यावहारिक झलक हमें 1930 के बाद मिलती है जब आंबेडकर ने 'बहिष्कृत भारत' और 'जनता' के संपादकीय प्रबंधन की जिम्मेदारी देवराव नाइक, बीआर काडरेकर, जीएन सहस्त्रबुद्धे, आरडी भंडारे और बीसी काम्बले को सौंप दी. इनमें नाइक, काडरेकर और सहस्त्रबुद्धे दलित नहीं थे, सवर्ण थे.
आंबेडकर के इस पत्रकारीय नजरिए में बदलाव आया 1927 के महार आंदोलन से, जब वे यह मानने लगे कि दलितों को हिंदू समाज से अलग देखा जाना चाहिए. उस दौरान 'बहिष्कृत भारत' के उनके लिखे संपादकीयों में हिंसा का सवाल केंद्रीय हो गया. इसके बावजूद 1930 के आरंभ तक आंबेडकर हिंदू समाज में सुधार की ओर झुके रहे लेकिन 1929 में जब जलगांव के 50 हजार दलितों ने खुलेआम हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा की तब आंबेडकर के वैचारिक जगत में निर्णायक बदलाव देखने को मिला. 'बहिष्कृत भारत' में उन्होंने इन दलितों को इस्लाम अपना लेने की सलाह दे डाली और अखबार में इस्लाम की खूबियों पर श्रृंखलाबद्ध तरीके से लेख लिखने लगे.
स्वतंत्र भारत में आंबेडकर को अपनाए जाने में सबसे बड़ी गलती यह हुई कि महार आंदोलन से पहले वाले आंबेडकर को छोड़ दिया गया और बाद वाले को अपना लिया गया. आंदोलन से पहले वाले आंबेडकर हिंदू धर्म के भीतर सुधार चाहते थे और उन्हें अपने उत्तराधिकारियों के रूप में सवर्णों को रखने में कोई आपत्ति नहीं थी. यह लाइन गांधी के करीब थी, वर्ग-समन्वय और सह-अस्तित्व वाली लाइन थी. हिंसा की महज एक घटना से बदल चुके (बाद वाले) आंबेडकर में प्रतिक्रिया हावी थी. वहां हिंदू और दलित की बाइनरी जन्म ले चुकी थी. कालांतर में इस देश के शासकों ने इस बाइनरी का बखूबी दोहन करते हुए आंबेडकर को दलितों का मसीहा बना डाला और उनके हाथ में संविधान की किताब थमाकर चौक चौराहों पर मूर्तियां खड़ी कर दीं.
इस तरह आंबेडकर को हिंदू समाज और स्वात्रंत्योत्तर आधुनिक राष्ट्र से काटने की प्रक्रिया पूरी हुई. इस प्रक्रिया में यह स्वत: स्पष्ट कर दिया गया कि आंबेडकर जिसके भगवान हैं, उनके हाथ में ली हुई किताब उन्हीं का धर्मग्रंथ है. यों संविधान को भी व्यापक समाज और राष्ट्र से काटकर अलग कर दिया गया. जाति-हिंसा के खिलाफ समतामूलक समाज के हित में काम करने वालों ने चूंकि 1929 के बाद वाले आंबेडकर को ही पकड़ा, लिहाजा उन्होंने हिंदू-दलित बाइनरी को और मज़बूती दी. जो काम कांशीराम ने राजनीतिक स्पेस में किया वही काम राजेंद्र यादव ने साहित्यिक स्पेस में किया.
इस तरह पत्रकारिता और साहित्य का मुकम्मल विभाजन पूरा किया गया. साहित्य के क्षितिज पर दलित साहित्य नाम का सितारा उग आया तो राष्ट्रीय पत्रकारिता के चौड़े आंगन के बाहर दलित पत्रकारिता ने अपना ठीहा लगा लिया. ये सब कुछ बीते 30-40 साल के दौरान बड़ी सहजता और स्वीकार्यता से होता रहा, लेकिन समतामूलक समाज के बारे में सोचने वाले जाति-विरोधी नेताओं, कार्यकर्ताओं और समाजकर्मियों ने कभी भी 1929 से पहले वाले आंबेडकर को अपनाने और आत्मसात करने की कोशिश नहीं की क्योंकि वहां उनकी अस्मिता डाइल्यूट होती थी. अस्मिताओं और हिस्सेदारी के दौर में यह स्वीकार्य नहीं था.
इसीलिए जब-जब भी अखबारों और पत्रिकाओं में पिछड़ा-दलित कवरेज का सवाल आया और जाति-हिंसा के मामलों पर अखबारों की संवेदनहीनता का रोना रोया गया, उसके समाधान के रूप में बौद्धिकों को केवल एक ही रास्ता सुझाई दिया कि संस्थानों में दलित-पिछड़ा प्रतिनिधित्व बढ़ाने से काम होगा. बीते 20 साल में पत्रकारिता में बार-बार जातिगत प्रतिनिधत्व का सवाल उठा है, लेकिन कभी भी यह हल नहीं हो सका क्योंकि हिंदू-दलित की सत्तर साल से जड़ जमा चुकी बाइनरी मानसिक प्रतिशोध के स्तर पर पहुंच चुकी थी. न तो दलित पत्रकार सामान्य न्यूज़रूम में सरवाइव कर पाया, न ही उसने न्यूज़रूम के सामान्य कायदों में खुद को ढालने की कोशिश की. जो बचे-खुचे जम गए, वे ढल कर वैसे ही हो गए.
इसी का नतीजा यह हुआ है कि अखबारों के लिए डॉ. आंबेडकर आज खानापूर्ति का साधन बन चुके हैं जबकि अखबारी दुनिया से बाहर कुकुरमुत्ते की तरह उग आए सैकड़ों सफल-असफल दलित मीडिया मंचों का गुजारा आंबेडकर के नाम के बगैर नहीं है. आंबेडकर हिंदू समाज की जिस बहुमंजिला इमारत के बीच सीढ़ी लगाने की ख्वाहिश रखते थे, उनके अनुयायियों ने उस इमारत से अपनी मंजिल को ही अलग कर के दूसरा प्लॉट ले लिया.
सोचिए, इस पर सबसे ज्यादा खुशी किसे हुई होगी? जाहिर है, हिंदू समाज के उस वर्चस्ववादी तबके को जो हमेशा से सोचता रहा है कि निचली मंजिल तक कोई सीढ़ी न लगे तो ही बेहतर!
एक पत्रकार के रूप में आरंभिक आंबेडकर को भुलाकर हमने भारतीय पत्रकारिता और समाज का जो नुकसान किया है, उसकी भरपाई अब संभव नहीं दिखती.
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