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"अब तो शायद मेरे मरने के बाद ही मैनेजमेंट मेरी बकाया तनख़्वाह दे"
ये शब्द पैसों की बेहद तंगी के कारण घरेलू कलह झेल रहे टी कुमार ने अपने परिवार से कहे थे. टी कुमार यूनाइटेड न्यूज़ एजेंसी ऑफ इंडिया में बतौर फोटो जर्नलिस्ट काम करते थे. और इस न्यूज़ चैनल ने पिछले 60 महीनों से उन्हें उनकी पूरी तनख़्वाह का भुगतान नहीं किया था. इसके कुछ महीनों बाद और अपनी बेटी की सगाई से करीब हफ्ते भर पहले 13 फरवरी की रात उनका मृत शरीर यूनाइटेड न्यूज़ एजेंसी ऑफ इंडिया के न्यूज़रूम में मिला. उनकी घड़ी और उनका फोन उनके मृत शरीर के पास ही रखा हुआ था.
जहां एक ओर नुंगमबक्कम पुलिस मामले की छानबीन सीआरपीसी की धारा 174 के तहत अप्राकृतिक मौत की संभावना के हिसाब से कर रही है वहीं कुमार की पत्नी, बेटे, बेटी और दोस्तों के साथ ही उनके सहकर्मियों का कहना है कि यह आत्महत्या का मामला है. वो इस आत्महत्या का कारण वेतन के भुगतान में होने वाली अनियमितता को मानते हैं. एक पुलिस अधिकारी ने कहा, "जांच की दिशा पोस्टमोर्टेम रिपोर्ट ही तय करेगी और उम्मीद है कि सप्ताह भर में यह रिपोर्ट आ जायेगी."
यूएनआई (यूनाइटेड न्यूज़ एजेंसी ऑफ इंडिया) के एडिटर इन चीफ अजय कौल ने इस बात की पुष्टि की कि कुमार को उनकी तनख़्वाह का कुछ हिस्सा बकाया था लेकिन इस मामले में "कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है." "ऐसे में मीडिया कैसे किसी निष्कर्ष पर पहुंच सकती है...? इस मामले पर लिखने वाले पत्रकारों ने पुलिस का पक्ष तो दिखाया ही नहीं."
अपनी मौत से कुछ दिन पहले, कुमार अपने परिवार के साथ कम वक्त बिताने और पहले से ज्यादा शराब पीने लगे थे. इसके अलावा ऐसा लगने लगा था कि उनकी भूख कम ही गई है. वो अक्सर चेन्नई प्रेस क्लब जाते रहते थे और वहां पर आने वाले उनके दोस्तों और सहकर्मियों को भी उन्हें देखकर ऐसा लगा था कि कुछ तो गड़बड़ है.
तीन महीने पहले तक परिवार में वो अकेले कमाने वाले व्यक्ति थे. बाद में उनके बेटे प्रवीण ने कस्टमर सपोर्ट एग्जीक्यूटिव के तौर पर नौकरी करना शुरू कर दी. कुमार को हर महीने करीब 15000 रुपए ही मिलते थे जो कि उनकी असल तनख़्वाह का तिहाई हिस्सा भी नहीं था. "हमें हर महीने 15000 रुपए किराए का चुकाना होता है. इसके अलावा और दूसरे भी बहुत से खर्चे हैं. फिर भी मेरे पिता ने घर को चलाने की बहुत कोशिश की, लेकिन चला नहीं पाए," प्रवीण ने कहा. "हमारे पास गैस सिलेंडर या ग्रॉसरी तक खरीदने के लिए भी पैसे नहीं है. साल भर पहले मेरी बहन की सगाई तय हुई थी, इस उम्मीद में कि मैनेजमेंट बकाया तनख़्वाह का कुछ हिस्सा तो दे ही देगा. लेकिन जब पैसे नहीं मिले तो मैंने सलाह दी थी कि सगाई को कुछ समय के लिए टाल देना चाहिए लेकिन मेरे पिता को पैसे मिलने की उम्मीद थी."
कुमार की मौत पर दुख और हैरानी जताने वाले जिन नौ पत्रकारों से न्यूज़लॉन्ड्री की बात हुई उनका कहना है कि कुमार एक अच्छे काउंसलर और जोशीले पत्रकार थे. "वैश्विक महामारी के दौरान के जब बहुत सारे फोटोग्राफर्स की नौकरियां चली गईं तो कुमार के ही शब्दों ने बहुतों को सहारा दिया," डेक्कन क्रॉनिकल के चीफ फोटोग्राफर, एनवी संपत ने कहा.
यूएनआई के फोटो डिपार्टमेंट के प्रमुख के पद से रिटायर हो चुके आशीषकार ने उन्हें एक जोशीले पत्रकार के तौर पर याद किया. "उनकी मौत से एक दिन पहले, हमारी रिटायरमेंट प्लान्स को लेकर काफी लंबी बातचीत हुई थी. काम के दौरान जमीन पर हमने जो कुछ भी अनुभव किया था उसको एक किताब की शक्ल देने की योजना बनाई थी."
यूएनआई ऑल इंडिया एम्प्लॉयीज फ्रंट ने कुमार के परिवार के लिए 10 लाख रुपए के हर्जाने और सप्ताह भर के भीतर उनके पूरे बकाया वेतन के भुगतान की मांग की है.
उत्थान और पतन
शहर भर की मीडिया बिरादरी समेत कई दूसरे तबकों को झकझोर देने वाली ये मौत बहुत से लोगों के लिए एक न्यूज़ एजेंसी के उत्थान और पतन की कहानी बन गई है.
आज हालात कुछ भी हो लेकिन कुमार यूएनआई में ही 36 सालों के अपने इतने लंबे तजुर्बे में एक पत्रकार के तौर पर बेहतर और समृद्ध हुए. यहां पर उन्होंने एक अटेंडर के तौर पर शुरुआत की, फिर फोटोग्राफर बने, उसके बाद फोटोजर्नलिस्ट और आखिरकार चेन्नई के दफ्तर में सात लोगों की एक टीम को मैनेज करने वाले ब्यूरो प्रमुख. "मेरे पिता यूएनआई से ही रिटायर होना चाहते थें इसीलिए उन्होंने कहीं और कोशिश नहीं की," प्रवीण ने कहा. फिर मामला चाहे सब्सक्रिप्शन के बढ़ने का हो या फिर यूएनआई के तमिलनाडु दफ्तर की आय का बहुत बड़ा हिस्सा पैदा करने वाला ब्यूरो बन जाने का, कुमार ने इस एजेंसी के सबसे चमकीले दिन भी देखे थें.
लेकिन 2006 में मामला पलट गया: तनख़्वाह देरी से आने लगी, मुश्किल ही वेतन में कोई इजाफा देखने को मिलता और कई पद खली पड़े रहते. "इसकी शुरुआत हुई हमें दो महीने में सिर्फ एक बार ही तनख़्वाह मिलने से. अब करीब 56 महीनों का वेतन बकाया है. 2021 में मुझे सिर्फ तीन महीने की ही तनख़्वाह मिली," कुमार के दोस्त और सहकर्मी वनामाली जीबी ने बताया. इन्हें ही कुमार दफ्तर में मृत अवस्था में मिले थे.
जहां अजय कौल का कहना है कि कर्मचारियों को तनख़्वाह के कुछ हिस्से का भुगतान करने का काम पिछले अगस्त में ही शुरू हो चुका है वहीं कर्मचारियों की- बढ़ते कर्ज, अनिश्चित भविष्य के साथ ही जिंदगी और "आत्मसम्मान" से समझौतों को लेकर अपनी एक अलग कहानी है.
55000 रुपए की तनख़्वाह के बदले सिर्फ 15000 रुपए ही पाने वाले दिवाकर का कहना है कि "यह भी" केवल पिछले तीन महीनों से ही मिल रहा है. "हम अब भी जमीन पर उतर कर काम कर रहे हैं लेकिन हमारे पास बस में चढ़ने तक के लिए पैसे नहीं हैं," उन्होंने कहा. दिवाकर ने यह भी बताया कि अब उनका परिवार पहले के मुकाबले एक छोटे मकान में शिफ्ट हो गया है और बच्चों की स्कूल की फीस तक भरने के लिए संघर्ष कर रहा है.
पिछले साल ही रिटायर होने वाले एक और कर्मचारी का दावा है कि उसे कोई ग्रेच्युटी नहीं मिली. "55 महीनों के बकाए के अलावा मुझे मेरी ग्रेच्युटी की रकम भी नहीं मिली. अब अगर मैं कोर्ट में जाऊं तो ही मुझे मेरे सारे बकाए मिल पाएंगे," इस कर्मचारी ने कहा. उसने आगे यह भी बताया कि "दाल-चावल" तक खा पाना भी एक संघर्ष ही लगता है.
यूएनआई के तीन कर्मचारियों ने हमें बताया कि वे पेयचेक टू पेयचेक की जिंदगी जीने के लिए एनजीओ और परोपकारी लोगों पर निर्भर हैं. "कुछ एनजीओ ने प्रोविजन्स खरीदें कुछ ने हमारे बच्चों के स्कूल की फीस भरी. जिंदा रहने के लिए हमें अपने स्वाभिमान का आखिरी तिनका तक गंवाना पड़ा है" एक कर्मचारी ने कहा.
कई यूएनआई कर्मियों ने अदालत का रुख किया है: प्रबंधन ने ऐसे मामलों की कुल संख्या का खुलासा करने से इंकार कर दिया है लेकिन कुछ कर्मचारियों का कहना है कि कुल मामलों की संख्या 100 से ज्यादा है.
एजेंसी में 37 सालों तक काम करने के बाद अक्टूबर, 2018 में रिटायर होने वाले अजय गुप्ता को 33 महीनों का बकाया वेतन मिलना था लेकिन सालों की कानूनी कार्रवाई के बाद उन्हें सिर्फ 13 महीनों का ही बकाया मिला.
न्यूज़लॉन्ड्री ने शिकायत की जो भी प्रतियां देखी उनके अनुसार अजय गुप्ता सबसे पहले राजस्थान के श्रम विभाग गए थे. सितंबर 2018, में श्रम अदालत ने यूएनआई को श्री गुप्ता के वेतन की कुल बकाया राशि को नौ प्रतिशत ब्याज समेत लौटाने का आदेश दिया. लेकिन एजेंसी इस मामले को लेकर 2019 में उच्च न्यायालय में चली गई और माननीय उच्च न्यायालय ने एजेंसी की याचिका खारिज कर दी. इसके साथ ही 2021 में श्रम अदालत ने एजेंसी के मैनेजमेंट के खिलाफ अदालत की अवेहलना का आदेश जारी कर दिया. श्री गुप्ता का कहना है कि उन्हें आज भी करीब 10 लाख रुपए के बकाए का भुगतान नहीं किया गया.
एडिटर इन चीफ श्री कौल ने बताया कि मैनजमेंट बाकी लोगों के साथ एक आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट के लिए कोशिशें कर रहा है. "अजय गुप्ता के साथ भी इस मसले पर बातचीत जारी है और हमें उम्मीद है कि जल्द ही या थोड़े और वक़्त में ये मामला भी निपट जायेगा," उन्होंने कहा.
'हद दर्जे की लापरवाहियां' और सब्सक्रिप्शन्स खो देना
लेकिन हालात इतने खराब कैसे हुए, वो भी एक ऐसी न्यूज़ एजेंसी के जिसे एक वक्त प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया का प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखा गया और जिसने सबसे पहले राजीव गांधी की हत्या की खबर दी थी?
1961 में एक अंग्रेजी न्यूज़ एजेंसी के तौर पर शुरुआत करने वाली यूएनआई ने आने वाले सालों में कुछ दूसरी भाषाओं में भी सेवाएं देना शुरू की. अनेक मीडिया घराने इसे सब्सक्राइब करते रहें और ये सिलसिला यूं ही जारी रहा. यूएनआई के पूर्व ब्यूरो चीफ डीजे वॉल्टर स्कॉट के अनुसार इसकी आय अखबारों, टीवी चैनलों के सब्सक्रिप्शन से आती है और एजेंसी का मैनेजमेंट अलग-अलग अखबारों से जुड़े बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के जरिए किया जाता है.
दूसरी न्यूज़ एजेंसियों की तरह यूएनआई अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसियों और भारतीय मीडिया के बीच एक पुल का काम करता है. "द एसोसिएटेड प्रेस और रायटर्स का यूएनआई और पीटीआई के साथ एक करार है, जिसमें हर चार साल में एक बार अदला-बदली होती है. हालांकि भूमंडलीकरण के बाद अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की पहुंच सीधे-सीधे भारतीय मीडिया तक हो गई है, यह कारण भी न्यूज़ एजेंसियों की अहमियत को कम करने के लिए जिम्मेदार है," 2012 में यूएनआई छोड़ने वाले वॉल्टर स्कॉट ने बताया. स्कॉट ने यह भी बताया कि यह एजेंसी उस वक्त फली-फूली जब स्थानीय भाषा के मीडिया घराने भारत के सभी कस्बों और शहरों में पत्रकार रखने का खर्च नहीं उठा सकते थे.
इसके बाद आये तूफानी झटके.
हर महीने 13-15 लाख रुपए का भुगतान करने वाले द हिंदू जैसे बड़े और अहम सब्सक्राइबर ने 2007 में अपना सब्सक्रिप्शन वापस ले लिया और देखा-देखी दूसरे बहुत से अखबारो ने भी इस कार्रवाई की नकल की. एक बहुत बड़ा झटका 2020 में तब लगा जब प्रसार भारती ने दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो का सब्सक्रिप्शन खत्म कर दिया.
इस दलील को सामने रखते हुए कि अपने घाटे की भरपाई के लिए मैनेजमेंट दूसरे रास्ते भी तलाश रहा है, अजय कौल ने कहा, "12 सालों से ज्यादा समय से यूएनआई फंड्स के लिए बुरी तरह हाथ-पांव मार रहा है. प्रसार भारती हमें सालाना 6.5 करोड़ रुपए का भुगतान करता था लेकिन अक्टूबर 2020 में उसके सब्सक्रिप्शन से हाथ खींच लेने के बाद से हमारा घाटा कई गुना बढ़ गया है."
मणिपाल ग्रुप के सागर मुखोपाध्याय बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के मुखिया हैं. पिछले साल यूएनआई को फिर से खड़ा कर देने के वादे के साथ उन्होंने चेयरमैन का पद संभाला. लेकिन ग्रुप कोई भी नया निवेश लेकर नहीं आया बल्कि यूएनआई ऑल इंडिया एम्प्लॉयीज फ्रंट के अनुसार इस ग्रुप ने 30 से ज्यादा कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को दूसरे कर्मचारियों के आर्थिक संकट के इस दौर में मोटी तनख़्वाह पर प्रमुख पद संभालने को दे दिए हैं.
मणिपाल ग्रुप के कानूनी मामलों के अध्यक्ष बिनोद मंडल और वकील पवन कुमार शर्मा भी बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के सदस्य हैं. यूएनआई के बड़े शेयरधारकों में जागरण प्रकाशन लिमिटेड, कस्तूरी एंड संस लिमिटेड, एक्सप्रेस पब्लिकेशन (मदुरै), एच टी मीडिया लिमिटेड, स्टेट्समैन लिमिटेड, नव भारत प्रेस (भोपाल) लिमिटेड, एबीपी प्राइवेट लिमिटेड और टाइम्स ऑफ इंडिया आदि शामिल हैं.
शर्मा ने यूएनआई के इस बुरी स्थिति के लिए अखबारों के कारोबार में आने वाली गिरावट को जिम्मेदार ठहराया. "यूएनआई की ऑनलाइन मौजूदगी न के बराबर है. इसके कर्मचारी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रति अपडेट रहने के लिए प्रक्षिशित नहीं है. मणिपाल मीडिया को यूएनआई से जुड़े पूरे एक साल भी नहीं हुए. यूएनआई की स्थिति में इतनी ज्यादा गिरावट पिछले 12 सालों से सुधारात्मक उपाय अमल में न लाने के कारण आई है."
यह कहते हुए कि सब्सक्रिप्शन्स को बढ़ाने के लिए कुछ कदम उठाए जा रहे हैं, शर्मा ने आगे कहा मणिपाल ग्रुप को शेयरधारकों द्वारा प्रबंधन के काम के लिए चुना गया था. "वे लोग अपनी सेवाएं देने वाले स्वतंत्र और पेशेवर लोग हैं."
इसी बीच कुछ लोगों ने मैनेजमेंट की ओर से लिए गए "बुरे फैसलों" की ओर भी उंगली उठाई.
"12 साल पहले मैनजमेंट ने यूनी टीवी को चार भाषाओं- हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और कन्नड़ में शुरू किया. वैसे तो ये सब्सक्रिप्शन पाने की दिशा में उठाया गया एक उचित कदम था लेकिन औसत गुणवत्ता के कारण इसे दो सालों के भीतर ही बंद करना पड़ गया. अगर किसी तीसरे पक्ष को कॉन्ट्रैक्ट न देकर ये काम अपने यहां ही कराया जाता तो इतनी बड़ी नाकामी देखने को नहीं मिलती," यूएनआई में कार्यरत एक सीनियर इंजीनियर ए कांडासामी ने कहा.
डेक्कन क्रॉनिकल के पूर्व संपादक आर भगवान सिंह ने कहा कि एजेंसी के पास समय के साथ आगे बढ़ने के लिए ऐडेड सर्विसेज भी होनी चाहिए, खासकर तब जब इसके सब्सक्रिप्शन का दाम पीटीआई से बहुत कम हो. "यूएनआई" के ट्रायल्स बहुत बड़ी नाकामी थे. एजेंसी ने एक फोटो सर्विस जोड़ी लेकिन इस काम को करने लिए पेशेवर लोगों की भर्ती नहीं की. तस्वीरों की गुणवत्ता से समझौता किया गया था."
गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए नामों को बदल दिया गया है.
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