Book Review
पुस्तक समीक्षा: उपन्यास 'खेला' जिसमें कमोबेश हर भारतीय का बचपन गुजरता है
कच्चे तेल का रंग तेल के रंग जैसा नहीं होता है. वह गहरे रंग का होता है. संभवतः तेल से लिपटे व्यापार, धर्म, लालच, हिंसा और राजनीति का मिलाजुला अंधेरा ही उसे काले रंग के संसार की तरफ धकेल देता है. नीलाक्षी सिंह का दूसरा उपन्यास ‘खेला’ इसी संसार की स्याही से मुखातिब है. लेकिन यह भी है कि तेल सतह पर तैरने के हल्केपन की नियति लेकर जन्मी चीज है. ठीक उसी तरह उपन्यास की पृष्ठभूमि पर कच्चे तेल के संसार का असर दिखता जरूर है पर उपन्यास की भीतरी तहें अलग-अलग भूखंड और जुदा कालखंड में इंसानी जिजीविषा और संघर्ष के धागों से बुनी हैं.
उपन्यास के अध्याय उन खेलों के नाम पर हैं जिनसे होकर कमोबेश हर भारतीय बचपन गुजरता है. कहानी में एक तरफ जहां विश्व बाजार के खिलाड़ी अपनी तिकड़म जाल बिछाए शह और मात की मुहिम पर हैं वहीं उनके समानांतर आम इंसानों ने भी अपने लिए छोटे बड़े मैदान तय कर रखे हैं जिनमें कभी वे प्रतिपक्षियों के साथ, कभी अपनों के साथ तो कभी खुद के ही साथ कतर ब्योंत का खेल खेलते नजर आते हैं.
उपन्यास का मुख्य चरित्र वरा कुलकर्णी का है. कथानक में कच्चे तेल, मजहब और हिंसा की पृष्ठभूमि है. मुख्य किरदार दुनिया को परदे के पीछे से देखने की धुन वाली एक साधारण सी लड़की है जो अपने चुनने की आजादी के पक्ष में हदों के पार चली जाती है. अंत में उसके हाथ में मामूली कुछ या कुछ नहीं आता है पर वह अपने चयन की स्वतंत्रता के हक में एक दुर्बल बयान से भी खुश है. यदि गौर से देखें तो उसके आसपास के चरित्र इतनी मजबूती से खुद को थामे दिखते हैं कि कभी-कभी उनका सहारा लेकर वरा कुलकर्णी भी अपने को बेहतर थाम पाती है. उपन्यास में वरा कुलकर्णी के अपने प्रेमी अफरोज को बगैर वजह छोड़ देने का प्रसंग है. आगे वरा कुलकर्णी इस फैसले को सदैव अपने भीतर गुनते धुनते चलती दिखती है पर अफरोज कहीं भी उस फैसले के साए में नहीं दिखता. वह अपनी दुनिया में पहले वाली दखल से मौजूद है बल्कि जब दिलशाद उसके साथ रहने उसके घर तक आ जाती है तब वह अपने घर के दरवाजे उसके लिए खोल देता है. उपन्यास में अफरोज की एक सर्द उपस्थिति को डिकोड करने से पाठ का एक अलग आयाम खुलता है.
दूसरे देश में बस एक चरित्र मिसेज गोम्स का है. चार पतियों वाली मिसेज गोम्स के चेहरे पर झुर्रियां हैं या नहीं इसका वर्णन तो उपन्यास में नहीं है पर उसकी कहानी पढ़ते हुए विविध अनुभवों की रेखाओं से पटे जीवन वाले एक शख्स की कल्पना सामने आती है. सोवियत संघ और हंगरी के प्रसंग से गुजरते हुए यह बात दिमाग में आती है कि शासक का कोई तयशुदा चेहरा और चरित्र नहीं होता. दुनिया के नक्शे पर बराबरी का लाल झंडा उठाए अवांगर्द सा बना राष्ट्र अपने अधीन देशों के साथ कैसा क्रूर था!
कहानी में वरा कुलकर्णी बुडापेस्ट पहुंचती है और उसी समय पेरिस पर हमला होता है. इससे पेरिस ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों के आपसी और बाहरी समीकरण बदल जाते हैं और यूरोप में प्रवासियों को शक से देखने की निगाह और गहरा जाती है. इसी पृष्ठभूमि में वरा कुलकर्णी की मुलाकात टिम नामक शख्स से होती है जिसकी हर मुलाकात में कुछ नई पहचान निकल कर सामने आती है. वरा कुलकर्णी, मिसेज गोम्स और टिम का तिकोन उलझा हुआ है और यह ऊहापोह, तीसरी दुनिया की अगुवाई करते सीरिया बनाम विकसित देशों के बीच की पैंतरेबाजी की पृष्ठभूमि पर और खिल कर निखरती है.
वरा कुलकर्णी तथाकथित शोषक और शोष्य दोनों पक्षों का शिकार बनती सी दिखती है पर जैसा कि इस उपन्यास में जो दिखता है वह हो नहीं रहा होता, वह दोनों पक्षों से अपने तरीके से भिड़ती है. यानी मैदान प्रतिपक्षियों के पर शर्तें उसकी अपनी. ‘खेला’ को आख्यान की सिद्ध वर्णन कला और विरल सृजनात्मक भाषा के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए. उक्त दोनों ही यहां जीवन, विचार, कला के सम्मिलित धागों से निर्मित हुए हैं और इनकी एक बेहतर पुनर्रचना तैयार कर सकते हैं.
उपन्यास के आखिरी हिस्से में एक अलहदा सी संभावना खुलती है जब अपने अलग-अलग संघर्ष के मैदानों को लांघ कर आई चार पांच स्त्रियां एक फ्रेम में आ जाती हैं. उनकी आपसी सिंफनी स्त्री विवेक के बहुत अलग-अलग रंगों को एक साथ ले आती हैं जिनसे एक नए ढंग का पाठ तैयार होता है जो संघर्ष, श्रम और उम्मीद की जमीन पर खड़ा है.
उपन्यास के मुख्य पात्र ही नहीं बल्कि हर छोटे बड़े पात्र अपने चुनाव की आजादी के लिए बहुत सजग हैं. उपन्यास की भाषा कहानी की लेयर्ड जटिलता को थाम कर चलती है. कथानक बार-बार अतीत और वर्तमान, यथार्थ और कल्पना, उचित और अनुचित के बीच आवाजाही करता है. इसलिए इसे पढ़ते हुए पाठकीय धैर्य की जरूरत है.
‘खेला’ विश्व बाजार की राजनीति के छल प्रपंच और इंसानों के आंतरिक और बाह्य संघर्ष का एक कोलाज है जिसे पढ़ा जाना चाहिए. संक्षेप में ‘खेला’ के बारे में कह सकते हैं: एक महत्वपूर्ण उपन्यास जिसमें अभिव्यक्त खुशियां, त्रासदियां असह्य, बेधक और बेचैन करने वाली हैं फिर भी पाठक उनकी गिरफ्त में बने रहना चाहेगा.
नीलाक्षी सिंह का परिचय, जन्म, 17 मार्च 1978, हाजीपुर, बिहार, प्रकाशन : परिंदे का इंतजार सा कुछ, जिनकी मुट्ठियों में सुराख था, जिसे जहां नहीं होना था, इब्तिदा के आगे खाली ही (कहानी संग्रह); शुद्धिपत्र, खेला (उपन्यास) सम्मान : रमाकांत स्मृति सम्मान, कथा सम्मान, साहित्य अकादेमी स्वर्ण जयंती युवा पुरस्कार, प्रो. ओमप्रकाश मालवीय एवं भारती देवी स्मृति सम्मान और कलिंग बुक ऑफ बुक ऑफ द इयर 2020-21.
पुस्तक का नाम - खेला द्वारा नीलाक्षी सिंह
मूल्य- 370 रुपए
प्रकाशक- सेतु प्रकाशन
(समीक्षक आशुतोष कुमार ठाकुर बैंगलोर में रहते हैं. पेशे से मैनेजमेंट कंसलटेंट हैं और कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल के सलाहकार हैं.)
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