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दिल्ली में हुई मौतें याद दिलाती हैं कि सरकारी योजनाओं के बावजूद हाथ से मैला ढोने का काम अब भी जारी है
गुड़िया अपने पति पूरन कुमार को सीवर की सफाई का काम करने के लिए भेजने को तैयार नहीं है. वह सीवर को "मौत का कुआं" कहती हैं. लेकिन, पेशे से सफाईकर्मी और अलीगढ़ के वाल्मीकि समुदाय से आने वाले पूरन का कहना है कि उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है.
पूरन के परिवार में कुल सात सदस्य हैं. जिसमें उनके और उनकी पत्नी के अलावा दो बेटे, दो बेटियां और एक 90 साल की बुजुर्ग मां हैं. और इस पूरे परिवार का हर महीने करीब 14,000 रुपए में घर चलता है जबकि ये लोग पिछले 25 सालों से दिल्ली में ही रह रहे हैं. हर बार किसी सीवर में उतरने पर पूरन को 300 से 500 रुपए मिल जाते हैं. “मुझे ये काम करने से डर लगता है, लेकिन इसके अलावा मैं और कर ही क्या सकता हूं? इसके जरिए मैं दिल्ली में रहने गुजारा करने लायक कुछ ऊपरी कमाई कर लेता हूं ... पिछले महीने, मुनिरका में एक सीवर की सफाई करते वक्त मैं बेहोश हो गया था. लेकिन भगवान का शुक्र है कि एक साथी ने मेरी जान बचा ली.”
दिल्ली में बहुत से दूसरे लोग पूरन जितने खुशनसीब नहीं रहे हैं. बीते मार्च महीने में सीवेज के गड्ढों की सफाई से जुड़ी दो दुर्घटनाओं में राष्ट्रीय राजधानी में एक हफ्ते के भीतर ही छह लोगों की मौत हो गई. रोहिणी इलाके में एमटीएनएल में काम करने वाले तीन निजी संविदा कर्मचारियों और उन्हें बचाने की कोशिश करने वाले एक रिक्शा चालक सहित चार की मौत हो गई. जबकि कोंडली की एक अन्य घटना में, दिल्ली जल बोर्ड की मोटर की मरम्मत के दौरान सीवेज के गड्ढे में गिरने से दो लोगों की मौत हो गई.
यह स्थिति तब है जबकि एक तरफ तो कानून के तहत हाथ से मैला ढोने के काम पर प्रतिबंध है वहीं दूसरी ओर दिल्ली सरकार ने इस प्रथा को खत्म करने के लिए सफाई मशीनों को तैनात करने की योजना शुरू कर दी है.
दिल्ली जल बोर्ड के वित्त वर्ष 2021-2022 के बजट के अनुसार, सीवर की सफाई के काम का प्रबंधन करने वाली एजेंसी दिल्ली जल बोर्ड ने 200 मिनी सीवर क्लीनिंग मशीनों को सर्विस कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए संकरी-पतली गलियों में तैनात किया गया है. दिल्ली जल बोर्ड के अतिरिक्त मुख्य अभियंता भूपेश कुमार ने कहा, "सर्विस कॉन्ट्रैक्ट्स हाथ से मैला साफ करने वाले सफाईकर्मियों के परिजनों और अनूसूचित जाति/जनजाति के समुदाय के लोगों को दिया जाता है. हमें दलित इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री से भरपूर मदद मिल रही है. यह योजना 2019 में शुरू की गई थी और आज की तारीख में यह एक सफल कार्यक्रम साबित हुई है. हम 200 लोगों को आत्मनिर्भर बनाकर उन्हें मुख्यधारा में ला चुके हैं. और इस काम के लिए बोर्ड ने एक भी पैसा खर्च नहीं किया है."
कुमार ने कहा कि एक मशीन की लागत लगभग 35 लाख रुपए है साथ ही केंद्र सरकार द्वारा 25 प्रतिशत सब्सिडी प्रदान की जाती है. इसके अलावा सर्विस कॉन्ट्रैक्ट से हर महीने करीब 30,000-40,000 रुपए का मुनाफा होगा. उन्होेंने कहा, “हमने मुख्यमंत्री मुफ्त सेप्टिक टैंक योजना नाम से एक योजना चलाने की शुरूआत की है. इस योजना के तहत हम 1,800 अनधिकृत कॉलोनियों में सेप्टिक टैंकों की सफाई की सेवा प्रदान करेंगे. इसमें हम ऑटोमैटिक मशीनों का इस्तेमाल करेंगे, जिसमें पंप टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा. इससे 150 लोगों को रोजगार मिलेगा. एक व्यक्ति के पास ज्यादा से ज्यादा दो मशीनें हो सकती हैं. यही तरीका सर्विस कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए भी इस्तेमाल किया जाएगा. हमें टेंडर मिल गया है और अगले चार महीनों में ये मशीनें सड़क पर उतार दी जाएंगी."
लेकिन दिखाई तो ऐसा पड़ता है कि पूरन जैसे सैकड़ों लोगों के लिए हालात बहुत कम ही बदले हैं. ये लोग चंद पैसों की खातिर अपनी जान जोखिम में डालने को मजबूर हैं. इन्हें तब काम पर रखा जाता है जब एमसीडी कर्मचारी अपनी शिफ्ट पर काम करने नहीं आते हैं. ये लोग बिना सुरक्षा गियर के बड़े जोखिम भरे सीवर के गढ्ढों में गोता लगा देते हैं.
देश की राजधानी में पिछले मार्च महीने में छह मौतें हुईं, रोहिणी में चार और कोंडली में दो तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वत संज्ञान लेते हुए दिल्ली के मुख्य सचिव और दिल्ली के पुलिस आयुक्त सहित शीर्ष अधिकारियों को नोटिस जारी किया. जिसमें ऐसी दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ की गई कार्रवाई और मृतक के परिजनों को दी गई राहत से संबंधित रिपोर्ट मांगी गई है.
उचित उपकरण और सुरक्षा उपायों के अभाव में सीवेज से संबंधित कार्यों में मौतों की निरंतर घटनाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए, आयोग ने पाया है कि स्पष्ट रूप से, शीर्ष अदालत के निर्देशों और हस्तक्षेपों के बावजूद संबंधित अधिकारियों द्वारा पर्याप्त तत्परता से कार्रवाई नहीं कि जा रही है.
देश भर में अन्य दुर्घटनाएं भी हुईं - लखनऊ में एक सीवर की सफाई के दौरान मरने वाले दो सफाईकर्मियों के परिवारों ने निजी कंपनियों पर कोई भी प्रोटैक्टिव गियर उपलब्ध नहीं कराने का आरोप लगाया है. वहीं राजस्थान के बीकानेर में करणी औद्योगिक क्षेत्र में एक सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान चार मजदूरों की मौत हो गई. बीते 10 मार्च को मुंबई के कांदिवली में जहरीली गैस से तीन सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई थी.
सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक और मानवाधिकार कार्यकर्ता बेजवाड़ा विल्सन ने यह समझाने की कोशिश की कि यह समस्या अब भी क्यों बरकरार है. उन्होंने कहा, “हाथ से मैला ढोने में शामिल 98 फीसदी लोग दलित समुदाय से आते हैं. और इसीलिए सरकार उन पर ध्यान नहीं दे रही है. ऐसे कई मामले हैं जिनकी रिपोर्ट भी दर्ज नहीं कराई जाती है, और भारत जैसे देश में तो आप हर एक मामलों में रिपोर्ट दर्ज होने की उम्मीद कर भी नहीं सकते. इन परिस्थितियों की एक दुखद सच्चाई यह है कि इस समस्या से निपटने के लिए कानून और अदालती फैसले तो हैं, लेकिन हम अभी भी हाथ से मैला साफ करने वाले लगभग 2,000 लोगों की मौतें देख रहे हैं और फिर भी चुप हैं.”
हाथ से मैला साफ करने के काम का रोजगार के तौर पर निषेध और इस काम से जुड़े लोगों का पुनर्वास अधिनियम 2013 जैसे कानून, देश में हाथ से मैला साफ करने पर रोक लगाते हैं. इस अधिनियम के अनुसार, कोई भी व्यक्ति, स्थानीय प्राधिकरण या एजेंसी सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के जोखिम भरे काम में किसी भी व्यक्ति को नहीं लगा सकता, और इस कानून का किसी भी तरह से उल्लंघन करने पर दो साल की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.
2014 के अपने एक ऐतिहासिक फैसले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों को हाथ से मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने का आदेश दिया था. सीवर से होने वाली मौतों के लिए, आपातकालीन स्थितियों में भी बिना सुरक्षा गियर के सीवर लाइनों में प्रवेश करना को अपराध घोषित करना चाहिए.
लेकिन जैसा कि आंकड़े बताते हैं, यह प्रथा अब भी जारी है. केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री रामदास अठावले द्वारा लोकसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच सालों में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई "दुर्घटनाओं" में 325 लोगों की मौत हुई हैं. इनमें से तमिलनाडु (43), उत्तर प्रदेश (52) के बाद 43 मौतों के साथ दिल्ली देश में तीसरे स्थान पर है. हालांकि, मंत्रीजी ने यह भी कहा कि हाथ से मैला ढोने की वजह से एक भी मौत नहीं हुई है.
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