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जारी हैं देश में भूख से मौतें, सरकार के खातों में एक भी नहीं
देश की सर्वोच्च अदालत के सामने 18 जनवरी, 2022 को जब भारत सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा, "भारत में एक भी मौत भुखमरी से नहीं हुई है." उसी वक्त मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना के साथ पीठ में शामिल जस्टिस एस बोपन्ना और जस्टिस हिमा कोहली ने कहा, "क्या हम इस बात का पूरी तरह से यकीन कर लें कि भारत में एक भी मौत भुखमरी से नहीं हुई है?"
प्रधान पीठ ने अटार्नी जनरल से कहा, "क्या इस कथन को रिकॉर्ड में लिया जाए?" इस सवाल का स्पष्ट जवाब सुप्रीम कोर्ट को नहीं मिल सका. सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल बोले कि राज्यों ने भुखमरी से होने वाली मौत के आंकड़े नहीं दिए हैं लिहाजा उन्हें इसके लिए जानकारी लेनी होगी. बहरहाल सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राज्यों और संघ शासित प्रदेशों से भी भुखमरी व कुपोषण से मौत के आंकड़े देने का आदेश दिया है.
भुखमरी और कुपोषण से मौत को लेकर दशकों से उलझे और अनुत्तरित इस सवाल पर छानबीन में पाया गया कि भुखमरी की पहचान करने वाली जटिल प्रक्रिया ‘ऑटोप्सी’ का प्रभावी विकल्प अब तक नहीं बन सका है. यहां तक कि बहुआयामी गरीबी झेलने वाले झारखंड जैसे राज्य में भूख से मौत का पता लगाने वाले प्रोटोकॉल की उपस्थिति के बावजूद भुखमरी की रिपोर्टिंग नहीं की जा रही है.
राइट टू फूड कैंपेन के मुताबिक कुल 13 राज्यों में 2015-2020 के बीच 108 मौतें भुखमरी से हुई हैं. इनमें ज्यादातर राज्य जहां सर्वाधिक मौते हुई हैं वह बहुआयामी गरीबी झेल रहे हैं. मसलन नीति आयोग के पहले बहुआयामी गरीबी सूचकांक में बिहार (51.9 फीसदी) शीर्ष पर है जबकि उसके बाद झारखंड (42.16), उत्तर प्रदेश (37.9 फीसदी) और मध्य प्रदेश (36.6 फीसदी) शामिल है.
स्टार्वेशन डेथ से लड़ने के लिए देश में पहली बार उठा कदम निष्प्रभावी
देश में पहली बार झारखंड में भूख से होने वाली मौतों के मामलों की जांच के लिए एक प्रोटोकॉल बनाया गया था. 28 फरवरी 2018 को खाद्य सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग की ओर से नौ सदस्यीय जांच समिति ने यह तैयार किया. इस प्रोटोकॉल में भुखमरी यानी स्टार्वेशन के बारे में कई स्रोतों से परिभाषाएं लिखी गईं लेकिन एक्सपर्ट के मुताबिक स्टार्वेशन डेथ की पहचान के लिए इसमें स्पष्टता में काफी कमी है. इसके अलावा भूखमरी और कुपोषण से मौत की स्पष्ट अलग पहचान के मानक नहीं हैं.
इस प्रोटोकॉल में जयसिंह पी मोदी के हवाले से लिखा गया है कि शरीर में पोषण संतुलन को बनाए रखने के लिए आवश्यक भोजन का नियमित और निश्चित मात्रा न मिल पाना भुखमरी है. इसके अलावा तीन तरह की भुखमरी का जिक्र इस प्रोटोकॉल में किया गया है. पहली है सुसाइडल, दूसरी है होमोसाइडल और तीसरी एक्सीडेंटल. इन तीनों में दुर्लभ सुसाइडल स्टार्वेशन है जबकि बड़ी संख्या में भुखमरी से मौत का मामला एक्सीडेंटल स्टार्वेशन में ही पाया जाता है, जो कि अकाल, आपदा, युद्ध जैसी घटनाओं के कारण होता है. वहीं, वृद्ध, असहाय, मानसिक रोगी, अनाथ बच्चे को पर्याप्त भोजन न मिल पाना होमोसाइडल स्टार्वेशन कहलाता है.
प्रोटोकॉल में भुखमरी रिपोर्ट के लिए यह भी लिखा गया है "यदि परिवार के लोग यह रिपोर्ट करें कि भोजन की अनुपलब्धता के कारण मृतक ने उस माह में जरूरत से भी कम भोजन ग्रहण किया." इसके अलावा इस प्रोटोकॉल में वर्बल ऑटोप्सी यानी सवालों के एक समूह को शामिल किया गया है जो कि मृतक के परिवार या उसे जानने वालों से पूछकर तैयार करने का भी निर्देश दिया है.
झारखंड में राइट ऑफ फूड कैंपेन से जुड़े कार्यकर्ता सिराज ने बताया कि राज्य में प्रोटोकॉल बना जरूर लेकिन वह अनुपयोगी रहा है. झारखंड में फील्ड सर्वे के दौरान मैंने पाया है कि जहां घटनाएं हुईं वहां ज्यादातर लोग पहले से ही एक वक्त का खाना नहीं खाते और धीरे-धीरे स्टार्वेशन डेथ की स्थिति में पहुंच जाते हैं. मृतकों में ज्यादातर के पास आधार कार्ड नहीं थे. प्रोटोकॉल में परिभाषाओं को उलझाया गया है और झारखंड के भुखमरी की प्रवृत्ति को ध्यान में नहीं रखा गया है.
प्रोटकॉल समिति में शामिल रहे अशर्फी नंद प्रसाद ने कहा कि प्रोटोकॉल में बहुत सी चीजों को शामिल किया गया है लेकिन सरकार हर तरह से ऐसी चीजों से बचने की कोशिश करती है. यह सही है कि प्रोटोकॉल के हिसाब से अभी तक कोई जांच नहीं किया गया है.
अंडर रिपोर्टिंग का संकट
सुप्रीम कोर्ट में भुखमरी के ताजा मामले में संबंधित जनहित याचिका की पैरवी करने वाली अधिवक्ता आशिमा मांडला ने बताया कि भूख से मौत की पहचान को लेकर मुख्य समस्या इनके बारे में जानकारी सामने आने के बाद भी रिपोर्ट न किए जाने की है. झारखंड-बिहार में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब मृतक के पोस्टमार्टम में यह साफ हुआ है कि उनके पेट में अनाज का एक दाना तक नहीं था, फिर भी इसकी रिपोर्टिंग सरकारी एजेंसियों के जरिए नहीं की गई.
राइट टू फूड कैंपेन से जुड़ी आयशा खान ने 2015 से लेकर मई, 2020 के बीच भुखमरी से मरने वालों की सूचनाओं को कार्यकर्ताओं और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार किया है. इसके मुताबिक 13 राज्यों में कुल 108 मौतें भूख के कारण हुई हैं. मृतकों की इस सूची में 05 से 80 आयु वर्ग के दलित, पिछड़ा, आदिवासी और सामान्य वर्ग के लोग शामिल हैं. इन आंकड़ों के मुताबिक झारखंड में सर्वाधिक 29 मौतें, उत्तर प्रदेश में 22 मौतें, ओडिशा में 15 मौतें, बिहार में 8 मौतें, कर्नाटक में 7, छत्तीसगढ़ में 6, पश्चिम बंगाल में 6, महाराष्ट्र में 4, मध्य प्रदेश में 4, आंध्र प्रदेश में 3, तमिलनाडु में 3, तेलंगाना में 1, राजस्थान में 1 मौत शामिल है.
क्रानिक पॉवर्टी रिसर्च सेंटर और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के तहत प्रकाशित हंगर अंडर न्यूट्रिशन एंड फूड सिक्योरिटी नाम के वर्किंग पेपर में एनसी सक्सेना बताते हैं कि भूख और भुखमरी क्षेत्रीय व भौगोलिक आयाम वाली होती है. भारत के किसी भी राज्य में गैर आदिवासी क्षेत्र के मुकाबले आदीवासी क्षेत्र ज्यादा खाद्य असुरक्षा वाले क्षेत्र हैं.
राइट टू फूड कैंपेन की पहल से पिछले पांच वर्षों में दर्ज की गई भूख से मौतों में लॉकडाउन और पलायन के घटनाक्रम भी शामिल हैं. इसके अलावा ऐसे भी मृतक रहे जिनके पास आधार कार्ड नहीं था जिसके कारण उनका राशन कार्ड काम का नहीं रहा और वे अनाज हासिल करने में नाकामयाब रहे.
हमने देश में जब सख्त राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान दिल्ली से श्रावस्ती तक की यात्रा की थी, उस दौरान पाया था कि मुंबई से श्रावस्ती तक पहुंचे इंसाफ अली ने गांव के क्वारंटीन सेंटर पर पहुंचकर दम तोड़ दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो सका लेकिन परिवार और गांव वालोें ने यह स्पष्ट किया था कि श्रमिक की मौत भूख और थकान से हुई है.
पीपुल्स विजिलेंस कमेटी ऑन ह्यूमन राइट्स के संस्थापक सदस्य व मानवाधिकार कार्यकर्ता लेनिन रघुवंशी ने बताया कि पूरी तरह से भुखमरी (एब्सल्यूट स्टार्वेशन) की स्थिति मनरेगा जैसी योजना के बाद सुधरी थी लेकिन कोविड-19 ने एब्सलूट स्टार्वेशन को लौटा दिया है. कोविड-19 में कुपोषण के कारण भी अधिक मौतें हुई हैं. सरकार को इन चीजों से छिपना नहीं चाहिए बल्कि स्थितियों को स्वीकार करना चाहिए.
रघुवंशी बताते हैं कि कुपोषण की स्थितियां लगातार बनी हुई हैं. लोगों तक प्रोटीन और माइक्रोन्यूट्रिएंटस नहीं पहुंच रहा है. पैकेट्स पर फ्रंट लेबलिंग भी नहीं है ऐसे में यदि कोई अपने बच्चे को आज पैकेट फूड देता है तो वह यह नहीं जानता कि चीनी और नमक की कितनी अधिक मात्रा उसके शरीर में चली गई.
एनसी सक्सेना के वर्किंग पेपर के मुताबिक माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी एक छुपी हुई भूख है. यदि कोई व्यक्ति पर्याप्त भोजन नहीं करता है तो माइक्रोन्यूट्रिएंट्स काम नहीं करते हैं.
1970-80 के बाद से लगातार उठ रहा भुखमरी का मामला पहली बार 2001 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था. उसके बाद से अब तक न ही इसके पहचान और न ही इसे रोकने को लेकर कोई स्थायी समाधान खोजा जा सका है.
(साभार- डाउन टू अर्थ)
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